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सर्वकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 680 में से

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पृष्ठ 200

१४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
प्रत्ययैरनुपाख्येयैर्ग्रहणानुगुणैस्तथा ।
ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥ इति ।
तेन व्यञ्जकौ शब्दार्थावपीह ध्वनिशब्देनोक्तौ । किञ्च वर्णेषु तावन्मात्रपरि-
माणेष्वपि सत्सु । यथोक्तम्—
अल्पीयसापि यत्नेन शब्दमुच्चारितं मतिः ।
यदि वा नैव गृह्णाति वर्णं वा सकलं स्फुटम् ॥ इति ।
तेषु तावत्स्वेव श्रूयमाणेषु वक्तुर्योऽन्यो द्रुतविलम्बितादिवृत्तिभेदात्मा प्रसि-
द्धादुच्चारणव्यापादभ्यधिकः स ध्वनिरुक्तः । यदाह स एव—
शब्दस्योर्ध्वमभिव्यक्तेर्वृत्तिभेदे तु वैकृताः ।
ध्वनयः समुपोहन्ते स्फोटात्मा तैर्न भिद्यते ॥ इति ।
‘अनिर्वचनीय एवं व्यक्तरूप स्फोट के ग्रहण के अनुकूल प्रत्ययों से उस शब्द में, जो
ध्वनियों द्वारा प्रकाशित होता है, स्फोट का स्वरूप ज्ञात होता है ।’
इसलिए व्यञ्जक शब्द और अर्थ को भी ‘ध्वनि’ शब्द से कहा है । और भी, जिस
रूप से श्रोत्रेन्दिय द्वारा गृहीत होते हैं उस परिमाण के वर्णों में भी ( ‘ध्वनि’ शब्द से
व्यवहार होता है) । जैसा कि कहा है—
मति थोड़े भी प्रयत्न से उच्चरित शब्द को नहीं ग्रहण करती है, यदि वा सकल वर्ण
को स्फुटरूप से ग्रहण कर लेती है ।
उतने ही अंश में श्रूयमाण वर्णों में वक्ता का जो अन्य द्रुत, विलम्बित आदि
वृत्ति भेद रूप प्रसिद्ध उच्चारण व्यापार से अधिक है वह ‘ध्वनि’ कहा गया है । जो कि
उन्होंने ही कहा है—
‘( स्फोटरूप ) शब्द की अभिव्यक्ति के पहले जो वैकृत शब्द ( द्रुत आदि ) वृत्तियों
के भेद में ‘ध्वनि’ मालूम पड़ते हैं, स्फोट उनसे भिन्न नहीं होता ।’
अर्थात् अनिर्वचनीय, व्यक्तरूप स्फोट के ग्रहण के अनुकूल, प्रत्ययों से उस शब्द में, जो
ध्वनियों द्वारा प्रकाशित होता है, स्फोट का स्वरूप ज्ञात होता है। मतलब यह कि जो शब्द
श्रूयमाण वर्ण रूप ध्वनियों से ग्रहण के अनुकूल, अनिर्वचनीय प्रत्ययों द्वारा प्रकाशित होता है उसे
ही ‘स्फोट’ का स्वरूप अवधारण किया जाता है । इस प्रकार जब वैयाकरणों ने ‘व्यञ्जक’ को ‘ध्वनि’
माना तब आलंकारिकों ने उसी समानता पर व्यञ्जक शब्द और अर्थ को भी अपने यहाँ ‘ध्वनि’
कहा। यहाँ तक ‘ध्वनि’ को लेकर व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जक शब्द और व्यञ्जक अर्थ को ‘ध्वनि’ कहने
की प्रवृत्ति की चर्चा हुई ।
अब व्यञ्जकत्व रूप व्यापार को ‘ध्वनि’ कहने की प्रवृत्ति किस आधार पर है, इसे स्पष्ट करते
हैं । वैयाकरणों के अनुसार जिन वर्णों का हम उच्चारण करते हैं उसकी अभिव्यक्ति में द्रुत एवं विलम्बित
आदि प्रकारों से अन्तर पड़ जाता है । अर्थात् हम कभी धीरे धीरे और कभी शीघ्र उच्चारण करते
हैं । इस प्रकार शब्द में अन्तर होते हुए भी अर्थ में अन्तर नहीं होता । वैयाकरणों ने शब्द के
दो रूप माने हैं एक प्राकृत दूसरा वैकृत । हम जो उच्चारण करते हैं वे वैकृत शब्द हैं और
प्राकृत शब्द उन वैकृत शब्दों के उच्चारण के बाद उत्पन्न होने वाला नित्य स्फोट रूप शब्द है ।
द्रुत, विलम्बित आदि वृत्तियाँ या स्वरभेद वैकृत शब्दों में हुआ करते हैं । इस प्रकार वक्ता की