ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १२९
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ध्वन्यालोकः
निमित्तनिमित्तिभावे चायमेव न्यायः ।
निमित्तनिमित्तिभाव में भी यही नियम लागू होगा।
लोचनम्
दिना विशेषस्यापि प्राधान्यमित्यन्तेन १ एतमेव न्यायं निमित्तनैमित्तिकभावेऽति-
दिशंस्तस्यापि द्विप्रकारतां दर्शयति—निमित्तेति । कदाचिन्निमित्तमप्रस्तुतं
सदभिधीयमानं नैमित्तिकं प्रस्तुतमाक्षिपति । यथा—
ये यान्त्यभ्युदये प्रीतिं नोञ्झन्ति व्यसनेषु च ।
ते बान्धवास्ते सुहृदो लोकः स्वार्थपरोऽपरः ॥
अत्राप्रस्तुतं सुहृद्बान्धवरूपत्वं निमित्तं सज्जनासक्त्या वर्णयति नैमित्तिकीं
श्रद्धेयवचनतां प्रस्तुतामात्मनोऽभिव्यङ्क्तुम्; तत्र नैमित्तिकप्रतीतावपि निमित्त-
वहाँ भी, सामान्य और विशेष के युगपत् प्राधान्य १ में विरोध नहीं है, यह कहा जा
चुका है। इस प्रकार दो भेदों वाला भी पहला प्रकार विचार कर लिया गया, जब
इत्यादि से लेकर विशेष भी प्राधान्य—तक। इसी नियम को निमित्तनैमित्तिकभाव
में भी अतिदेश (लागू) करते हुए उसका द्विविधत्व दिखाते हैं—निमित्त···। कभी
निमित्त (कारण) अप्रस्तुत अभिधीयमान होकर नैमित्तिक कार्य (अप्रस्तुत) का
आक्षेप करता है। जैसे—
'जो अभ्युदय होने पर प्रसन्न होते हैं और दुःख पड़ने पर त्याग नहीं करते वे
बान्धव हैं, वे सुहृद हैं, दूसरे लोग स्वार्थपरायण हैं।'
यहाँ अप्रस्तुत सुहृद्-बान्धव रूप निमित्त को प्रस्तुत नैमित्तिक श्रद्धेयवचनता के
व्यञ्जनार्थ सज्जन के प्रति गौरव के कारण वर्णन करते हैं। वहाँ नैमित्तिक की
१. जैसा कि वृत्तिग्रन्थ का निर्देश है, अप्रस्तुतप्रशंसा के सादृश्यमूलक भेद के अतिरिक्त चार
भेदों में ध्वनि का अवसर क्यों नहीं है उसे यहाँ स्पष्टरूप से अवगत कर लेना चाहिए। अप्रस्तुत
से प्रस्तुत का आक्षेप ही 'अप्रस्तुतप्रशंसा' है। जब कोई अप्रस्तुत और प्रस्तुत अर्थात् अभिधीयमान
और प्रतीयमान में सामान्यविशेषभावरूप या निमित्तनिमित्तिभावरूप सम्बन्ध होगा तब दोनों बराबर
प्रधान होंगे। क्योंकि सम्बन्ध की स्थिति में दोनों का बराबर होना अनिवार्य है। और जब
प्रधानता समानरूप से दोनों में रहेगी तो किसी प्रकार 'ध्वनि' का प्रसंग हो नहीं सकता, क्योंकि
वाच्य के गुणीभाव और व्यंग्य के प्राधान्य की विवक्षा में ही 'ध्वनि' का प्रसंग होता है। सामान्य
और विशेष के युगपत् प्राधान्य में विरोध नहीं है, अर्थात् एक स्थान में, एक समय में दोनों प्रधान
हो सकते हैं। सम्बन्ध की बात को लेकर यह कह सकते हैं कि जब सामान्यरूप अप्रस्तुत
अभिधीयमान होगा और विशेषरूप प्रस्तुत प्रतीयमान होगा तब, क्योंकि सामान्य के अन्तर्गत
सभी विशेष आ जाते हैं (निर्विशेषं न सामान्यम् = विना विशेष के सामान्य नहीं होता), इस
प्रकार 'अविनाभाव' होने के कारण जब सामान्यरूप अप्रस्तुत अभिधीयमान का भी प्राधान्य
होगा। इसी प्रकार जब विशेषरूप अप्रस्तुत अभिधीयमान से सामान्यरूप प्रस्तुत का आक्षेप होगा
तब जिस प्रकार सामान्य का प्राधान्य होगा उसी प्रकार विशेष का भी होगा, क्योंकि सामान्य में
६ ध्व०