धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० ] धम्मपद [ ११।१०
अनुवाद—अल्पश्रुत (=अज्ञानी) पुरुष बैलकी भाँति जीर्ण होता है।
उसका मांस ही बढ़ता है, प्रज्ञा नहीं बढ़ती।
१५३-अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिब्बिसं ।
गहकारकं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं ॥८॥
(अनेकजातिसंसारं समधाविषं अनिर्विशमानः ।
गृहकारकं गवेषयन्, दुःखा जातिः पुनः पुनः ॥८॥)
१५४-गहकारक ! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि ।
सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसङ्घितं ।
विसङ्खारगतं चित्तं तण्हानं खयमन्झगा ॥६॥
(गृहकारक, दृष्टोऽसि पुनर्गेहं न करिष्यसि ।
सर्वास्ते पार्श्विका भग्ना गृहकूटं विसंस्कृतम् ।
विसंस्कारगतं चित्तं तृष्णानां क्षयमभ्यगात् ॥६॥)
अनुवाद—बिना रुके अनेक जन्मों तक संसारमें दौड़ता रहा। (इस काया
रूपी) कोठरीको बनानेवाले (=गृहकारक) को खोजते
पुनः पुनः दुःख (-मय) जन्म में पड़ता रहा। हे गृह-
कारक ! (अब) तुझे पहिचान लिया, (अब) फिर तू
घर नहीं बना सकेगा। तेरी सभी कड़ियाँ भग्न हो गयीं,
गृहका शिखर भी निर्बल हो गया। संस्कार-रहित चित्तसे
तृष्णाका क्षय हो गया।
बाराणसी (ऋषिपत्तन) महाधनी सेठका पुत्र
१५५-अचरित्वा ब्रह्मचरियं अलद्धा योब्बने धनं ।
जिण्णकोञ्चा'व झायन्ति खीशमच्छे'व पल्लले ॥१०॥