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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

२६।३८ ] ब्राह्मणवग्गो [ १८५
अनुवाद-मानुष(-भोगोंके) कामोंको छोड़, दिव्य (भोगोंके) कामको
भी ( जिसने ) त्याग दिया, सारे ही कामोंमें जो आसक्त
नहीं है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।
४१८-हित्वा रतिञ्च अरतिञ्च सीतीभूतं निरूपधिं ।
सब्बलोकाभिभुं वीरं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३६॥
(हित्वा रतिं चाऽरतिं च शीतीभूतं निरुपधिम् ।
सर्वलोकाऽभिभुवं वीरं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३६॥ )
अनुवाद-रति और अरति (=घृणा) को छोड़, जो शीतल-स्वभाव
( तथा ) क्लेशरहित है, ( जो ऐसा ) सर्वलोकविजयी,
वीर है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।
राजगह (वेणुवन) वङ्गीस (थेर)
४१९-चुतिं यो वेदि सत्तानं उपपत्तिञ्च सब्बसो ।
असत्तं सुगतं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३७॥
( च्युतिं यो वेद सत्त्वानां, उपपत्तिं च सर्वशः ।
असक्तं सुगतं बुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३७॥ )
अनुवाद-जो प्राणियोंकी च्युति (=मृत्यु) और उत्पत्तिको भली
प्रकार जानता है, (जो) आसक्तिरहित सुगत (=सुंदर
गतिको प्राप्त) और बुद्ध (=ज्ञानी) है, उसे मैं ब्राह्मण
कहता हूँ ।
४२०-यस्स गतिं न जानन्ति देवा गन्धव्वमानुसा ।
खीणासवं अरहन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३८॥

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