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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

१८० ] धम्मपदं [ २६।२५
(निधाय दण्डं भूतेषु त्रसेषु स्थावरेषु च ।
यो न हन्ति न घातयति तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२३॥)
अनुवाद—चर-अचर ( सभी ) प्राणियोंमें प्रहारविरत हो, जो न
मारता है, न मारनेकी प्रेरणा करता है, उसे मैं ब्राह्मण
कहता हूँ ।
जेतवन चार श्रामणेर
४०६-अविरुद्धं विरुद्धेसु अत्तदण्डेसु निब्बुतं ।
सादानेसु अनादानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२४॥
( अविरुद्धं विरुद्धेषु, आत्तदण्डेषु निवृत्तम् ।
सादानेष्वनादानं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२४॥)
अनुवाद—जो विरोधियोंके बीच विरोधरहित रहता है, जो दंड-
धारियोंके बीच ( दण्ड-)रहित है, सग्राहियोंमें जो
सग्रहरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।
राजगृह ( वेणुवन ) महापन्थक ( थेर )
४०७-यस्स रागो च दोसो च मानो मक्खो च पातितो ।
सासपोरिव आरग्गा तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२५॥
( यस्य रागश्च द्वेषश्च मानो म्रक्षश्च पातितः ।
सर्षप इवाऽऽराग्रात् तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२५॥)
अनुवाद—आरके ऊपर सरसोकी भांति, जिसके ( चित्तसे ) राग, द्वेष,
मान, डाह, फेंक दिये गये हैं, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।