धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६।२३ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७९
जान लेता है, जिसने अपने बोझको उतार फेंका, और जो
आसक्तिरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।
राजगृह ( गृध्रकूट ) खेमा ( भिक्षुणी )
४०३-गम्भीरपञ्ञं मेधाविं मग्गामग्गस्स कोविदं ।
उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२१॥
( गंभीरप्रज्ञं मेधाविनं मार्गामार्गस्य कोविदम् ।
उत्तमार्थमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२१॥
अनुवाद-जो गम्भीर प्रज्ञावाला, मेधावी, मार्ग-अमार्गका ज्ञाता,
उत्तम पदार्थ (=सत्य) को पाये है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।
जेतवन ( पब्भारवासी ) तिस्स ( थेर )
४०४-असंसट्ठं गहट्ठेहि अनागारेहि चूभयं ।
अनोकसारिं अप्पिच्छं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२२॥
( असंसृष्टं गृहस्थैः, अनागारैश्चोभाभ्याम् ।
अनोकःसारिणं अल्पेच्छं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२२॥
अनुवाद-घरवाले (=गृहस्थ ) और बेघरवाले दोनों हीमें जो लिप्त
नहीं होता, जो बिना ठिकानेके घूमता तथा बेचाह है,
उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।
जेतवन ( कोई भिक्षु )
४०५-निधाय दण्डं भूतेसु तसेसु थावरेसु च ।
यो न हन्ति न घातेति तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२३॥