धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ ] धम्मपदं [ २५।१७
( यतो यतः संमृशति स्कन्धानां उदयव्ययम् ।
लभते प्रीतिप्रामोद्यं अमृतं तद् विजानताम् ॥ १५ ॥)
अनुवाद—( पुरुष ) जैसे जैसे ( रूप, वेदना, संज्ञा, सस्कार, विज्ञान
इन ) पाँच स्कन्धोंकी उत्पत्ति और विनाश पर विचार
करता है, ( वैसे ही वैसे, वह ) ज्ञानियोंकी प्रीति और
प्रमोद ( रूपी ) अमृतको प्राप्त करता है ।
३७५–तत्रायमादि भवति इध पञ्ञस्स भिक्खुनो ।
इन्द्रियगुत्ती सन्तुट्ठी पातिमोक्खे च संवरो ।
मित्ते भजस्सु कल्याणे सुद्धाजीवे अतन्दिते ॥१६॥
( तत्राऽयमादिर्भवतीह प्राज्ञस्य भिक्षोः ।
इन्द्रियगुप्तिः सन्तुष्टिः प्रातिमोक्षे च संवरः ।
मित्राणि भजस्व कल्याणानि शुद्धाजीवान्यतन्द्रितानि ॥१६॥)
अनुवाद—यहाँ प्राज्ञ भिक्षुको आदि( में करना ) है—इन्द्रिय-
संयम, सन्तोष और प्रातिमोक्ष(=भिक्षुओंके आचार )की
रक्षा । ( वह, इसके लिये ) निरालस, शुद्ध जीविकावाले,
अच्छे मित्रोंका सेवन करे ।
३७६–पटिसन्थारवुत्तस्स आचारकुसलो सिया ।
ततो पामोज्जबहुलो दुक्खस्सन्तं करिस्सति ॥ १७॥
( प्रतिसंस्तारवृत्तस्याऽऽचारकुशलः स्यात् ।
ततः प्रामोद्यबहुलो दुःखस्याऽन्तं करिष्यति ॥१७॥)
अनुवाद—जो प्रेम सत्कार स्वभाववाला तथा आचार( शास्त्र)में
निपुण है, वह सानन्द दुःखका अन्त करेगा ।