धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५।१५ ] भिक्खुवग्गो [ १६५
मा लोहगोलं गिल पमत्तः,
मा क्रन्दीः दुखमिदमिति दह्यमानः ॥१२॥)
अनुवाद—हे भिक्षु ! ध्यानमें लगो, मत गफलत करो, तुम्हारा चित्त
मत भोगोके चक्करमें पडें, प्रमत्त होकर मत लोहेके गोलेको
निगलो, '( हाय ! ) यह दुःख' कहकर दग्ध होते ( पीछे )
मत तुम्हें क्रन्दन करना पडे ।
३७२–नत्थि झानं अपञ्ञस्स पञ्ञा नत्थि अझायतो ।
यम्हि झानञ्च पञ्ञा च स वे निब्बाणसन्तिके ॥१३॥
( नाऽस्ति ध्यानमप्रज्ञस्य प्रज्ञा नाऽस्त्यध्यायतः ।
यस्मिन् ध्यानं च प्रज्ञा च सवै निर्वाणाऽन्तिके ॥१३॥)
अनुवाद—प्रज्ञाविहीन ( पुरुष ) को ध्यान नहीं ( होता ) है, ध्यान
( एकाग्रता ) न करनेवालेको प्रज्ञा नहीं हो सकती । जिसमें
ध्यान और प्रज्ञा ( दोनों ) हैं, वही निर्वाणके समीप है ।
३७३–सुञ्ञागारं पविट्ठस्स सन्तचित्तस्स भिक्खुनो ।
अमानुसी रती होति सम्माधम्मं विपस्सतो ॥१४॥
( शून्यागारं प्रविष्टस्य शान्तचित्तस्य भिक्षोः ।
अमानुषी रतिर्भवति सम्यग् धर्मं विपश्यतः ॥१४॥)
अनुवाद—शून्य (=एकान्त ) गृहमें प्रविष्ट, शान्तचित्त भिक्षुको
भली प्रकार धर्मका साक्षात्कार करते, अमानुषी रति
(=आनंद ) होती है ।
३७४–यतो यतो सम्मसति खन्धानं उदयव्वयं ।
लभती पीतिपामोज्जं अमतं तं विजानतं ॥१५॥