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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

२५।२० ] भिक्खुवग्गो [ १६७
जेतवन पाँच सौ भिक्षु
३७७-वस्सिका विय पुप्फानि मद्दवानि पमुञ्चति ।
एवं रागञ्च दोसञ्च विप्पमुञ्चेथ भिक्खवो ॥१८॥
( वर्षिका इव पुष्पाणि मर्दितानि प्रमुंचति ।
एवं रागं च द्वेषं च विप्रमुंचत भिक्षवः ॥१८॥
अनुवाद—जैसे जूही कुम्हलाये फूलोंको छोड़ देती है, वैसे ही हे
भिक्षुओ ! ( तुम ) राग और द्वेषको छोड़ दो ।
जेतवन ( शान्तकाय थेर )
३७८-सन्तकायो सन्तवाचो सन्तवा सुसमाहितो ।
वन्तलोकामिसो भिक्खू उपसन्तो 'ति वुच्चति ॥१९॥
(शान्तकायो शान्तवाक् शान्तिमान् सुसमाहितः ।
वान्तलोकाऽऽमिषो भिक्षुः 'उपशान्त' इत्युच्यते ॥१९॥
अनुवाद—काया (और) बचनसे शान्त, भली प्रकार समाधियुक्त,
शान्ति सहित (तथा) लोकके आमिषको वमन कर दिये
हुए भिक्षुको 'उपशान्त' कहा जाता है ।
जेतवन लङ्कगूल (थेर)
३७६-अत्तना चोदय'त्तानं पटिवासे अत्तमत्तना ।
सो अत्तगुत्तो सतिमा सुखं भिक्खू विहाहिसि ॥२०॥
( आत्मना चोदयेदात्मानं प्रतिवसेदात्मानं आत्मना ।
स आत्मगुप्तः स्मृतिमान् सुखं भिक्षो! विहरिष्यसि ॥२०