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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१६२ ] धम्मपदं [ २५।७
( धर्म्मारामो धर्म्मरतो धर्म्मं अनुविचिन्तयन् ।
धर्म्ममनुस्मरन् भिक्षुः सद्धर्म्मान्न परिहीयते ॥५॥)
अनुवाद—धर्ममें रमण करनेवाला, धर्ममें रत, धर्मका चिन्तन करते,
धर्मका अनुसरण करते भिक्षु सच्चे धर्मसे च्युत नहीं होता ।
राजगृह ( वेणुवन ) विपक्ष-सेवक ( भिक्खु )
३६५—सलाभं नातिमञ्ञेय्य, नान्नेसं पिहयं चरे ।
अन्नेसं पिहयं भिक्खू समाधिं नाधिगच्छति ॥६॥
( स्वलाभं नाऽतिमन्येत, नाऽन्येषां स्पृहयन्, चरेत् ।
अन्येषां स्पृहयन् भिक्षुः समाधिं नाऽधिगच्छति ॥६॥)
अनुवाद—अपने लाभकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। दूसरोंके
( लाभ ) की स्पृहा न करनी चाहिये। दूसरोंके ( लाभकी )
स्पृहा करनेवाला भिक्षु समाधि (=चित्तकी एकाग्रता )को
नहीं प्राप्त करता ।
३६६—अप्पलाभोपि चे भिक्खू स-लाभं नातिमञ्ञति ।
तं वे देवा पसंसन्ति सुद्धाजीविं अतन्दितं ॥७॥
( अल्पलाभोऽपि चेद् भिक्षुः स्वलाभं नाऽतिमन्येत ।
तं वै देवाः प्रशंसन्ति शुद्धाऽऽजीवं अनन्दितम् ॥७॥)
अनुवाद—चाहे अल्प ही हो, भिक्षु अपने लाभकी अवहेलना न करे ।
उसीकी देवता प्रशंसा करते हैं, ( जो ) शुद्ध जीविकावाला
और आलस्यरहित है ।