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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

२५।५ ] भिक्खुवग्गो [ १६१
अनुवाद—कायाका संवर (=संयम ) ठीक है, ठीक है वचनका संवर;
मनका संवर ठीक है, ठीक है सर्वत्र (इन्द्रियों)का संवर;
सर्वत्र संवर-युक्त भिक्षु सारे दुःखोंसे छूट जाता है ।
जेतवन हंसघातक (भिक्षु)
३६२—हत्थसञ्‍ञतो पादसञ्‍ञतो वाचाय सञ्‍ञतो सञ्‍ञतुत्तमो ।
अज्झत्तरतो समाहितो एको सन्तुसितो तमाहु भिक्खू ॥३॥
(हस्तसंयतः पादसंयतो वाचा संयतः संयतोत्तमः ।
अध्यात्मरतः समाहित एकः सन्तुष्टस्तमाहुर्भिक्षुम् ॥३॥)
अनुवाद—जिसके हाथ, पैर और वचनमें संयम है, (जो) उत्तम
संयमी है, जो घटके भीतर (=अध्यात्म) रत, समाधियुक्त,
अकेला (और) सन्तुष्ट है, उसे भिक्षु कहते हैं ।
जेतवन कोकालिक
३६३—यो मुखसञ्‍ञतो भिक्खू मन्तभाणी अनुद्धतो ।
अत्थं धम्मञ्च दीपेति मधुरं तस्स भासितं ॥४॥
(यो मुखसंयतो भिक्षुर्मंत्रमाणी, अनुद्धतः ।
अर्थं धर्मं च दीपयति मधुरं तस्य भाषितम् ॥४॥)
अनुवाद—जो मुखमें संयम रखता है, मनन करके बोलता है,
उद्धत नहीं है, अर्थ और धर्मको प्रकट करता है, उसका
भाषण मधुर होता है ।
जेतवन धम्माराम (थेर)
३६४—धम्मारामो धम्मरतो धम्मं अनुविचिन्तयं ।
धम्मं अनुस्सरं भिक्खू सद्धम्मा न परिहायति ॥५॥
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