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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

२२।७ ] निरयवग्गो [ १३७
राजा च दण्डं गरुकं पणेति
तस्मा नरो परदारं न सेवे ॥५॥
(अपुण्यलाभश्च गतिश्च पापिका,
भीतस्य भीतया रतिश्च स्तोकिका।
राजा च दंडं गुरुकं प्रणयति
तस्मात् नरो परदारान् न सेवेत ॥ ५ ॥)
अनुवाद—प्रमादी परस्त्रीगामी मनुष्यकी चार गतियाँ हैं—अपुण्य-
का लाभ, सुखसे न निद्रा, तीसरे निन्दा, और चौथे नरक।
(अथवा) अपुण्यलाभ, बुरी गति, भयभीत (पुरुष) की,
भयभीत (स्त्री) से अत्यल्प रति, और राजाका भारी दंड
देना, इसलिये मनुष्यको परस्त्रीगमन न करना चाहिये।
जेतवन कठमाषी (भिक्षु)
३११–कुसो यथा दुग्गहीतो हत्थमेवानुकन्तति ।
सामञ्ञं दुप्परामट्ठं निरयायुपकड्ढति ॥६॥
(कुशो यथा दुर्गृहीतो हस्तमेवाऽनुकृन्तति ।
श्रामण्यं दुष्परामृष्टं निरयायोपकर्षति ॥ ६ ॥)
अनुवाद—जैसे ठीकसे न पकडनेसे कुश हाथको ही छेदता है, (इसी
प्रकार) श्रमणपन (=संन्यास) ठीकसे ग्रहण न करनेपर
नरकमें ले जाता है।
३१२-यं किञ्चि सिथिलं कम्मं सङ्किलिट्ठं च यं वतं ।
सङ्कस्सरं ब्रह्मचरियं न तं होति महप्फलं ॥७॥