धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ ] धम्मपदं [ २२।९
( यत् किंचित् शिथिलं कर्म संक्लिष्टं च यद् व्रतम् ।
संकुच्छ्रं ब्रह्मचर्यं न तद् भवति महत्फलम् ॥ ७ ॥ )
अनुवाद—जो कर्म कि शिथिल है, जो व्रत कि क्लेश (=मल )-युक्त
है, और जो ब्रह्मचर्य अशुद्ध है, वह महाफल (-दायक )
नहीं होता ।
३१३–कयिरञ्चे कयिरायेनं दळ्हमेनं परक्कमे ।
सिथिलो हि परिब्वाजो भिय्यो आकिरते रजं ॥८॥
( कुर्याच्चेत् कुर्वीतैनद् दृढमेतत् पराक्रमेत ।
शिथिलो हि परिव्राजको भूय आकिरते रजः ॥ ८ ॥ )
अनुवाद—यदि ( प्रव्रज्या धर्म ) करना है, तो उसे करे, उसमें दृढ
पराक्रमके साथ लग जावे; ढीला ढाला परिव्राजक (=
संन्यासी ) अधिक मल बिखेरता है ।
जेतवन ( कोई ईर्ष्यालु स्त्री )
३१४–अकतं दुक्कतं सेय्यो, पच्छा तपति दुक्कतं ।
कतञ्च सुकतं सेय्यो यं कत्वा नानुतप्पति ॥६॥
( अकृतं दुष्कृतं श्रेयः पश्चात् तपति दुष्कृतम् ।
कृतं च सुकृतं श्रेयो यत् कृत्वा नाऽनुतप्यते ॥६॥ )
अनुवाद—दुष्कृत (=पाप ) का न करना श्रेष्ठ है, दुष्कृत करनेवाला
पीछे अनुताप करता है, सुकृतका करना श्रेष्ठ है, जिसको
करके ( मनुष्य ) अनुताप नहीं करता ।