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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

१३६ ] धम्मपदं [ २२।४
( काषायकंठा बहवः पापधर्मा असंयताः ।
पापाः पापैः कर्मभिर्निरयं त उत्पद्यन्ते ॥२॥ )
अनुवाद—कंठमें काषाय (-वस्त्र ) डाले कितने ही पापी असंयमी हैं, जो
पापी कि ( अपने ) पाप कर्मोंसे नरकमें उत्पन्न होते हैं।
वैशाली ( वग्गुमुदातीरवासी भिक्खु )
३०८—सेय्यो अयोगुलो भुत्तो तत्तो अग्गिसिखूपमो ।
यञ्चे भुञ्जेय्य दुस्सीलो रट्ठपिण्डं असञ्ञतो ॥३॥
( श्रेयान् अयोगोलो भुक्तस्तप्तोऽग्निशिखोपमः ।
यच्चेद् भुञ्जीत दुश्शीलो राष्ट्रपिंडं असंयतः ॥३॥ )
अनुवाद—असंयमी दुराचारी हो राष्ट्रका पिंड [ =देशका अन्न ]
खानेसे अग्नि-शिखाके समान तप्त लोहेका गोला खाना
उत्तम है ।
जेतवन खेम (श्रेष्ठीपुत्र )
३०९—चत्तारि ठानानि नरो पमत्तो आपज्जती परदारूपसेवी ।
अपुञ्ञलाभं न निकामसेय्यं निन्दं ततीयं निरयं चतुत्थं ॥४॥
( चत्वारि स्थानानि नरः प्रमत्त आपद्यते परदारोपसेवी ।
अपुण्यलाभं न निकामशय्यां
निन्दां तृतीयां निरयं चतुर्थम् ॥ ४ ॥ )
३१०—अपुञ्ञलाभो च गती च पापिका,
भीतस्स भीताय रती च थोकिका ।