सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
स्रग न शीतल होइ मन, चन्द न चन्दन पास।
शीतल संगति साधु की, कीजे दादू दास ॥ 37 ॥
दादू शीतल जल नहीं, हिम नहिं शीतल होइ।
दादू शीतल संत जन, राम सनेही सोइ ॥ 38 ॥
साध बेपरवाही
दादू चन्दन कद कह्या, अपना प्रेम प्रकाश।
दह दिशि प्रगट है रह्या, शीतल गंध सुवास ॥ 39 ॥
दादू पारस कद कह्या, मुझ थीं कंचन होइ।
पारस परगट है रह्या, साच कहै सब कोइ ॥ 40 ॥
नरबिड़ रूप हठीजन
तन नहिं भूला, मन नहिं भूला, पंच न भूला प्राण।
साधु सबद क्यूँ भूलिये, रे मन मूढ अजाण ॥ 41 ॥
साधु महिमा
रत्न पदारथ माणिक मोती, हीरों का दरिया।
चिंतामणि चित रामधन, घट अमृत भरिया ॥ 42 ॥
समर्थ शूरा साधु सो, मन मस्तक धरिया।
दादू दर्शन देखतां, सब कारज सरिया ॥ 43 ॥
साधु महिमा महात्म
धरती अम्बर रात दिन, रवि शशि नावैं शीश।
दादू बलि बलि वारणें, जे सुमिरैं जगदीश ॥ 44 ॥
चन्द सूर सिजदा करैं, नाम अलह का लेइ।
दादू जमीं आस्मान सब, उन पावों सिर देइ ॥ 45 ॥
जे जन राते राम सौं, तिनकी मैं बलि जांव।
दादू उन पर वारणे, जे लाग रहे हरि नांव ॥ 46 ॥
- 188 -