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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

बादशाह ने कलश को अपने सामने वाली गद्दी पर. बैठने का इशारा किया।
किन्तु कलश खड़े ही रहे। औरंगजेब कुछ कड़ी आवाज में बोला, "क्यों कविराज
कौन-सी जागीर चाहिए? आगरा, बरेली, लखनऊ या सासाराम? बोलो कौन-
सी?"
"सिर्फ एक फरियाद लेकर आया हूँ आपके दरबार में।" कविराज का स्वर
दयनीय था।
"कैसी? और कौन-सी फरियाद?"
"शहंशाह! आप मेरे टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों के आगे डाल दें तो भी कोई
बात नहीं। किन्तु मेरे राजा के साथ आप एक राजा जैसा ही बर्ताव करें।"
कलश का कथन सुनकर बादशाह चकरा गया। उसने क्रोध से पूछा,
"किसलिए आये हो? अपनी जान बचाने के लिए या सम्भा की?"
"हम तुम्हारे आगे भीख नहीं माँग रहे हैं। तैमूर के महान वंश का दम भरने
वाले बादशाह से हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं, 'बकरे काटने वाले कसाई और
हिन्दुस्तान के सिंहासन पर बैठने वाले राजा के व्यवहार में कुछ तो फर्क होना
चाहिए'।"
कवि कलश के ऐसा बोलने से वहाँ उपस्थित सैनिक और सेवक थरथर
काँपने लगे। बादशाह की गुस्से से घूमती आँखों को देखकर ऐसा लगा मानो माथे में
घुसी जा रही हों। कलश की जबान की तलवार झपाझप चल रही थी।
"कितनी घोर विडम्बना है। 'क्या जुलूस निकाला। अपने आसुरी आनन्द का
ऐसा खुला प्रदर्शन, द्वेष का ऐसा नग्न दर्शन, दुष्ट बुद्धि का ऐसा नर्तन संसार के किसी
भी सत्ताधीश ने कभी भी न किया होगा।"
"काफिरों का सम्मान करने की हमारी यही रीति है। बेवकूफ!"
"बादशाह को दुश्मनों से तो कुछ तहजीब और दिलदारी सीखनी चाहिए।"
"किस तहजीब और दिलदारी का पाठ हमें पढ़ा रहा है तू, पागल शायर?"
बादशाह पूरी तरह खिसिया गया था।
"यह शायर थोड़ा-थोड़ा इतिहास भी जानता है। तुम्हारी और सुजा की जब
निर्णायक लड़ाई चल रही थी, तब पंजाब में मिर्जाराजा जयसिंह तुम्हारे विरोध में
लड़ रहे थे। उस समय लाख के जंगल में तुम्हारे ऊपर बहुत बुरा समय आया था।
उस जंगल में तू जयसिंह को एकदम अकेला मिल गया था। ठीक वैसे जैसे सिंह के
पंजे में किसी भेड़-बकरी का पैर आ जाए। उसी समय यदि बिना दया दिखाए
उसने तुम्हारा गला चीर दिया होता तो औरंगजेब नाम का यह संकट आज के लिए
बचा न रहता।"
कलश की उस जानकारी से बादशाह बौखला गया। अपने को सँभालते हुए
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सिपाहियों की ओर चिल्लाया, "बदमाशोऽऽ, पागलोऽऽ, क्या देख रहे हो? खींच
लो इस बेशर्म शायर को। उसकी टाँगें तोड़कर हमेशा के लिए किसी गन्दी नाली में
फेंक दो।"
बादशाह के सिपाही जल्दी से कविराज को खींचकर ले जाने लगे। उस
समय पीछे मुड़कर कलश दाँत पीसते हुए जोर-जोर से कहने लगे, "अल्लाह की
सेवा सिर्फ टोपियाँ सीने का नाटक करने से नहीं होती। पागल बादशाह, तुम्हारे
दिमाग के टाँके ही ढीले पड़ गये हैं।"
"अरे देखते क्या हो कमबख्तो? ले जाओ घसीटकर इस मूर्ख शायर को।"
बादशाह का हुक्म पाते ही सैनिक उस पर टूट पड़े किन्तु कलश उनकी
पकड़ में नहीं आ रहे थे। वे जोर जोर से कविता गा रहे थे—
'पाप कर्म करके सदा करता बिस्मिलाह
ढोंग किया, टोपी सिया मिले नहीं अल्लाह
निज दिमाग को टाँक लो पागल शाहंशाह'
कविता की इन आधी अधूरी पंक्तियों के कान में पड़ते ही बादशाह क्रोध से
पागल हो उठा। वह अपनी कटार हाथ में लेकर गरजा, "क्या सुन रहे हो? पहले
इस मगरूर शायर की जीभ काट दो। इसकी लाल चटचटाती जीभ काट दो।"
सिपाही छुरी-कटारी लेकर कलश की ओर दौड़े।
बलवान शरीर वाला एक पठान कलश की छाती पर बैठ गया। दूसरे दो
लोगों ने पैरों को गन्ने की तरह मरोड़कर पीछे खींचा। दोनों ने अपने राक्षसी हाथों
से कविराज की खोपड़ी पकड़ी। एक ने उनके मुँह पर जोर का तमाचा मारा, जबड़े
में हाथ डाला। इस प्रक्रिया में कविराज के चार दाँत टूटकर नीचे गिर गये। वह
जल्लाद कविराज की जोभ बाहर खींचने का प्रयास कर रहा था। कविराज की आँखें
सफेद पड़ गयीं। साँस फूल रही थी। इसी बीच आगे खींची हुई कविराज की जीभ
कटार से छाँट दी गयी। उनकी स्थिति आधी खोपड़ी टूटी चटपटाती मुर्गी की तरह
हो गयी। कविराज के मुँह से शब्दों की जगह रक्त की धारा बह रही थी। घायल
होने के कारण आँखों से आँसू बह रहे थे। साँसें तिलमिलाकर लम्बी हो रही थीं।
सम्भाजी :: 741

तेरह
सुराही का पानी बादशाह ने गटागट पी लिया। उसकी थकी हारी देह में थोड़ी
सजगता आयी। उसने अपने गंजे सिर पर हाथ फेरा। भावुक होता हुआ वह
उदयपुरी बेगम से बोला, “बेगम, तुम्हारे सामने एक बात कहकर मैं अपने दिल को
हल्का करना चाहता हूँ।”
“ऐसी कौन-सी बात है, मेरे आका?”
“जी हाँ बेगम। मेरी अपेक्षा इस जहन्नुमी सम्भा का बाप कितनी बड़ी
किस्मत वाला था जिसने सम्भा जैसे बहादुर बेटे को जन्म दिया। हमारे चार चार
शहजादे लेकिन बस, गधों की भीड़। इस सम्भा जैसा एकाध होनहार बच्चा हमारे
यहाँ जन्मा होता तो मैं अल्लाह से केवल दो ही चीजें माँगता—जपने की माला और
नमाज की चादर। बस इन्हीं दो चीजों को लेकर मैं एक पाक फकीर की तरह हमेशा
के लिए मक्का मदीना की यात्रा पर चला गया होता।”
उदयपुरी ने बादशाह के जीवन के अनेक चढ़ाव उतार, यश अपयश को
बहुत समीप से देखा था। किन्तु आजकल की बादशाह की मनोदशा उससे देखी
नहीं जा रही थी। उदयपुरी को अपने पति पर दया आ रही थी। वे बोलीं, “मेरे
आका हमारी इच्छा के अनुसार ही अल्लाह ने हमारा साथ दिया है। बीजापुर समाप्त
हो गया, गोलकुंडा अपनी शरण में आ गया, शिवा का बेटा भी मिल गया। लेकिन
इस विजय का आनन्द बादशाह के चेहरे पर दिखाई नहीं दे रहा है। आखिर बात
क्या है मेरे हजरत?”
बादशाह ने कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। जाप की माला को छाती से
लगाए बहुत देर तक कुरान की आयतों का मनन करता हुआ वह उसी तरह बैठा
रहा। बादशाह के मन को बहलाने के उद्देश्य से ही उदयपुरी ने कहा, “हजरत
आपकी जवानी की वह जंग आपके साथी तो क्या जानवर भी नहीं भूले होंगे। वह
बलख के आक्रमण का घमासान युद्ध। दिन ढलने लगा था, हजरत के सायंकाल के
नमाज का वक्त हो गया था। आप जंगे मैदान में ही चादर डालकर नमाज पढ़ रहे
थे। उस समय आपकी दाहिनी और बाईं ओर तोप के गोले छूट रहे थे, बाणों की
बौछारें उड़ रही थीं। उस जंगे मैदान में एक आपको छोड़कर इतना बेधड़क कोई
नहीं था। उस लड़ाई में हाथियों, घोड़ा, ढालों की आड़ में तो हर कोई जंग लड़ रहा
था किन्तु आप बिना विचलित हुए निश्चिन्त भाव से नमाज पढ़ रहे थे। आपको
देखकर लोगों की आँखों में आँसू उमड़ आये। सारे फौजी कहते थे, 'वह देखो
जिन्दा पीर' ऐसा कहते हुए जिल्लेसूबहानी की ओर उँगली उठाते थे।”
742 :• सम्भाजी

"अब्बाजान, अनेक फौजियों से यह हकीकत मैंने भी सुनी है।" शहजादी
जीनतउन्निसा ने कहा। "गुस्ताखी माफ़ अब्बाजान, मुझे भी डर लग रहा है। सन्देह
पैदा होता है। इतने-इतने बड़े युद्धों की आग झेलकर भी आप कभी डरे नहीं। आज
अपने तीनों बलवान दुश्मनों को मिट्टी में मिला देने के बाद भी आपके चेहरे पर
रौनक क्यों नहीं दिख रही है?"
"बेटी कुतुबशाही और आदिलशाही को मिट्टी में मिला दिया। वे दोनों
बादशाह हमारे कैदखाने में पड़े हैं। मरगट्ठों का सम्भा भी हमारे कैदखाने में पड़ा
जंग खा रहा है। यह भी सच है। किन्तु मराठों की इस भूमि में शिवा और सम्भा ने
ऐसा कोई सुरंगी बारूद भर रखा है, किसे पता? राजा के गिरफ्तार होने पर भी
मराठों का राज्य समाप्त नहीं हुआ है। हमारे द्वारा भेजे गये जुल्फिकार जैसे सेनानी
का हाथ अभी भी खाली है। जिस तरह पेड़ की चोटी पर बन्दर बैठते हैं वैसे ही
प्रत्येक किले के संरक्षण के लिए बुर्ज बुर्ज पर मराठे हथियार लेकर बैठे हैं। सम्भा
के गले में गिरफ्तारी की जंजीर बाँधे एक महीना हो गया पर उसकी महारानी, वह
डाकिन येसूबाई रायगढ़ का कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है। चाबुक मार मारकर
कलश और सम्भा की पीठ छलनी कर दी फिर भी वे कोई भेद देने को तैयार नहीं।
यह कैसी फतह है बिटिया?"
बादशाह बहुत देर तक विचारमग्न बैठा रहा। बाद में उसने असदखान को
अपने निजी कक्ष में बुलाकर कहा, "वजीरे आजम, इस बहादुरगढ़ की जगह ही
अशुभ है। यहाँ के महल गर्क होते हैं। यहाँ की जमीन खोदो तो शरीर पर कीड़े
उड़ते हैं। यह फतह मिलने पर भी फतह की खुशी हासिल नहीं होती।"
"हुजूर?"
"हाँऽ, असदखान। कल ही यहाँ से डेरे डंडे बाहर निकालिए। अपने दोनों
राजबन्दियों को कड़े बन्दोबस्त में साथ ले लो।"
"लेकिन जहाँपनाह, जाना कहाँ है? उनके अनुसार आदेश दूँ।"
"पुणे के आसपास।"
दूसरे दिन बादशाह के कुछ लाख घोड़े और सैनिक भीमा नदी के किनारे
किनारे ऊपर की ओर सरकने लगे। कोरेगाँव और तुलापुर के बीच छावनी बनाने का
बादशाह ने निश्चय कर लिया था। उसका विचार था कि पूना के पास पहुँचकर पूना
और चाकण के क्षेत्र पर आक्रमण किया जाए। उसके धूर्त मस्तिष्क में इस तरह के
विचार सक्रिय थे। उत्तरी कोंकण में उतरने से बादशाह की दहशत फैलने वाली थी,
जगह बदल जाने से घोड़े और सैनिक भी कुछ चैतन्य हो जाने वाले थे। बादशाह
को यह भी समीप से देखने का अवसर मिल जाता कि जुल्फिकार वहाँ कोंकण में
कौन-सा खेल खेल रहा है?
सम्भाजी 743

बादशाह के साथ वे दोनों राजबन्दी भी थे। उन पर शारीरिक और मानसिक
अत्याचार पहले की तरह ही हो रहा था। बादशाह सोचता था कि इन कैदियों की
चीख-पुकार सुनकर शायद रायगढ़ पर महारानी का कलेजा फटे और वे अपने पति
की जान बचाने के लिए तुलापुर की ओर दौड़ी चली आयें। यह कल्पना बादशाह
को भी बहुत व्यग्र कर रही थी।
3 मार्च, 1689 को बादशाह की फौज कोरेगाँव के मैदान तक पहुँच गयी।
तुलापुर के पीछे पहाड़ की तलहटी में भीमानदी के किनारे बादशाह का खेमा फैला
हुआ था। एक ओर से बहती हुई आती सन्त तुकाराम की इन्द्रायणी और दूसरी ओर
से सीमा। इन्हीं दो नदियों के संगम पर तुलापुर बसा हुआ था। दोनों नदियों के बीच
एक छोटी पहाड़ी जैसा ऊँचा स्थल था। उसी पहाड़ी पर औरंगजेब ने अपना
लालबारी डेरा खड़ा किया था। उसकी बची हुई तीन लाख सेना बडू कला और बडू
खुर्द से लेकर कोरेगाँव तक डेरा डाले पसरी थी।
लालबारी के डेरे-डंडे जिस दिन वहाँ लगे उसी दिन शाम को बादशाह ने
मियाँखान को अकेले में बुलाया। मियाँखान के कान में औरंगजेब फुसफुसाया,
"अपनी फौज के सबसे अधिक विश्वासपात्र के रूप में मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया है,
मियाँखान ?"
"जहाँपनाह आपकी खातिर तो जान भी हाजिर है।"
"हमें एक सन्देह हो रहा है। सन्देह नहीं विश्वास हो गया है कि हमारी
छावनी के कुछ लोग खुफिया तौर पर अभी भी उस सम्भा के साथ मिले हुए हैं।"
"क्या कह रहे हैं, मेरे आका?" मियाँखान के गले में जैसे कुछ अटक गया।
"इसीलिए जानबूझकर मैंने तुम्हें बुलाया है। हमारा अब किसी पर भरोसा
बचा नहीं है। कौन हैं ये मक्कार? आप ही इन्हें ढूँढ़ निकालिए।"
"ठीक है, मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूँगा, मेरे आका।" मियाँखान ने
सौगन्ध खाई।
तुलापुर की छावनी में दिन बीतने लगे। जुल्फिकारखान की ओर से फतह की
कोई सूचना नहीं आयी। मराठों की महारानी और उसकी सेना शरणागत होने का
नाम नहीं ले रही थीं। बादशाह को बहुत क्रोध आ रहा था। उन दोनों राजबन्दियों
को पकड़े पूरा महीना बीत गया था, फिर भी राजबन्दी जीवित थे। बादशाह ही
नहीं, सभी सैनिकों की आँखों के सामने अतीत की क्रूर कथाएँ बार-बार साकार हो
रही थीं। मथुरा में नेस्तनाबूद किये गये वे गोस्वामी, दारा शिकोह, भाई मतीदास,
भाई सतीदास, दयालदास और गुरु तेगबहादुर...। सम्भा और कलश को मारने
पीटने से भी कुछ हाथ नहीं लग रहा था। बादशाह को अनुभव हो रहा था कि
छावनी के सारे अधिकारी ही नहीं, फौजी बाजारों के आवारा लड़के भी उसकी ओर
744 :: सम्भाजी

देखकर उपहास से हँसते हैं। उसे दुर्बल और डरपोक समझने लगे हैं।
क्रोध के आवेश में एक सुबह औरंगजेब ने रुहुल्लाखान को हुक्म दिया,
"जाओ उस कवि कलश की आँखों में तपती सलाई घुमाकर, उस कुत्ते की आँखें
निकाल लो।"
खुफिया नौकर और अन्य फौजी बन्दीखाने की ओर दौड़े। हुक्म की तत्काल
तामील की गयी। कविराज की पानीदार आँखें और उसमें चमकती हुई पुतली
निकाल ली गयी। उनकी आँखों का केवल भयानक खाँचा बचा रह गया।
बादशाह राजबन्दियों की रोज बारीकी से पूछताछ करता था। दोनों
राजबन्दियों का शरीर व्यायाम के अभ्यास से पोषित था। इसलिए वे बहुत मजबूत
और धैर्यवान थे। उनकी जगह यदि कोई अन्य होता तो कब का तड़पकर मर गया
होता। कविराज और सम्भाजी राजा का खाना-पीना बहुत कम हो गया था।
एक दिन सवेरे-सवेरे औरंगजेब ने सम्भाजी राजा को अपने दरबार में बुलाया।
उनकी अति पानीदार आँखों को देखकर बादशाह विषाद से हँसा। अपने सरदारों के
सामने सम्भाजी राजा की खिल्ली उड़ाते हुए बोला, "सम्भाऽऽ मुझे लगता था कि
अपने दोस्त की आँखों की ओर देखकर तुझे अक्ल आ जाएगी। पर खैर चलो-"
औरंगजेब जैसे शैतान की ओर देखना सम्भाजी राजा को पाप जैसा लग रहा
था। उनकी लाल सुर्ख आँखें औरंगजेब की क्रोधाग्नि में घी का काम कर रही थीं।
बादशाह क्रोधावेश में बोला, "तेरे दोस्त की जीभ मैंने पहले ही छाँट दी है।
तुम्हारी इसलिए छोड़ रखी थी कि उससे हार की, पराभव की बात सुन सकें। किन्तु
तुम्हारी तो तकदीर ही खराब दिखती है। उसके लिए तुम्हारे तैंतीस करोड़ देवता भी
क्या कर सकते हैं?"
फतह हासिल करने पर भी बादशाह के हाथ कुछ नहीं लग रहा था। इससे
बादशाह बहुत दुखी और क्रुद्ध था। वह दाँतों से जीभ चबाते हुए धीमे स्वर में
बोला, "सम्भा अब तुम्हें नयी दृष्टि देने की जरूरत है।" पूर्व निश्चित योजना के
अनुसार पास ही तपती हुई सलाइयाँ तैयार थीं। उन तीलियों की जलती लाल भभक
औरंगजेब ने स्वयं देखी। सरदारों की भीड़ में पीछे की ओर भयभीत मियाँखान
खड़ा था। बादशाह की दृष्टि उस पर पड़ी। बादशाह ने जोर से पुकारा, "आओ
मियाँखान, सामने आओ।"
मियाँखान सामने आकर लड़खड़ाते पैरों से खड़ा हो गया। सम्भाजी राजा के
हाथ पीछे की ओर बँधे थे। मियाँखान की हैरान आँखों की ओर देखकर औरंगजेब
खुशी से हँसा। उसने कहा, "वजीरे-आज़म, सम्भा को नयी दृष्टि देने की नापाक
कारगुजारी के लिए हमें एक ईमानदार आदमी की जरूरत है। और मियाँखान के
समान दूसरा वफादार आदमी हमारी फौज में कौन मिलेगा?"
सम्भाजी :: 745

मियाँखान बादशाह के सामने टालमटोल करने लगा। तभी बादशाह जल्लादों
पर चिल्लाया, “मियाँखान ना कहता है तो सम्भा से पहले उसकी ही आँख निकाल
लो।” मियाँखान का हाथ थर-थर काँपने लगा। उसने काँपते हाथों में जलती
सलाइयों को पकड़ लिया। धीरे धीरे चार कदम रखता हुआ सम्भाजी राजा के पास
पहुँच गया। सम्भाजी राजा की तेजस्वी आँखों के पास उन तपती सलाइयों को ले
जाते-ले जाने अचानक उन्हें अपने पेट में चुभा दिया। जोर का शोर उठा। बादशाह
के इशारे पर नौकर आगे दौड़े। उन्होंने मियाँखान के शरीर पर तलवार से सपासप
वार किया। मियाँखान का रक्त मांस सम्भाजी राजा के पैरों में बिखर गया।
बादशाह की आज्ञा से जल्लाद आगे बढ़े। तप्त लाल सलाइयाँ सम्भाजी राजा
की आँखों में घुमाई गयीं। चर्र चर्र की आवाज हुई। आँखों से धुआँ उठा। चेहरे का
चमड़ा भी थरथराया। किन्तु मुँह से भय या आक्रोश की कोई चीख नहीं उठी। यह
देखकर औरंगजेब को बहुत दुःख हुआ।
चौदह
जिंजी के भव्य किले के नीचे कंसोपन्त त्रिमल का निवास था। दिन डूबते डूबते
आज यह दुखद समाचार वहाँ पहुँच गया। 'शम्भूराजा कैद हो गये उन्हें औरंगजेब
की सेना जंजीरों से बाँधकर ले गयी।' इस समाचार ने केसोपन्त का कलेजा टूक
टूक कर दिया। केसोपन्त त्रिमल के भीतर का ईमानदार रक्त उन्हें शान्त बैठने नहीं
दे रहा था। ऊपर किले पर हरजी राजा के पास भी यह समाचार पहुँचा था। केसो
त्रिमल को विश्वास था कि समाचार पाते ही हरजी राजा उन्हें बुलाएँगे। इसीलिए
उन्होंने तैयारी आरम्भ कर दी थी। उन्होंने अपनी सेना को तैयार रहने का संकेत
दिया। उन्होंने कहा, “किसी भी समय औरंगजेब से बदला लेने के लिए हमें
महाराष्ट्र वापस जाना पड़ सकता है।”
केसो त्रिमल के बड़े भाई मोरोपन्त शिवाजी महाराज के अष्टप्रधानों में पेशवा
थे। उन्होंने महाराज के साथ लेखनी ही नहीं तलवार भी चलाई थी। पिंगले घराने
के वफादार खून की परम्परा को केसोपन्त ने रामशेज के किले पर भी प्रमाणित किया
था। दो वर्षों तक किले पर आँच नहीं आने दी थी। एक विश्वासपात्र के रूप में ही
सम्भाजी राजा ने उनकी नियुक्ति दक्षिण के तमिल और कर्नाटक प्रदेश में की थी।
746 • सम्भाजी

हरजी राजा का सन्देश आया, "महल से निकलकर तुरन्त पूना के लिए प्रस्थान
करना पड़ेगा। विचार-विमर्श के लिए फ़ौरन ऊपर आइए। आपकी राह देखते हम
दरवाजे पर ही खड़े हैं।" तब वृद्ध केसो त्रिमल जिंजी का वह किला चढ़कर ऊपर
आये। पसीने से तरबतर हरजी महाड़िक के सामने खड़े हो गये।
हरजी प्रसन्न मुद्रा में झूले पर बैठे दिखे। दालान के कोने से किसी की रोने
की आवाज आ रही थी। सम्भवतः वह आवाज अम्बिकाबाई की होगी। आखिर
शम्भुराजा उनके छोटे भाई थे। केसो पन्त कुछ हड़बड़ाए हुए से सामने रखे आसन
पर बैठने लगे। उसी समय कोने में खड़े अपने सिपाहियों को संकेत किया। आठ
दस लोग केसोपन्त पर टूट पड़े। उन्हें बन्दी बनाकर कैदखाने की ओर ले जाया
गया। केसोपन्त की वफादार आत्मा आहत हुई और अपमान से उनका चेहरा लाल
हो गया। मराठों का राजा दूर अपनी मातृभूमि में कैद हो गया। उसकी मदद के लिए
दौड़कर जाने के बदले हरजी राजा जैसा व्यक्ति, राजा का सगा बहनोई इस प्रकार
का धोखा करेगा, ऐसा तो त्रिमल ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था।
हरजी राजा ने केसो त्रिमल को ले जाते हुए देखा। हरजी प्रसन्नता से हँसे।
महाड़िक के कर्मचारी लेखन सामग्री लेकर पहले से ही बैठे थे। हरजी राजा
औरंगजेब को पत्र लिखवाने लगे।
"ऊपर ईश्वर की महिमा का आसमान और नीचे बादशाह मेहरबान। यही
सत्य स्थिति है। इसे हम भली प्रकार जानते हैं। आपने जिस प्रकार हमारे साढ़ू भाई
गणोजी शिर्के और महादजी निंबालकर पर दयाभाव रखा है वैसी ही कृपा हमारे
ऊपर भी रखिए। यद्यपि हम शिवाजी के जामाता हैं फिर भी हमारा सिर उनके पुत्र
सम्भा की तरह फिरा नहीं है। कहने का मकसद यह है कि आप हम पर कृपा करके
बादशाही की सेवा का देवदुर्लभ अवसर प्रदान करें।"

पन्द्रह

रायगढ़ पर शोक की लहर फैली थी। दस वर्ष पूर्व शिवाजी महाराज के आकस्मिक
निधन से राजधानी को भूकम्प का झटका लगा था। अब दस वर्ष बाद मुगलों द्वारा
सम्भाजी राजा को जीवित पकड़ा गया था। हिन्दवी स्वराज्य को यह दूसरा भीषण
झटका लगा था। सम्भाजी राजा जैसे ध्येय धुरन्धर रणवीर और कर्तव्यपरायण राजा
सम्भाजी 747

का जीवन केवल बत्तीस वर्ष होने का प्रजा को बहुत दुख था।
येसूबाई महारानी पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा था। जैसे किसी ऊँचे पहाड़
से फिसलकर हिरन नीचे गिर जाये और उसकी मृत देह को देखकर हिरनी पागल
होकर छटपटाए, अपने हृदय की असह्य वेदना को दबाकर नाचने लगे, वही स्थिति
येसूबाई महारानी की हो रही थी। जो जन्म से राजा और प्रवृत्ति से राजर्षि था, ऐसे
अपने प्राणप्रिय पति के भाग्य में ऐसा दुर्दिन आएगा ? इसकी तो कल्पना तक नहीं
थी।
महारानी को सम्भाजी राजा की स्मृतियाँ बार-बार आती थीं। क्रूरकर्मा
औरंगजेब चुप बैठेगा इसका विश्वास नहीं होता था। शम्भुराजा भी किसी तोड़
जोड़ या समझौते के लिए तैयार न थे। इसलिए मन के भीतर मृत्यु का घंटा बजता
सुनाई पड़ता था। कराल काल का भयानक दरवाजा करकरा रहा था। महारानी को
रोज का कार्यव्यापार-पत्राचार, लेना-देना, हर किले के किलेदारों और सरदारों का
धैर्य बँधाना, जहाँ आवश्यक हो वहाँ सेना को पहुँचाना, रायगढ़ को निवाले की तरह
निगलने के लिए तत्पर जुल्फिकारखान के आक्रमण को रोकने का प्रबन्ध आदि
करना पड़ रहा था।
महारानी को राजमहल खाने को दौड़ता था। चौकियों के पहरे के निरीक्षण के
निमित्त से वे कभी-कभी बाहर निकलती थीं। साथ में ताराबाई, खंडो बल्लाल और
अन्य लोग होते थे। वे रायगढ़ के बुर्जों से सामने के गहन अँधेरे को देखती थीं।
उन्हें लगता था कि इस तहीभूत अँधेरे को ही अपने पास बुला लें। महाराज कब
मिलने वाले थे ? इस जन्म में या दुर्देव से अगले जन्म में ही। सिर के ऊपर आकाश
चन्द्र की ओर वे देखती ही नहीं थीं। यदि कभी असावधानी से चन्द्र दर्शन हो जाता
तो उनका मन शम्भुराजा की स्मृति में पागल हो जाता था।
येसूबाई के माथे का सौभाग्य सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। क्रूरकर्मा
औरंगजेब पीछे हटने को तैयार नहीं था। ऐसी खबरें आ रही थीं कि औरंगजेब की
सेना बहादुरगढ़ छोड़कर तुलापुर की ओर बढ़ रही है। आसपास की घाटियों में
आकर स्वराज्य के बुर्जों को ध्वस्त करने का निश्चय बादशाह ने कर लिया है।
अनेक अनुभवी और सम्मानित लोग अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने और जागीर के
टुकड़े के लिए औरंगजेब के तम्बू की ओर दौड़ लगा रहे हैं। ऐसे समय में सह्याद्रि
की घाटियों के साढ़े तीन सौ किलों की रक्षा करना आवश्यक है। यही सोचकर
येसूबाई रात-दिन एक करके हिम्मत के साथ आये हुए संकट का मुकाबला कर रही
थीं।
सम्भाजी राजा की मियाँखान और कुछ अन्य मुगलों से मैत्री थी। यह बात
748 :: सम्भाजी

किसी को ज्ञात न थी। इससे आधे-अधूरे ही सही किन्तु राजा के सन्देश रायगढ़ तक
पहुँच जाते थे। इधर शम्भूराजा के सन्देशों में प्रयुक्त निर्वाण की भाषा से येसूबाई
बहुत विकल हो गयी थीं। राजा का सन्देश आया था, "येसूरानी! मेरे द्वारा बताए
गये सन्देश के अनुसार कलिकाल का मुकाबला करने के लिए तैयार रहिए। महाराष्ट्र
के माथे पर पिताजी द्वारा गोदवाए गये स्वराज्य के गोदने की रक्षा के लिए अपने
माथे का कुंकम पोंछने के लिए आप तैयार रहिए। मुझे भूलिए और राज्य को
सँभालने की तैयारी कीजिए।"
ग्रह-नक्षत्र विपरीत हो गये थे। मराठों पर काल उलट गया था। फिर भी
जलते घरों की अग्नि पर अपने स्वार्थ का बैंगन भूनने वालों की कमी नहीं थी।
येसूबाई के मन में यह तिलमिलाहट थी कि किसी तरह यह कराल काल बदल
जाये और राजा फिर से स्वराज्य में लौट आयें। एक दिन सिर नीचे झुकाए पुनवड़ी
के बड़े व्यापारी कान्तासेठ बिहारीमल आये। उनके साथ बारामती के जीवाप्पा
नाइक, तुकोबा सोन साखले जैसे व्यापारी थे। इनकी पीढ़ियाँ पुणे में थीं। गोलकुंडा,
बीजापुर और औरंगजेब के बाजारों में उनका व्यापार चल रहा था।
ये सभी लक्ष्मीपुत्र रायगढ़ पर महारानी से मिले। वे धीमे स्वर में महारानी से
कहने लगे, "बादशाह के खजानची रूहूल्लाखान और उनके तीन सौ बाजारों के
साथ हमारा रोज का सम्बन्ध है। हमारी मध्यस्तता से महाराज के प्राण अभी भी
बचाए जा सकते हैं।"
महारानी ने उन पर दृष्टि डाली। ऐसी कल्पना सुनने में भी बहुत मधुर लग
रही थी। कान्तासेठ और उनके साथियों ने धीमे स्वर में किन्तु आशापूर्ण स्वर में
कहा, "बादशाह की फौज के अधिकारी बहुत भ्रष्ट हैं। यह बात आपके कान तक
भी आयी होगी।"
येसूबाई एक क्षण के लिए रुकीं, किन्तु तुरन्त खंडो बल्लाल की ओर देखते
हुए बोलीं, "खंडोबा इस कार्य के लिए इन्हें जितना धन चाहिए दे दीजिए।"
महारानी दरबार से उठीं। किन्तु उनके पैर ठिठक गये। इस कार्य में उनके
साथ विश्वासघात होने की पूरी सम्भावना थी। उन्होंने अनुभव किया कि इस
मंडली की आँखों में विश्वास का कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहा था। महारानी के
पीछे-पीछे आकर ताराबाई भीतरी दालान में उनसे बोलीं, "दीदी, यह धन चोरों की
झोली में जाने की ही अधिक सम्भावना है।"
"तारा, मेरी भी समझ में ऐसा ही कुछ आ रहा है। परन्तु यदि इस अन्धी
सम्भावना का आधार पकड़कर महाराज के प्राण बच सकें तो?"
"मुझसे भूल हुई, दीदी। दादासाहब के प्राणों के सामने मुट्ठी भर द्रव्य की
क्या कीमत?"
पैसे देकर काम सिद्ध करने के नाम पर ये महानुभाव मोटी-मोटी थैलियाँ
सम्भाजी 749

लेकर चले गये। उनके डगमगाते पैरों का बादशाह की छावनी तक पहुँचना सम्भव
ही नहीं था। रास्ते में इन लोगों के बीच घुसर-फुसर चल रही थी। वे सोच रहे थे
कि औरंगजेब के भयंकर धक्के के सामने महारानी भी कितने दिन जी पाएँगी।
चलते हुए ये महानुभाव अपनी अन्नदात्री महारानी के सम्बन्ध में इस प्रकार की चर्चा
कर रहे थे। राज्य की सीमा पर पहुँचकर उन चोरों ने सारा द्रव्य आपस में बाँट लिया
और वहाँ से अपने इष्टमित्रों अथवा व्यापार स्थलों पर चले गये।
शम्भूराजा के अमानवीय जुलूस, उनके साथ दुर्दैवी घात आदि की कथाएँ
राजधानी तक पहुँच रही थीं। इस समय सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि इस अनिश्चय
की स्थिति को कितने दिन झेला जा सकता है ? इस भयानक व्यूह रचना से बाहर
निकलने का उपाय कैसे ढूँढ़ा जाए ? कौन-सी योजना बनाई जाए ? प्रहलाद निराजी,
येसाजी कंक, रामचन्द्र पन्त जैसे वरिष्ठ अनुभवी लोग इसी उधेड़बुन में व्यस्त थे।
प्रायः सभी इस बात पर सहमत थे कि इस प्रकार की भ्रामक और अनिश्चित
परिस्थिति में महारानी का रहना ठीक नहीं था। महारानी भी आखिर कितने दिनों
तक राज्य का कार्यभार संभाल सकती थीं ?
“सच बात तो यह है कि रायगढ़ के सिंहासन को रिक्त रखना किसी के भी
हित में नहीं है।” येसाजी ने अपना स्पष्ट मत व्यक्त किया।
येसूबाई, राजाराम साहब और ताराबाई की ओर मुखातिब हुईं। उन्होंने पूछा,
“आप लोगों की क्या राय है?”
“दादाजी महाराज पर बुरा समय आया है। राज्य पर उनके अनेक उपकार हैं
उनकी जीवन्त यादगार के रूप में उनके चिरंजीव बालक शाहू को गद्दी पर
बिठा दीजिए। हम हर प्रकार से उनके पीछे खड़े रहेंगे।” राजाराम साहब ने अपना
मत व्यक्त किया।
अधिकारी वर्ग के दुष्ट तत्त्व यद्यपि समाप्त हो चुके थे किन्तु ईर्ष्या-द्वेष की
प्रवृत्ति अभी समाप्त नहीं हुई थी। राजाराम साहब ने अपना बड़प्पन दिखाया था।
किन्तु अनेक लोग आपसी रिश्तों की बुनियाद पर ईर्ष्या की आग भड़काने के लिए
फूँक मारने में लगे थे।
महारानी येसूबाई ने कहा, “सन्तुलित और मूल्यनिष्ठ विचार से ही राज्य
चल सकता है। छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए जूझना हमें शोभा नहीं देगा। भोंसले
खानदान की तीन-तीन पीढ़ियों को उजाड़ने वाले औरंगजेब जैसे सबल शत्रु का
एकजुट होकर मुकाबला करना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।”
“इसलिए हम अपने बालशाहू का राज्याभिषेक शीघ्रातिशीघ्र कर लें।” सभी
ने एक साथ मत व्यक्त किया।
“नहींऽऽ!” धीमे किन्तु दृढ़ स्वर में महारानी ने असहमति व्यक्त की।
उन्होंने कहा, “सात वर्ष के बाल शाहू की अपेक्षा राजाराम साहब अधिक समझदार
750 :: सम्भाजी

और कर्तव्यनिष्ठ हैं। सिंहासन पर उन्हें ही बिठाएँगे।'
जिस दिन यह निर्णय लिया गया उसी दिन छोटेखाँ ने राज्याभिषेक की सभी
विधियाँ पूरी कर लीं। राजाराम साहब हिन्दवी स्वराज्य के तीसरे छत्रपति बन गये।
उन्होंने कृतकृत्य भाव से अपनी बड़ी भाभी का वन्दन किया, उनका आशीर्वाद
लिया।
समय के साथ रायगढ़ के आसपास फन्दा कसता जा रहा था। जुल्फिकारखान
ने आसपास के अनेक जंगली एवं घाटियों के रास्ते रोक दिए थे। शत्रुओं की सेना
एक दिन रायगढ़ के बिलकुल समीप पहुँच गयी। किले का संरक्षण करने वाली
घेराबन्दी, किले के मुख्यद्वार, चितदरवाजे से अन्दर सरक गयी। अनेक घायल और
रक्तरंजित घुड़सवार किले की ओर भागे। उनके विकृत चेहरे देखे नहीं जा रहे थे।
बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग भी बन्द हो गया था। इस प्रकार का भयानक संकट
राजधानी रायगढ़ पर पहले कभी नहीं आया था।
अधिकारी, कर्मचारी और प्रजाजन सभी चिन्तित हो गये। वे सोच रहे थे कि
यदि शिवाजी महाराज का दूसरा उत्तराधिकारी भी मुगलों के हाथ लग गया तो
स्वराज्य समाप्त ही हो जाएगा। सारा कार्यव्यापार समाप्त हो जाएगा। किन्तु प्रश्न
यह था कि इस भयानक चक्रव्यूह से निकलें भी तो कहाँ? और कैसे? मुख्यद्वार
चितदरवाजा से महाद्वार की ओर निकलने के अतिरिक्त दूसरा कोई अन्य मार्ग न था।
इस मार्ग के अतिरिक्त एक बार एक स्त्री जिसका नाम हीरकणी था, दूसरे रास्ते से
किले से नीचे उतरी थी। यह बड़े जोखिम का काम था। किन्तु शिवाजी महाराज ने
उस रास्ते को भी बन्द करवा दिया था। रायगढ़ के पंछी, हवा और वर्षा के पानी की
बात छोड़ दें तो किले से बाहर जाने के लिए मुख्यद्वार के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग
नहीं था।
उस दिन सन्ध्या समय ताराबाई और येसूबाई ने जगदीश्वर का अभिषेक
किया। उनकी पालकियाँ मन्दिर से राज्यप्रासाद की ओर चलीं। रास्ते में किले पर
ब्राह्मणबाड़ा था। वहीं पास में गड़ेरियों के घर थे। उनकी भेड़ें बेंऽऽ बेंऽऽ करती हुई
अपने बाड़े की ओर लौट रही थीं। भेड़ों के पचीस तीस छोटे मेमने बड़े-बड़े झाबों
के भीतर ढकेले जा रहे थे। राज्यप्रासाद के पन्त, कर्मचारी, पहरेदार सभी चिन्तामग्न
थे। सभी की एक ही चिन्ता थी कि मुगलों के फन्दे से राजपरिवार को कैसे बचाया
जाए?
महारानी के कानों में अभी भी भेड़ों के बच्चों का मिमियाना अनुगूँजित था।
उन्होंने सैनिकों को बुलाया। सैनिक गड़ेरियों के बड़े बड़े झाबे लेकर आये। आधी
रात को बाघ दरवाजे के पिछले बुर्ज से रस्सी लटकाई गयी। कुछ सैनिकों को झाबे
में बैठाकर नीचे उतरने का घातक अभ्यास कराया गया। दूर जंगल में मुगलों की
फौज में जलती मशालें दिखाई पड़ रही थीं। उनकी गतिविधियाँ चालू थीं। येसूबाई
सम्भाजी :: 751

ने राजाराम और ताराबाई को एक बड़े झाबे में बैठने की आज्ञा दी। साथ में कुछ
सैनिक भी जाने वाले थे। येसूबाई ने चिन्तित स्वर में कहा; "समय एकदम नष्ट न
करो। चलिए पहले बाहर निकलिए। अपने किले में अभी भी अनेक स्थलों पर
किलेबन्दी बची हुई है। उसी ओर भागिए। अपनी जान बचाइए, राज्य बचाइए,
लड़ते रहिए।"
"किन्तु भाभी जी आप?" राजाराम ने कातर स्वर में पूछा।
"नहींऽ दीदी आपको भी हमारे साथ आना होगा। आप पीछे रह गयीं तो
कैद हो जाएँगी।" ताराबाई हकलाते हुए बोली। उनकी आँखें अश्रुपूरित हो गयी
थीं।
"मैंने जानबूझकर कैद होने की तैयारी कर ली है। तुम दोनों जितनी जल्दी
हो सके निकल जाओ। नहीं तो हम सभी कैद हो जाएँगे।"
"मतलब?"
"मेरे कैद होने में लाभ है। शम्भू महाराज के कुटुम्ब के बन्दी हो जाने के
आनन्द से हमारा शत्रु दो-चार दिन के लिए ढीला पड़ जाएगा। उसी अवधि में आप
दोनों खतरे की सीमा के पार निकल जाइए।"
येसूबाई की असाधारण उदारता और अद्भुत बौद्धिक कौशल देखकर
राजाराम और ताराबाई को बहुत आश्चर्य हुआ। वे रो पड़े। शत्रु की फौज रायगढ़ पर
अधिकार करने के लिए रात में ही कूच कर चुकी थी उनका शोर अब पास ही सुनाई
देने लगा था। हाथ ऊँचा करके महारानी से विदा लेने तक का अवसर राजाराम और
ताराबाई को नहीं मिला। मजबूत रस्सियों में बँधे झाबे में बिठाकर वे नीचे छोड़ दिये
गये। येसूबाई ने सन्तोष की साँस ली और थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।
मन ही मन जगदीश्वर का आभार माना।
सोलह
"बेवकूफ बादशाह, मौत हमें कबूल है किन्तु तुम्हारा धर्म स्वीकार करना नहीं। यह
शिवपुत्र तुम्हारे मजहबी जाल में कभी भी फँसने वाला नहीं है।" सम्भाजी ने
मुँहतोड़ उत्तर दिया।
"मजहब के लिए मैं रुका भी नहीं हूँ।" औरंगजेब कुत्सित हँसी हँसते
हुए बोला।
752 : सम्भाजी

"खजाने की बात करते हो तो हमारा प्रत्येक किला खजाना ही है। तेरे बूढ़े
शरीर में यदि अभी भी कुछ ताकत बची हो तो अल्लाह के घर जाने से पहले
शिवाजी-सम्भाजी के किले जीतकर दिखा।" सम्भाजी ने चुनौती भरे शब्दों में
कहा।
"सम्भाऽऽ, हमारा सवाल मजहब की आरज़ू और खजाने की चाहत से परे
है। हमें हिन्दुस्तान की राजनीति आगे भी चलानी है। इसलिए शासक होने के नाते
तुमसे साफ साफ जवाब चाहता हूँ। बोलऽ, तुम्हारे साथ और उन दो शिया राजाओं
के साथ हमारे कौन-कौन से लोग खुफिया के तौर पर शामिल थे। इस एक सवाल
का ठीक ठीक जवाब दोगे तो अभी भी अपनी प्यारी जिन्दगी बचा सकते हो।"
"हमारी मौत का फतवा तो तुम्हारे काजी ने कल दोपहर में ही जारी
कर दिया है।"
"काज़ी, मौलवी, फतवा आदि तो हम राजनीतिज्ञों की कटारों के मखमली
आवरण होते हैं। जब चाहें कोई भी फतवा खारिज कर दें। फतवे का अमल करना
न करना हमारी मुट्ठी में होता है। बोलऽऽ, हमारे कौन कौन से धोखेबाज तुम्हारे
माथ मिले हुए थे। वे कौन हैं जिन्होंने पिछले नौ वर्षों तक दक्खिन के जंगलों में
मुझे फकीर की तरह भटकाया और उन बदमाश मक्कारों ने तेरे जैसे जहन्नमी की
मदद की? कौन हैं वे लोग?"
सम्भाजी राजा का पेट पीठ से सट गया था। पिछले कुछ दिनों से पेट में अन्न
का एक टुकड़ा तक न गया था। उनके होंठ सूख गये थे। आँखों के आगे अँधेरा छा
रहा था। स्वास्थ्य एकदम खराब हो गया था। इस अवस्था में भी सम्भाजी राजा
बेहोशी में हँसे और बादशाह से बोले, "जो जवाब तुम्हें चाहिए वह हम कभी भी
नहीं दे सकते-"
"क्यूँ?"
"हम अपने शत्रु पर सामने से तलवार चलाते हैं और अपने मित्रों की पीठ
बचाकर रखते हैं। हम ऐसा उनकी पीठ थपथपाकर शाबासी देने के लिए करते हैं,
धोखे से उनकी पीठ में खंजर भोंकने के लिए नहीं।"
सम्भाजी के आखिरी उत्तर से बादशाह जलभुन उठा। उसे सम्भाजी राजा से
कोई भी बात मालूम नहीं हो सकी। इससे वह बहुत चिढ़ गया था। बन्दीखाने के
चारों कोनों में धुआँ फेंकती मशालें बादशाह के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रही
थीं। पास में रखी सुराही का पानी उसने गट गट पिया। उसने ध्यानपूर्वक सामने
देखा। सामने कवि कलश आपाद मस्तक जकड़े हुए रखे गये थे।
बादशाह को वहाँ अधिक देर तक ठहरना नहीं था। वह उठा और तेज कदमों
से कैदखाने से बाहर आ गया। मशालों के उजाले में सैकड़ों आँखें उसकी ओर घूर
सम्भाजी :: 753

रही थीं। थोड़ी दूर जाकर बादशाह के पैर ठिठक गये। वह स्वयं से प्रश्न पूछने
लगा, 'आखिर तुमने क्या निश्चित किया? अपने जन्मजात शत्रु को यों ही जिन्दा
रखना है? काजी के फतवा जारी करने के बाद भी?'
सत्रह
वह अमावस्या के पहले की रात थी। भीमा नदी के किनारे सन्नाटा पसरा पड़ा था।
अँधेरा घनीभूत हो गया था। नदी में बाढ़ का बहाव था और हवा तेजी से बह रही
थी। तुलापुर की पहाड़ी की दूसरी ओर रह-रहकर सियारों का शोर उठता था। कहीं
कोई कुत्ता गला फाड़कर रोने लगता था। कहीं कोई बेपरवाह टिटिहरी नदी की धारा
पर टींऽऽ, टींऽऽ की कर्कश आवाज करती, इधर-उधर उड़ती थी।
नदी के किनारे ही बाँस और घास से बना वह बन्दीखाना था। जैसे जानवरों
को घेरकर रखा जाता है, उसी प्रकार सम्भाजी राजा और कवि कलश को रखा गया
था। इन दोनों हतभाग्य प्राणियों को पिछले अड़तीस-चालीस दिनों से ठीक से
नहाने को नहीं मिला था। मियाँखान और उसके कुछ साथी अभी भी बन्दीखाने के
पहरे पर थे। ये लोग यथा सम्भव राजा की सेवा शुश्रूषा कर दिया करते थे। उन दोनों
राजबन्दियों के शरीर पर बहुत खुजली उभरती थी दुर्गन्ध आती थी, ऐसी शिकायतें
समय-समय पर की गयी थीं। इसी कारण बीच-बीच में पानी का बर्तन लेकर आते
थे। जिस प्रकार बैलों या भैंसों पर पानी मारा जाता है उसी प्रकार कभी चार दिनों में
इनके ऊपर पानी फेंक दिया जाता था। इन दिनों बार-बार की मार-पीट के कारण
उनके शरीर में जगह-जगह पर छाले पड़ गये थे। सिर के बाल भी पहरेदारों ने
अनेक बार खींचे थे। बालों की जड़ें टूटने से वहाँ अभी भी पीड़ा हो रही थी। इस
प्रकार की यातनाएँ शरीर के अंग-प्रत्यंग को आग की तरह जला रही थीं। कविराज
के तो जीभ ही नहीं थी। वे तो अपनी वेदना को व्यक्त भी नहीं कर सकते थे।
मध्यरात्रि बीत गयी। नदी के पाट के बहाव पर हवा का एक आवर्त निर्मित
हुआ। कुछ समय तक यह आवर्त वहीं पर घूमता रहा। देखते-देखते हवा का वह
झोंका मानवी आकार में बदल गया। करुण और वेदनामय आवाज करता हुआ वह
हवा का झोंका नदी की कछार चढ़कर ऊपर आया। देखते-देखते वह बन्दीखाने की
दरार मे भीतर चला गया।
754 :. सम्भाजी

वह सरसराती हवा सम्भाजी राजा के शरीर के साथ खेलने लगी। जैसे कोई
वैद्य सिर पर हाथ रखकर घाव को सहला रहा हो उसी तरह वह हवा सम्भाजी राजा
के मस्तक के आसपास घूमने लगी। उनके सारे शरीर के साथ क्रीड़ा करने लगी।
उन्हें अपने आलिंगन में लेने लगी।
सम्भाजी राजा ग्लानि से जागे। उन्होंने सोचा कि इस मनहूस काली रात में
कौन है जो अपनी ममतामयी उँगलियाँ बालों में घुमा रहा है? यह किसके पैरों की
आवाज है। घावों से जर्जर इस शरीर को कौन अपनी ममतामयी गोद में ले रहा है?
किसके शरीर की गन्ध और किसकी उष्ण साँस है यह? यह कौन है नितान्त
अपना सा, पहचाना सा? सम्भाजी राजा का शरीर प्रफुल्लित होने लगा। जख्मी
और ज्योतिहीन आँखों से चिपचिपा द्रव बहने लगा। वे पूर्णरूप से मोहमुग्ध हो
गये। शरीर के अंगों की भीतरी वेदना पर आनन्द की लहर दौड़ गयी। सामने के
अदृश्य हाथों की हथेली सम्भाजी राजा के माथे को सहलाने लगी। कपोलों पर
चुम्बन का स्पर्श हुआ। उस शरीर से सोनचम्पा की सुगन्ध आ रही थी, उसके स्पर्श
में अपूर्व ममता थी। उस आभासमूर्ति की गोद में अपनी देह को झोंकते हुए सम्भाजी
राजा अपूर्व आनन्द का अनुभव कर रहे थे। वे आनन्द से किलकते हुए बोले,
"पिताजीऽऽ पिताजीऽऽ, आखिर आप आखिरी रात में आ ही गये अपने बालक
सम्भा से मिलने।"
माथे पर फिरने वाला हाथ अब सम्भाजी राजा के पीठ पर फिरने लगा। वह
आभासमूर्ति और भी समीप आ गयी। उसने सम्भाजी को प्रगाढ़ आलिंगन में ले
लिया। आभासमूर्ति करुणार्द्र स्वर में बोली, "शम्भू बेटे! कितनी क्रूर है यह दैव
गति?"
"पिताजीऽऽ आप।"
"हाँ, मैं ही हूँ।"
"पिताजी, आप आखिर मिल ही गये। मैं तो धन्य हो गया। इस शम्भू से
कोई भूल चूक हुई हो तो क्षमा कर दीजिएगा।"
"मेरे बेटे ऐसा मत बोलो। घोड़े की पीठ पर अपना सिंहासन लादने वाला
ऐसा कोई विरला योद्धा ही होगा जो देश, धर्म और भूमि के लिए आठ वर्षों तक
निरन्तर लड़ता रहे। यश अपयश और घोर आक्रमणों की परवाह किये बिना, केवल
बत्तीस वर्ष की आयु में औरंगजेब जैसे कराल कलिकाल से तुम्हारा मुकाबला
अद्वितीय और अद्भुत है, बेटा शम्भू।"
"पिताजी, शरीर में जितना बल था, जितनी शक्ति थी, वह सब मैंने देश-
सेवा में लगा दी।"
"नींद का स्वाँग करके सोने वाले स्वार्थी कुम्भकर्ण तुम्हारे इस महान साहस
सम्भाजी .. 755

का अनदेखा कर सकते हैं। किन्तु सह्याद्रि की प्रत्येक घाटी और रास्ते, घाट और
मैदान, बुरहानपुर से तमिल देश तक, जिन पत्थरों और भूखंडों को तुमने और तुम्हारे
हजारों सहयोगियों ने अपने रक्त से सींचा है। वह मिट्टी और पाषाण तुम्हें कैसे भूल
सकेंगे? क्या मनुष्य जाति इतनी कृतघ्न है?''
"पिताजीऽऽ हम तो बदनाम-"
"बिल्कुल नहींऽऽ, बिल्कुल नहीं, धीरोत्तम राजकुमार, बलशाली, सच्चा
महाराष्ट्र पुत्र। ऐसी दुर्बल भावना कभी मन में भी नहीं ले आना। ऊपर आकाश की
चाँदनी की आँखों से पिछले आठ वर्षों से निरन्तर देखता रहा हूँ।"
"शम्भू बेटे! तुम्हें एक सच्ची बात बताऊँ?"
"पिताजी - ?"
"जन्म मृत्यु के दैवी चक्र से हमारे हाथ बँधे हुए हैं, नहीं तो स्वर्ग के
महादरवाजे से निकलकर हम कब के बाहर आ गये होते। अपने पराक्रमी बेटे की
सहायता के लिए मैं स्वयं तुम्हारे पास भागता हुआ आया होता।"
"पिताजी, भाग्य का यह दुश्चक्र, अपने आत्मीय और विश्वस्त लोगों द्वारा
कलेजे पर घात, मन बिलकुल भर गया था। कराल काल ने हाथों से शस्त्र छीन
लिये, आँखें ले लीं।"
"शम्भू बेटे! अन्धकारपूर्ण और काँटोंभरी राहों पर चलते हुए तुमने अपने
क्रिया-कलाप में निराशा का एक रोड़ा भी कभी आने नहीं दिया। अब दिल के
किसी कोने में भी अपराध भावना को स्थान मत दो। आज नहीं तो कल तुम्हारे
कार्यों के समक्ष सभी को आदरभाव से नतमस्तक होना ही पड़ेगा। अपने बुद्धिबल
और बाहुबल से तुमने पाँच लाख सैनिकों और चार लाख जानवरों वाली विशाल
मुगल सेना की महाबाढ़ को इतने दिन रोक रखा। अन्यथा दुर्भाग्यवश पाँच छह
महीने में ही सब कुछ समाप्त हो जाता और औरंगजेब की जीत हो जाती। हाथ में
जजियाकर का अस्त्र लेकर आयी मुगल सेना के सामने अपना प्रदेश विनष्ट हो गया
होता, फिर तुकोबा रामदास और शिवाजी का महाराष्ट्र कहाँ और कितना बच
पाता?''
सम्भाजी राजा ने महाराज के कन्धों पर अपना सिर टिका दिया। उस
ममतामयी ऊष्मा से सम्भाजी राजा स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहे थे।
"शम्भू, मेरे बहादुर बेटे, औरंगजेब अनेक राहु-केतुओं को मिलाकर बनाया
गया एक दुष्ट और क्रूरकर्मी है। संसार की एक बलशाली शक्ति को तुमने बड़ी
हिम्मत से टक्कर दी है। इससे पहले जब यह महादैत्य दिल्ली या आगरे के
राजमहल में बैठता था तब उसके सन्देश मात्र से ही दक्षिण के राज्य थरथर काँपते
थे। आदिलशाही और कुतुबशाही जैसी हुकूमतें उसकी परछाईं से ही डर जाती थीं।
756 :: सम्भाजी

शम्भू बेटे, उस राक्षस के कारण न चाहकर भी तुम्हारे साथ आगरे तक जाना पड़ा
था। पुरन्दर की वह घटना हमारे जीवन का अपमानपर्व था। बेटे, इस प्रकार का
घातक, कपटी और निरंकुश शत्रु जब विशाल सेना समुद्र लेकर महाराष्ट्र तक आया
तो कोई अन्य व्यक्ति उस सागर की तरंगों को देखकर ही जान बचाकर भाग गया
होता। किन्तु बिना तनिक भी घबराए, अपनी पीठ पर सह्याद्रि की श्रेणियों को बाँधे
उस दुष्ट से बड़ी कठोरता से दीर्घकाल तक लड़ते रहे।
"जब बहुतों की तलवारों को जंग लग रही थी, बुद्धिमानों की प्रज्ञा समाप्त
हो चुकी थी, मर्दों के पैर पंगु हो गये थे, सामान्य जनता भुखमरी से जूझ रही थी,
तब बचे खुचे लोगों को एकत्र करके, मुसीबतों से टकराते हुए तुमने संकट की
कन्दराओं से अपना मार्ग निकाला। इतनी बड़ी फौज के साथ, इतने कम साधनों में,
इतने लम्बे समय तक मुकाबला करने वाला, जवाँ मर्द खोज करने के लिए इतिहास
के पृष्ठों में गहन शोध करनी पड़ेगी। सच कहूँ शम्भूऽऽ, मुझे तो लगता है कि
तुम्हारे भावी पराक्रम को ध्यान में रखकर ही तुकोबा माउली ने ये पंक्तियाँ रची
थीं—
पुत्र हो तो ऐसा मुस्तंडा,
जिसका तीनो लोक मे झंडा।
"बस, बस, पिताजी, मृत्यु महामन्दिर की ओर प्रयाण के पूर्व आप मिल गये
यह मेरा सौभाग्य है। आपके इन शब्दों ने मुझे इतना तृप्त कर दिया है कि अब शरीर
पर सहस्रों मरणों की वर्षा भी मुझे दुखी नहीं कर सकती।"
"शम्भू बेटे, आज इस शिवाजी का कलेजा तिल तिल करके टूट रहा है तो
केवल दो बातों के लिए। अपने स्वजनों ने घात करके तुम्हारे पराक्रमी पैर तोड़ दिये।
दूसरे नियति क्रूर चक्र को देखकर भी आत्मा आहत होती है—"
"पिताजीऽऽ!"
"हाँ, शम्भू बेटे, क्या मेरी जिन्दगी में ऐसी कठिन परीक्षा के क्षण कम आये
हैं? कुटिल अफजलखान से मिलने हम पालकी में जा रहे थे। कहारों के पदक्षेप के
साथ मृत्यु मेरे साथ चल रही थी। वहाँ से मैं केवल भाग्यवश ही बच सका। आगरे
के कैदखाने के सामने हजारों यवनों का घेरा क्या कम भयानक था? तुम्हारे साथ ही
वहाँ से भी सकुशल छूट गये। जालनापुर जीतकर लौटते हुए संगमनेर के पास
जंगलों में रणमस्तखान की धोखादायक कुटिल रणनीति से तो बाल बाल बचा था।
थोड़ा ही अन्तर पड़ा था, नहीं तो जो दुर्दैव तुम पर संगमेश्वर में आया, वह मुझ पर
संगमनेर में आ गया होता।"
शिवाजी महाराज रुके, उन्हें जोर का झटका लगा। शम्भूराजा की ओर
सम्भाजी 757

देखकर, विशेष रूप से उनकी आँखों के रिक्त खाँचों की-ओर देखकर वे बुरी तरह
काँप गये। शम्भूराजा के श्रान्त और जख्मी सिर को अपनी छाती से सटाकर वे आर्द्र
स्वर में बोले, "शम्भूऽऽ मेरी जिन्दगी में ईश्वर ने, भाग्य ने, सद्भाग्य की पिटारी
भरकर मेरे कदमों में रख दिया था। क्या ही अच्छा होता कि उसमें से दो-चार मुट्ठी
बचाकर मेरे शम्भू के लिए रख लिया होता। यही सोचकर दुख होता है।"
"पिताजीऽऽ!"
"मेरे बच्चे, कहाँ गयीं तेरी तेजस्वी आँखें?"
"पिताजी, केवल जागीर के लोभी अपनी भूमि के अनेक लोगों ने हमारे
साथ धोखा किया। आज मृत्यु से पहले मेरे नेत्र चले गये तो अच्छा ही हुआ।
जागीरों के लोभ के लिए स्वाभिमान को नष्ट करने वाले इस महाराष्ट्र को देखने की
अपेक्षा तो नेत्रों का चला जाना ही अच्छा है।"
"बेटा, तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। अकाल के प्रकोप का प्रजा ने सामना
किया। सामान्य गरीब लोग हिन्दवी स्वराज्य की रक्षा के लिए तुम्हारे झंडे के नीचे
खड़े हुए। उन्होंने अगरबत्ती की तरह अपनी देह जला दी। किन्तु यहाँ के स्वार्थी
जागीरदारों ने तुम्हारे साथ धोखा किया। अन्यथा संगमेश्वर से तुलापुर तक की लम्बी
यात्रा में सभी ने मिलकर एक साथ पत्थर फेंके होते तो भी बादशाह कभी का
परलोक सिधार गया होता। परन्तु यहाँ के स्वार्थी सयाने लोग तो यही सोचते हैं कि
राजा मरे चाहे राज्य डूबे, उनकी जागीर बची रहनी चाहिए। तुम्हारे साथ हुआ यह
भयानक धोखा इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।"
"आपके शब्दों ने अनेक जटिल प्रश्नों को सुलझा दिया, पिताजी।"
"वाह, महाराष्ट्र! सफलतापूर्वक जीवन कैसे जिया जाए - इसे इस शिवाजी
ने तुम्हें सिखाया होगा, परन्तु देश, धर्म और मिट्टी के लिए प्राण कैसे दें इसका बोध
प्रजा को मेरे बेटे शम्भू से सीखना होगा। हे महाराष्ट्र, इस शिवाजी के गौरव के
उन्माद में हमारे शम्भूराजा के बलिदान को दुर्लक्षित करने का प्रमाद कभी न करना।
शम्भू पराक्रम से भरे तुम्हारे यश कलश को देखकर एक बात कहने की इच्छा हो
रही है। कुछ वर्ष पूर्व सिसोदिया वंश के साथ अपने सम्बन्धों की खोज के लिए मैंने
बालाजी चिटणीस को राजपूताना भेजा था। किन्तु शम्भूराजा के जुझारू जीवन की
गाथा जिस दिन लोगों के सामने आएगी और लोग तुम्हारे अपूर्व पराक्रम से परिचित
होंगे तब कोई अपनी वंशावली की खोज के लिए राजस्थान की रेत की ओर नहीं
दौड़ेगा। इसके विपरीत बाहरी योद्धा सहनशीलता के इस फौलादी महापर्वत से
अपना सम्बन्ध खोजते दौड़े आएँगे।"
"पिताजी, आपके शब्दों से हम पावन हो गये। मृत्यु की देह देहरी पर
पहुँचकर अब मेरे कलेजे में कोई भी काँटा बचा नहीं है। इसके विपरीत मृत्यु को
758 :. सम्भाजी

गले लगाने के लिए हम अधीर हो रहे हैं। इस सम्भा की मृत्यु से यदि मृतप्राय
महाराष्ट्र जागृत हो सके, आलमगीर बादशाह की कब्र यहीं दक्षिण में बनाई जा
सके, तो ऐसी मृत्यु को मैं सौभाग्यशालिनी मानूँगा।"
अठारह
नदी के किनारे से आवाजें आने लगीं। सवेरे-सवेरे ठंडी हवा तेजी में बह रही थी।
सम्भाजी राजा की आँख के सामने अँधेरा था। उन्हें दिन और रात के परिवर्तन का
चराचर की हलचलों से ही पता चलता था। सवेरे वक्त उन्हें बड़ी प्रगाढ़ और
शान्तिमयी नींद आयी थी। कुएँ के भीतर बुलबुल की तरह सम्भाजी राजा की
आवाज फूटी- "कविराज- ?"
कविराज के कानों से आवाज टकराई। उनके मुंह में जीभ नहीं थी। आँखों
का गोलक समाप्त होकर केवल कोटर बचा था। उन दोनों राजबन्दियों के मन में
अन्न-पानी के प्रति कोई आकर्षण शेष न था। बादशाह के दुष्ट सैनिक उनके बालों
को पकड़कर बेरहमी से झटकते थे। किसी प्रकार जीवित बनाए रखने के लिए
चुल्लू-भर दूध पिलाते थे। दोनों ही बहुत दुर्बल हो गये थे। सम्भाजी राजा के नेत्र
गर्म सलाई से खोदकर निकाल गये थे। औरंगजेब का अनुमान था कि इन यातनाओं
से थककर ये लोग जिन्दगी की भीख माँगेंगे। मृत्यु का भय उन्हें विवश करेगा।
इसी आशा में सम्भाजी राजा की जबान अभी तक नहीं काटी गयी थी।
सम्भाजी राजा उदासी से हँसे। उनके कविराज शब्द के उच्चारण पर एक
मानवीय रक्त-मांस का फटेहाल जीवित गोला उनकी ओर सरका। राजा ने उस
घिसटते कवि-कलश का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उन्होंने कहा-
"पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात।
देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात।।
मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले की भाँति क्षणभंगुर है। देखते-देखते यह
प्रभातकाल के तारे की तरह लुप्त हो जाता है। उसके लिए दुख और खेद कैसा?
हम एक दृष्टि से भाग्यशाली हैं। कल रात हवा का झोंका बनकर मेरे पिताजी आये
थे। बहुत प्रेम से मिले। बहुत समय तक हम दोनों के बीच कुशल-क्षेम चलता
सम्भाजी · 759