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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 758, कुल 793 में से

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पृष्ठ 758

का अनदेखा कर सकते हैं। किन्तु सह्याद्रि की प्रत्येक घाटी और रास्ते, घाट और
मैदान, बुरहानपुर से तमिल देश तक, जिन पत्थरों और भूखंडों को तुमने और तुम्हारे
हजारों सहयोगियों ने अपने रक्त से सींचा है। वह मिट्टी और पाषाण तुम्हें कैसे भूल
सकेंगे? क्या मनुष्य जाति इतनी कृतघ्न है?''
"पिताजीऽऽ हम तो बदनाम-"
"बिल्कुल नहींऽऽ, बिल्कुल नहीं, धीरोत्तम राजकुमार, बलशाली, सच्चा
महाराष्ट्र पुत्र। ऐसी दुर्बल भावना कभी मन में भी नहीं ले आना। ऊपर आकाश की
चाँदनी की आँखों से पिछले आठ वर्षों से निरन्तर देखता रहा हूँ।"
"शम्भू बेटे! तुम्हें एक सच्ची बात बताऊँ?"
"पिताजी - ?"
"जन्म मृत्यु के दैवी चक्र से हमारे हाथ बँधे हुए हैं, नहीं तो स्वर्ग के
महादरवाजे से निकलकर हम कब के बाहर आ गये होते। अपने पराक्रमी बेटे की
सहायता के लिए मैं स्वयं तुम्हारे पास भागता हुआ आया होता।"
"पिताजी, भाग्य का यह दुश्चक्र, अपने आत्मीय और विश्वस्त लोगों द्वारा
कलेजे पर घात, मन बिलकुल भर गया था। कराल काल ने हाथों से शस्त्र छीन
लिये, आँखें ले लीं।"
"शम्भू बेटे! अन्धकारपूर्ण और काँटोंभरी राहों पर चलते हुए तुमने अपने
क्रिया-कलाप में निराशा का एक रोड़ा भी कभी आने नहीं दिया। अब दिल के
किसी कोने में भी अपराध भावना को स्थान मत दो। आज नहीं तो कल तुम्हारे
कार्यों के समक्ष सभी को आदरभाव से नतमस्तक होना ही पड़ेगा। अपने बुद्धिबल
और बाहुबल से तुमने पाँच लाख सैनिकों और चार लाख जानवरों वाली विशाल
मुगल सेना की महाबाढ़ को इतने दिन रोक रखा। अन्यथा दुर्भाग्यवश पाँच छह
महीने में ही सब कुछ समाप्त हो जाता और औरंगजेब की जीत हो जाती। हाथ में
जजियाकर का अस्त्र लेकर आयी मुगल सेना के सामने अपना प्रदेश विनष्ट हो गया
होता, फिर तुकोबा रामदास और शिवाजी का महाराष्ट्र कहाँ और कितना बच
पाता?''
सम्भाजी राजा ने महाराज के कन्धों पर अपना सिर टिका दिया। उस
ममतामयी ऊष्मा से सम्भाजी राजा स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहे थे।
"शम्भू, मेरे बहादुर बेटे, औरंगजेब अनेक राहु-केतुओं को मिलाकर बनाया
गया एक दुष्ट और क्रूरकर्मी है। संसार की एक बलशाली शक्ति को तुमने बड़ी
हिम्मत से टक्कर दी है। इससे पहले जब यह महादैत्य दिल्ली या आगरे के
राजमहल में बैठता था तब उसके सन्देश मात्र से ही दक्षिण के राज्य थरथर काँपते
थे। आदिलशाही और कुतुबशाही जैसी हुकूमतें उसकी परछाईं से ही डर जाती थीं।
756 :: सम्भाजी