छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 757, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह सरसराती हवा सम्भाजी राजा के शरीर के साथ खेलने लगी। जैसे कोई
वैद्य सिर पर हाथ रखकर घाव को सहला रहा हो उसी तरह वह हवा सम्भाजी राजा
के मस्तक के आसपास घूमने लगी। उनके सारे शरीर के साथ क्रीड़ा करने लगी।
उन्हें अपने आलिंगन में लेने लगी।
सम्भाजी राजा ग्लानि से जागे। उन्होंने सोचा कि इस मनहूस काली रात में
कौन है जो अपनी ममतामयी उँगलियाँ बालों में घुमा रहा है? यह किसके पैरों की
आवाज है। घावों से जर्जर इस शरीर को कौन अपनी ममतामयी गोद में ले रहा है?
किसके शरीर की गन्ध और किसकी उष्ण साँस है यह? यह कौन है नितान्त
अपना सा, पहचाना सा? सम्भाजी राजा का शरीर प्रफुल्लित होने लगा। जख्मी
और ज्योतिहीन आँखों से चिपचिपा द्रव बहने लगा। वे पूर्णरूप से मोहमुग्ध हो
गये। शरीर के अंगों की भीतरी वेदना पर आनन्द की लहर दौड़ गयी। सामने के
अदृश्य हाथों की हथेली सम्भाजी राजा के माथे को सहलाने लगी। कपोलों पर
चुम्बन का स्पर्श हुआ। उस शरीर से सोनचम्पा की सुगन्ध आ रही थी, उसके स्पर्श
में अपूर्व ममता थी। उस आभासमूर्ति की गोद में अपनी देह को झोंकते हुए सम्भाजी
राजा अपूर्व आनन्द का अनुभव कर रहे थे। वे आनन्द से किलकते हुए बोले,
"पिताजीऽऽ पिताजीऽऽ, आखिर आप आखिरी रात में आ ही गये अपने बालक
सम्भा से मिलने।"
माथे पर फिरने वाला हाथ अब सम्भाजी राजा के पीठ पर फिरने लगा। वह
आभासमूर्ति और भी समीप आ गयी। उसने सम्भाजी को प्रगाढ़ आलिंगन में ले
लिया। आभासमूर्ति करुणार्द्र स्वर में बोली, "शम्भू बेटे! कितनी क्रूर है यह दैव
गति?"
"पिताजीऽऽ आप।"
"हाँ, मैं ही हूँ।"
"पिताजी, आप आखिर मिल ही गये। मैं तो धन्य हो गया। इस शम्भू से
कोई भूल चूक हुई हो तो क्षमा कर दीजिएगा।"
"मेरे बेटे ऐसा मत बोलो। घोड़े की पीठ पर अपना सिंहासन लादने वाला
ऐसा कोई विरला योद्धा ही होगा जो देश, धर्म और भूमि के लिए आठ वर्षों तक
निरन्तर लड़ता रहे। यश अपयश और घोर आक्रमणों की परवाह किये बिना, केवल
बत्तीस वर्ष की आयु में औरंगजेब जैसे कराल कलिकाल से तुम्हारा मुकाबला
अद्वितीय और अद्भुत है, बेटा शम्भू।"
"पिताजी, शरीर में जितना बल था, जितनी शक्ति थी, वह सब मैंने देश-
सेवा में लगा दी।"
"नींद का स्वाँग करके सोने वाले स्वार्थी कुम्भकर्ण तुम्हारे इस महान साहस
सम्भाजी .. 755