छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 760, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेखकर, विशेष रूप से उनकी आँखों के रिक्त खाँचों की-ओर देखकर वे बुरी तरह
काँप गये। शम्भूराजा के श्रान्त और जख्मी सिर को अपनी छाती से सटाकर वे आर्द्र
स्वर में बोले, "शम्भूऽऽ मेरी जिन्दगी में ईश्वर ने, भाग्य ने, सद्भाग्य की पिटारी
भरकर मेरे कदमों में रख दिया था। क्या ही अच्छा होता कि उसमें से दो-चार मुट्ठी
बचाकर मेरे शम्भू के लिए रख लिया होता। यही सोचकर दुख होता है।"
"पिताजीऽऽ!"
"मेरे बच्चे, कहाँ गयीं तेरी तेजस्वी आँखें?"
"पिताजी, केवल जागीर के लोभी अपनी भूमि के अनेक लोगों ने हमारे
साथ धोखा किया। आज मृत्यु से पहले मेरे नेत्र चले गये तो अच्छा ही हुआ।
जागीरों के लोभ के लिए स्वाभिमान को नष्ट करने वाले इस महाराष्ट्र को देखने की
अपेक्षा तो नेत्रों का चला जाना ही अच्छा है।"
"बेटा, तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। अकाल के प्रकोप का प्रजा ने सामना
किया। सामान्य गरीब लोग हिन्दवी स्वराज्य की रक्षा के लिए तुम्हारे झंडे के नीचे
खड़े हुए। उन्होंने अगरबत्ती की तरह अपनी देह जला दी। किन्तु यहाँ के स्वार्थी
जागीरदारों ने तुम्हारे साथ धोखा किया। अन्यथा संगमेश्वर से तुलापुर तक की लम्बी
यात्रा में सभी ने मिलकर एक साथ पत्थर फेंके होते तो भी बादशाह कभी का
परलोक सिधार गया होता। परन्तु यहाँ के स्वार्थी सयाने लोग तो यही सोचते हैं कि
राजा मरे चाहे राज्य डूबे, उनकी जागीर बची रहनी चाहिए। तुम्हारे साथ हुआ यह
भयानक धोखा इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।"
"आपके शब्दों ने अनेक जटिल प्रश्नों को सुलझा दिया, पिताजी।"
"वाह, महाराष्ट्र! सफलतापूर्वक जीवन कैसे जिया जाए - इसे इस शिवाजी
ने तुम्हें सिखाया होगा, परन्तु देश, धर्म और मिट्टी के लिए प्राण कैसे दें इसका बोध
प्रजा को मेरे बेटे शम्भू से सीखना होगा। हे महाराष्ट्र, इस शिवाजी के गौरव के
उन्माद में हमारे शम्भूराजा के बलिदान को दुर्लक्षित करने का प्रमाद कभी न करना।
शम्भू पराक्रम से भरे तुम्हारे यश कलश को देखकर एक बात कहने की इच्छा हो
रही है। कुछ वर्ष पूर्व सिसोदिया वंश के साथ अपने सम्बन्धों की खोज के लिए मैंने
बालाजी चिटणीस को राजपूताना भेजा था। किन्तु शम्भूराजा के जुझारू जीवन की
गाथा जिस दिन लोगों के सामने आएगी और लोग तुम्हारे अपूर्व पराक्रम से परिचित
होंगे तब कोई अपनी वंशावली की खोज के लिए राजस्थान की रेत की ओर नहीं
दौड़ेगा। इसके विपरीत बाहरी योद्धा सहनशीलता के इस फौलादी महापर्वत से
अपना सम्बन्ध खोजते दौड़े आएँगे।"
"पिताजी, आपके शब्दों से हम पावन हो गये। मृत्यु की देह देहरी पर
पहुँचकर अब मेरे कलेजे में कोई भी काँटा बचा नहीं है। इसके विपरीत मृत्यु को
758 :. सम्भाजी