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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

दृष्टि से घूरते हुए देखा। बादशाह ने कहा, "एक जंगली चूहा, मामूली जमींदार
मरगठ्ठों की सल्तनत खड़ी कर ले, यह कितनी बहादुरी की बात है?"
"बादशाह, मेरे पिताजी की दौलत किसी घमंडी सुल्तान की गद्दी नहीं थी।
वह गरीब गुर्बों का, उनके सपनों का साम्राज्य था।"
थोड़े गम्भीर स्वर में औरंगजेब ने कहा, "कितना खुशकिस्मत है वह शिवा
जिसने तुम्हारे जैसे होनहार बेटे को जन्म दिया। तुम पर हमें बहुत नाज होता है।
आदमी अनुभव से सीखता है, ठेस लगने से सावधान होता है। तुमने मुझे आठ वर्ष
तक चक्कर कटवाया है। उस अनुभव से मैं तुम्हारी वीरता खुले रूप में स्वीकार
करता हूँ। शहजादे, यह तुम्हारी तारीफ नहीं हकीकत है। अपने पिता की, मरगठ्ठों
की गद्दी को सँभालने के लिए जिस तरह तुमने मुकाबला किया अपने किलों को
बचाकर रखा, समुद्र के पानी में आग लगाई, ऐसी थोड़ी-बहुत औकात मेरे चार
शहजादों में से किसी में भी हो तो-?"
सम्भाजी राजा ने गहरी साँस ली। वे बादशाह की नजरों में अपनी क्रुद्ध नजरों
मे देखते हुए बोले, "औरंगजेब बादशाह ऐसी झूठी प्रशंसा करने के बदले तुम्हें जो
चाहिए वह साफ-साफ कहो और छुट्टी पाओ।"
"तुम्हारा सबसे समृद्ध खजाना कहाँ है?"
"हर किले पर।"
"हमारी फौज के कौन-कौन से गद्दार शैतान तुम्हारे साथ मिले हैं?"
"पता नहीं।"
"घमंडी सम्भा, अब तो होश में आओ। एक मूर्ख शायर के साथ मिलकर
नादान मत बनो। तुम्हें इस बात का अनुमान नहीं है। हमारे जुल्फिकारखान की
चालीस हजार की फौज अब तक रायगढ़ में घुस चुकी होगी। रायगढ़ के किले पर
घेरा भी डाल दिया होगा।"
"बेवकूफ बादशाह, हमारा रायगढ़ बालू की दीवार से नहीं बना है?"
"फौलाद का बना हो तो भी उसे पिघला दो। ऐसी आज्ञा देकर ही मैंने
जुल्फिकार को वहाँ भेजा है।"
"पत्थर का है। उसके दो टुकड़े भी नहीं हो सकते।"
"बेमुरौवत काफिर बच्चे अपनी जान बचाओ! किसके भरोसे तुम इतना
घमंड करते हो? तुम्हारे प्रदेश की हर घाटी में हमारी फौज घुसने लगी है। यह भी
बारीकी से देखो कि तुम्हारे मुल्क के सारे जागीरदार हमारे दरबार में दौड़ लगा रहे
हैं।"
"जागीर के टुकड़ों के लोभ में जी हुजूरी करने वाले कुछ जागीरदारों का
मतलब महाराष्ट्र नहीं है। मर्दों का सच्चा महाराष्ट्र झुकेगा नहीं, झुकेगा तो नहीं
734 :: सम्भाजी

ही।''
बादशाह मन मसोसकर रह गया। वह फिर एक बार जोर से हँसते हुए बोला,
“सम्भा तुमसे मुझे दो ही बातें चाहिए। एक तो धोखेबाज गद्दारों की सूची और
दूसरे सह्याद्रि के सभी महत्त्वपूर्ण किलों की चाभियाँ, क़ब्ज़े के साथ।''
बादशाह की उस गर्जना को सुनकर सम्भाजी राजा को उस परिस्थिति में भी
हँसी छूटने लगी। औरंगजेब का उपहास करते हुए सम्भाजी महाराज बोले, “मूर्ख
बादशाह, सह्याद्रि के कन्धों पर बने हमारे मजबूत किले ही हमारी शोभा, सामर्थ्य
और प्राण हैं। किससे क्या माँगने की मूर्खता कर रहे हो? कल तू ईद के चाँद से
माँगेगा कि आकाश की सारी चाँदनी निकालकर मुझे दे दे, तो क्या ऐसा सम्भव
है?''
सम्भाजी राजा के जवाब के इस ढंग से कोने से हँसी के फव्वारे छूटे। कवि
कलश बादशाह की मूर्खता पर खिलखिलाकर हँस रहे थे।
सम्भाजी राजा और कवि कलश द्वारा किये गये अपमान और उपहास से
बादशाह भीतर ही भीतर बहुत बिफर गया था। वह अपने को बहुत बेइज्जत अनुभव
कर रहा था। उसे रामशेज किले की याद आयी। एक अकेले रामशेज ने साढ़े छह
वर्षों से नाक में दम कर दिया था। उसके अनेक बहादुर सरदार आँखों के आगे
प्रत्यक्ष हो गये। वह सोचने लगा, इस हिसाब से मराठों के सभी बलशाली किलों
को जीतने के लिए कितना समय लगाना पड़ेगा? इस कल्पना से बादशाह मन ही
मन घबरा गया। फिर भी उसने राजबन्दियों के सामने अपनी बात रखी, “सम्भाऽऽ
तू एक बात ध्यान रखना, दया माया, प्यार मुहब्बत जैसे झूठे जलवे हम अपने
कलेजे से चिपकाकर कभी नहीं रखते। हम खुले सत्य के पुजारी हैं। हम तुमसे वादा
करते हैं। तुम अपने सारे किलों का कब्ज़ा मेरे अधिकारियों के ताबे में दे दो और
अपने इस दोस्त के साथ ऐयाशी करने के लिए किसी भी प्रदेश में चले जाओ।”
“वाहऽ बादशाह।” कवि कलश खखाकर हँसे।
“यह मजाक नहीं है, मूर्ख शायर। चाहो तो कुरान शरीफ पर हाथ रखकर
हम तुम्हें वचन देते हैं।”
बादशाह की ओर देखकर सम्भाजी राजा व्यंग्य से हँसे। वे कहने लगे,
“हमारे गढ़ों-दुर्गों की चाभियाँ लेने के लिए तू बहुत ही बेताब दिख रहा है
बादशाह! बिना लड़े ही चुपचाप किलों का क़ब्ज़ा दे देने को कह रहा है तू?”
“बिल्कुल।”
“ऐसी फूँका फूँकी और बिना प्रयत्न के अधिकार जमाना है तो तू उधर उत्तर
की ओर क्यों नहीं जाता? वहाँ तुम्हारी तरह के लोगों को चाभियाँ मिल जाती हैं।
किन्तु उसके लिए नक्षत्र जैसी अपनी बहू बेटियों के हाथ दुश्मनों के हवाले करके
सम्भाजी :· 735

दौलत को बचाने वाली औलादें वहाँ रहती हैं। हम मराठों का सिद्धान्त अलग है
हम किले के प्रत्येक पत्थर पर अपने रक्त का सिन्दूर चढ़ाते हैं और उसकी रक्षा में
अपना बलिदान करते हैं।"
ग्यारह
"मेरे आका, सियासत के मामले में मैंने कभी कोई दखलन्दाजी नहीं की। किन्तु
नौ दस वर्षों से रोज अभियान, रोज नयी जगह पर पड़ाव। नयी नयी जगह पर
बादशाह का डेरा। ऐसा क्यों हो रहा है? इस खानाबदोश की जिन्दगी से मैं ऊब
गयी हूँ।" उदयपुरी बेगम ने कहा।
"शाही डेरे में रहने वालों का यह हाल है तो जंगे मैदान में रोज धूल
धक्कड़ भरे दमघोटू वातावरण में रहने वाले सिपाहियों का क्या हाल होता होगा ?"
बादशाह ने उल्टा सवाल किया।
बाजार त्रस्त हो गये थे। फौजी वापस जाने के लिए बेताब हो रहे थे। अनेक
कर्मचारी वेतन बढ़ाने के लिए अड़े बैठे थे। ये सारी स्थितियाँ बादशाह को पीड़ित
कर रही थीं। उदयपुरी ने आगे कहा, "अब बाकी क्या रह गया है। सम्भा तो अब
मिल गया न?"
"लेकिन उसके किले, उसका राज्य अभी तक कहाँ क़ब्ज़े में आया ?"
"यदि वैसा आवश्यक लगता हो तो सम्भा को अपने साथ ले लें।"
"दिल्ली की तरफ?"
"क्यों नहीं?"
"बेगम, यह जंग मैंने ऐसे मुकाम पर ला दी है कि इसे छोड़ना हमारे लिए
मुमकिन नहीं। हमारे पीछे मराठे दौड़े आएँगे। मेरा और सम्भा का जो भी फैसला
होगा, इसी मिट्टी में होगा।" बादशाह दीर्घ उच्छ्वास छोड़ता हुआ बोला।
एक रात में बादशाह को अचानक एक विचार सूझा। उसे स्मरण आया कि
कवि कलश सम्भा का प्राणतत्त्व है, यह बात मराठों के घर घर में छोटे बड़े सभी
जानते थे। बादशाह ने सोचा, यदि इसी धागे को पकड़ा जाये तो? बादशाह रात में
ही उठ गया। वह महल से बाहर निकला। गश्ती वाले पहरेदार सावधान हो गये।
उन्होंने अनुमान लगाया कि बादशाह निरीक्षण के लिए बाहर निकला होगा। फौज में
736 :: सम्भाजी

घबराहट फैल गयी। किन्तु बादशाह निकलकर उस बदनाम बन्दीखाने की ओर नहीं
गया। वह आधी रात में रूहूल्लाखान के डेरे में पहुँचा और वहीं पर कवि कलश को
लेकर आने का हुक्म दिया।
कविराज रूहूल्लाखान के डेरे में पहुँचे। सामने तकिये के सहारे बैठे
औरंगजेब को अस्वस्थ मनःस्थिति में देखकर वे मन ही मन हँसे। सम्भाजी राजा से
अलग बुलाए जाने का रहस्य उनकी समझ में आ गया।
आज तक औरंगजेब ने कविराज और सम्भाजो राजा को धमकियाँ देने, धाक
जमाने, डाँट फटकार, झूठे वादे, तुरन्त जान से मार देने की धौंस जैसे अनेक कड़वे
काढ़े पिलाकर देख लिया था। इस प्रकार की किसी भी औषधि का असर उन दोनों
पर नहीं हुआ। इसीलिए बादशाह ने कवि कलश को अकेले बुलाकर नयी टेढ़ी
चाल चलने की सोची। तीक्ष्ण बुद्धि के कविराज की समझ में सब कुछ आ गया।
रूहूल्लाखान के डेरे में चिराग जल रहे थे। उस अरुणाभ प्रकाश में खान और
बादशाह की मुद्रा कुछ अलग ही दिख रही थी। कविराज के अन्दर आते ही, खान
के संकेत से कविराज के शरीर और कन्धों से बेड़ियों का अधिकांश बोझ उतार दिया
गया। बादशाह की परवाह न करते हुए कविराज ठठाकर हँसते हुए और बादशाह
पर व्यंग्य करते हुए बोले, "देखिए एक बेवकूफ बादशाह एक नादान शायर से सौदा
करने के लिए खुद चलकर आ गया।"
आरम्भ में ही बादशाह ने कवि कलश से हँसते हुए पूछा, "बोलो कविराज,
क्या चाहते हो?"
इस सवाल पर दिल खोलकर हँसते हुए कविराज ने कहा, "शायर और कवि
के दिमाग में मस्ती का बारूद भरा रहता है, शहंशाह ! हमारी दुनिया में सिंहासन का
मूल्य कौड़ी भर भी नहीं होता। हमारी मस्ती ही हमारा सिंहासन है।"
बादशाह ने कवि कलश की ओर दयाभाव से देखा और उपहास करते हुए
बोला, "पागलखाने की दीवारों को फाँदकर जो भागते हैं उन्हीं को दुनिया शायर
कहती है तू भी एक मूर्ख शायर है, बस!"
"बिल्कुल।"
"इसीलिए तुम्हें जागीर, हीरे-जवाहरात जैसी किसी भी चीज की चाहत
नहीं होगी।"
"जी हाँ, शरीर पर लाज बचाने भर का लिबास और सम्भाजी राजा जैसे मित्र
. नहीं फरिश्ते का साथ मिल जाये तो तो दूसरा और कुछ नहीं चाहिए।" कवि कलश
ने लापरवाही से कहा।
"लेकिन तू सिर्फ शायर ही नहीं एक ब्राह्मण भी है, वह भी कोई मामूली
ब्राह्मण नहीं, कन्नौज का ब्राह्मण।" कलश की आँखों में घूरते हुए बादशाह ने कहा।
सम्भाजी .: 737

"पर उससे क्या फर्क पड़ता है?"
"तुम कन्नौज वाले अपना पेट भरने के लिए देव-धर्म का पाखंड करते हो।
गंगा-स्नान के लिए आये यात्रियों की दौलत लूटते हो। उनके शरीर के गहने-कपड़े
छीन लेते हो। बेचारे तीर्थयात्रियों को गंगा की बालू में दफन कर देते हो और उन
बदनसीब यात्रियों के घर सन्देश पहुँचा देते हो कि उन्हें जन्नत मिल गयी।"
"हुजूर आप कहना क्या चाहते हैं?"
"तू भी उसी कन्नौज का एक ब्राह्मण है, एक भूखा-प्यासा ब्राह्मण।"
"परन्तु बादशाह!"
"तुमसे हमारा छोटा-सा काम है। सम्भा के मुख्य दीवान या प्रधानमन्त्री के
रूप में सारा महाराष्ट्र जानता है। सभी मराठे तुम्हें पहचानते हैं। उस सम्भा के साथ
ही तू भी गिरफ्तार हुआ है, यह भी सब जानते हैं। इस समय बस, तुम्हें इतना ही
करना है...।"
"क्या?"
"तुम्हारी मुहर और हस्ताक्षर के साथ मराठों के सभी किलेदारों को खुला
हुक्म देना है। उन्हें लिखना है कि सम्भाजी ने अपनी जान बचाने के लिए बादशाह
औरंगजेब से सौदा कर लिया है। समझौते के अनुसार सभी किलों को खाली कर
देना है। किलों का क़ब्ज़ा मुगलों को दे दिया जाए। इस प्रकार का आदेश देने के
लिए स्वयं सम्भाजी ने कहा है।"
"झूठा हुक्म? सम्भाजी राजा के नाम से झूठा हुक्म?" कलश ने आश्चर्य
व्यक्त किया।
"हाँ! क्यों नहीं? कमबख्त शायर, इस छोटी सी शाही सेवा के बदले हम
तुम्हें मालामाल कर देंगे। बोलो, कौन-सी जागीर चाहिए तुम्हें? बरेली, सामाराम,
कानपुर या आगरा?" अपना उल्लू सीधा करने के लिए उतावला बादशाह पूछने
लगा।
कलश ने व्यंग्यभरी दृष्टि से बादशाह को नीचे से ऊपर तक देखा। बादशाह
की कुत्सित नजरों में अपनी निश्चयपूर्ण दृढ़ दृष्टि से देखते हुए कविराज ने कहा,
"बादशाह सलामत आप बहुत कमीने हैं। यह हमें शहजादा और अन्य अनेक लोगों
ने बताया है। लेकिन आज तो विश्वास हो गया कि आप दुनिया के कमीनों और
मक्कारों के मिरताज हैं।"
"जबान सँभालो बेवकूफ!" बादशाह कड़ककर बोला।
"अरे, अपने स्वार्थ के लिए सगे भाई के पेट और पीठ में छुरा भोंकने वाला
तू, अपने दारा जैसे विद्वान भाई का तूने सिर काट लिया। उस सिर को गोद में
खिलौने की तरह रखकर तू देर तक देखता रहा, इतना बड़ा हैवान तू। अपने
738 :: सम्भाजी

जन्मदाता माता पिता का पानी रोकने वाला तू एक नम्बर का हरामजादा है। यारी
दोस्ती का सच्चा जलवा क्या होता है यह तुम्हारे जैसे पत्थर हृदय मनुष्य को क्या
पता चलेगा?''
‘‘ठहरो पागल! बिना मतलब जिन्दगी गँवा बैठेगा। ’’
‘‘तू मेरा क्या बिगाड़ लेगा ? बूढ़ा सियार कहीं का। ’’
‘‘पागल बाभन, तुझे मैं फाँसी पर लटकाऊँगा। ’’
‘‘अरे छोड़, सम्भाजी राजा जैसे दिलदार दोस्त के लिए यह नाचीज
जिन्दगी कभी भी और कैसे भी समाप्त हो जाये तो बेहतर। ’’ कलश ने सगर्व
उद्गार व्यक्त किया।
इस मुँहतोड़ उत्तर को सुनकर बादशाह आग बबूला हो गया। उसने चाबुक
लाठियाँ लेकर खड़े अपने सैनिकों को अन्दर बुलाया। कविराज के शरीर पर सपासप
कोड़े पड़ने लगे। कुछ लाठियाँ भी पड़ीं। उनके मस्तक से खून की धारा फूट पड़ी।
जख्मी जानवर की तरह कविराज को वहाँ से खींचते हुए बाहर ले गये।
बारह
जिस दिन बादशाह ने बहादुरगढ़ छोड़ने का निश्चय किया था उसकी पिछली रात
फौलादखान बादशाह के कान में धीरे धीरे कहने लगा, ‘‘जहाँपनाह! सम्भा नहीं तो
उसका दीवान ही सही। अन्त में वह कलश फूट गया है। जहाँपनाह से मिलकर
वह स्वयं अपना उद्देश्य स्पष्ट करना चाहता है। ’’
बादशाह को अपने कानों और अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
किन्तु यदि इस तरह से कोई बात बनती थी तो वह उसके अनुकूल थी। इसलिए
औरंगजेब कलश से मिलने के लिए उत्सुक था। पिछली भेंट में भी कविराज को
मुँहमाँगी जागीर देने की तैयारी बादशाह ने दिखाई थी। किन्तु जागीर के मन्त्र से इस
तरह और इतनी जल्दी जादू की छड़ी फिर जाएगी, इसकी कल्पना बादशाह को न
थी। अनेक दिनों के उपवास और फौजियों द्वारा की गयी पिटाई के कारण कविराज
के शरीर की चमक जा चुकी थी। शरीर थका थका सा और सिर के बालों में जूएँ
भर गयी थीं। इत्र के शौकीन कविराज के शरीर से खून और पसीने की बदबू आ
रही थी।
सम्भाजी :. 739

बादशाह ने कलश को अपने सामने वाली गद्दी पर. बैठने का इशारा किया।
किन्तु कलश खड़े ही रहे। औरंगजेब कुछ कड़ी आवाज में बोला, "क्यों कविराज
कौन-सी जागीर चाहिए? आगरा, बरेली, लखनऊ या सासाराम? बोलो कौन-
सी?"
"सिर्फ एक फरियाद लेकर आया हूँ आपके दरबार में।" कविराज का स्वर
दयनीय था।
"कैसी? और कौन-सी फरियाद?"
"शहंशाह! आप मेरे टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों के आगे डाल दें तो भी कोई
बात नहीं। किन्तु मेरे राजा के साथ आप एक राजा जैसा ही बर्ताव करें।"
कलश का कथन सुनकर बादशाह चकरा गया। उसने क्रोध से पूछा,
"किसलिए आये हो? अपनी जान बचाने के लिए या सम्भा की?"
"हम तुम्हारे आगे भीख नहीं माँग रहे हैं। तैमूर के महान वंश का दम भरने
वाले बादशाह से हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं, 'बकरे काटने वाले कसाई और
हिन्दुस्तान के सिंहासन पर बैठने वाले राजा के व्यवहार में कुछ तो फर्क होना
चाहिए'।"
कवि कलश के ऐसा बोलने से वहाँ उपस्थित सैनिक और सेवक थरथर
काँपने लगे। बादशाह की गुस्से से घूमती आँखों को देखकर ऐसा लगा मानो माथे में
घुसी जा रही हों। कलश की जबान की तलवार झपाझप चल रही थी।
"कितनी घोर विडम्बना है। 'क्या जुलूस निकाला। अपने आसुरी आनन्द का
ऐसा खुला प्रदर्शन, द्वेष का ऐसा नग्न दर्शन, दुष्ट बुद्धि का ऐसा नर्तन संसार के किसी
भी सत्ताधीश ने कभी भी न किया होगा।"
"काफिरों का सम्मान करने की हमारी यही रीति है। बेवकूफ!"
"बादशाह को दुश्मनों से तो कुछ तहजीब और दिलदारी सीखनी चाहिए।"
"किस तहजीब और दिलदारी का पाठ हमें पढ़ा रहा है तू, पागल शायर?"
बादशाह पूरी तरह खिसिया गया था।
"यह शायर थोड़ा-थोड़ा इतिहास भी जानता है। तुम्हारी और सुजा की जब
निर्णायक लड़ाई चल रही थी, तब पंजाब में मिर्जाराजा जयसिंह तुम्हारे विरोध में
लड़ रहे थे। उस समय लाख के जंगल में तुम्हारे ऊपर बहुत बुरा समय आया था।
उस जंगल में तू जयसिंह को एकदम अकेला मिल गया था। ठीक वैसे जैसे सिंह के
पंजे में किसी भेड़-बकरी का पैर आ जाए। उसी समय यदि बिना दया दिखाए
उसने तुम्हारा गला चीर दिया होता तो औरंगजेब नाम का यह संकट आज के लिए
बचा न रहता।"
कलश की उस जानकारी से बादशाह बौखला गया। अपने को सँभालते हुए
740 :: सम्भाजी

सिपाहियों की ओर चिल्लाया, "बदमाशोऽऽ, पागलोऽऽ, क्या देख रहे हो? खींच
लो इस बेशर्म शायर को। उसकी टाँगें तोड़कर हमेशा के लिए किसी गन्दी नाली में
फेंक दो।"
बादशाह के सिपाही जल्दी से कविराज को खींचकर ले जाने लगे। उस
समय पीछे मुड़कर कलश दाँत पीसते हुए जोर-जोर से कहने लगे, "अल्लाह की
सेवा सिर्फ टोपियाँ सीने का नाटक करने से नहीं होती। पागल बादशाह, तुम्हारे
दिमाग के टाँके ही ढीले पड़ गये हैं।"
"अरे देखते क्या हो कमबख्तो? ले जाओ घसीटकर इस मूर्ख शायर को।"
बादशाह का हुक्म पाते ही सैनिक उस पर टूट पड़े किन्तु कलश उनकी
पकड़ में नहीं आ रहे थे। वे जोर जोर से कविता गा रहे थे—
'पाप कर्म करके सदा करता बिस्मिलाह
ढोंग किया, टोपी सिया मिले नहीं अल्लाह
निज दिमाग को टाँक लो पागल शाहंशाह'
कविता की इन आधी अधूरी पंक्तियों के कान में पड़ते ही बादशाह क्रोध से
पागल हो उठा। वह अपनी कटार हाथ में लेकर गरजा, "क्या सुन रहे हो? पहले
इस मगरूर शायर की जीभ काट दो। इसकी लाल चटचटाती जीभ काट दो।"
सिपाही छुरी-कटारी लेकर कलश की ओर दौड़े।
बलवान शरीर वाला एक पठान कलश की छाती पर बैठ गया। दूसरे दो
लोगों ने पैरों को गन्ने की तरह मरोड़कर पीछे खींचा। दोनों ने अपने राक्षसी हाथों
से कविराज की खोपड़ी पकड़ी। एक ने उनके मुँह पर जोर का तमाचा मारा, जबड़े
में हाथ डाला। इस प्रक्रिया में कविराज के चार दाँत टूटकर नीचे गिर गये। वह
जल्लाद कविराज की जोभ बाहर खींचने का प्रयास कर रहा था। कविराज की आँखें
सफेद पड़ गयीं। साँस फूल रही थी। इसी बीच आगे खींची हुई कविराज की जीभ
कटार से छाँट दी गयी। उनकी स्थिति आधी खोपड़ी टूटी चटपटाती मुर्गी की तरह
हो गयी। कविराज के मुँह से शब्दों की जगह रक्त की धारा बह रही थी। घायल
होने के कारण आँखों से आँसू बह रहे थे। साँसें तिलमिलाकर लम्बी हो रही थीं।
सम्भाजी :: 741

तेरह
सुराही का पानी बादशाह ने गटागट पी लिया। उसकी थकी हारी देह में थोड़ी
सजगता आयी। उसने अपने गंजे सिर पर हाथ फेरा। भावुक होता हुआ वह
उदयपुरी बेगम से बोला, “बेगम, तुम्हारे सामने एक बात कहकर मैं अपने दिल को
हल्का करना चाहता हूँ।”
“ऐसी कौन-सी बात है, मेरे आका?”
“जी हाँ बेगम। मेरी अपेक्षा इस जहन्नुमी सम्भा का बाप कितनी बड़ी
किस्मत वाला था जिसने सम्भा जैसे बहादुर बेटे को जन्म दिया। हमारे चार चार
शहजादे लेकिन बस, गधों की भीड़। इस सम्भा जैसा एकाध होनहार बच्चा हमारे
यहाँ जन्मा होता तो मैं अल्लाह से केवल दो ही चीजें माँगता—जपने की माला और
नमाज की चादर। बस इन्हीं दो चीजों को लेकर मैं एक पाक फकीर की तरह हमेशा
के लिए मक्का मदीना की यात्रा पर चला गया होता।”
उदयपुरी ने बादशाह के जीवन के अनेक चढ़ाव उतार, यश अपयश को
बहुत समीप से देखा था। किन्तु आजकल की बादशाह की मनोदशा उससे देखी
नहीं जा रही थी। उदयपुरी को अपने पति पर दया आ रही थी। वे बोलीं, “मेरे
आका हमारी इच्छा के अनुसार ही अल्लाह ने हमारा साथ दिया है। बीजापुर समाप्त
हो गया, गोलकुंडा अपनी शरण में आ गया, शिवा का बेटा भी मिल गया। लेकिन
इस विजय का आनन्द बादशाह के चेहरे पर दिखाई नहीं दे रहा है। आखिर बात
क्या है मेरे हजरत?”
बादशाह ने कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। जाप की माला को छाती से
लगाए बहुत देर तक कुरान की आयतों का मनन करता हुआ वह उसी तरह बैठा
रहा। बादशाह के मन को बहलाने के उद्देश्य से ही उदयपुरी ने कहा, “हजरत
आपकी जवानी की वह जंग आपके साथी तो क्या जानवर भी नहीं भूले होंगे। वह
बलख के आक्रमण का घमासान युद्ध। दिन ढलने लगा था, हजरत के सायंकाल के
नमाज का वक्त हो गया था। आप जंगे मैदान में ही चादर डालकर नमाज पढ़ रहे
थे। उस समय आपकी दाहिनी और बाईं ओर तोप के गोले छूट रहे थे, बाणों की
बौछारें उड़ रही थीं। उस जंगे मैदान में एक आपको छोड़कर इतना बेधड़क कोई
नहीं था। उस लड़ाई में हाथियों, घोड़ा, ढालों की आड़ में तो हर कोई जंग लड़ रहा
था किन्तु आप बिना विचलित हुए निश्चिन्त भाव से नमाज पढ़ रहे थे। आपको
देखकर लोगों की आँखों में आँसू उमड़ आये। सारे फौजी कहते थे, 'वह देखो
जिन्दा पीर' ऐसा कहते हुए जिल्लेसूबहानी की ओर उँगली उठाते थे।”
742 :• सम्भाजी

"अब्बाजान, अनेक फौजियों से यह हकीकत मैंने भी सुनी है।" शहजादी
जीनतउन्निसा ने कहा। "गुस्ताखी माफ़ अब्बाजान, मुझे भी डर लग रहा है। सन्देह
पैदा होता है। इतने-इतने बड़े युद्धों की आग झेलकर भी आप कभी डरे नहीं। आज
अपने तीनों बलवान दुश्मनों को मिट्टी में मिला देने के बाद भी आपके चेहरे पर
रौनक क्यों नहीं दिख रही है?"
"बेटी कुतुबशाही और आदिलशाही को मिट्टी में मिला दिया। वे दोनों
बादशाह हमारे कैदखाने में पड़े हैं। मरगट्ठों का सम्भा भी हमारे कैदखाने में पड़ा
जंग खा रहा है। यह भी सच है। किन्तु मराठों की इस भूमि में शिवा और सम्भा ने
ऐसा कोई सुरंगी बारूद भर रखा है, किसे पता? राजा के गिरफ्तार होने पर भी
मराठों का राज्य समाप्त नहीं हुआ है। हमारे द्वारा भेजे गये जुल्फिकार जैसे सेनानी
का हाथ अभी भी खाली है। जिस तरह पेड़ की चोटी पर बन्दर बैठते हैं वैसे ही
प्रत्येक किले के संरक्षण के लिए बुर्ज बुर्ज पर मराठे हथियार लेकर बैठे हैं। सम्भा
के गले में गिरफ्तारी की जंजीर बाँधे एक महीना हो गया पर उसकी महारानी, वह
डाकिन येसूबाई रायगढ़ का कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है। चाबुक मार मारकर
कलश और सम्भा की पीठ छलनी कर दी फिर भी वे कोई भेद देने को तैयार नहीं।
यह कैसी फतह है बिटिया?"
बादशाह बहुत देर तक विचारमग्न बैठा रहा। बाद में उसने असदखान को
अपने निजी कक्ष में बुलाकर कहा, "वजीरे आजम, इस बहादुरगढ़ की जगह ही
अशुभ है। यहाँ के महल गर्क होते हैं। यहाँ की जमीन खोदो तो शरीर पर कीड़े
उड़ते हैं। यह फतह मिलने पर भी फतह की खुशी हासिल नहीं होती।"
"हुजूर?"
"हाँऽ, असदखान। कल ही यहाँ से डेरे डंडे बाहर निकालिए। अपने दोनों
राजबन्दियों को कड़े बन्दोबस्त में साथ ले लो।"
"लेकिन जहाँपनाह, जाना कहाँ है? उनके अनुसार आदेश दूँ।"
"पुणे के आसपास।"
दूसरे दिन बादशाह के कुछ लाख घोड़े और सैनिक भीमा नदी के किनारे
किनारे ऊपर की ओर सरकने लगे। कोरेगाँव और तुलापुर के बीच छावनी बनाने का
बादशाह ने निश्चय कर लिया था। उसका विचार था कि पूना के पास पहुँचकर पूना
और चाकण के क्षेत्र पर आक्रमण किया जाए। उसके धूर्त मस्तिष्क में इस तरह के
विचार सक्रिय थे। उत्तरी कोंकण में उतरने से बादशाह की दहशत फैलने वाली थी,
जगह बदल जाने से घोड़े और सैनिक भी कुछ चैतन्य हो जाने वाले थे। बादशाह
को यह भी समीप से देखने का अवसर मिल जाता कि जुल्फिकार वहाँ कोंकण में
कौन-सा खेल खेल रहा है?
सम्भाजी 743

बादशाह के साथ वे दोनों राजबन्दी भी थे। उन पर शारीरिक और मानसिक
अत्याचार पहले की तरह ही हो रहा था। बादशाह सोचता था कि इन कैदियों की
चीख-पुकार सुनकर शायद रायगढ़ पर महारानी का कलेजा फटे और वे अपने पति
की जान बचाने के लिए तुलापुर की ओर दौड़ी चली आयें। यह कल्पना बादशाह
को भी बहुत व्यग्र कर रही थी।
3 मार्च, 1689 को बादशाह की फौज कोरेगाँव के मैदान तक पहुँच गयी।
तुलापुर के पीछे पहाड़ की तलहटी में भीमानदी के किनारे बादशाह का खेमा फैला
हुआ था। एक ओर से बहती हुई आती सन्त तुकाराम की इन्द्रायणी और दूसरी ओर
से सीमा। इन्हीं दो नदियों के संगम पर तुलापुर बसा हुआ था। दोनों नदियों के बीच
एक छोटी पहाड़ी जैसा ऊँचा स्थल था। उसी पहाड़ी पर औरंगजेब ने अपना
लालबारी डेरा खड़ा किया था। उसकी बची हुई तीन लाख सेना बडू कला और बडू
खुर्द से लेकर कोरेगाँव तक डेरा डाले पसरी थी।
लालबारी के डेरे-डंडे जिस दिन वहाँ लगे उसी दिन शाम को बादशाह ने
मियाँखान को अकेले में बुलाया। मियाँखान के कान में औरंगजेब फुसफुसाया,
"अपनी फौज के सबसे अधिक विश्वासपात्र के रूप में मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया है,
मियाँखान ?"
"जहाँपनाह आपकी खातिर तो जान भी हाजिर है।"
"हमें एक सन्देह हो रहा है। सन्देह नहीं विश्वास हो गया है कि हमारी
छावनी के कुछ लोग खुफिया तौर पर अभी भी उस सम्भा के साथ मिले हुए हैं।"
"क्या कह रहे हैं, मेरे आका?" मियाँखान के गले में जैसे कुछ अटक गया।
"इसीलिए जानबूझकर मैंने तुम्हें बुलाया है। हमारा अब किसी पर भरोसा
बचा नहीं है। कौन हैं ये मक्कार? आप ही इन्हें ढूँढ़ निकालिए।"
"ठीक है, मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूँगा, मेरे आका।" मियाँखान ने
सौगन्ध खाई।
तुलापुर की छावनी में दिन बीतने लगे। जुल्फिकारखान की ओर से फतह की
कोई सूचना नहीं आयी। मराठों की महारानी और उसकी सेना शरणागत होने का
नाम नहीं ले रही थीं। बादशाह को बहुत क्रोध आ रहा था। उन दोनों राजबन्दियों
को पकड़े पूरा महीना बीत गया था, फिर भी राजबन्दी जीवित थे। बादशाह ही
नहीं, सभी सैनिकों की आँखों के सामने अतीत की क्रूर कथाएँ बार-बार साकार हो
रही थीं। मथुरा में नेस्तनाबूद किये गये वे गोस्वामी, दारा शिकोह, भाई मतीदास,
भाई सतीदास, दयालदास और गुरु तेगबहादुर...। सम्भा और कलश को मारने
पीटने से भी कुछ हाथ नहीं लग रहा था। बादशाह को अनुभव हो रहा था कि
छावनी के सारे अधिकारी ही नहीं, फौजी बाजारों के आवारा लड़के भी उसकी ओर
744 :: सम्भाजी

देखकर उपहास से हँसते हैं। उसे दुर्बल और डरपोक समझने लगे हैं।
क्रोध के आवेश में एक सुबह औरंगजेब ने रुहुल्लाखान को हुक्म दिया,
"जाओ उस कवि कलश की आँखों में तपती सलाई घुमाकर, उस कुत्ते की आँखें
निकाल लो।"
खुफिया नौकर और अन्य फौजी बन्दीखाने की ओर दौड़े। हुक्म की तत्काल
तामील की गयी। कविराज की पानीदार आँखें और उसमें चमकती हुई पुतली
निकाल ली गयी। उनकी आँखों का केवल भयानक खाँचा बचा रह गया।
बादशाह राजबन्दियों की रोज बारीकी से पूछताछ करता था। दोनों
राजबन्दियों का शरीर व्यायाम के अभ्यास से पोषित था। इसलिए वे बहुत मजबूत
और धैर्यवान थे। उनकी जगह यदि कोई अन्य होता तो कब का तड़पकर मर गया
होता। कविराज और सम्भाजी राजा का खाना-पीना बहुत कम हो गया था।
एक दिन सवेरे-सवेरे औरंगजेब ने सम्भाजी राजा को अपने दरबार में बुलाया।
उनकी अति पानीदार आँखों को देखकर बादशाह विषाद से हँसा। अपने सरदारों के
सामने सम्भाजी राजा की खिल्ली उड़ाते हुए बोला, "सम्भाऽऽ मुझे लगता था कि
अपने दोस्त की आँखों की ओर देखकर तुझे अक्ल आ जाएगी। पर खैर चलो-"
औरंगजेब जैसे शैतान की ओर देखना सम्भाजी राजा को पाप जैसा लग रहा
था। उनकी लाल सुर्ख आँखें औरंगजेब की क्रोधाग्नि में घी का काम कर रही थीं।
बादशाह क्रोधावेश में बोला, "तेरे दोस्त की जीभ मैंने पहले ही छाँट दी है।
तुम्हारी इसलिए छोड़ रखी थी कि उससे हार की, पराभव की बात सुन सकें। किन्तु
तुम्हारी तो तकदीर ही खराब दिखती है। उसके लिए तुम्हारे तैंतीस करोड़ देवता भी
क्या कर सकते हैं?"
फतह हासिल करने पर भी बादशाह के हाथ कुछ नहीं लग रहा था। इससे
बादशाह बहुत दुखी और क्रुद्ध था। वह दाँतों से जीभ चबाते हुए धीमे स्वर में
बोला, "सम्भा अब तुम्हें नयी दृष्टि देने की जरूरत है।" पूर्व निश्चित योजना के
अनुसार पास ही तपती हुई सलाइयाँ तैयार थीं। उन तीलियों की जलती लाल भभक
औरंगजेब ने स्वयं देखी। सरदारों की भीड़ में पीछे की ओर भयभीत मियाँखान
खड़ा था। बादशाह की दृष्टि उस पर पड़ी। बादशाह ने जोर से पुकारा, "आओ
मियाँखान, सामने आओ।"
मियाँखान सामने आकर लड़खड़ाते पैरों से खड़ा हो गया। सम्भाजी राजा के
हाथ पीछे की ओर बँधे थे। मियाँखान की हैरान आँखों की ओर देखकर औरंगजेब
खुशी से हँसा। उसने कहा, "वजीरे-आज़म, सम्भा को नयी दृष्टि देने की नापाक
कारगुजारी के लिए हमें एक ईमानदार आदमी की जरूरत है। और मियाँखान के
समान दूसरा वफादार आदमी हमारी फौज में कौन मिलेगा?"
सम्भाजी :: 745

मियाँखान बादशाह के सामने टालमटोल करने लगा। तभी बादशाह जल्लादों
पर चिल्लाया, “मियाँखान ना कहता है तो सम्भा से पहले उसकी ही आँख निकाल
लो।” मियाँखान का हाथ थर-थर काँपने लगा। उसने काँपते हाथों में जलती
सलाइयों को पकड़ लिया। धीरे धीरे चार कदम रखता हुआ सम्भाजी राजा के पास
पहुँच गया। सम्भाजी राजा की तेजस्वी आँखों के पास उन तपती सलाइयों को ले
जाते-ले जाने अचानक उन्हें अपने पेट में चुभा दिया। जोर का शोर उठा। बादशाह
के इशारे पर नौकर आगे दौड़े। उन्होंने मियाँखान के शरीर पर तलवार से सपासप
वार किया। मियाँखान का रक्त मांस सम्भाजी राजा के पैरों में बिखर गया।
बादशाह की आज्ञा से जल्लाद आगे बढ़े। तप्त लाल सलाइयाँ सम्भाजी राजा
की आँखों में घुमाई गयीं। चर्र चर्र की आवाज हुई। आँखों से धुआँ उठा। चेहरे का
चमड़ा भी थरथराया। किन्तु मुँह से भय या आक्रोश की कोई चीख नहीं उठी। यह
देखकर औरंगजेब को बहुत दुःख हुआ।
चौदह
जिंजी के भव्य किले के नीचे कंसोपन्त त्रिमल का निवास था। दिन डूबते डूबते
आज यह दुखद समाचार वहाँ पहुँच गया। 'शम्भूराजा कैद हो गये उन्हें औरंगजेब
की सेना जंजीरों से बाँधकर ले गयी।' इस समाचार ने केसोपन्त का कलेजा टूक
टूक कर दिया। केसोपन्त त्रिमल के भीतर का ईमानदार रक्त उन्हें शान्त बैठने नहीं
दे रहा था। ऊपर किले पर हरजी राजा के पास भी यह समाचार पहुँचा था। केसो
त्रिमल को विश्वास था कि समाचार पाते ही हरजी राजा उन्हें बुलाएँगे। इसीलिए
उन्होंने तैयारी आरम्भ कर दी थी। उन्होंने अपनी सेना को तैयार रहने का संकेत
दिया। उन्होंने कहा, “किसी भी समय औरंगजेब से बदला लेने के लिए हमें
महाराष्ट्र वापस जाना पड़ सकता है।”
केसो त्रिमल के बड़े भाई मोरोपन्त शिवाजी महाराज के अष्टप्रधानों में पेशवा
थे। उन्होंने महाराज के साथ लेखनी ही नहीं तलवार भी चलाई थी। पिंगले घराने
के वफादार खून की परम्परा को केसोपन्त ने रामशेज के किले पर भी प्रमाणित किया
था। दो वर्षों तक किले पर आँच नहीं आने दी थी। एक विश्वासपात्र के रूप में ही
सम्भाजी राजा ने उनकी नियुक्ति दक्षिण के तमिल और कर्नाटक प्रदेश में की थी।
746 • सम्भाजी

हरजी राजा का सन्देश आया, "महल से निकलकर तुरन्त पूना के लिए प्रस्थान
करना पड़ेगा। विचार-विमर्श के लिए फ़ौरन ऊपर आइए। आपकी राह देखते हम
दरवाजे पर ही खड़े हैं।" तब वृद्ध केसो त्रिमल जिंजी का वह किला चढ़कर ऊपर
आये। पसीने से तरबतर हरजी महाड़िक के सामने खड़े हो गये।
हरजी प्रसन्न मुद्रा में झूले पर बैठे दिखे। दालान के कोने से किसी की रोने
की आवाज आ रही थी। सम्भवतः वह आवाज अम्बिकाबाई की होगी। आखिर
शम्भुराजा उनके छोटे भाई थे। केसो पन्त कुछ हड़बड़ाए हुए से सामने रखे आसन
पर बैठने लगे। उसी समय कोने में खड़े अपने सिपाहियों को संकेत किया। आठ
दस लोग केसोपन्त पर टूट पड़े। उन्हें बन्दी बनाकर कैदखाने की ओर ले जाया
गया। केसोपन्त की वफादार आत्मा आहत हुई और अपमान से उनका चेहरा लाल
हो गया। मराठों का राजा दूर अपनी मातृभूमि में कैद हो गया। उसकी मदद के लिए
दौड़कर जाने के बदले हरजी राजा जैसा व्यक्ति, राजा का सगा बहनोई इस प्रकार
का धोखा करेगा, ऐसा तो त्रिमल ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था।
हरजी राजा ने केसो त्रिमल को ले जाते हुए देखा। हरजी प्रसन्नता से हँसे।
महाड़िक के कर्मचारी लेखन सामग्री लेकर पहले से ही बैठे थे। हरजी राजा
औरंगजेब को पत्र लिखवाने लगे।
"ऊपर ईश्वर की महिमा का आसमान और नीचे बादशाह मेहरबान। यही
सत्य स्थिति है। इसे हम भली प्रकार जानते हैं। आपने जिस प्रकार हमारे साढ़ू भाई
गणोजी शिर्के और महादजी निंबालकर पर दयाभाव रखा है वैसी ही कृपा हमारे
ऊपर भी रखिए। यद्यपि हम शिवाजी के जामाता हैं फिर भी हमारा सिर उनके पुत्र
सम्भा की तरह फिरा नहीं है। कहने का मकसद यह है कि आप हम पर कृपा करके
बादशाही की सेवा का देवदुर्लभ अवसर प्रदान करें।"

पन्द्रह

रायगढ़ पर शोक की लहर फैली थी। दस वर्ष पूर्व शिवाजी महाराज के आकस्मिक
निधन से राजधानी को भूकम्प का झटका लगा था। अब दस वर्ष बाद मुगलों द्वारा
सम्भाजी राजा को जीवित पकड़ा गया था। हिन्दवी स्वराज्य को यह दूसरा भीषण
झटका लगा था। सम्भाजी राजा जैसे ध्येय धुरन्धर रणवीर और कर्तव्यपरायण राजा
सम्भाजी 747

का जीवन केवल बत्तीस वर्ष होने का प्रजा को बहुत दुख था।
येसूबाई महारानी पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा था। जैसे किसी ऊँचे पहाड़
से फिसलकर हिरन नीचे गिर जाये और उसकी मृत देह को देखकर हिरनी पागल
होकर छटपटाए, अपने हृदय की असह्य वेदना को दबाकर नाचने लगे, वही स्थिति
येसूबाई महारानी की हो रही थी। जो जन्म से राजा और प्रवृत्ति से राजर्षि था, ऐसे
अपने प्राणप्रिय पति के भाग्य में ऐसा दुर्दिन आएगा ? इसकी तो कल्पना तक नहीं
थी।
महारानी को सम्भाजी राजा की स्मृतियाँ बार-बार आती थीं। क्रूरकर्मा
औरंगजेब चुप बैठेगा इसका विश्वास नहीं होता था। शम्भुराजा भी किसी तोड़
जोड़ या समझौते के लिए तैयार न थे। इसलिए मन के भीतर मृत्यु का घंटा बजता
सुनाई पड़ता था। कराल काल का भयानक दरवाजा करकरा रहा था। महारानी को
रोज का कार्यव्यापार-पत्राचार, लेना-देना, हर किले के किलेदारों और सरदारों का
धैर्य बँधाना, जहाँ आवश्यक हो वहाँ सेना को पहुँचाना, रायगढ़ को निवाले की तरह
निगलने के लिए तत्पर जुल्फिकारखान के आक्रमण को रोकने का प्रबन्ध आदि
करना पड़ रहा था।
महारानी को राजमहल खाने को दौड़ता था। चौकियों के पहरे के निरीक्षण के
निमित्त से वे कभी-कभी बाहर निकलती थीं। साथ में ताराबाई, खंडो बल्लाल और
अन्य लोग होते थे। वे रायगढ़ के बुर्जों से सामने के गहन अँधेरे को देखती थीं।
उन्हें लगता था कि इस तहीभूत अँधेरे को ही अपने पास बुला लें। महाराज कब
मिलने वाले थे ? इस जन्म में या दुर्देव से अगले जन्म में ही। सिर के ऊपर आकाश
चन्द्र की ओर वे देखती ही नहीं थीं। यदि कभी असावधानी से चन्द्र दर्शन हो जाता
तो उनका मन शम्भुराजा की स्मृति में पागल हो जाता था।
येसूबाई के माथे का सौभाग्य सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। क्रूरकर्मा
औरंगजेब पीछे हटने को तैयार नहीं था। ऐसी खबरें आ रही थीं कि औरंगजेब की
सेना बहादुरगढ़ छोड़कर तुलापुर की ओर बढ़ रही है। आसपास की घाटियों में
आकर स्वराज्य के बुर्जों को ध्वस्त करने का निश्चय बादशाह ने कर लिया है।
अनेक अनुभवी और सम्मानित लोग अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने और जागीर के
टुकड़े के लिए औरंगजेब के तम्बू की ओर दौड़ लगा रहे हैं। ऐसे समय में सह्याद्रि
की घाटियों के साढ़े तीन सौ किलों की रक्षा करना आवश्यक है। यही सोचकर
येसूबाई रात-दिन एक करके हिम्मत के साथ आये हुए संकट का मुकाबला कर रही
थीं।
सम्भाजी राजा की मियाँखान और कुछ अन्य मुगलों से मैत्री थी। यह बात
748 :: सम्भाजी

किसी को ज्ञात न थी। इससे आधे-अधूरे ही सही किन्तु राजा के सन्देश रायगढ़ तक
पहुँच जाते थे। इधर शम्भूराजा के सन्देशों में प्रयुक्त निर्वाण की भाषा से येसूबाई
बहुत विकल हो गयी थीं। राजा का सन्देश आया था, "येसूरानी! मेरे द्वारा बताए
गये सन्देश के अनुसार कलिकाल का मुकाबला करने के लिए तैयार रहिए। महाराष्ट्र
के माथे पर पिताजी द्वारा गोदवाए गये स्वराज्य के गोदने की रक्षा के लिए अपने
माथे का कुंकम पोंछने के लिए आप तैयार रहिए। मुझे भूलिए और राज्य को
सँभालने की तैयारी कीजिए।"
ग्रह-नक्षत्र विपरीत हो गये थे। मराठों पर काल उलट गया था। फिर भी
जलते घरों की अग्नि पर अपने स्वार्थ का बैंगन भूनने वालों की कमी नहीं थी।
येसूबाई के मन में यह तिलमिलाहट थी कि किसी तरह यह कराल काल बदल
जाये और राजा फिर से स्वराज्य में लौट आयें। एक दिन सिर नीचे झुकाए पुनवड़ी
के बड़े व्यापारी कान्तासेठ बिहारीमल आये। उनके साथ बारामती के जीवाप्पा
नाइक, तुकोबा सोन साखले जैसे व्यापारी थे। इनकी पीढ़ियाँ पुणे में थीं। गोलकुंडा,
बीजापुर और औरंगजेब के बाजारों में उनका व्यापार चल रहा था।
ये सभी लक्ष्मीपुत्र रायगढ़ पर महारानी से मिले। वे धीमे स्वर में महारानी से
कहने लगे, "बादशाह के खजानची रूहूल्लाखान और उनके तीन सौ बाजारों के
साथ हमारा रोज का सम्बन्ध है। हमारी मध्यस्तता से महाराज के प्राण अभी भी
बचाए जा सकते हैं।"
महारानी ने उन पर दृष्टि डाली। ऐसी कल्पना सुनने में भी बहुत मधुर लग
रही थी। कान्तासेठ और उनके साथियों ने धीमे स्वर में किन्तु आशापूर्ण स्वर में
कहा, "बादशाह की फौज के अधिकारी बहुत भ्रष्ट हैं। यह बात आपके कान तक
भी आयी होगी।"
येसूबाई एक क्षण के लिए रुकीं, किन्तु तुरन्त खंडो बल्लाल की ओर देखते
हुए बोलीं, "खंडोबा इस कार्य के लिए इन्हें जितना धन चाहिए दे दीजिए।"
महारानी दरबार से उठीं। किन्तु उनके पैर ठिठक गये। इस कार्य में उनके
साथ विश्वासघात होने की पूरी सम्भावना थी। उन्होंने अनुभव किया कि इस
मंडली की आँखों में विश्वास का कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहा था। महारानी के
पीछे-पीछे आकर ताराबाई भीतरी दालान में उनसे बोलीं, "दीदी, यह धन चोरों की
झोली में जाने की ही अधिक सम्भावना है।"
"तारा, मेरी भी समझ में ऐसा ही कुछ आ रहा है। परन्तु यदि इस अन्धी
सम्भावना का आधार पकड़कर महाराज के प्राण बच सकें तो?"
"मुझसे भूल हुई, दीदी। दादासाहब के प्राणों के सामने मुट्ठी भर द्रव्य की
क्या कीमत?"
पैसे देकर काम सिद्ध करने के नाम पर ये महानुभाव मोटी-मोटी थैलियाँ
सम्भाजी 749

लेकर चले गये। उनके डगमगाते पैरों का बादशाह की छावनी तक पहुँचना सम्भव
ही नहीं था। रास्ते में इन लोगों के बीच घुसर-फुसर चल रही थी। वे सोच रहे थे
कि औरंगजेब के भयंकर धक्के के सामने महारानी भी कितने दिन जी पाएँगी।
चलते हुए ये महानुभाव अपनी अन्नदात्री महारानी के सम्बन्ध में इस प्रकार की चर्चा
कर रहे थे। राज्य की सीमा पर पहुँचकर उन चोरों ने सारा द्रव्य आपस में बाँट लिया
और वहाँ से अपने इष्टमित्रों अथवा व्यापार स्थलों पर चले गये।
शम्भूराजा के अमानवीय जुलूस, उनके साथ दुर्दैवी घात आदि की कथाएँ
राजधानी तक पहुँच रही थीं। इस समय सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि इस अनिश्चय
की स्थिति को कितने दिन झेला जा सकता है ? इस भयानक व्यूह रचना से बाहर
निकलने का उपाय कैसे ढूँढ़ा जाए ? कौन-सी योजना बनाई जाए ? प्रहलाद निराजी,
येसाजी कंक, रामचन्द्र पन्त जैसे वरिष्ठ अनुभवी लोग इसी उधेड़बुन में व्यस्त थे।
प्रायः सभी इस बात पर सहमत थे कि इस प्रकार की भ्रामक और अनिश्चित
परिस्थिति में महारानी का रहना ठीक नहीं था। महारानी भी आखिर कितने दिनों
तक राज्य का कार्यभार संभाल सकती थीं ?
“सच बात तो यह है कि रायगढ़ के सिंहासन को रिक्त रखना किसी के भी
हित में नहीं है।” येसाजी ने अपना स्पष्ट मत व्यक्त किया।
येसूबाई, राजाराम साहब और ताराबाई की ओर मुखातिब हुईं। उन्होंने पूछा,
“आप लोगों की क्या राय है?”
“दादाजी महाराज पर बुरा समय आया है। राज्य पर उनके अनेक उपकार हैं
उनकी जीवन्त यादगार के रूप में उनके चिरंजीव बालक शाहू को गद्दी पर
बिठा दीजिए। हम हर प्रकार से उनके पीछे खड़े रहेंगे।” राजाराम साहब ने अपना
मत व्यक्त किया।
अधिकारी वर्ग के दुष्ट तत्त्व यद्यपि समाप्त हो चुके थे किन्तु ईर्ष्या-द्वेष की
प्रवृत्ति अभी समाप्त नहीं हुई थी। राजाराम साहब ने अपना बड़प्पन दिखाया था।
किन्तु अनेक लोग आपसी रिश्तों की बुनियाद पर ईर्ष्या की आग भड़काने के लिए
फूँक मारने में लगे थे।
महारानी येसूबाई ने कहा, “सन्तुलित और मूल्यनिष्ठ विचार से ही राज्य
चल सकता है। छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए जूझना हमें शोभा नहीं देगा। भोंसले
खानदान की तीन-तीन पीढ़ियों को उजाड़ने वाले औरंगजेब जैसे सबल शत्रु का
एकजुट होकर मुकाबला करना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।”
“इसलिए हम अपने बालशाहू का राज्याभिषेक शीघ्रातिशीघ्र कर लें।” सभी
ने एक साथ मत व्यक्त किया।
“नहींऽऽ!” धीमे किन्तु दृढ़ स्वर में महारानी ने असहमति व्यक्त की।
उन्होंने कहा, “सात वर्ष के बाल शाहू की अपेक्षा राजाराम साहब अधिक समझदार
750 :: सम्भाजी

और कर्तव्यनिष्ठ हैं। सिंहासन पर उन्हें ही बिठाएँगे।'
जिस दिन यह निर्णय लिया गया उसी दिन छोटेखाँ ने राज्याभिषेक की सभी
विधियाँ पूरी कर लीं। राजाराम साहब हिन्दवी स्वराज्य के तीसरे छत्रपति बन गये।
उन्होंने कृतकृत्य भाव से अपनी बड़ी भाभी का वन्दन किया, उनका आशीर्वाद
लिया।
समय के साथ रायगढ़ के आसपास फन्दा कसता जा रहा था। जुल्फिकारखान
ने आसपास के अनेक जंगली एवं घाटियों के रास्ते रोक दिए थे। शत्रुओं की सेना
एक दिन रायगढ़ के बिलकुल समीप पहुँच गयी। किले का संरक्षण करने वाली
घेराबन्दी, किले के मुख्यद्वार, चितदरवाजे से अन्दर सरक गयी। अनेक घायल और
रक्तरंजित घुड़सवार किले की ओर भागे। उनके विकृत चेहरे देखे नहीं जा रहे थे।
बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग भी बन्द हो गया था। इस प्रकार का भयानक संकट
राजधानी रायगढ़ पर पहले कभी नहीं आया था।
अधिकारी, कर्मचारी और प्रजाजन सभी चिन्तित हो गये। वे सोच रहे थे कि
यदि शिवाजी महाराज का दूसरा उत्तराधिकारी भी मुगलों के हाथ लग गया तो
स्वराज्य समाप्त ही हो जाएगा। सारा कार्यव्यापार समाप्त हो जाएगा। किन्तु प्रश्न
यह था कि इस भयानक चक्रव्यूह से निकलें भी तो कहाँ? और कैसे? मुख्यद्वार
चितदरवाजा से महाद्वार की ओर निकलने के अतिरिक्त दूसरा कोई अन्य मार्ग न था।
इस मार्ग के अतिरिक्त एक बार एक स्त्री जिसका नाम हीरकणी था, दूसरे रास्ते से
किले से नीचे उतरी थी। यह बड़े जोखिम का काम था। किन्तु शिवाजी महाराज ने
उस रास्ते को भी बन्द करवा दिया था। रायगढ़ के पंछी, हवा और वर्षा के पानी की
बात छोड़ दें तो किले से बाहर जाने के लिए मुख्यद्वार के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग
नहीं था।
उस दिन सन्ध्या समय ताराबाई और येसूबाई ने जगदीश्वर का अभिषेक
किया। उनकी पालकियाँ मन्दिर से राज्यप्रासाद की ओर चलीं। रास्ते में किले पर
ब्राह्मणबाड़ा था। वहीं पास में गड़ेरियों के घर थे। उनकी भेड़ें बेंऽऽ बेंऽऽ करती हुई
अपने बाड़े की ओर लौट रही थीं। भेड़ों के पचीस तीस छोटे मेमने बड़े-बड़े झाबों
के भीतर ढकेले जा रहे थे। राज्यप्रासाद के पन्त, कर्मचारी, पहरेदार सभी चिन्तामग्न
थे। सभी की एक ही चिन्ता थी कि मुगलों के फन्दे से राजपरिवार को कैसे बचाया
जाए?
महारानी के कानों में अभी भी भेड़ों के बच्चों का मिमियाना अनुगूँजित था।
उन्होंने सैनिकों को बुलाया। सैनिक गड़ेरियों के बड़े बड़े झाबे लेकर आये। आधी
रात को बाघ दरवाजे के पिछले बुर्ज से रस्सी लटकाई गयी। कुछ सैनिकों को झाबे
में बैठाकर नीचे उतरने का घातक अभ्यास कराया गया। दूर जंगल में मुगलों की
फौज में जलती मशालें दिखाई पड़ रही थीं। उनकी गतिविधियाँ चालू थीं। येसूबाई
सम्भाजी :: 751

ने राजाराम और ताराबाई को एक बड़े झाबे में बैठने की आज्ञा दी। साथ में कुछ
सैनिक भी जाने वाले थे। येसूबाई ने चिन्तित स्वर में कहा; "समय एकदम नष्ट न
करो। चलिए पहले बाहर निकलिए। अपने किले में अभी भी अनेक स्थलों पर
किलेबन्दी बची हुई है। उसी ओर भागिए। अपनी जान बचाइए, राज्य बचाइए,
लड़ते रहिए।"
"किन्तु भाभी जी आप?" राजाराम ने कातर स्वर में पूछा।
"नहींऽ दीदी आपको भी हमारे साथ आना होगा। आप पीछे रह गयीं तो
कैद हो जाएँगी।" ताराबाई हकलाते हुए बोली। उनकी आँखें अश्रुपूरित हो गयी
थीं।
"मैंने जानबूझकर कैद होने की तैयारी कर ली है। तुम दोनों जितनी जल्दी
हो सके निकल जाओ। नहीं तो हम सभी कैद हो जाएँगे।"
"मतलब?"
"मेरे कैद होने में लाभ है। शम्भू महाराज के कुटुम्ब के बन्दी हो जाने के
आनन्द से हमारा शत्रु दो-चार दिन के लिए ढीला पड़ जाएगा। उसी अवधि में आप
दोनों खतरे की सीमा के पार निकल जाइए।"
येसूबाई की असाधारण उदारता और अद्भुत बौद्धिक कौशल देखकर
राजाराम और ताराबाई को बहुत आश्चर्य हुआ। वे रो पड़े। शत्रु की फौज रायगढ़ पर
अधिकार करने के लिए रात में ही कूच कर चुकी थी उनका शोर अब पास ही सुनाई
देने लगा था। हाथ ऊँचा करके महारानी से विदा लेने तक का अवसर राजाराम और
ताराबाई को नहीं मिला। मजबूत रस्सियों में बँधे झाबे में बिठाकर वे नीचे छोड़ दिये
गये। येसूबाई ने सन्तोष की साँस ली और थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।
मन ही मन जगदीश्वर का आभार माना।
सोलह
"बेवकूफ बादशाह, मौत हमें कबूल है किन्तु तुम्हारा धर्म स्वीकार करना नहीं। यह
शिवपुत्र तुम्हारे मजहबी जाल में कभी भी फँसने वाला नहीं है।" सम्भाजी ने
मुँहतोड़ उत्तर दिया।
"मजहब के लिए मैं रुका भी नहीं हूँ।" औरंगजेब कुत्सित हँसी हँसते
हुए बोला।
752 : सम्भाजी

"खजाने की बात करते हो तो हमारा प्रत्येक किला खजाना ही है। तेरे बूढ़े
शरीर में यदि अभी भी कुछ ताकत बची हो तो अल्लाह के घर जाने से पहले
शिवाजी-सम्भाजी के किले जीतकर दिखा।" सम्भाजी ने चुनौती भरे शब्दों में
कहा।
"सम्भाऽऽ, हमारा सवाल मजहब की आरज़ू और खजाने की चाहत से परे
है। हमें हिन्दुस्तान की राजनीति आगे भी चलानी है। इसलिए शासक होने के नाते
तुमसे साफ साफ जवाब चाहता हूँ। बोलऽ, तुम्हारे साथ और उन दो शिया राजाओं
के साथ हमारे कौन-कौन से लोग खुफिया के तौर पर शामिल थे। इस एक सवाल
का ठीक ठीक जवाब दोगे तो अभी भी अपनी प्यारी जिन्दगी बचा सकते हो।"
"हमारी मौत का फतवा तो तुम्हारे काजी ने कल दोपहर में ही जारी
कर दिया है।"
"काज़ी, मौलवी, फतवा आदि तो हम राजनीतिज्ञों की कटारों के मखमली
आवरण होते हैं। जब चाहें कोई भी फतवा खारिज कर दें। फतवे का अमल करना
न करना हमारी मुट्ठी में होता है। बोलऽऽ, हमारे कौन कौन से धोखेबाज तुम्हारे
माथ मिले हुए थे। वे कौन हैं जिन्होंने पिछले नौ वर्षों तक दक्खिन के जंगलों में
मुझे फकीर की तरह भटकाया और उन बदमाश मक्कारों ने तेरे जैसे जहन्नमी की
मदद की? कौन हैं वे लोग?"
सम्भाजी राजा का पेट पीठ से सट गया था। पिछले कुछ दिनों से पेट में अन्न
का एक टुकड़ा तक न गया था। उनके होंठ सूख गये थे। आँखों के आगे अँधेरा छा
रहा था। स्वास्थ्य एकदम खराब हो गया था। इस अवस्था में भी सम्भाजी राजा
बेहोशी में हँसे और बादशाह से बोले, "जो जवाब तुम्हें चाहिए वह हम कभी भी
नहीं दे सकते-"
"क्यूँ?"
"हम अपने शत्रु पर सामने से तलवार चलाते हैं और अपने मित्रों की पीठ
बचाकर रखते हैं। हम ऐसा उनकी पीठ थपथपाकर शाबासी देने के लिए करते हैं,
धोखे से उनकी पीठ में खंजर भोंकने के लिए नहीं।"
सम्भाजी के आखिरी उत्तर से बादशाह जलभुन उठा। उसे सम्भाजी राजा से
कोई भी बात मालूम नहीं हो सकी। इससे वह बहुत चिढ़ गया था। बन्दीखाने के
चारों कोनों में धुआँ फेंकती मशालें बादशाह के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रही
थीं। पास में रखी सुराही का पानी उसने गट गट पिया। उसने ध्यानपूर्वक सामने
देखा। सामने कवि कलश आपाद मस्तक जकड़े हुए रखे गये थे।
बादशाह को वहाँ अधिक देर तक ठहरना नहीं था। वह उठा और तेज कदमों
से कैदखाने से बाहर आ गया। मशालों के उजाले में सैकड़ों आँखें उसकी ओर घूर
सम्भाजी :: 753