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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 739, कुल 793 में से

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पृष्ठ 739

घबराहट फैल गयी। किन्तु बादशाह निकलकर उस बदनाम बन्दीखाने की ओर नहीं
गया। वह आधी रात में रूहूल्लाखान के डेरे में पहुँचा और वहीं पर कवि कलश को
लेकर आने का हुक्म दिया।
कविराज रूहूल्लाखान के डेरे में पहुँचे। सामने तकिये के सहारे बैठे
औरंगजेब को अस्वस्थ मनःस्थिति में देखकर वे मन ही मन हँसे। सम्भाजी राजा से
अलग बुलाए जाने का रहस्य उनकी समझ में आ गया।
आज तक औरंगजेब ने कविराज और सम्भाजो राजा को धमकियाँ देने, धाक
जमाने, डाँट फटकार, झूठे वादे, तुरन्त जान से मार देने की धौंस जैसे अनेक कड़वे
काढ़े पिलाकर देख लिया था। इस प्रकार की किसी भी औषधि का असर उन दोनों
पर नहीं हुआ। इसीलिए बादशाह ने कवि कलश को अकेले बुलाकर नयी टेढ़ी
चाल चलने की सोची। तीक्ष्ण बुद्धि के कविराज की समझ में सब कुछ आ गया।
रूहूल्लाखान के डेरे में चिराग जल रहे थे। उस अरुणाभ प्रकाश में खान और
बादशाह की मुद्रा कुछ अलग ही दिख रही थी। कविराज के अन्दर आते ही, खान
के संकेत से कविराज के शरीर और कन्धों से बेड़ियों का अधिकांश बोझ उतार दिया
गया। बादशाह की परवाह न करते हुए कविराज ठठाकर हँसते हुए और बादशाह
पर व्यंग्य करते हुए बोले, "देखिए एक बेवकूफ बादशाह एक नादान शायर से सौदा
करने के लिए खुद चलकर आ गया।"
आरम्भ में ही बादशाह ने कवि कलश से हँसते हुए पूछा, "बोलो कविराज,
क्या चाहते हो?"
इस सवाल पर दिल खोलकर हँसते हुए कविराज ने कहा, "शायर और कवि
के दिमाग में मस्ती का बारूद भरा रहता है, शहंशाह ! हमारी दुनिया में सिंहासन का
मूल्य कौड़ी भर भी नहीं होता। हमारी मस्ती ही हमारा सिंहासन है।"
बादशाह ने कवि कलश की ओर दयाभाव से देखा और उपहास करते हुए
बोला, "पागलखाने की दीवारों को फाँदकर जो भागते हैं उन्हीं को दुनिया शायर
कहती है तू भी एक मूर्ख शायर है, बस!"
"बिल्कुल।"
"इसीलिए तुम्हें जागीर, हीरे-जवाहरात जैसी किसी भी चीज की चाहत
नहीं होगी।"
"जी हाँ, शरीर पर लाज बचाने भर का लिबास और सम्भाजी राजा जैसे मित्र
. नहीं फरिश्ते का साथ मिल जाये तो तो दूसरा और कुछ नहीं चाहिए।" कवि कलश
ने लापरवाही से कहा।
"लेकिन तू सिर्फ शायर ही नहीं एक ब्राह्मण भी है, वह भी कोई मामूली
ब्राह्मण नहीं, कन्नौज का ब्राह्मण।" कलश की आँखों में घूरते हुए बादशाह ने कहा।
सम्भाजी .: 737