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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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दौलत को बचाने वाली औलादें वहाँ रहती हैं। हम मराठों का सिद्धान्त अलग है
हम किले के प्रत्येक पत्थर पर अपने रक्त का सिन्दूर चढ़ाते हैं और उसकी रक्षा में
अपना बलिदान करते हैं।"
ग्यारह
"मेरे आका, सियासत के मामले में मैंने कभी कोई दखलन्दाजी नहीं की। किन्तु
नौ दस वर्षों से रोज अभियान, रोज नयी जगह पर पड़ाव। नयी नयी जगह पर
बादशाह का डेरा। ऐसा क्यों हो रहा है? इस खानाबदोश की जिन्दगी से मैं ऊब
गयी हूँ।" उदयपुरी बेगम ने कहा।
"शाही डेरे में रहने वालों का यह हाल है तो जंगे मैदान में रोज धूल
धक्कड़ भरे दमघोटू वातावरण में रहने वाले सिपाहियों का क्या हाल होता होगा ?"
बादशाह ने उल्टा सवाल किया।
बाजार त्रस्त हो गये थे। फौजी वापस जाने के लिए बेताब हो रहे थे। अनेक
कर्मचारी वेतन बढ़ाने के लिए अड़े बैठे थे। ये सारी स्थितियाँ बादशाह को पीड़ित
कर रही थीं। उदयपुरी ने आगे कहा, "अब बाकी क्या रह गया है। सम्भा तो अब
मिल गया न?"
"लेकिन उसके किले, उसका राज्य अभी तक कहाँ क़ब्ज़े में आया ?"
"यदि वैसा आवश्यक लगता हो तो सम्भा को अपने साथ ले लें।"
"दिल्ली की तरफ?"
"क्यों नहीं?"
"बेगम, यह जंग मैंने ऐसे मुकाम पर ला दी है कि इसे छोड़ना हमारे लिए
मुमकिन नहीं। हमारे पीछे मराठे दौड़े आएँगे। मेरा और सम्भा का जो भी फैसला
होगा, इसी मिट्टी में होगा।" बादशाह दीर्घ उच्छ्वास छोड़ता हुआ बोला।
एक रात में बादशाह को अचानक एक विचार सूझा। उसे स्मरण आया कि
कवि कलश सम्भा का प्राणतत्त्व है, यह बात मराठों के घर घर में छोटे बड़े सभी
जानते थे। बादशाह ने सोचा, यदि इसी धागे को पकड़ा जाये तो? बादशाह रात में
ही उठ गया। वह महल से बाहर निकला। गश्ती वाले पहरेदार सावधान हो गये।
उन्होंने अनुमान लगाया कि बादशाह निरीक्षण के लिए बाहर निकला होगा। फौज में
736 :: सम्भाजी