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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

सहायता लेकर वह हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था।
जुल्फिकारखान और शहजादा आजम सह्याद्रि की घाटियों में पहुँच अवश्य गये थे।
किन्तु उनकी सफलता का कोई समाचार मिल नहीं रहा था।
भाग्य ने औरंगजेब को बेहाल कर दिया था। रात को खाना खाते समय
औरंगजेब बिना भूले बेगम उदयपुरी और शहजादी जीनतउर्न्निसा को अपने पास
बुला लेता था। उनसे अपने मन की बात कहने में उसे हल्कापन महसूस होता था।
आज बादशाह की मुद्रा कुछ ठीक नहीं दिखाई दे रही थी। उसने चिढ़े हुए
स्वर में अपनी शहजादी से कहा, "जीनत, हमारे कर्मचारियों ने बहुत कोशिश की,
किन्तु वह निकम्मा काफिरबच्चा तो एकदम उल्टी खोपड़ी का निकला।"
"क्यूँ अब्बाजान?"
"वह पत्थर जरा भी नहीं पिघलता। खुफिया लोगों से पता चला है कि
सम्भा की औरत, बहन और बेटी भी बहुत जिद्दी और घमंडी हैं। ये सबकी सब
फाँसी के तख्ते पर चढ़ने को तैयार हैं किन्तु समझौता नहीं करना चाहतीं।"
"अब्बाजान धीरज रखिए सब कुछ ठीक हो जाएगा।"
"नहीं बेटी, सम्भा तो शैतान ही है। अपनी आँखों की कोर में उस जहन्नमी
के लिए जरा भी रहम रखने की भूल मत करो।"
बादशाह के कान बाहर भी लगे थे। पिछले दिन से शहाबुद्दीनखान बे लगाम
होकर बोल रहा था। बादशाह उसे किसी प्रकार समझाने की बात सोच रहा था।
तोला माशा का सन्तुलन रखने वाली बेगम उदयपुरी कुछ दूरी पर थीं। उन्होंने
बादशाह और शहजादी के संवाद में भाग नहीं लिया था। इसी बीच कुछ खुफिया
और दासियाँ बाहर से आयीं। उनसे खड़े खड़े बात करके बेगम उदयपुरी अन्दर
आयीं। उस समय उनकी मुखमुद्रा क्रोध से लाल हो गयी थी।
बेगम उदयपुरी क्रोधावेश में बादशाह के सामने आकर खड़ी हो गयीं।
बादशाह की आँखों में आँखें डालकर बेगम बोली, "बादशाह सलामत! आदमी
की जोर जबरदस्ती की कोई सीमा होती है कि नहीं? एक समय दारा जैसे पवित्र
और जिन्दादिल शहजादे के साथ मेरी शादी हुई थी। उसका कत्ल करके और
सिंहासन से हटाकर आपने मुझे छीन लिया। तख्त तो लकड़ी का था वह बेचारा
क्या करता? किन्तु मेरी भावनाओं की आपने कभी परवाह की? कभी नहीं, किन्तु
वह सब कुछ चुपचाप पीकर मैं पूरी जिन्दगी बादशाह की इच्छानुसार जुर्मों की सेज
सजाती रही। क्या मैंने कभी विरोध किया?"
"खामोश बेगमऽ तुझे आज हो क्या गया है?" औरंगजेब भयंकर रूप से
सन्तप्त होकर कभी उदयपुरी और कभी शहजादी की ओर देखने लगा।
"सुनने दीजिए शहजादी को। वह कोई नासमझ बच्ची नहीं है। किन्तु
सम्भाजी :: 729

हजरत, जिस व्यक्ति ने भरे बाजार में शौहर का कत्ल कर दिया हो, उसकी सेज
सजाते हुए जिन्दगी भर जुर्म सहने के लिए बहुत बड़े साहस की जरूरत होती है।
किन्तु अब उसकी भी हद हो गयी है।"
"लेकिन बेगम, ऐसा क्या हो गया?"
"आपका कुत्ता शहाबुद्दीनखान, जो जिन्दगी भर बड़ी-बड़ी बातें करता रहा
किन्तु सम्भाजी दाहिनी ओर से आता है ऐसा सुनकर बाई ओर भागने वाला चूहा।
उसकी इतनी मजाल?"
"क्या हुआ? बताओ तो सही—" बादशाह ने चिल्लाते हुए पूछा।
"उस बुड्ढे शहाबुद्दीनखान ने आज सम्भा के पास सन्देश भेजा है—अपने
किलों की चाभियाँ और कब्जे दे दो, नहीं तो भरे बाजार में तुम्हारी औरत पर नौकरों
और गुलामों के लड़के छोड़े जाएँगे। उसकी इज्जत लूटी जाएगी।"
"बस इतना ही? मुझे तो लगा आपके सिर पर आसमान ही गिर गया था।"
बादशाह शान्त होकर नीचे बैठ गया। किन्तु उदयपुरी के क्रोध का पारा ऊपर चढ़ता
गया। शहजादी क्रोध से काँपने लगी। उन दोनों को समझाते हुए बादशाह ने कहा,
"कितनी चिन्ता करती हो? इतनी बहस करने का क्या कारण है? क्या कुत्ता और
क्या कैदी? दोनों बराबर ही होते हैं।"
अब तक उदयपुरी का क्रोध अपनी सीमा पर पहुँच गया था। वे बादशाह के
सामने बैठ गयीं। वे जिन्दगी में पहली बार बादशाह से विवाद कर रही थीं। "वह
दुर्गा—वह राणू केवल सम्भाजी की पत्नी और बहन नहीं हैं, वे शिवाजी की पुत्रवधू
और बेटी हैं। शिवाजी ने जिन्दगी भर दंगाफसाद और खूनखराबा किया परन्तु किसी
मुसलमान बहू-बेटी का स्पर्श नहीं किया। उनकी मृत्यु के पश्चात् स्वयं आपने
शिवाजी की इस विशेषता की तारीफ की थी। वह सम्भा बड़ा बदमिजाज है,
इश्कबाज है, दारूबाज हैं, इसकी साक्ष्य मराठों के बड़े-बड़े पंडित दे रहे हैं, किन्तु
किसी मुसलमान ने ऐसी शिकायत कभी भी नहीं की। इसके विपरीत हर मुसलमान
माँ-बहन को सम्भा ने अपने पिता की भाँति ही हमेशा इज्जत दी।"
महिलाओं के इस आक्रमण से बादशाह सकपका गया। उसने तत्काल
शहाबुद्दीन को सन्देशा भेजा कि वह अपनी अकल ठिकाने रखे। इससे बुड्ढा
शहाबुद्दीन ठिकाने पर आ गया।
दिन बीत रहे थे। महाड़ से जुल्फिकार पत्र पर पत्र भेज रहा था। आज अशनी
सेना बिखाड़ी तक पहुँच गयी। कल अवचितगढ़ तक पहुँच जाएँगे। किले की
तलहटी में घेरा डाल दिया है। इन पत्रों को पढ़कर बादशाह असदखान पर भड़कता
था, "आपका बेटा मुझे नक्शा पढ़ने का तरीका सिखा रहा है क्या?"
730 :: सम्भाजी

जुल्फिकार रायगढ़ पर सीधे आक्रमण करने से घबरा रहा था। महारानी के
शरणागत होने के कोई चिह्न दिखाई नहीं पड़ रहे थे। बादशाह के चित्त को रंचमात्र
भी शान्ति नहीं मिल रही थी। सम्भाजीराजा पर उसका क्रोध जरा भी कम न हुआ
था। उसने खिन्नता से शहजादी से कहा, "जीनतऽ, उस पापी सम्भा को
मुकर्रबखान द्वारा कैद किये आज बीस दिन हो गये। दाग जैसे सगे भाई को दो-तीन
दिन में ही कत्ल करके जहन्नुम भेजने वाला यह शहंशाह औरंगजेब उस काफिर
बच्चे को बीस दिन तक कैसे जिन्दा रखता है, इस कल्पना से अनुभवी लोग चकित
होते हैं। शहंशाह डरपोक हो गया है ऐसा सोचकर बच्चे छुपकर हँसते हैं। मेरा
मजाक उड़ाते हैं। बादशाह का ऐसा अपमान पहले कभी नहीं हुआ था।"
"मेरे आका! आपके प्राण उस सम्भा में नहीं बल्कि मराठों के किलों में
अटके हैं।" उदयपुरी ने कहा।
"और नहीं तो क्या बेगम? कल को रामसेज की तरह एक एक किले को
जीतने में छह-छह वर्ष लगेंगे तो इस प्रदेश को जीतने के लिए यह जिन्दगी कम पड़
जाएगी?"
"अब्बाजान, तो आप स्वयं जाकर क्यों नहीं मिलते उस सम्भा से? जो
तलवार से सम्भव नहीं है उसे आप जबान की मीठी कटारी से कर सकते हैं।
आपके शब्दों की शक्ति मैंने अकबर भैया को लिखे गये आपके पत्रों में देखी है।"
"किन्तु शहजादी हिन्दुस्तान का बादशाह बन्दीखाने में जाएगा? वह भी उस
काफिर बच्चे से मिलने?" औरंगजेब के माथे की सिकुड़न भयंकर लग रही थी।
दस
एक दिन अपने महल में बादशाह शोर मचाने लगा, "सब के सब बेवकूफ हैं। कैसे
पहरे करते हैं? किस तरह का बन्दोबस्त करते है? दुश्मनों के कुछ जासूसों के
बहादुरगढ़ आने की खबर मिली है। उनकी इतनी हिम्मत होती कैसे है?" वह
असम्भव घटना घटी है इसका विश्वास दिलाने के लिए औरंगजेब तूफान मचा रहा
था। "उस करीमखाँ को बुलाओ। उस शैतान बगसद को बुलाओ। वह पागल
दस्तगीरखान कहाँ चला गया?" औरंगजेब ने अपने दस बारह कर्मचारियों को रात
में ही महल में बुलाया। पहरे में ढिलाई के कारण उनकी खूब फजीहत की। उनमें
सम्भाजी 731

से एकाध ने हिम्मत करके कहा, "जहाँपनाह, चाहें तो आप स्वयं आकर बन्दोबस्त
देख लें।"
"क्यों नहीं? तुम्हारी मूर्खता के लिए अब मुझे गश्तीवालों की तरह रात में
घूमना पड़ेगा?" ऐसा कहकर बादशाह रुका नहीं, वह तत्काल बाहर निकला।
उस रात बादशाह ने अनेक चौकियों और पहरों का निरीक्षण किया। दूसरी
रात को भी चक्कर लगाया। तीसरी रात को वह उस ओर गया जहाँ वे खतरनाक
राजबन्दी कैद किये गये थे। उसके साथ केवल असदखान था। वहाँ पहुँचने से
पहले बादशाह ने इस बात की पूरी जानकारी प्राप्त कर ली थी कि कवि कलश और
सम्भाजी को बेड़ियों और जंजीरों से ठीक तरह से बाँधा गया है कि नहीं? उनके
बन्धन ढीले तो नहीं हैं? यह जान लेने के बाद ही बादशाह ने वहाँ पाँव रखा था।
बन्दोबस्त के निरीक्षण का नाटक करते हुए बादशाह उन बन्दियों तक पहुँचा
था। उन दोनों का भोजन बहुत कम हो गया था। मार-पीट के कारण शरीर के वस्त्र
फट गये थे। किन्तु उनकी गर्दन की अकड़ और आँखों का रोष जरा भी कम न हुआ
था। वजीर असदखान पीछे रुक गये। जिस प्रकार कोई चिड़ियाघर में बँधे बाघ के
बच्चे को देखता है उसी प्रकार औरंगजेब ने सम्भाजी राजा को देखा। राजा की ओर
क्रोध और कुत्सा से देखते हुए बादशाह ने कहा, "सम्भा, जवाँमर्द, इस घटना को
लगभग तीस वर्ष हो गये। अपने सगे भाई, शहजादा दारा का एक मरियल हाथी पर
ऐसा ही जुलूस दिल्ली की सड़कों पर निकाला था। उस समय उस बेवकूफ की
बेइज्जती पर मैं खूब हँसा था।"
"बादशाह तू मूर्ख है। दारा एक भला, नेकदिल इनसान था। हिन्दुओं और
मुसलमानों दोनों का प्रिय शहजादा।" बीच में ही कवि कलश बोल पड़े।
"पागल शायर, तू अपनी जबान पर लगाम लगा नहीं तो चटर चटर बोलने
वाली इस लाल जीभ को जड़ से उखाड़ना पड़ेगा।" बादशाह कड़ककर बोला।
कलश थोड़ा चुप हुए, तब बादशाह ने आगे कहा, "प्रजा को मोहित करने
की कला दारा को अच्छी तरह मालूम थी। इसीलिए खुली सड़क पर दारा का जुलूस
देखकर अनेक लोग छाती पीट रहे थे। औरतें दीवारों पर सिर पटक रही थीं। हमारी
मूर्ख प्रजा ने कितना रोना-धोना मचाया था? और इधर शिवाजी की धरती से,
विदूषकों का लिबास पहनाकर मैं तुझे मुर्गे की तरह नचाते हुए यहाँ ले आया तो मेरे
घोड़े की लगाम पकड़ने के लिए कोई माई का लाल आगे नहीं आया। बोलो, यह
तुम्हारी हार है या जीत?"
"केवल धोखा। बेवकूफ बादशाह इस तरह धोखे और बेईमानी के दाव-पेंच
से गढ़ी गयी कहानी को तुम यदि अपनी जीत मानते हो तो तुम गद्दारों के बादशाह
माने जाओगे, हिन्दुस्तान के नहीं।" शम्भू महाराज ने कहा।
732 :: सम्भाजी

“ऐसा रंग और ये मस्ती ?”
“क्यों नहीं? अभी भी हिम्मत है तो हमारे शरीर की ये बेड़ियाँ खोल दो
और तुम्हारा कोई भी सिपहसालार, शहजादा या कोई सामने आये तो आमने सामने
की लड़ाई में हमारे हाथों की नाचती तलवार तुम्हारे सवालों का सही जवाब दे
देगी।”
बादशाह कुछ नहीं बोला। कुछ समय तक उसी तरह चुप रहकर नाटकीय
ढंग से बोला, “सम्भा तुम्हारे जुलूस के समय क्या कम लोगों ने तुम्हें देखा? कौन
आया तुम्हारी मदद के लिए? बेवकूफ राजा, अपनी प्यारी जिन्दगी बचा। आरजू,
हसरत, महत्त्वाकांक्षा आदि छत से लटकती झूमर के समान हैं। एक बार टूटकर
गिरीं तो उनका काँच बटोरने के लिए भी कोई नहीं रुकता।”
शम्भूराजा कुछ बोल नहीं रहे थे। किन्तु क्रुद्ध लाल आँखें बादशाह पर घूम
रही थीं। सम्भाजी को समझाने का प्रयत्न करते हुए औरंगजेब ने कहा, “दुनियादारी
की तराजू में सिर्फ व्यवहार तौला जाता है। जो व्यवहार शिवाजी के सभी जमाई
राजाओं ने समझा वह अक्ल तुम्हें कब आएगी? शिवाजी के जमाई राजाओं की तरह
ही उनके राजकुमार का भी बादशाही फौज में सम्मान किया जाएगा। मन की शंका
को निकाल दो। मुझे अपना मानो।”
“मेरा जुलूस निकालकर आपने मेरा कितना सम्मान किया? यह दुनिया को
अच्छी तरह पता चल गया है।”
“वह जुलूस एक सबक था। केवल आपके लिए नहीं बल्कि अल्लाहताला
द्वारा बहाल की गयी इस सल्तनत में जो भी बदमाश सिर उठाएँगे, उन सबके
लिए।”
शम्भूराजा कुछ अधिक नहीं बोले। बादशाह भीतर ही भीतर बहुत उद्विग्न हो
गया था। शम्भूराजा को कैद किये बीस दिन बीत गये थे। बादशाह के हाथ किलों
की चाभियाँ नहीं लग रही थीं। जुल्फिकारखान का गुप्त पत्र आया था। “अभी तक
रायगढ़ पर क़ब्ज़ा नहीं हुआ। हमलोग महाड़ में डेरा डाले हुए हैं। रायगढ़ को घेरने
की कोशिश कर रहे हैं कि धनाजी और सन्ताजी के खुफिया लुटेरे रात बेरात
टिड्डियों की तरह हमला कर देते हैं और हमारी बड़ी बर्बादी करते हैं। सह्याद्रि में
हम प्रविष्ट तो हो गये हैं किन्तु किलों पर विजय पाना मुमकिन नहीं लगता।” यह
समाचार दिल दहलाने वाला था। रायगढ़ की रानी भी शरण में आने का नाम नहीं ले
रही थी। थोड़ा बहुत यश मिलना बादशाह के लिए आवश्यक हो गया था। अपनी
मधुर वाणी की मोहिनी शम्भूराजा पर डालने का प्रयास करते हुए औरंगजेब ने कहा,
“सम्भा तुम्हारे पिता, उस काफिर शिवा से मुझे हमेशा ईर्ष्या होती है।”
सम्भाजी राजा ने गहरी साँस ली। उन्होंने बादशाह की आँखों में अपनी क्रुद्ध
सम्भाजी :: 733

दृष्टि से घूरते हुए देखा। बादशाह ने कहा, "एक जंगली चूहा, मामूली जमींदार
मरगठ्ठों की सल्तनत खड़ी कर ले, यह कितनी बहादुरी की बात है?"
"बादशाह, मेरे पिताजी की दौलत किसी घमंडी सुल्तान की गद्दी नहीं थी।
वह गरीब गुर्बों का, उनके सपनों का साम्राज्य था।"
थोड़े गम्भीर स्वर में औरंगजेब ने कहा, "कितना खुशकिस्मत है वह शिवा
जिसने तुम्हारे जैसे होनहार बेटे को जन्म दिया। तुम पर हमें बहुत नाज होता है।
आदमी अनुभव से सीखता है, ठेस लगने से सावधान होता है। तुमने मुझे आठ वर्ष
तक चक्कर कटवाया है। उस अनुभव से मैं तुम्हारी वीरता खुले रूप में स्वीकार
करता हूँ। शहजादे, यह तुम्हारी तारीफ नहीं हकीकत है। अपने पिता की, मरगठ्ठों
की गद्दी को सँभालने के लिए जिस तरह तुमने मुकाबला किया अपने किलों को
बचाकर रखा, समुद्र के पानी में आग लगाई, ऐसी थोड़ी-बहुत औकात मेरे चार
शहजादों में से किसी में भी हो तो-?"
सम्भाजी राजा ने गहरी साँस ली। वे बादशाह की नजरों में अपनी क्रुद्ध नजरों
मे देखते हुए बोले, "औरंगजेब बादशाह ऐसी झूठी प्रशंसा करने के बदले तुम्हें जो
चाहिए वह साफ-साफ कहो और छुट्टी पाओ।"
"तुम्हारा सबसे समृद्ध खजाना कहाँ है?"
"हर किले पर।"
"हमारी फौज के कौन-कौन से गद्दार शैतान तुम्हारे साथ मिले हैं?"
"पता नहीं।"
"घमंडी सम्भा, अब तो होश में आओ। एक मूर्ख शायर के साथ मिलकर
नादान मत बनो। तुम्हें इस बात का अनुमान नहीं है। हमारे जुल्फिकारखान की
चालीस हजार की फौज अब तक रायगढ़ में घुस चुकी होगी। रायगढ़ के किले पर
घेरा भी डाल दिया होगा।"
"बेवकूफ बादशाह, हमारा रायगढ़ बालू की दीवार से नहीं बना है?"
"फौलाद का बना हो तो भी उसे पिघला दो। ऐसी आज्ञा देकर ही मैंने
जुल्फिकार को वहाँ भेजा है।"
"पत्थर का है। उसके दो टुकड़े भी नहीं हो सकते।"
"बेमुरौवत काफिर बच्चे अपनी जान बचाओ! किसके भरोसे तुम इतना
घमंड करते हो? तुम्हारे प्रदेश की हर घाटी में हमारी फौज घुसने लगी है। यह भी
बारीकी से देखो कि तुम्हारे मुल्क के सारे जागीरदार हमारे दरबार में दौड़ लगा रहे
हैं।"
"जागीर के टुकड़ों के लोभ में जी हुजूरी करने वाले कुछ जागीरदारों का
मतलब महाराष्ट्र नहीं है। मर्दों का सच्चा महाराष्ट्र झुकेगा नहीं, झुकेगा तो नहीं
734 :: सम्भाजी

ही।''
बादशाह मन मसोसकर रह गया। वह फिर एक बार जोर से हँसते हुए बोला,
“सम्भा तुमसे मुझे दो ही बातें चाहिए। एक तो धोखेबाज गद्दारों की सूची और
दूसरे सह्याद्रि के सभी महत्त्वपूर्ण किलों की चाभियाँ, क़ब्ज़े के साथ।''
बादशाह की उस गर्जना को सुनकर सम्भाजी राजा को उस परिस्थिति में भी
हँसी छूटने लगी। औरंगजेब का उपहास करते हुए सम्भाजी महाराज बोले, “मूर्ख
बादशाह, सह्याद्रि के कन्धों पर बने हमारे मजबूत किले ही हमारी शोभा, सामर्थ्य
और प्राण हैं। किससे क्या माँगने की मूर्खता कर रहे हो? कल तू ईद के चाँद से
माँगेगा कि आकाश की सारी चाँदनी निकालकर मुझे दे दे, तो क्या ऐसा सम्भव
है?''
सम्भाजी राजा के जवाब के इस ढंग से कोने से हँसी के फव्वारे छूटे। कवि
कलश बादशाह की मूर्खता पर खिलखिलाकर हँस रहे थे।
सम्भाजी राजा और कवि कलश द्वारा किये गये अपमान और उपहास से
बादशाह भीतर ही भीतर बहुत बिफर गया था। वह अपने को बहुत बेइज्जत अनुभव
कर रहा था। उसे रामशेज किले की याद आयी। एक अकेले रामशेज ने साढ़े छह
वर्षों से नाक में दम कर दिया था। उसके अनेक बहादुर सरदार आँखों के आगे
प्रत्यक्ष हो गये। वह सोचने लगा, इस हिसाब से मराठों के सभी बलशाली किलों
को जीतने के लिए कितना समय लगाना पड़ेगा? इस कल्पना से बादशाह मन ही
मन घबरा गया। फिर भी उसने राजबन्दियों के सामने अपनी बात रखी, “सम्भाऽऽ
तू एक बात ध्यान रखना, दया माया, प्यार मुहब्बत जैसे झूठे जलवे हम अपने
कलेजे से चिपकाकर कभी नहीं रखते। हम खुले सत्य के पुजारी हैं। हम तुमसे वादा
करते हैं। तुम अपने सारे किलों का कब्ज़ा मेरे अधिकारियों के ताबे में दे दो और
अपने इस दोस्त के साथ ऐयाशी करने के लिए किसी भी प्रदेश में चले जाओ।”
“वाहऽ बादशाह।” कवि कलश खखाकर हँसे।
“यह मजाक नहीं है, मूर्ख शायर। चाहो तो कुरान शरीफ पर हाथ रखकर
हम तुम्हें वचन देते हैं।”
बादशाह की ओर देखकर सम्भाजी राजा व्यंग्य से हँसे। वे कहने लगे,
“हमारे गढ़ों-दुर्गों की चाभियाँ लेने के लिए तू बहुत ही बेताब दिख रहा है
बादशाह! बिना लड़े ही चुपचाप किलों का क़ब्ज़ा दे देने को कह रहा है तू?”
“बिल्कुल।”
“ऐसी फूँका फूँकी और बिना प्रयत्न के अधिकार जमाना है तो तू उधर उत्तर
की ओर क्यों नहीं जाता? वहाँ तुम्हारी तरह के लोगों को चाभियाँ मिल जाती हैं।
किन्तु उसके लिए नक्षत्र जैसी अपनी बहू बेटियों के हाथ दुश्मनों के हवाले करके
सम्भाजी :· 735

दौलत को बचाने वाली औलादें वहाँ रहती हैं। हम मराठों का सिद्धान्त अलग है
हम किले के प्रत्येक पत्थर पर अपने रक्त का सिन्दूर चढ़ाते हैं और उसकी रक्षा में
अपना बलिदान करते हैं।"
ग्यारह
"मेरे आका, सियासत के मामले में मैंने कभी कोई दखलन्दाजी नहीं की। किन्तु
नौ दस वर्षों से रोज अभियान, रोज नयी जगह पर पड़ाव। नयी नयी जगह पर
बादशाह का डेरा। ऐसा क्यों हो रहा है? इस खानाबदोश की जिन्दगी से मैं ऊब
गयी हूँ।" उदयपुरी बेगम ने कहा।
"शाही डेरे में रहने वालों का यह हाल है तो जंगे मैदान में रोज धूल
धक्कड़ भरे दमघोटू वातावरण में रहने वाले सिपाहियों का क्या हाल होता होगा ?"
बादशाह ने उल्टा सवाल किया।
बाजार त्रस्त हो गये थे। फौजी वापस जाने के लिए बेताब हो रहे थे। अनेक
कर्मचारी वेतन बढ़ाने के लिए अड़े बैठे थे। ये सारी स्थितियाँ बादशाह को पीड़ित
कर रही थीं। उदयपुरी ने आगे कहा, "अब बाकी क्या रह गया है। सम्भा तो अब
मिल गया न?"
"लेकिन उसके किले, उसका राज्य अभी तक कहाँ क़ब्ज़े में आया ?"
"यदि वैसा आवश्यक लगता हो तो सम्भा को अपने साथ ले लें।"
"दिल्ली की तरफ?"
"क्यों नहीं?"
"बेगम, यह जंग मैंने ऐसे मुकाम पर ला दी है कि इसे छोड़ना हमारे लिए
मुमकिन नहीं। हमारे पीछे मराठे दौड़े आएँगे। मेरा और सम्भा का जो भी फैसला
होगा, इसी मिट्टी में होगा।" बादशाह दीर्घ उच्छ्वास छोड़ता हुआ बोला।
एक रात में बादशाह को अचानक एक विचार सूझा। उसे स्मरण आया कि
कवि कलश सम्भा का प्राणतत्त्व है, यह बात मराठों के घर घर में छोटे बड़े सभी
जानते थे। बादशाह ने सोचा, यदि इसी धागे को पकड़ा जाये तो? बादशाह रात में
ही उठ गया। वह महल से बाहर निकला। गश्ती वाले पहरेदार सावधान हो गये।
उन्होंने अनुमान लगाया कि बादशाह निरीक्षण के लिए बाहर निकला होगा। फौज में
736 :: सम्भाजी

घबराहट फैल गयी। किन्तु बादशाह निकलकर उस बदनाम बन्दीखाने की ओर नहीं
गया। वह आधी रात में रूहूल्लाखान के डेरे में पहुँचा और वहीं पर कवि कलश को
लेकर आने का हुक्म दिया।
कविराज रूहूल्लाखान के डेरे में पहुँचे। सामने तकिये के सहारे बैठे
औरंगजेब को अस्वस्थ मनःस्थिति में देखकर वे मन ही मन हँसे। सम्भाजी राजा से
अलग बुलाए जाने का रहस्य उनकी समझ में आ गया।
आज तक औरंगजेब ने कविराज और सम्भाजो राजा को धमकियाँ देने, धाक
जमाने, डाँट फटकार, झूठे वादे, तुरन्त जान से मार देने की धौंस जैसे अनेक कड़वे
काढ़े पिलाकर देख लिया था। इस प्रकार की किसी भी औषधि का असर उन दोनों
पर नहीं हुआ। इसीलिए बादशाह ने कवि कलश को अकेले बुलाकर नयी टेढ़ी
चाल चलने की सोची। तीक्ष्ण बुद्धि के कविराज की समझ में सब कुछ आ गया।
रूहूल्लाखान के डेरे में चिराग जल रहे थे। उस अरुणाभ प्रकाश में खान और
बादशाह की मुद्रा कुछ अलग ही दिख रही थी। कविराज के अन्दर आते ही, खान
के संकेत से कविराज के शरीर और कन्धों से बेड़ियों का अधिकांश बोझ उतार दिया
गया। बादशाह की परवाह न करते हुए कविराज ठठाकर हँसते हुए और बादशाह
पर व्यंग्य करते हुए बोले, "देखिए एक बेवकूफ बादशाह एक नादान शायर से सौदा
करने के लिए खुद चलकर आ गया।"
आरम्भ में ही बादशाह ने कवि कलश से हँसते हुए पूछा, "बोलो कविराज,
क्या चाहते हो?"
इस सवाल पर दिल खोलकर हँसते हुए कविराज ने कहा, "शायर और कवि
के दिमाग में मस्ती का बारूद भरा रहता है, शहंशाह ! हमारी दुनिया में सिंहासन का
मूल्य कौड़ी भर भी नहीं होता। हमारी मस्ती ही हमारा सिंहासन है।"
बादशाह ने कवि कलश की ओर दयाभाव से देखा और उपहास करते हुए
बोला, "पागलखाने की दीवारों को फाँदकर जो भागते हैं उन्हीं को दुनिया शायर
कहती है तू भी एक मूर्ख शायर है, बस!"
"बिल्कुल।"
"इसीलिए तुम्हें जागीर, हीरे-जवाहरात जैसी किसी भी चीज की चाहत
नहीं होगी।"
"जी हाँ, शरीर पर लाज बचाने भर का लिबास और सम्भाजी राजा जैसे मित्र
. नहीं फरिश्ते का साथ मिल जाये तो तो दूसरा और कुछ नहीं चाहिए।" कवि कलश
ने लापरवाही से कहा।
"लेकिन तू सिर्फ शायर ही नहीं एक ब्राह्मण भी है, वह भी कोई मामूली
ब्राह्मण नहीं, कन्नौज का ब्राह्मण।" कलश की आँखों में घूरते हुए बादशाह ने कहा।
सम्भाजी .: 737

"पर उससे क्या फर्क पड़ता है?"
"तुम कन्नौज वाले अपना पेट भरने के लिए देव-धर्म का पाखंड करते हो।
गंगा-स्नान के लिए आये यात्रियों की दौलत लूटते हो। उनके शरीर के गहने-कपड़े
छीन लेते हो। बेचारे तीर्थयात्रियों को गंगा की बालू में दफन कर देते हो और उन
बदनसीब यात्रियों के घर सन्देश पहुँचा देते हो कि उन्हें जन्नत मिल गयी।"
"हुजूर आप कहना क्या चाहते हैं?"
"तू भी उसी कन्नौज का एक ब्राह्मण है, एक भूखा-प्यासा ब्राह्मण।"
"परन्तु बादशाह!"
"तुमसे हमारा छोटा-सा काम है। सम्भा के मुख्य दीवान या प्रधानमन्त्री के
रूप में सारा महाराष्ट्र जानता है। सभी मराठे तुम्हें पहचानते हैं। उस सम्भा के साथ
ही तू भी गिरफ्तार हुआ है, यह भी सब जानते हैं। इस समय बस, तुम्हें इतना ही
करना है...।"
"क्या?"
"तुम्हारी मुहर और हस्ताक्षर के साथ मराठों के सभी किलेदारों को खुला
हुक्म देना है। उन्हें लिखना है कि सम्भाजी ने अपनी जान बचाने के लिए बादशाह
औरंगजेब से सौदा कर लिया है। समझौते के अनुसार सभी किलों को खाली कर
देना है। किलों का क़ब्ज़ा मुगलों को दे दिया जाए। इस प्रकार का आदेश देने के
लिए स्वयं सम्भाजी ने कहा है।"
"झूठा हुक्म? सम्भाजी राजा के नाम से झूठा हुक्म?" कलश ने आश्चर्य
व्यक्त किया।
"हाँ! क्यों नहीं? कमबख्त शायर, इस छोटी सी शाही सेवा के बदले हम
तुम्हें मालामाल कर देंगे। बोलो, कौन-सी जागीर चाहिए तुम्हें? बरेली, सामाराम,
कानपुर या आगरा?" अपना उल्लू सीधा करने के लिए उतावला बादशाह पूछने
लगा।
कलश ने व्यंग्यभरी दृष्टि से बादशाह को नीचे से ऊपर तक देखा। बादशाह
की कुत्सित नजरों में अपनी निश्चयपूर्ण दृढ़ दृष्टि से देखते हुए कविराज ने कहा,
"बादशाह सलामत आप बहुत कमीने हैं। यह हमें शहजादा और अन्य अनेक लोगों
ने बताया है। लेकिन आज तो विश्वास हो गया कि आप दुनिया के कमीनों और
मक्कारों के मिरताज हैं।"
"जबान सँभालो बेवकूफ!" बादशाह कड़ककर बोला।
"अरे, अपने स्वार्थ के लिए सगे भाई के पेट और पीठ में छुरा भोंकने वाला
तू, अपने दारा जैसे विद्वान भाई का तूने सिर काट लिया। उस सिर को गोद में
खिलौने की तरह रखकर तू देर तक देखता रहा, इतना बड़ा हैवान तू। अपने
738 :: सम्भाजी

जन्मदाता माता पिता का पानी रोकने वाला तू एक नम्बर का हरामजादा है। यारी
दोस्ती का सच्चा जलवा क्या होता है यह तुम्हारे जैसे पत्थर हृदय मनुष्य को क्या
पता चलेगा?''
‘‘ठहरो पागल! बिना मतलब जिन्दगी गँवा बैठेगा। ’’
‘‘तू मेरा क्या बिगाड़ लेगा ? बूढ़ा सियार कहीं का। ’’
‘‘पागल बाभन, तुझे मैं फाँसी पर लटकाऊँगा। ’’
‘‘अरे छोड़, सम्भाजी राजा जैसे दिलदार दोस्त के लिए यह नाचीज
जिन्दगी कभी भी और कैसे भी समाप्त हो जाये तो बेहतर। ’’ कलश ने सगर्व
उद्गार व्यक्त किया।
इस मुँहतोड़ उत्तर को सुनकर बादशाह आग बबूला हो गया। उसने चाबुक
लाठियाँ लेकर खड़े अपने सैनिकों को अन्दर बुलाया। कविराज के शरीर पर सपासप
कोड़े पड़ने लगे। कुछ लाठियाँ भी पड़ीं। उनके मस्तक से खून की धारा फूट पड़ी।
जख्मी जानवर की तरह कविराज को वहाँ से खींचते हुए बाहर ले गये।
बारह
जिस दिन बादशाह ने बहादुरगढ़ छोड़ने का निश्चय किया था उसकी पिछली रात
फौलादखान बादशाह के कान में धीरे धीरे कहने लगा, ‘‘जहाँपनाह! सम्भा नहीं तो
उसका दीवान ही सही। अन्त में वह कलश फूट गया है। जहाँपनाह से मिलकर
वह स्वयं अपना उद्देश्य स्पष्ट करना चाहता है। ’’
बादशाह को अपने कानों और अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
किन्तु यदि इस तरह से कोई बात बनती थी तो वह उसके अनुकूल थी। इसलिए
औरंगजेब कलश से मिलने के लिए उत्सुक था। पिछली भेंट में भी कविराज को
मुँहमाँगी जागीर देने की तैयारी बादशाह ने दिखाई थी। किन्तु जागीर के मन्त्र से इस
तरह और इतनी जल्दी जादू की छड़ी फिर जाएगी, इसकी कल्पना बादशाह को न
थी। अनेक दिनों के उपवास और फौजियों द्वारा की गयी पिटाई के कारण कविराज
के शरीर की चमक जा चुकी थी। शरीर थका थका सा और सिर के बालों में जूएँ
भर गयी थीं। इत्र के शौकीन कविराज के शरीर से खून और पसीने की बदबू आ
रही थी।
सम्भाजी :. 739

बादशाह ने कलश को अपने सामने वाली गद्दी पर. बैठने का इशारा किया।
किन्तु कलश खड़े ही रहे। औरंगजेब कुछ कड़ी आवाज में बोला, "क्यों कविराज
कौन-सी जागीर चाहिए? आगरा, बरेली, लखनऊ या सासाराम? बोलो कौन-
सी?"
"सिर्फ एक फरियाद लेकर आया हूँ आपके दरबार में।" कविराज का स्वर
दयनीय था।
"कैसी? और कौन-सी फरियाद?"
"शहंशाह! आप मेरे टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों के आगे डाल दें तो भी कोई
बात नहीं। किन्तु मेरे राजा के साथ आप एक राजा जैसा ही बर्ताव करें।"
कलश का कथन सुनकर बादशाह चकरा गया। उसने क्रोध से पूछा,
"किसलिए आये हो? अपनी जान बचाने के लिए या सम्भा की?"
"हम तुम्हारे आगे भीख नहीं माँग रहे हैं। तैमूर के महान वंश का दम भरने
वाले बादशाह से हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं, 'बकरे काटने वाले कसाई और
हिन्दुस्तान के सिंहासन पर बैठने वाले राजा के व्यवहार में कुछ तो फर्क होना
चाहिए'।"
कवि कलश के ऐसा बोलने से वहाँ उपस्थित सैनिक और सेवक थरथर
काँपने लगे। बादशाह की गुस्से से घूमती आँखों को देखकर ऐसा लगा मानो माथे में
घुसी जा रही हों। कलश की जबान की तलवार झपाझप चल रही थी।
"कितनी घोर विडम्बना है। 'क्या जुलूस निकाला। अपने आसुरी आनन्द का
ऐसा खुला प्रदर्शन, द्वेष का ऐसा नग्न दर्शन, दुष्ट बुद्धि का ऐसा नर्तन संसार के किसी
भी सत्ताधीश ने कभी भी न किया होगा।"
"काफिरों का सम्मान करने की हमारी यही रीति है। बेवकूफ!"
"बादशाह को दुश्मनों से तो कुछ तहजीब और दिलदारी सीखनी चाहिए।"
"किस तहजीब और दिलदारी का पाठ हमें पढ़ा रहा है तू, पागल शायर?"
बादशाह पूरी तरह खिसिया गया था।
"यह शायर थोड़ा-थोड़ा इतिहास भी जानता है। तुम्हारी और सुजा की जब
निर्णायक लड़ाई चल रही थी, तब पंजाब में मिर्जाराजा जयसिंह तुम्हारे विरोध में
लड़ रहे थे। उस समय लाख के जंगल में तुम्हारे ऊपर बहुत बुरा समय आया था।
उस जंगल में तू जयसिंह को एकदम अकेला मिल गया था। ठीक वैसे जैसे सिंह के
पंजे में किसी भेड़-बकरी का पैर आ जाए। उसी समय यदि बिना दया दिखाए
उसने तुम्हारा गला चीर दिया होता तो औरंगजेब नाम का यह संकट आज के लिए
बचा न रहता।"
कलश की उस जानकारी से बादशाह बौखला गया। अपने को सँभालते हुए
740 :: सम्भाजी

सिपाहियों की ओर चिल्लाया, "बदमाशोऽऽ, पागलोऽऽ, क्या देख रहे हो? खींच
लो इस बेशर्म शायर को। उसकी टाँगें तोड़कर हमेशा के लिए किसी गन्दी नाली में
फेंक दो।"
बादशाह के सिपाही जल्दी से कविराज को खींचकर ले जाने लगे। उस
समय पीछे मुड़कर कलश दाँत पीसते हुए जोर-जोर से कहने लगे, "अल्लाह की
सेवा सिर्फ टोपियाँ सीने का नाटक करने से नहीं होती। पागल बादशाह, तुम्हारे
दिमाग के टाँके ही ढीले पड़ गये हैं।"
"अरे देखते क्या हो कमबख्तो? ले जाओ घसीटकर इस मूर्ख शायर को।"
बादशाह का हुक्म पाते ही सैनिक उस पर टूट पड़े किन्तु कलश उनकी
पकड़ में नहीं आ रहे थे। वे जोर जोर से कविता गा रहे थे—
'पाप कर्म करके सदा करता बिस्मिलाह
ढोंग किया, टोपी सिया मिले नहीं अल्लाह
निज दिमाग को टाँक लो पागल शाहंशाह'
कविता की इन आधी अधूरी पंक्तियों के कान में पड़ते ही बादशाह क्रोध से
पागल हो उठा। वह अपनी कटार हाथ में लेकर गरजा, "क्या सुन रहे हो? पहले
इस मगरूर शायर की जीभ काट दो। इसकी लाल चटचटाती जीभ काट दो।"
सिपाही छुरी-कटारी लेकर कलश की ओर दौड़े।
बलवान शरीर वाला एक पठान कलश की छाती पर बैठ गया। दूसरे दो
लोगों ने पैरों को गन्ने की तरह मरोड़कर पीछे खींचा। दोनों ने अपने राक्षसी हाथों
से कविराज की खोपड़ी पकड़ी। एक ने उनके मुँह पर जोर का तमाचा मारा, जबड़े
में हाथ डाला। इस प्रक्रिया में कविराज के चार दाँत टूटकर नीचे गिर गये। वह
जल्लाद कविराज की जोभ बाहर खींचने का प्रयास कर रहा था। कविराज की आँखें
सफेद पड़ गयीं। साँस फूल रही थी। इसी बीच आगे खींची हुई कविराज की जीभ
कटार से छाँट दी गयी। उनकी स्थिति आधी खोपड़ी टूटी चटपटाती मुर्गी की तरह
हो गयी। कविराज के मुँह से शब्दों की जगह रक्त की धारा बह रही थी। घायल
होने के कारण आँखों से आँसू बह रहे थे। साँसें तिलमिलाकर लम्बी हो रही थीं।
सम्भाजी :: 741

तेरह
सुराही का पानी बादशाह ने गटागट पी लिया। उसकी थकी हारी देह में थोड़ी
सजगता आयी। उसने अपने गंजे सिर पर हाथ फेरा। भावुक होता हुआ वह
उदयपुरी बेगम से बोला, “बेगम, तुम्हारे सामने एक बात कहकर मैं अपने दिल को
हल्का करना चाहता हूँ।”
“ऐसी कौन-सी बात है, मेरे आका?”
“जी हाँ बेगम। मेरी अपेक्षा इस जहन्नुमी सम्भा का बाप कितनी बड़ी
किस्मत वाला था जिसने सम्भा जैसे बहादुर बेटे को जन्म दिया। हमारे चार चार
शहजादे लेकिन बस, गधों की भीड़। इस सम्भा जैसा एकाध होनहार बच्चा हमारे
यहाँ जन्मा होता तो मैं अल्लाह से केवल दो ही चीजें माँगता—जपने की माला और
नमाज की चादर। बस इन्हीं दो चीजों को लेकर मैं एक पाक फकीर की तरह हमेशा
के लिए मक्का मदीना की यात्रा पर चला गया होता।”
उदयपुरी ने बादशाह के जीवन के अनेक चढ़ाव उतार, यश अपयश को
बहुत समीप से देखा था। किन्तु आजकल की बादशाह की मनोदशा उससे देखी
नहीं जा रही थी। उदयपुरी को अपने पति पर दया आ रही थी। वे बोलीं, “मेरे
आका हमारी इच्छा के अनुसार ही अल्लाह ने हमारा साथ दिया है। बीजापुर समाप्त
हो गया, गोलकुंडा अपनी शरण में आ गया, शिवा का बेटा भी मिल गया। लेकिन
इस विजय का आनन्द बादशाह के चेहरे पर दिखाई नहीं दे रहा है। आखिर बात
क्या है मेरे हजरत?”
बादशाह ने कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। जाप की माला को छाती से
लगाए बहुत देर तक कुरान की आयतों का मनन करता हुआ वह उसी तरह बैठा
रहा। बादशाह के मन को बहलाने के उद्देश्य से ही उदयपुरी ने कहा, “हजरत
आपकी जवानी की वह जंग आपके साथी तो क्या जानवर भी नहीं भूले होंगे। वह
बलख के आक्रमण का घमासान युद्ध। दिन ढलने लगा था, हजरत के सायंकाल के
नमाज का वक्त हो गया था। आप जंगे मैदान में ही चादर डालकर नमाज पढ़ रहे
थे। उस समय आपकी दाहिनी और बाईं ओर तोप के गोले छूट रहे थे, बाणों की
बौछारें उड़ रही थीं। उस जंगे मैदान में एक आपको छोड़कर इतना बेधड़क कोई
नहीं था। उस लड़ाई में हाथियों, घोड़ा, ढालों की आड़ में तो हर कोई जंग लड़ रहा
था किन्तु आप बिना विचलित हुए निश्चिन्त भाव से नमाज पढ़ रहे थे। आपको
देखकर लोगों की आँखों में आँसू उमड़ आये। सारे फौजी कहते थे, 'वह देखो
जिन्दा पीर' ऐसा कहते हुए जिल्लेसूबहानी की ओर उँगली उठाते थे।”
742 :• सम्भाजी

"अब्बाजान, अनेक फौजियों से यह हकीकत मैंने भी सुनी है।" शहजादी
जीनतउन्निसा ने कहा। "गुस्ताखी माफ़ अब्बाजान, मुझे भी डर लग रहा है। सन्देह
पैदा होता है। इतने-इतने बड़े युद्धों की आग झेलकर भी आप कभी डरे नहीं। आज
अपने तीनों बलवान दुश्मनों को मिट्टी में मिला देने के बाद भी आपके चेहरे पर
रौनक क्यों नहीं दिख रही है?"
"बेटी कुतुबशाही और आदिलशाही को मिट्टी में मिला दिया। वे दोनों
बादशाह हमारे कैदखाने में पड़े हैं। मरगट्ठों का सम्भा भी हमारे कैदखाने में पड़ा
जंग खा रहा है। यह भी सच है। किन्तु मराठों की इस भूमि में शिवा और सम्भा ने
ऐसा कोई सुरंगी बारूद भर रखा है, किसे पता? राजा के गिरफ्तार होने पर भी
मराठों का राज्य समाप्त नहीं हुआ है। हमारे द्वारा भेजे गये जुल्फिकार जैसे सेनानी
का हाथ अभी भी खाली है। जिस तरह पेड़ की चोटी पर बन्दर बैठते हैं वैसे ही
प्रत्येक किले के संरक्षण के लिए बुर्ज बुर्ज पर मराठे हथियार लेकर बैठे हैं। सम्भा
के गले में गिरफ्तारी की जंजीर बाँधे एक महीना हो गया पर उसकी महारानी, वह
डाकिन येसूबाई रायगढ़ का कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है। चाबुक मार मारकर
कलश और सम्भा की पीठ छलनी कर दी फिर भी वे कोई भेद देने को तैयार नहीं।
यह कैसी फतह है बिटिया?"
बादशाह बहुत देर तक विचारमग्न बैठा रहा। बाद में उसने असदखान को
अपने निजी कक्ष में बुलाकर कहा, "वजीरे आजम, इस बहादुरगढ़ की जगह ही
अशुभ है। यहाँ के महल गर्क होते हैं। यहाँ की जमीन खोदो तो शरीर पर कीड़े
उड़ते हैं। यह फतह मिलने पर भी फतह की खुशी हासिल नहीं होती।"
"हुजूर?"
"हाँऽ, असदखान। कल ही यहाँ से डेरे डंडे बाहर निकालिए। अपने दोनों
राजबन्दियों को कड़े बन्दोबस्त में साथ ले लो।"
"लेकिन जहाँपनाह, जाना कहाँ है? उनके अनुसार आदेश दूँ।"
"पुणे के आसपास।"
दूसरे दिन बादशाह के कुछ लाख घोड़े और सैनिक भीमा नदी के किनारे
किनारे ऊपर की ओर सरकने लगे। कोरेगाँव और तुलापुर के बीच छावनी बनाने का
बादशाह ने निश्चय कर लिया था। उसका विचार था कि पूना के पास पहुँचकर पूना
और चाकण के क्षेत्र पर आक्रमण किया जाए। उसके धूर्त मस्तिष्क में इस तरह के
विचार सक्रिय थे। उत्तरी कोंकण में उतरने से बादशाह की दहशत फैलने वाली थी,
जगह बदल जाने से घोड़े और सैनिक भी कुछ चैतन्य हो जाने वाले थे। बादशाह
को यह भी समीप से देखने का अवसर मिल जाता कि जुल्फिकार वहाँ कोंकण में
कौन-सा खेल खेल रहा है?
सम्भाजी 743

बादशाह के साथ वे दोनों राजबन्दी भी थे। उन पर शारीरिक और मानसिक
अत्याचार पहले की तरह ही हो रहा था। बादशाह सोचता था कि इन कैदियों की
चीख-पुकार सुनकर शायद रायगढ़ पर महारानी का कलेजा फटे और वे अपने पति
की जान बचाने के लिए तुलापुर की ओर दौड़ी चली आयें। यह कल्पना बादशाह
को भी बहुत व्यग्र कर रही थी।
3 मार्च, 1689 को बादशाह की फौज कोरेगाँव के मैदान तक पहुँच गयी।
तुलापुर के पीछे पहाड़ की तलहटी में भीमानदी के किनारे बादशाह का खेमा फैला
हुआ था। एक ओर से बहती हुई आती सन्त तुकाराम की इन्द्रायणी और दूसरी ओर
से सीमा। इन्हीं दो नदियों के संगम पर तुलापुर बसा हुआ था। दोनों नदियों के बीच
एक छोटी पहाड़ी जैसा ऊँचा स्थल था। उसी पहाड़ी पर औरंगजेब ने अपना
लालबारी डेरा खड़ा किया था। उसकी बची हुई तीन लाख सेना बडू कला और बडू
खुर्द से लेकर कोरेगाँव तक डेरा डाले पसरी थी।
लालबारी के डेरे-डंडे जिस दिन वहाँ लगे उसी दिन शाम को बादशाह ने
मियाँखान को अकेले में बुलाया। मियाँखान के कान में औरंगजेब फुसफुसाया,
"अपनी फौज के सबसे अधिक विश्वासपात्र के रूप में मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया है,
मियाँखान ?"
"जहाँपनाह आपकी खातिर तो जान भी हाजिर है।"
"हमें एक सन्देह हो रहा है। सन्देह नहीं विश्वास हो गया है कि हमारी
छावनी के कुछ लोग खुफिया तौर पर अभी भी उस सम्भा के साथ मिले हुए हैं।"
"क्या कह रहे हैं, मेरे आका?" मियाँखान के गले में जैसे कुछ अटक गया।
"इसीलिए जानबूझकर मैंने तुम्हें बुलाया है। हमारा अब किसी पर भरोसा
बचा नहीं है। कौन हैं ये मक्कार? आप ही इन्हें ढूँढ़ निकालिए।"
"ठीक है, मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूँगा, मेरे आका।" मियाँखान ने
सौगन्ध खाई।
तुलापुर की छावनी में दिन बीतने लगे। जुल्फिकारखान की ओर से फतह की
कोई सूचना नहीं आयी। मराठों की महारानी और उसकी सेना शरणागत होने का
नाम नहीं ले रही थीं। बादशाह को बहुत क्रोध आ रहा था। उन दोनों राजबन्दियों
को पकड़े पूरा महीना बीत गया था, फिर भी राजबन्दी जीवित थे। बादशाह ही
नहीं, सभी सैनिकों की आँखों के सामने अतीत की क्रूर कथाएँ बार-बार साकार हो
रही थीं। मथुरा में नेस्तनाबूद किये गये वे गोस्वामी, दारा शिकोह, भाई मतीदास,
भाई सतीदास, दयालदास और गुरु तेगबहादुर...। सम्भा और कलश को मारने
पीटने से भी कुछ हाथ नहीं लग रहा था। बादशाह को अनुभव हो रहा था कि
छावनी के सारे अधिकारी ही नहीं, फौजी बाजारों के आवारा लड़के भी उसकी ओर
744 :: सम्भाजी

देखकर उपहास से हँसते हैं। उसे दुर्बल और डरपोक समझने लगे हैं।
क्रोध के आवेश में एक सुबह औरंगजेब ने रुहुल्लाखान को हुक्म दिया,
"जाओ उस कवि कलश की आँखों में तपती सलाई घुमाकर, उस कुत्ते की आँखें
निकाल लो।"
खुफिया नौकर और अन्य फौजी बन्दीखाने की ओर दौड़े। हुक्म की तत्काल
तामील की गयी। कविराज की पानीदार आँखें और उसमें चमकती हुई पुतली
निकाल ली गयी। उनकी आँखों का केवल भयानक खाँचा बचा रह गया।
बादशाह राजबन्दियों की रोज बारीकी से पूछताछ करता था। दोनों
राजबन्दियों का शरीर व्यायाम के अभ्यास से पोषित था। इसलिए वे बहुत मजबूत
और धैर्यवान थे। उनकी जगह यदि कोई अन्य होता तो कब का तड़पकर मर गया
होता। कविराज और सम्भाजी राजा का खाना-पीना बहुत कम हो गया था।
एक दिन सवेरे-सवेरे औरंगजेब ने सम्भाजी राजा को अपने दरबार में बुलाया।
उनकी अति पानीदार आँखों को देखकर बादशाह विषाद से हँसा। अपने सरदारों के
सामने सम्भाजी राजा की खिल्ली उड़ाते हुए बोला, "सम्भाऽऽ मुझे लगता था कि
अपने दोस्त की आँखों की ओर देखकर तुझे अक्ल आ जाएगी। पर खैर चलो-"
औरंगजेब जैसे शैतान की ओर देखना सम्भाजी राजा को पाप जैसा लग रहा
था। उनकी लाल सुर्ख आँखें औरंगजेब की क्रोधाग्नि में घी का काम कर रही थीं।
बादशाह क्रोधावेश में बोला, "तेरे दोस्त की जीभ मैंने पहले ही छाँट दी है।
तुम्हारी इसलिए छोड़ रखी थी कि उससे हार की, पराभव की बात सुन सकें। किन्तु
तुम्हारी तो तकदीर ही खराब दिखती है। उसके लिए तुम्हारे तैंतीस करोड़ देवता भी
क्या कर सकते हैं?"
फतह हासिल करने पर भी बादशाह के हाथ कुछ नहीं लग रहा था। इससे
बादशाह बहुत दुखी और क्रुद्ध था। वह दाँतों से जीभ चबाते हुए धीमे स्वर में
बोला, "सम्भा अब तुम्हें नयी दृष्टि देने की जरूरत है।" पूर्व निश्चित योजना के
अनुसार पास ही तपती हुई सलाइयाँ तैयार थीं। उन तीलियों की जलती लाल भभक
औरंगजेब ने स्वयं देखी। सरदारों की भीड़ में पीछे की ओर भयभीत मियाँखान
खड़ा था। बादशाह की दृष्टि उस पर पड़ी। बादशाह ने जोर से पुकारा, "आओ
मियाँखान, सामने आओ।"
मियाँखान सामने आकर लड़खड़ाते पैरों से खड़ा हो गया। सम्भाजी राजा के
हाथ पीछे की ओर बँधे थे। मियाँखान की हैरान आँखों की ओर देखकर औरंगजेब
खुशी से हँसा। उसने कहा, "वजीरे-आज़म, सम्भा को नयी दृष्टि देने की नापाक
कारगुजारी के लिए हमें एक ईमानदार आदमी की जरूरत है। और मियाँखान के
समान दूसरा वफादार आदमी हमारी फौज में कौन मिलेगा?"
सम्भाजी :: 745

मियाँखान बादशाह के सामने टालमटोल करने लगा। तभी बादशाह जल्लादों
पर चिल्लाया, “मियाँखान ना कहता है तो सम्भा से पहले उसकी ही आँख निकाल
लो।” मियाँखान का हाथ थर-थर काँपने लगा। उसने काँपते हाथों में जलती
सलाइयों को पकड़ लिया। धीरे धीरे चार कदम रखता हुआ सम्भाजी राजा के पास
पहुँच गया। सम्भाजी राजा की तेजस्वी आँखों के पास उन तपती सलाइयों को ले
जाते-ले जाने अचानक उन्हें अपने पेट में चुभा दिया। जोर का शोर उठा। बादशाह
के इशारे पर नौकर आगे दौड़े। उन्होंने मियाँखान के शरीर पर तलवार से सपासप
वार किया। मियाँखान का रक्त मांस सम्भाजी राजा के पैरों में बिखर गया।
बादशाह की आज्ञा से जल्लाद आगे बढ़े। तप्त लाल सलाइयाँ सम्भाजी राजा
की आँखों में घुमाई गयीं। चर्र चर्र की आवाज हुई। आँखों से धुआँ उठा। चेहरे का
चमड़ा भी थरथराया। किन्तु मुँह से भय या आक्रोश की कोई चीख नहीं उठी। यह
देखकर औरंगजेब को बहुत दुःख हुआ।
चौदह
जिंजी के भव्य किले के नीचे कंसोपन्त त्रिमल का निवास था। दिन डूबते डूबते
आज यह दुखद समाचार वहाँ पहुँच गया। 'शम्भूराजा कैद हो गये उन्हें औरंगजेब
की सेना जंजीरों से बाँधकर ले गयी।' इस समाचार ने केसोपन्त का कलेजा टूक
टूक कर दिया। केसोपन्त त्रिमल के भीतर का ईमानदार रक्त उन्हें शान्त बैठने नहीं
दे रहा था। ऊपर किले पर हरजी राजा के पास भी यह समाचार पहुँचा था। केसो
त्रिमल को विश्वास था कि समाचार पाते ही हरजी राजा उन्हें बुलाएँगे। इसीलिए
उन्होंने तैयारी आरम्भ कर दी थी। उन्होंने अपनी सेना को तैयार रहने का संकेत
दिया। उन्होंने कहा, “किसी भी समय औरंगजेब से बदला लेने के लिए हमें
महाराष्ट्र वापस जाना पड़ सकता है।”
केसो त्रिमल के बड़े भाई मोरोपन्त शिवाजी महाराज के अष्टप्रधानों में पेशवा
थे। उन्होंने महाराज के साथ लेखनी ही नहीं तलवार भी चलाई थी। पिंगले घराने
के वफादार खून की परम्परा को केसोपन्त ने रामशेज के किले पर भी प्रमाणित किया
था। दो वर्षों तक किले पर आँच नहीं आने दी थी। एक विश्वासपात्र के रूप में ही
सम्भाजी राजा ने उनकी नियुक्ति दक्षिण के तमिल और कर्नाटक प्रदेश में की थी।
746 • सम्भाजी

हरजी राजा का सन्देश आया, "महल से निकलकर तुरन्त पूना के लिए प्रस्थान
करना पड़ेगा। विचार-विमर्श के लिए फ़ौरन ऊपर आइए। आपकी राह देखते हम
दरवाजे पर ही खड़े हैं।" तब वृद्ध केसो त्रिमल जिंजी का वह किला चढ़कर ऊपर
आये। पसीने से तरबतर हरजी महाड़िक के सामने खड़े हो गये।
हरजी प्रसन्न मुद्रा में झूले पर बैठे दिखे। दालान के कोने से किसी की रोने
की आवाज आ रही थी। सम्भवतः वह आवाज अम्बिकाबाई की होगी। आखिर
शम्भुराजा उनके छोटे भाई थे। केसो पन्त कुछ हड़बड़ाए हुए से सामने रखे आसन
पर बैठने लगे। उसी समय कोने में खड़े अपने सिपाहियों को संकेत किया। आठ
दस लोग केसोपन्त पर टूट पड़े। उन्हें बन्दी बनाकर कैदखाने की ओर ले जाया
गया। केसोपन्त की वफादार आत्मा आहत हुई और अपमान से उनका चेहरा लाल
हो गया। मराठों का राजा दूर अपनी मातृभूमि में कैद हो गया। उसकी मदद के लिए
दौड़कर जाने के बदले हरजी राजा जैसा व्यक्ति, राजा का सगा बहनोई इस प्रकार
का धोखा करेगा, ऐसा तो त्रिमल ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था।
हरजी राजा ने केसो त्रिमल को ले जाते हुए देखा। हरजी प्रसन्नता से हँसे।
महाड़िक के कर्मचारी लेखन सामग्री लेकर पहले से ही बैठे थे। हरजी राजा
औरंगजेब को पत्र लिखवाने लगे।
"ऊपर ईश्वर की महिमा का आसमान और नीचे बादशाह मेहरबान। यही
सत्य स्थिति है। इसे हम भली प्रकार जानते हैं। आपने जिस प्रकार हमारे साढ़ू भाई
गणोजी शिर्के और महादजी निंबालकर पर दयाभाव रखा है वैसी ही कृपा हमारे
ऊपर भी रखिए। यद्यपि हम शिवाजी के जामाता हैं फिर भी हमारा सिर उनके पुत्र
सम्भा की तरह फिरा नहीं है। कहने का मकसद यह है कि आप हम पर कृपा करके
बादशाही की सेवा का देवदुर्लभ अवसर प्रदान करें।"

पन्द्रह

रायगढ़ पर शोक की लहर फैली थी। दस वर्ष पूर्व शिवाजी महाराज के आकस्मिक
निधन से राजधानी को भूकम्प का झटका लगा था। अब दस वर्ष बाद मुगलों द्वारा
सम्भाजी राजा को जीवित पकड़ा गया था। हिन्दवी स्वराज्य को यह दूसरा भीषण
झटका लगा था। सम्भाजी राजा जैसे ध्येय धुरन्धर रणवीर और कर्तव्यपरायण राजा
सम्भाजी 747

का जीवन केवल बत्तीस वर्ष होने का प्रजा को बहुत दुख था।
येसूबाई महारानी पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा था। जैसे किसी ऊँचे पहाड़
से फिसलकर हिरन नीचे गिर जाये और उसकी मृत देह को देखकर हिरनी पागल
होकर छटपटाए, अपने हृदय की असह्य वेदना को दबाकर नाचने लगे, वही स्थिति
येसूबाई महारानी की हो रही थी। जो जन्म से राजा और प्रवृत्ति से राजर्षि था, ऐसे
अपने प्राणप्रिय पति के भाग्य में ऐसा दुर्दिन आएगा ? इसकी तो कल्पना तक नहीं
थी।
महारानी को सम्भाजी राजा की स्मृतियाँ बार-बार आती थीं। क्रूरकर्मा
औरंगजेब चुप बैठेगा इसका विश्वास नहीं होता था। शम्भुराजा भी किसी तोड़
जोड़ या समझौते के लिए तैयार न थे। इसलिए मन के भीतर मृत्यु का घंटा बजता
सुनाई पड़ता था। कराल काल का भयानक दरवाजा करकरा रहा था। महारानी को
रोज का कार्यव्यापार-पत्राचार, लेना-देना, हर किले के किलेदारों और सरदारों का
धैर्य बँधाना, जहाँ आवश्यक हो वहाँ सेना को पहुँचाना, रायगढ़ को निवाले की तरह
निगलने के लिए तत्पर जुल्फिकारखान के आक्रमण को रोकने का प्रबन्ध आदि
करना पड़ रहा था।
महारानी को राजमहल खाने को दौड़ता था। चौकियों के पहरे के निरीक्षण के
निमित्त से वे कभी-कभी बाहर निकलती थीं। साथ में ताराबाई, खंडो बल्लाल और
अन्य लोग होते थे। वे रायगढ़ के बुर्जों से सामने के गहन अँधेरे को देखती थीं।
उन्हें लगता था कि इस तहीभूत अँधेरे को ही अपने पास बुला लें। महाराज कब
मिलने वाले थे ? इस जन्म में या दुर्देव से अगले जन्म में ही। सिर के ऊपर आकाश
चन्द्र की ओर वे देखती ही नहीं थीं। यदि कभी असावधानी से चन्द्र दर्शन हो जाता
तो उनका मन शम्भुराजा की स्मृति में पागल हो जाता था।
येसूबाई के माथे का सौभाग्य सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। क्रूरकर्मा
औरंगजेब पीछे हटने को तैयार नहीं था। ऐसी खबरें आ रही थीं कि औरंगजेब की
सेना बहादुरगढ़ छोड़कर तुलापुर की ओर बढ़ रही है। आसपास की घाटियों में
आकर स्वराज्य के बुर्जों को ध्वस्त करने का निश्चय बादशाह ने कर लिया है।
अनेक अनुभवी और सम्मानित लोग अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने और जागीर के
टुकड़े के लिए औरंगजेब के तम्बू की ओर दौड़ लगा रहे हैं। ऐसे समय में सह्याद्रि
की घाटियों के साढ़े तीन सौ किलों की रक्षा करना आवश्यक है। यही सोचकर
येसूबाई रात-दिन एक करके हिम्मत के साथ आये हुए संकट का मुकाबला कर रही
थीं।
सम्भाजी राजा की मियाँखान और कुछ अन्य मुगलों से मैत्री थी। यह बात
748 :: सम्भाजी