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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

समय शम्भूराजा झट से उठकर खड़े हो गये। उन्होंने म्यान खींचकर तलवार बाहर
निकाल ली। सामने हो हल्ला मचाने वाली भीड़ को शस्त्र दिखाते हुए वे
चिल्लाये- "शान्ति रखो नहीं तो एक-एक के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा।"
महाराज की उस गर्जना से सभी स्तब्ध हो गये। हताश महाराज वहीं पर
घुटनों के बल बैठ गये। जिस प्रकार पुजारी भगवान की मूर्ति को बड़े भक्ति भाव से
हाथ में लेता है उसी प्रकार शम्भूराजा ने कोंडाजी के सिर को अपने हाथ में ले
लिया। दूसरे ही क्षण उन्होंने दिल दहला देने वाली दर्द भरी चीत्कार की-
"कोंडाजी बाबाऽऽ! कैसे हुआ यह ?"
निराश भाव महाराज ने उस आगन्तुक की ओर देखा।
वह वीर पूरी तरह विचलित हो गया था। उसकी दोनों आँखें छलछलाने
लगीं। उन्हें किसी प्रकार सँभालते हुए उद्विग्न व्यक्ति की तरह कहने का प्रयास
करने लगा- "महाराज, आप और कोंडाजी के द्वारा बनाई गयी गुप्त योजना के
अनुसार ही सब कुछ हो रहा था। उस योजना को कार्यान्वित करने के लिए हम
बारह जन हब्शियों के गढ़ में घुसे थे। वहाँ हम सबों ने तेरह-चौदह महीने किस
तरह काटे इसे हमारा जी ही जानता है।"
"अरे, लेकिन यह धोखा हुआ कैसे?" शम्भूराजा ने प्रश्न किया।
"महाराज, कुदरत ने और खुदा ने थोड़ी मेहरबानी कर दी होती तो कल रात
ही जंजीरे के सभी बारूदखाने जलकर खाक हो गये होते। आसमान में उठने वाली
लपटों ने कल रात ही हमारा अभिनन्दन किया होता।"
"लेकिन हमारे कोंडाजी बाबा कितने बली और बुद्धिमान वीर थे!"
"क्या बताऊँ महाराज ? विगत चौदह महीनों हम बारह व्यक्तियों ने अपनी
योजना के सम्बन्ध में रंचमात्र भी संशयात्मक स्थिति नहीं पैदा होने दी। वे सिद्दी
बन्धु और उनकी फौज के सभी कालसर्प पूरी तरह असावधान थे। कोंडाजी ने
आपसे भीषण झगड़ा करके चले आने के बाद बड़ी-बड़ी कहानियाँ सुनायी थीं।
एक नम्बर के बहुरूपी कासिम का बाबा पर इतना विश्वास हो गया था मानो उसे
बाबा के रूप में कई जन्मों का मित्र मिल गया हो। अपनी प्रिय रक्षिता ईरानी सुन्दर
युवती दिलरुबा को कासिम ने कोंडाजी बाबा को समर्पित कर दिया। दिलरुबा भी
बाबा पर जान देने लगी थी। कोंडाजी और ग्यारह जन जंजीरे किसलिए प्रविष्ट हुए
हैं इसका उस स्त्री को पिछले महीने तक कुछ भी पता न था।"
"चलोऽऽ इसका मतलब उसी ने अन्त में धोखा किया।"
"नहीं, नहीं, महाराज, वैसा नहीं...."
"तो फिर?"
"कल रात तक हमारी सारी योजना ठीक थी। जंजीरे के आठ बड़े
बारूदखानों में एक ही समय आग लगाकर उड़ा देने की पूरी तैयारी हो चुकी थी।
370 :: सम्भाजी

वहाँ के कुछ लोगों को अधिक धन देकर बाबा ने अपनी ओर कर लिया था। कल
की आधी रात के समय सभी बारूदखानों को भस्म करने का मुहूर्त था। किले के
पिछले दरवाजे के पास एक नाव तैयार खड़ी थी। कार्य सफल होने के बाद जो
सौभाग्य से बच जाते उन्हें पिछले दरवाजे से आकर नाव में बैठकर इस ओर निकल
आना था। लेकिन ऐन समय पर दिलरुबा साथ आने के लिए हठ करने लगी। वह
प्रार्थना करने लगी—"मुझे भी अपने मुल्क मे साथ ले चलो।"
"ठीक है, फिर?"
"दिलरुबा को अपने साथ ले आना कोंडाजी ने स्वीकार कर लिया। किन्तु
उसकी जायरा नाम की एक प्रिय दासी थी। उसके बिना दिलरुबा पानी का घूँट भी
नहीं लेती थी। इसलिए अन्तिम समय में दिलरुबा ने उस दासी को भी साथ ले आने
का निश्चय किया। बारूदखानों को आग लगाने के एक घंटा पहले दिलरुबा ने
जायरा को बता दिया कि कहाँ जाने की तैयारी है। जायरा ने कहा कि मैं अपने कपड़े
लेकर शीघ्रता से वापस आती हूँ। ऐसा कहते हुए वह तेजी मे निकली और सीधे
खैरियत खान के महल में पहुँच गयी।"
"अरे रे!" सारी कहानी सुनकर शम्भूराजा के सभी साथी चिल्ला पडे।
कितनो ने तो अपना मुँह पीट लिया।
वह मराठा वीर आगे कहने लगा—"दासी से बगावत का समाचार पाते ही
किले पर खतरे का घंटा बजने लगा। देखते देखते दो तीन हजार सैनिक हम बारह
जनों के पीछे लग गये। हममें से तीन जनों ने बुर्ज के नीचे की ओर छलाँग लगाई,
जिनमें दो तो वहीं पर चकनाचूर हो गये। कोंडाजी के साथ आठ जन एक पंक्ति में
खड़े किये गये और सपासप तलवार से काट दिये गए। दिलरुबा का गला कासिम
ने अपने हाथों से काटा। संयोग से एक दीवार के खड्ढे में मुझे थोड़ी सी जगह
मिल गयी और मैं बच गया। अपने सभी बहादुरों के शव को कासिम के कुत्तों ने पैर
पकड़कर घसीटते हुए एक जगह इकट्ठा किया। पिछले दरवाजे के बाहर एक
चबूतरे पर लकड़ी जलाकर उसी में शवों और सिरों को डाल दिया। वे कुत्ते विजय
के नशे में नाचते-नाचते किले की ओर निकल गये।
"उसी नशे में उनकी पीठ पीछे का पहरा ढीला पड़ गया और मैं कुछ
जंगली लताओं का सहारा लेकर किसी तरह रेंगते हुए नीचे उतरा। वहीं पर मुझे
कोंडाजी बाबा का अधजला सिर दिखाई पड़ा। उसी सिर ने एक बार फिर से मेरे
शरीर में शक्ति का संचार कर दिया। महाराज, बड़ी कठिनाई से मैं यहाँ तक पहुँचा।
मुझे पता था कि आप हमारी राह देखते किले की ओर आँख लगाए बैठे होंगे। यदि
मैं यहाँ न पहुँच पाता तो कोंडाजी बाबा और उनके साथियों की वीरता की कहानी
आपको कौन सुनाता? आप को तो किसी बात का पता भी न चलता।"
यह करुण कहानी सुनते सुनते सभी की आत्माएँ कराह उठीं। अपने कीमती
सम्भाजी 371

राजसी लिबास की चिन्ता न करते हुए शम्भूराजा नें दुख के आवेग में कीचड़ और
मिट्टी से सने उस मराठा वीर को बाँहों में भर लिया। तैरकर आया हुआ वह वीर
अभी रोते हुए कह रहा था—"जब भी हम एकान्त में बैठते थे तो कोंडाजी बाबा
हमसे कहते थे—'केवल चौंसठ मावले वीरों को लेकर मैंने पन्हाला किले को जीता
था और फूल की तरह शिवाजी महाराज के चरणों में चढ़ा दिया था। उसी तरह
जंजीरा नाम के इस बदतमीज किले को हमें प्राप्त करना है और अपने युवराज के
चरणों में चढ़ाना है। दोस्तो, इसीलिए कहता हूँ कि आखिरी रात यहाँ बारूदखानों
के जलने से ऐसा धमाका होना चाहिए कि उसी धमाके से यह किला पानी में चला
जाये और उसी धमाके के चमत्कार से मेरा शरीर भी उड़कर समुद्र पार पर्वत पर मेरी
प्रतीक्षा कर रहे शम्भूराजा के चरणों में गिरना चाहिए। मेरी जिन्दगी की यही सबसे
बड़ी सार्थकता है।'"
इस करुण कथा को सुनकर सभी के कलेजे फट गये। शम्भूराजा के हृदय को
बहुत ही गहरा आघात पहुँचा। किन्तु उस सेनानायक ने अपने को सँभाला। आक्रोश
के सैलाब को बड़ी कठिनाई से रोकते हुए उन्होंने बाबा के सिर को बड़े सम्मान से
पालकी में रखा, उसे ताजे फूलों से ढक दिया। उन्होंने अपने गले से रत्नमाला को
खींचकर उसके सारे रत्न कोंडाजी बाबा के सिर के अगल बगल हल्के मे रख
दिया। करंजा और जांभुल के औषधीय पत्तों को सिर के चारों ओर रख दिया गया।
पालकी उठा ली गयी। सभी राजदूत कोंडाजी बाबा के जन्मस्थान की ओर
चल पड़े। जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए शम्भूराजा आगे आये। उसे ऊँचे पहाड़ से
अपनी जीभ से पानी चाट रहे जालिम जंजीरे को वे देखते रह गये।
दुर्गादास राठौड़ कवि कलश का हाथ पकड़कर एक ओर ले गये और धीरे से
पूछा—"क्यों जी, तेरह महीने पूर्व निश्चित की गयी इतनी गम्भीर योजना के
सम्बन्ध में आपने हमें एक शब्द भी नहीं बताया?"
"नहीं जी, मुझे भी कहाँ पता था?" कवि कलश ने अपना सम्भ्रम प्रकट
किया। थोड़ी देर पहले जब वह मराठा जवान इस कहानी को सुना रहा था तभी
आपके साथ ही मैंने भी पहली बार सुना।"
आठ
दूसरे दिन की सुबह तोपों के जोरदार धमाकों के साथ हुई। दंडा राजपुरी के परिसर
372 :: सम्भाजी

में घुडूमधम, घुडूमधम, कड़ाडधूमऽऽऽऽऽऽ जैसी कान फाड़ने वाली आवाजों से
सारा वन प्रदेश भर गया। तोपों के गोलों से किनारों पर धुओं की लहर उठने लगी।
जंजीरे की तटबन्दी पर गिरने वाले तोप के 'गोलों' से वहाँ के पत्थर और चूने
चिथड़े होकर पानी में गिरने लगे। परिसर के पंछी भी कहीं दूर अपना घोंसला बनाने
के लिए भाग गये।
वह तोप का धमाका इतना भयंकर था कि राजपुरी और आगरदांडा में बचे-
खुचे लोग भी घबराकर अपना-अपना गाँव छोड़कर भागने लगे। सामानों से भरे
छकड़ों, बोरों से लदे बैलों और ऊँटों को निकल जाने के लिए मराठा सैनिकों ने
सहायता की। शम्भूराजा द्वारा जंजीरे पर किया गया आक्रमण बहुत भयंकर था। युद्ध
भूमि विकराल हो उठी थी। यहाँ तक कि आसपास की मस्जिदों में अजान बन्द थी
और मन्दिरों की ओर जाने का किसी में साहस नहीं था।
इतने दिनों से पानी में रेंगती हुई नौकाएँ अब आलस छोड़कर पूरी तरह सजग
हो गयी थीं। जहाजों पर चढ़ाई गयी तोपों और छोटी-मोटी नौकाओं में गोले बारूद
ठूंस ठूंसकर भर दिये गये थे। शम्भूराजा की क्रुद्ध सेना आवेश में बाहर निकली।
तांडेल नाविक दल सजग हो गया। काले घने बालों वाले मध्यम ऊँचाई के हब्शी
सैनिक मराठों के निशाने पर आने लगे। छोटी मोटी नावों ने जंजीरे के चारों ओर से
शिकंजा कसने की शुरुआत की।
मराठों द्वारा भयंकर आक्रमण करने का समाचार सवेरे ही हब्शियों को मिल
चुका था। सिद्दी खैरियत खान और सिद्दी कासिम खान प्रतिकार की भावना से
किले पर नाचने लगे। बारूद भरी तोपों को आगे खींचने में उन्होंने जरा भी
प्रतीक्षा नहीं की।
हब्शियों का तोपखाना भी उच्चकोटि का था। ये तोपें जहाजों पर अचूक
निशाना साधने लगीं। हब्शियों के गोलों-बारूदों से पानी में मराठों की नावें जलने
लगीं। जहाजें डूबने लगीं। मराठा नौसैनिक अपने जलते हुए कपड़ों के साथ पानी में
कूदने लगे। जिस तरह भी सम्भव बन पड़ा अपने प्राणों की रक्षा का प्रयास करने
लगे।
मराठों और हब्शियों के बीच एक जल रेखा और एक अग्निरेखा खिंच गयी
थी। उस रेखा को दोनो सैन्य दल किसी को पार नहीं करने दे रहे थे। यह देखकर
कि किले के आसपास का घेरा नहीं टूट रहा है, शम्भूराजा ने अपनी चाल बदली।
उन्होंने फूल पत्तों में छुपाई गयी अपनी सशक्त तोपों को बाहर निकाला। अब मराठों
का यह विशिष्ट तोपखाना अपनी आग की जीभ से किले को चाटने लगा। जंजीरे के
तट से टकराने वाला एक-एक गोला पौने चार सेर वजन का था। जब निशाना
चूककर ये गोले पानी में गिरते तो समुद्र के पेट से पानी की धार वेग से ऊपर उठती
सम्भाजी .: 373

और आकाश की ओर मुँह किये पानी में फौवारे नाचते दिखाई पड़ते।
जंजीरे के बुर्जों में लगे बड़े-बड़े पत्थर टूटकर नीचे पानी में गिरने लगे। किले
का फौलादी किनारा टूटने लगा। तोपों के भयंकर धमाकों से किले के अन्दर धरती
हिलने लगी। किले के भीतर बने साठ सत्तर घरों को आग लग गयी। सिद्दी का
सुन्दर शीश महल तो चकनाचूर हो गया। छोटे-छोटे रंगीन टुकड़े महल में फैल
गये।
धुएँ और आग के बीच मचे कोलाहल से हबशी घबरा गये। जिस समय
सामने का कमान धराशायी हुई और नगारखाने की दिशा बिगड़ी उसी दिन हब्शियों
के जनानखाने में हलचल मच गयी। बेगमें, बच्चे, रक्षिताएँ किला छोड़कर पिछले
दरवाजे से बाहर निकले। जो भी जहाज या नाव मिली उसमें बैठकर बाहर भागने
लगे।
कासिमखान और खैरियत खान डूबते हुए किले को बचाने की हर सम्भव
कोशिश करने लगे। किले के सिंहद्वार से उनकी शक्तिशाली तोपें— लांडा कासिम,
कलाल बागड़ी और व्याघ्रमुखी आग उगलने लगीं, उन तोपों से होने वाला प्रहार
प्रचंड था। मराठों के बड़े जहाजों को भी उन्होंने जलाना आरम्भ किया। इन तोपों से
हब्शियों को कुछ राहत अवश्य मिली, किन्तु शम्भुराजा रुकने को तैयार नहीं थे। इस
भीषण आक्रमण से सिद्दी बन्धु निराश हो चुके थे। खैरियत खान ने कासिम से
कहा "यह सम्भाजी हमारी इतनी हालत खराब करेगा, यदि हम जानते तो मुगलों
के मांडलिक बनते ही क्यों ? मराठों की शरण में गये होते तो कम से कम प्राण तो
बचते।"
जंजीरे के किले का मुख्य आधार सामने वाली खाड़ी के किनारे पर फैला
हुआ हब्शियों का अधिकृत प्रदेश था। पृष्ठभाग का यह क्षेत्र रोहा की खाड़ी से
लेकर बाणकोट की खाड़ी तक कई कोस में फैला हुआ था। मुरुड, तळा, म्हसला,
हरिहरेश्वर, दिवेआगार दिघी जैसा सारा भूभाग हब्शियों के अधिकार में था। बाहर
से रसद की आवश्यकता पड़ने पर यह प्रदेश ही हब्शियों के लिए अन्न का भंडार
था। इसीलिए सिद्दियों पर दबाव बनाने के लिए शम्भुराजा ने दिघी और आगरदांडा
की ओर से जंजीरे की ओर के सभी यातायात को पूरी तरह से रोक दिया था। उस
ओर से मराठों की गश्ती नावें और जहाजें किसी को भी जंजीरे की ओर जाने नहीं
देते थे। इस प्रकार हब्शियों की पूरी तरह नाकेबन्दी कर दी गयी थी।
डेढ़ मील की परिधि के जंजीरे के बीचोबीच पहाड़ी की तरह एक ऊँचा
हिस्सा था। उसी पर हब्शियों के किले का ध्वज फहराता रहता था। जब समुद्र की
ओर से मराठों ने गोलाबारी शुरू की तो दोनों सिद्दी बन्धु अपनी बचीखुची सेना
लेकर उसी बीच वाले पहाड़े की बगल में जा छुपे थे। वहीं गोला बारूद भण्डार
174 सम्भाजी

अपने बचाव की लड़ाई लड़ रहे थे। किन्तु अब तक हब्शियों की असीम हानि हो
चुकी थी। इतना होने पर भी वे किला छोड़कर जाने के लिए तैयार न थे। क्योंकि
यह अजेय जंजीरा और उसकी कृपा से प्राप्त यह समुद्री हुकूमत हब्शियों के
गंडस्थल के समान था। उसके फूटने से सिद्दी हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाने
वाले थे। इसीलिए उन्होंने अल्लाह और औरंगजेब की शरण ली थी।
इतनी दुर्दशा होने पर भी सिद्दी किला छोड़ नहीं रहा था। यह देखकर
शम्भुराजा बेचैन हो गये। उन्होंने कवि कलश से कहा, "समझ में नहीं आता कि
किस भूत ने घेर रखा है इस किले को ? आधा किला पानी में गिर चुका है फिर भी
सिद्दी न तो आत्मसमर्पण करता है और न किला ही छोड़ता है।"
जंजीरे का किला अजेय है, इसलिए हब्शी कभी भी पराजित नहीं होंगे।
हब्शियों की प्रजा में इस प्रकार का विश्वास दृढ़ हो गया था। यही कारण था कि
कोंकण के लोग हब्शियों से बहुत घबराते थे। लेकिन प्रजा ने जब शम्भुराजा को
हब्शियों की आँखें सफेद करते देखा तो उनमें साहस आ गया और वे बाहर आने
लगे। नादगाँव और नागाँव के लोगों ने शम्भुराजा के पैर छूते हुए कहा, "हमें इन
हब्शियों के बन्धन से मुक्त करायें। हाँ महाराज, यदि कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका
निभानी पड़ी तो हम भी उस गिलहरी की तरह निभाएँगे।"
गाँव के लोग आकर मिले किन्तु अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण
शम्भुराजा बहुत सन्त्रस्त थे। इसी बीच ग्रामीणों के मुख से निकला 'गिलहरी' शब्द
उनके मस्तिष्क मे चक्कर काटने लगा। एकाएक उनके भीतर एक ज्योति फूटी।
बचपन में श्रृंगारपुर के केशव पंडित और रमाजी पंडित से सुनी हुई रामायण की
एक कथा याद आयी। लंका में जाने के लिए प्रभु रामचन्द्र द्वारा वानर सेना के साथ
निर्माण किया गया वह सेतु और थोड़ी थोड़ी रेत लाकर दरारों को भरने वाली वह
गिलहरी याद आयी। शम्भुराजा का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने ताली बजायी।
रात में विचार विमर्श करते समय शम्भुराजा ने प्रश्न किया-
"कविराज, दादजी सामने के इस समुद्र में ही रास्ता तैयार किया जाये तो ?"
"क्या ? क्या कह रहे हैं आप ? कहाँ से महाराज ?"
"समुद्र मे !" शम्भुराजा धीमे स्वर में गरजे।
"क्यों नहीं ? क्या यह असम्भव है? प्रभु रामचन्द्र ने लंका जीतने के लिए
जिस तरह सेतु का निर्माण किया था वैसे इस जंजीरे को पराजित करने के लिए हम
भी सेतु का निर्माण करेंगे।"
शम्भुराजा के सभी सहयोगी घबराये, विचलित हुए, किन्तु राजाज्ञा को कौन
नकार सकता था ? शम्भुराजा अपनी सेना के लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय थे।
शम्भुराजा कवि हृदय ही नहीं सचमुच कवि थे। किन्तु उनकी इस प्रकार की कल्पना
सम्भाजी ३75

के पंखों को पानी पर कैसे उतारा जाये? इन हिंसक लहरों के आघात में सेतु टिकेगा
कैसे?
शम्भुराजा अपने निर्णय से हटने को तैयार नहीं थे। तलवार चलाने वालों ने
अपने शस्त्र अलग रखकर हाथों में कुल्हाड़ी उठा ली। दूसरे दिन ही राजपुरी की
पहाड़ी की बगल के बड़े-बड़े वृक्ष कटकर गिरने लगे। जंजीरे के बुर्ज पर हब्शी
सैनिकों की भीड़ एकत्र हो गयी थी। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उन्हें
लगा मराठों का राजा कहीं पागल तो नहीं हो गया?
उस दिन बहुत से सैनिक, घुड़सवार, सरदार और अधिकारी इस कार्य में जुटे
थे। इनमें कामाठियों और बेलदारों ने बहुत परिश्रम किया। दिनभर परिश्रम करने के
कारण उनका शरीर थक गया था। शम्भुराजा भी दोपहर की कड़ी धूप में समुद्र के
किनारे खड़े थे। 'चलो, उठाओ, ढकेल दो।' ऐसी हिदायत दे रहे थे। कभी कभी
स्वयं भी वे वृक्ष के तने या बड़े पत्थर को ढकेलने के लिए हाथ लगाते थे। शारीरिक
परिश्रम और मानसिक त्रास से शम्भुराजा बहुत थक गये थे। उन्होंने रात को तम्बू के
अन्दर बिस्तर में अपना शरीर झोंक दिया।
बाहर जल रहे अलाव का प्रकाश बहुत दूर तक फैला था। अलाव के पास
बैठे कविराज कलश, दुर्गादास, भायनाक, दादजी देशपांडे, गोविन्दराव काथे सभी
चुप थे। बीच बीच में एक दूसरे की ओर चोर नजरों से देख लेते थे। सारांशतः
शम्भुराजा का जो नया अभियान चल रहा था उस पर उन लोगों का भरोसा नहीं था।
उस समूह में अरबी सूबेदार जंगेखान भी सम्मिलित था। मराठों की चोर नजरें उससे
छिपी नहीं थीं।
"कहाँ रामायण के सपने और कहाँ शरीर को भस्म करने वाली शत्रुओं की
तोपें? दोनों में कोई मेल नहीं।" दादजी बोले।
जंगेखान हँसते हुए बोला, "देखो भाई, जो जाति से ही युद्धवीर होता है,
उसने यदि एक बार टक्कर देना निश्चित कर लिया तो उसके लिए पर्वत क्या और
पानी क्या?"
"खान साहब तुम्हारे लोग भी काम पर गये हैं शायद?" गोविन्दराव ने
पूछा।
"गोविन्दराव, भायनाक! तुम्हारे रामायण में क्या सच है? क्या झूठ है? मुझे
कुछ भी पता नहीं है किन्तु वहाँ पश्चिम में एक जंग बहादुर समुद्र पर सेतु बाँधकर
अपने मकसद में कामयाब हुआ था। इसका मुझे पक्का पता है।"
"कौन? कौन था वह?" बहुत देर से सिर नीचे झुकाए सब की बातें सुन रहे
कवि कलश एकदम उनक' खड़े हो गये
"सिकन्दर! अलेक्झाइंडर द ग्रेट' 'डे हजार वर्ष पहले की बात है। न्यू
376 :: सम्भाजी

टायर नाम टापू को जीतने के लिए उसने इसी तरह समुद्र में सेतु बाँधकर पराक्रम
दिखाया था और युद्ध जीता था।''
अरब सूबेदार ने सिकन्दर का उदाहरण दिया तो सरदारों और राजाओं का भी
उत्साह बढ़ा। हर रोज सामने वाली खाड़ी आठ सौ गज की दूरी पाटने के लिए
बड़े बड़े पेड़ और पत्थर डाले जाते रहे। कपास से उन्हें जोड़े रखने का प्रयास
किया गया। किन्तु समुद्र की क्रुद्ध लहरें पेड़ों और पत्थरों को निगल जाती थीं। पानी
में डाला गया वृक्षों और पत्थरों का ढेर दूसरे दिन अपनी जगह पर दिखाई ही नहीं
पड़ता था। घोर परिश्रम से किया गया कार्य पानी में बह जाता था। किन्तु शम्भुराजा
अपने संकल्प को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। धीरे धीरे आसपास के गाँवो के
लोग इस कठिन कार्य में सहभागी होने लगे।
देखते देखते आधा सेतु तैयार हो गया। पानी की गहराई अधिक होने के
कारण, बहुत से बड़े बड़े पत्थर अन्दर चले गये। किन्तु संकल्प और उत्साह की
कोई सीमा नहीं थी। आधा सेतु बनते ही शम्भूराजा का उत्साह दुगुना हो गया।
किन्तु दूसरी ओर से कलाल बांगड़ी और लांडा कासिम तोपें सेतु पर गोले फेंकने
लगीं। शम्भूराजा ने भयानक और दादजी को आदेश दिया। पानी में दाई और बाई
ओर फैली हुई जहाजों को इकट्ठा किया गया। ये समुद्री जहाज एक ओर शत्रु की
तोपो का सामना कर रही थीं तो दूसरी ओर सैनिको और मजदूरों के लिए सुरक्षा
कवच बन रही थीं।
अब सिद्दी बन्धुओं ने सारी आशाएँ छोड़ दी थीं। किले में से सिद्दी का
खजाना बाहर निकाला गया। उसके मूल्यवान वस्त्रों और आभूषणों को पेटियों में
भरा गया। अब तक बहती हवा का रुख हब्शी सैनिकों को ज्ञात हो गया था। वे
भीतर ही भीतर बहुत घबरा गये थे। दो तीन दिनों में ही किला गिरने वाला था।
जजीरे की तटबन्दी पर मराठों की शहनाई और नगाड़े बजने वाले थे। शम्भूराजा की
विजय के अन्तिम सोपान पर पहुँचने का समाचार आसपास के गाँवो में पहुँचने लगा
था। गाँवों के लोग बड़े उत्साह से आगे आ रहे थे। प्रसन्नता की लहर खेतों और
सिवानों में फैल रही थी।
केवल दो दिन पहले सुबह सुबह कुछ सैनिक जंजीरे के पिछवारे से किले
पर आये। उन्हें देखकर ठंडे पड़े हब्शियों में उत्साह आ गया। मराठों को लगा कि
उनके पास कुछ रसद और गोला बारूद आ गया है। किन्तु शम्भूराजा की बेचैनी
बहुत बढ़ गयी थी। शत्रु दल का यह उत्साह तात्कालिक नहीं था। उसमें किसी
गम्भीर रहस्य का आभास मिल रहा था।
उसी रात पन्द्रह बीस घोड़े हिनहिनाते हुए राजपुरी के तट पर पहुँचे।
कोथलागढ के किलेदार ने राजा को आधी रात में जगाया। वह बडी घबराहट के
सम्भाजी :: 377

साथ कहने लगा—
"राजन! धोखा हो गया है। उस औरंगजेब कां हसन अली नायक सरदार,
नासिक होता हुआ कोंकण में आ गया है। उसके साथ बीस हजार घुड़सवार और
पन्द्रह हजार पैदल सैनिक हैं। अपना सारा प्रदेश जलाते हुए आ रहा है। कल्याण के
बन्दरगाह पर उन्होंने एक झटके में क़ब्ज़ा कर लिया। वहाँ के शहर, राजवाड़ा और
कमानों को भारी क्षति पहुँचायी है।"
"सरकार, शीघ्र ही पनवेल और पेन को जलाते हुए रायगढ़ पर चढ़ाई करने
का उसका इरादा है।" दीवान पंडित ने चिन्ता व्यक्त की।
"फिर हमारी गश्ती सेनाएँ क्या कर रही हैं?" शम्भूराजा ने उद्विग्नता
से पूछा।
"महाराज! भयंकर तूफान के सामने झोंपड़ी कैसे टिक सकती है? उमके
लिए बड़ा शक्तिशाली बन्दोबश्त चाहिए।" किलेदार ने उत्तर दिया।
इस समय तक शम्भूराजा के सभी विशिष्ट सहयोगी एकत्र हो गये थे। हसन
अली खान द्वारा पैदा की गयी विपत्ति से शम्भूराजा सन्न हो गये थे। वे भारी कदमों
से डेरे से बाहर आये। हवा के झोंके आ रहे थे। वे वहीं खड़े होकर नीचे की खाड़ी
की ओर देखने लगे। पिछले पचीस वर्षों में देखे गये हिंदवी स्वराज्य के स्वप्न को
पूरा करने वाला सेतु आधे से अधिक तैयार हो चुका था। चार आठ दिन में ही यह
कार्य हो जाना था। अँधेरे से ही संकेत करने वाला आधा ध्वस्त जंजीरा हाथ में आने
वाला था। शिवाजी महाराज के शब्द शम्भूराजा के कानों में घूम रहे थे—"एक बार
जंजीरा कब्ज़े में आ जाये तो अपनी गज्य सीमा गंगा यमुना से जा मिलेगी।"
क्रोध, मन्ताप और उद्वेग के कारण शम्भूराजा का चेहरा लाल अंगारा हो गया
था। वे गरजे—"नहीं कविराज, नहीं दाद जी, इस जंजीरे को पानी में डुबोये बिना
हम पीछे नहीं हटेंगे।"
"परन्तु राजन, हसन अलीखान की समुद्र की तरह गरजती सेना को पीछे
हटाना भी जरूरी है। यह संकट अपना दरवाजा खटखटा रहा है।"
महाराज पीछे हटने को तैयार नहीं थे। परन्तु दादाजी, दरिया सारंग, मायनाक
आदि सभी ने उनके ऊपर दबाव बढ़ाया। हर एक ने उन्हें समझाते हुए कहा—
"महाराज, जंजीरा तो महत्त्वपूर्ण है ही, लेकिन रायगढ़ उससे कहीं अधिक
महत्त्वपूर्ण है।"
अन्ततः दादजी रघुनाथ देशपांडे के हाथों में वहाँ का कार्यभार सौंपकर, बड़ी
कठिनाई से शम्भुराजा वहाँ से निकले। उनके साथ दो हजार सवारों का एक दल
था। शम्भूराजा का घोड़ा बड़ी कठिनाई से पीछे के पर्वत पर चढ़ा। वहीं पर उन्होंने
अपने घोड़े का मुँह पीछे की ओर तेजी से मोड़ा। जंजीरे के उस मनहूस प्रदेश के
378 . सम्भाजी

दृष्टि से ओझल होने से पूर्व उन्हें आँख भर देखना था।
समुद्र से हवा के तेज झोंके आ रहे थे। समुद्र में बना वह सेतु राजा को
अस्पष्ट रूप से दिखने लगा था। सहयोगियों का मनोबल क्षीण न हो इसलिए
अपने आँसुओं को रोकने का भरसक प्रयास कर रहे थे। किन्तु उनकी आँखों में
समुद्र उमड़ आया था। उसमें वह सेतु भीगकर गीला हो गया था।

सम्भाजी ३7५

क्षात्र तेज
एक
शम्भूराजा राजधानी में वापस आ गये। रास्ते में पहाड़ के पास चांभारगढ़ पर एक रात
का पड़ाव किया था। वहीं पर उन्हें खोजते हुए गुप्तचर वहाँ आये थे और रात मे ही
उन्हें ताजा समाचार सुनाया—'हसनअली खान भिवंडी और कल्याण में भीषण
अग्निकांड करके घाट की ओर चला गया। मराठों का समझकर उसने पुर्तगालियो
के चालीस गाँवों को आग लगा दी।'
शम्भूराजा ने कवि कलश से कहा—"कविराज एक हसनअलीखान चला
गया। किन्तु अपने स्वराज्य को कष्ट देने के लिए औरंगजेब ने जगह जगह अनके
भूत छोड़ रखे हैं। इस औरंगजेब से महाराष्ट्र किस प्रकार लडता रहेगा और कैसे
उसे धूल चटाएगा इस पर विचार करना आवश्यक है। राजधानी में चलकर प्रमुख
सहयोगियों से युद्ध के सम्बन्ध में विचार विमर्श करना अति आवश्यक है।"
"बिलकुल ठीक, राजन।"
"कविराज, मेरे साथ गढ़ नहीं चलो। जल्दी ही दक्षिण कोंकण की ओर
निकलो।"
"महाराज ?"
"कुडाल और डिचाली में बारूद का कार्य किस तरह चल रहा है? खर्च
क्या है? और उत्पादन क्या है? इसके अतिरिक्त गोवा की ओर पुर्तगालियों की क्या
गतिविधियाँ चल रही हैं? इसका पूरा विवरण हमें दीजिए।"
"राजन, ऐसे चलने चलते निकलता हूँ। चौथे पड़ाव के लिए रायगढ़ पर
स्वामी के चरणों में उपस्थित होता हूँ।" कवि कलश ने उत्साहित होकर कहा।
दूसरे दिन शम्भूराजा रायगढ़ पहुँच गये। महल के द्वार पर महारानी येसूबाई ने
सोने की थाली में उनका परिछन किया। महारानी को देखकर शम्भूराजा चमके।
उनके पेट में पाँच माह का शिशु पल रहा था। वे उनकी पीताभ कान्ति को देखते रह
380 :: सम्भाजी

गये। उस बेडौलपन में भी एक मिठास, एक मनोवांछित छवि आ गयी थी।
रात को शयनकक्ष में राजा ने कहा, "कुलदीपक का आगमन हो, ऐमी राजा
की ही नहीं सामान्य प्रजा की भी आकांक्षा है। गयगढ़ को उनराधिकारी मिलेगा
तो.."
"हाँ, कवि भाई जी के पुत्रकामेष्टि यज्ञ को यश मिला है।"
"सच है, पगन्तु अपने कविराज द्वारा सुझाया गया वह यज्ञ भी कुछ लोगों के
पेट में चुभ रहा था। किन्तु ऐसा यज्ञ तो पुत्रप्राप्ति के लिए महागज दशरथ ने भी
किया था।"
"मराठों के हिन्दवी स्वराज्य के लिए भी एक गम मिलेगा।" महारानी के
भीतर आनन्द का ज्वार उठ गया था।
"प्रसूति के लिए कहाँ जाएँगी ?" शम्भुराजा ने अचानक प्रश्न किया।
"कहाँ? शृंगारपुर नहीं तो दाभोल गणोजी राजा के यहाँ।"
येसूबाई ने बीच में रुकते हुए प्रतिप्रश्न किया - "आपने ऐसा टेढ़ा प्रश्न क्यो
किया ?"
"कुछ नहीं, महज भाव से पूछ लिया।"
"हमारे पिताजी गतवर्ष भगवान को प्यारे हो गये। लेकिन इससे क्या होता
है? अपनी बहन की प्रमृति व्यवस्था न कग पाने की लाचारी अभी शिर्के लोगों को
नहीं आयी है। गणोजी राजा हर तरह मे समर्थ और समृद्ध हैं।" येम्रुबाई ने
अभिमान के साथ कहा।
जंजीरे का सेतु अधूरा रह गया था। उसी बीच औरंगजेब के आक्रमण ने
अनन्त अड़चनों और कार्यों के पहाड़ खड़े कर दिये थे। शम्भुराजा को बहुत देर तक
नींद नहीं आयी। येसूबाई को नींद आ गयी थी और देखते-देखते वे गहरी नींद सो
गईं। एक ही शरीर में दो प्राण विश्राम कर रहे थे। शम्भुराजा अपनी पत्नी की ओर
बड़े प्यार से देख रहे थे।
अचानक राजा को स्मरण हुआ कि सन्ध्या समय अन्दर आते समय महाद्वार
पर खंडोजी ने उन्हें एक गुप्त लिफाफा दिया था। अलसाए हुए चिराग के प्रकाश में
उन्होंने लिफाफे की हरी गाँठें खोलीं। आरम्भ की दो पंक्तियों पर दृष्टि डालते ही
उन्होंने अपनी साँस रोक ली। उनकी आँखें मियाँखान के उस पत्र पर जल्दी जल्दी
घूमने लगीं।
"शम्भू महाराज, लगता है कि इसके पहले के चार गुप्तपत्र आपके पास तक
नहीं पहुँच पाये। हो सकता है कि हमारे गुप्त जासूसों को ममाचार की थैली सहित
कैद कर लिया गया हो। अपनी बेटी के लिए बाप का कलेजा किस तरह टूटता है ?
इसे आपने मेरे सन्दर्भ में देखा ही है। मेरी दो दुलारी शहजादियों का विवाह केवल
सम्भाजी .: 381

आपकी कृपा से सम्भव हुआ। महाराज बहुत-बहुत शुक्रिया! आज आपको एक
खुशखबरी देते हुए मुझे भी बड़ी खुशी हो रही है। आप भी एक प्यारी-प्यारी बेटी
के पिता हुए हैं।" यह समाचार पढ़ते ही शम्भुराजा के सर्वांग से आनन्द की बिजली
दौड़ गयी। वह धम्मभ से बिछौने पर बैठ गये। भूपालगढ़ के दिन उन्हें स्मरण हो
आये। उस समय समस्याओं से ग्रस्त दुर्गा देवी का चित्र उनकी आँखों के सामने
साकार हो गया।
शम्भुराजा की आँखों में आनन्दाश्रु भर आए। दूसरे ही क्षण लाडली बेटी का
स्मरण करके उनका हृदय भर आया। वे आगे का समाचार पढ़ने लगे—"बेलों में
फूल आने से माली खुशी से पागल हो उठता है। आप तो मराठों के बादशाह हैं।
आज आपकी राजकन्या औरंगजेब के अहमदनगर के किले में कैद है और वहीं
छोटी से बड़ी हो रही है। किसी बात की चिन्ता न करें। आपकी रानी, राणूदीदी
और लाडली बेटी की औरंगजेब ने अच्छी व्यवस्था की है। फिर भी पिंजड़ा तो
पिंजड़ा ही है, चाहे सोने का हो या लकड़ी का। किन्तु आप चिन्ता न करें।
कई जन्मों के लिए आपका शुक्रगुजार यह मियाँखान अभी जिन्दा है। बीमारी
की वजह बताकर अहमदनगर किले में ही एक छोटी नौकरी कर ली है। यहाँ यह
मियाँखान बादशाह की नहीं, अपनी राजदुलारी शहजादी की सेवा-चाकरी कर रहा
है।"
शयनगृह में उस रात अपनी बेटी का स्मरण करके राजा के धैर्य का बाँध टूट
गया। वे अपना रोना रोक नहीं सके। उनके रोने की आवाज से महारानी येसूबाई भी
जग गयीं। पत्र पढ़कर उनका भी मन भर आया। वह भी रोने लगीं। शम्भुराजा
संभले। येसूबाई के पेट में भी एक शिशु था। उसे कष्ट न पहुँचे इसलिए वे येसूबाई
को समझाने लगे। उन्हें धीरज बँधाने लगे। रानी के कपोलों पर अपनी उँगलियाँ
घुमाते-घुमाते बेटी की स्मृति में उनका मन बहुत छोटा होता जा रहा था।
प्रातः काल राजाज्ञा हुई। रायगढ़ पर जलेबियों की परातें आने लगीं। बहुत
लोगों को आश्चर्य भी हुआ। प्रजा में कानाफूसी होने लगी। खंडो बल्लाल ने
शम्भुराजा से पूछा, "महाराज, अभी महारानी प्रसूति के लिए मायके गयी भी नहीं,
तब तक ये जलेबियाँ?"
"क्यों ?"
"नहीं, महाराज को पुत्ररत्न प्राप्त हो ऐसी प्रजा की हार्दिक इच्छा है। हम
सब पेड़े चाहते हैं और आप जलेबियाँ बाँट रहे हैं।"
ऐसा है खंडोजी, बच्ची की इच्छा हुई तो आज जलेबियाँ। कल पुत्रप्राप्ति के
बाद पेड़े तो हैं ही।" इसी प्रकार कुछ कहकर शम्भुराजा ने बात को टाल दिया।
382 :: सम्भाजी

दो
शम्भूराजा को राजधानी में आये पाँच दिन हो चुके थे परन्तु उनका दर्शन दुर्लभ था।
वे न तो दरबार में आते थे और न ही जगदीश्वर के दर्शन के लिए बाहर निकलते
थे। उन्होंने अपने महल में स्वयं को बन्द कर लिया था। वे बीमार नहीं थे किन्तु
युद्ध नाम के ज्वर ने उन्हें पूरी तरह हैरान कर दिया था।
शम्भूराजा के साथ येसाजी कंक, म्हालोजी घोड़पड़े, निलोपन्त पेशवा,
प्रह्लाद निराजी, खंडो बल्लाल, यानाजी मोरे जैसे पुराने प्रतिष्ठित लोग और नयी
ऊर्जा के वीर सिर से सिर लगाकर बैठे थे। चार दिन किसी प्रकार बीत गये। गुप्त
मन्त्रणा अखंडरूप से चलती रही। दुर्गादास राठौर और शाहजादा अकबर का निवास
वकीलों के निवास के पास था। वे दिन में कभी-कभी आकर विचार-विमर्श में
भाग लेते थे। उनमें केवल दुर्गादास में ही इन कार्यों रुचि दिखाई पड़ती थी।
पिछले चार दिनों से शम्भूराजा प्रातःकाल आठ-नौ बजे से विचार गोष्ठी में
बैठ जाते थे। वहीं पर दोपहर और रात के भोजन के लिए थालियाँ आ जाती थीं रात
बीतने पर मुर्गे की पहली बाँग के साथ ही वे अपना स्थान छोड़ते थे। केवल घंटे दो
घंटे की ही नींद किसी प्रकार ले पाते थे। पुनः स्नान करके घंटे भर उनकी पूजा
चलती थी। इसके बाद गर्म दूध का प्याला उनके ओठों को लगता था। फिर वे
जल्दी में वस्त्र धारण करते थे। निजी कक्ष से सदर की ओर जाते हुए रायप्पा और
अन्य सेवक लिवासबन्द बाँधते और रत्नों के आभूषण पहनाते थे।
भीतर निजी दरबार में इतना व्यस्त कार्यक्रम चल रहा है, इसका किसी को
अनुमान तक न था। लेकिन विचार-विमर्श करते समय अर्जोजी यादव और
कान्होजी भांडवलकर जैसे विशेषज्ञों द्वारा बनाये गये मानचित्र एवं मोम की बनी
अनेक किलों की प्रतिकृतियाँ सदैव ही रखी रहती थीं। उनका अध्ययन करते हुए,
सारी रात मशाल की तरह आँख जलाते सभी रात भर जागते रहते थे। औरंगजेब के
भयंकर आक्रमण से शंभूराजा बहुत सावधान हो गये थे। बादशाह की पाँच लाख की
फौज और लगभग तीन लाख घुड़सवारों का समुद्र की तरह गरजते हुए स्वराज्य पर
चढ़ आना उन्हें अच्छी तरह स्मरण था। इस प्रचण्ड का मुँह मोड़ने, उसे दूसरी ओर
घुमा देने के लिए कौन-सा भगीरथ प्रयास किया जाय? इसी की चर्चा हो रही थी।
पिछली रात अचानक इस चर्चा में हंबीर मामा अवतरित हुए। उन्हें देखकर
नये-पुराने सभी सदस्य आश्चर्यचकित हुए। शम्भूराजा ने आश्चर्य से पूछा-
“मामाऽऽ आप यहाँ आयेंगे, ऐसी सम्भावना नहीं थी। आप तो वहाँ मोर्चे पर ... ?”
शान्त स्वभाव के हंबीरराव मोहिते हँसते हुए बोले, “शम्भू बेटे, हम बड़े
सम्भाजी :: 383

महाराज के सेनापति रहे हैं और उनके प्रिय बहनोई भी। उनसे दो-चार अध्याय तो
पढ़े ही हैं।"
"मतलब?"
"दूसरा एक बन्दा हंबीर बनकर बी गरी का स्वांग किये हमारी भूमिका निभा
रहा है। हमारे शत्रुओं को ही नहीं मित्रों को भी यही विश्वास है कि मैं मोर्चे पर
मौजूद हूँ।"
"वाहऽऽ।" शम्भूराजा ने हंबीरराव की प्रशंसा की।"
हंबीरराव की उपस्थिति से सभी में उत्साह आ गया।
जिस समय किले पर जोरों की चर्चा चल रही उसी समय रायगढ़ किले की
तलहटी में निर्माण कार्य जोरों पर था। नयी सेना गठित की जा रही थी।
रायगढ़वाड़ी के अठारह कारखाने रात-दिन युद्ध सामग्री तैयार करने में लगे थे।
पाँचवें दिन दोपहर को प्रमुख व्यक्तियों की बैठक आरम्भ हुई। उसके पूर्व ही
कवि कलश राजधानी में वापस आ चुके थे। उन्होंने तोप गोलों का, कच्चे बारूद
का, भावी योजना का सारा ब्यौरा शम्भूराजा के सम्मुख प्रस्तुत किया। बैठक शुरू हो
गयी किन्तु महारानी येसूबाई अभी भी वहाँ पहुँच नहीं पायी थीं। राजा को अपनी
सहचरी महारानी की प्रतीक्षा थी। उसी समय महल के बाहर पैरों की आहट सुनाई
दी। महारानी के साथ गयी आठ-दस पालकियाँ वापस आयी थीं। अपनी पाँच
महीने की गर्भावस्था में भी बिना किसी का सहारा लिए, अपने को सँभालते हुए
येसूबाई बाहर निकलीं। उसी अवस्था में वे आकर बैठक में सम्मिलित हो गयीं।
महारानी को कुछ विलम्ब हो जाने से राजा को चिन्ता हुई। उनकी प्रश्नातुर
आँखों का भाव समझकर येसूबाई बोली- "जंजीरें की लड़ाई में काम आये चार सौ
सैनिकों की सूची आयी थी। उनमें से तीस बालपरवेशी निकले। उनकी व्यवस्था
देखने के बाद ही मैं यहाँ आयी।"
बैठक में उपस्थित दुर्गादास राठौड़ ने शम्भूराजा की ओर दृष्टि घुमाई।
शम्भूराजा ने उन्हें बताया- "हिन्दवी स्वराज्य के लिए जो युद्ध में वीरगति प्राप्त
करते हैं उनके बाल-बच्चों की समुचित देखरेख के लिए पिताजी ने बालपरवेशी
व्यवस्था आरम्भ की थी। आज भी हम उसका निर्वाह कर रहे हैं।"
"बालपरवेशी, यानी क्या?"
"युद्ध में जिन बच्चों के पिता काम आते हैं, उनका पालन-पोषण अपने
बच्चे की तरह राज्य की ओर से किया जाता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर जब तक
स्वयं सेना में भर्ती नहीं हो जाते तब तक उनका सारा दायित्व राज्य पर होता है।
उनकी माँ का यदि कोई दूसरा सहारा नहीं है तो उसकी भी व्यवस्था बालपरवेशी
गृह में की जाती है।"
"वाहऽ वाह! बहुत खूब-"
384 : सम्भाजी

“हाथियों के पीलखाने के पास हमारा एक बड़ा बालपरवेशी गृह है। एक
बार जाकर देख लो। केवल रायगढ़ पर हिन्दू, मुस्लिम, ब्राह्मण आदि सभी जातियों
और धर्मों के सत्तर बालपरवेशी रहते हैं। उनमें जंजीरा के नये तीस और जुड़ेंगे।”
इस यथार्थ को सुनकर दुर्गादास बहुत भावुक हो गये। वे कहने लगे—‘‘वाह
शम्भू महाराज! यह दुर्गादास दिल्ली, आगरा, राजपूताना जैसे अनेक प्रदेशों में घूमा
है। परन्तु शिवाजी और सम्भाजी महाराज जैसा प्रजाहितैषी राजा, कोई दूसरा देखने
को नहीं मिला।”
चर्चा आगे चलती रही। युद्ध सम्बन्धी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार-विमर्श के
लिए सभी अष्ट प्रधान, सेनापति, नये-पुराने सरदार और राजा के मुख्य सहयोगी
उपस्थित थे। दादाजी रघुनाथ देशपांडे ने जंजीरे की लड़ाई अभी तक चालू रखी थी।
कोंकण के समुद्रतट पर प्रत्येक बन्दरगाह में पुर्तगाली-मराठा संघर्ष की आग सुलग
रही थी। जिस प्रकार कोई सपेरा पूरे घर को विषैला बना देने के लिए अपने साँपों की
सभी टोकरियाँ खाली कर देता है उसी प्रकार हिन्दवी स्वराज्य को समाप्त कर देने
के लिए मुगलों की फौज बाहर निकली थी। ऐसी परिस्थिति में स्वराज्य के दूसरे
छत्रपति सम्भाजी महाराज अपने स्वराज्य के लिए क्या निर्णय लेते हैं? इस पर सभी
का ध्यान केन्द्रित था।
सम्भाजी महाराज ने अत्यन्त विनम्र शब्दों में कहना आरम्भ किया—‘‘बहादुर
जवानों, हम मराठों के लिए पर्वतराज सह्याद्रि वैसे ही जीवन और प्राण के समान है
जैसे श्रीकृष्ण के लिए गोकुल था। हमारे पिताजी यही मानते रहे। उन्होंने सह्याद्रि
नाम का ही लौह कवच धारण किया था। सह्याद्रि का आश्रय लेकर ही अनेक दाँव-
पेंच का प्रयोग करके, हिन्दवी स्वराज्य की सोने-मोतियों की फसल काटी।”
‘‘परन्तु शम्भूजी महाराज! हमारे समय की लड़ाइयाँ बहुत छोटी थीं। किसी
की पाँच लाख की फौज तो हमारे सपनों में भी नहीं आयी थी।” युद्ध अनुभवी
मालोजी घौड़पड़े ने कहा।
‘‘वही कह रहा हूँ, घौड़पड़े काका।” शम्भूराजा ने दृढ़ शब्दों में कहा,
‘‘जब तक सह्याद्रि नाम का यह लौह कवच हमारे पास है तब किसी की क्या
चिन्ता? कल तो पाँच तो क्या दस लाख की फौज का समुद्र हमारे ऊपर चढ़ आये
तो भी हम उसे इस सह्याद्रि के कवच से चकनाचूर कर देंगे।”
शम्भूराजा के इस आत्मविश्वास से सभी के भीतर स्वाभिमान और वीरत्व की
लहर दौड़ गयी। किन्तु आरम्भ में ही उन्होंने सभी को एक संकेत दिया।
‘‘एक बात स्मरण रखो। औरंगजेब की इतनी बलशाली सेना का खुले मैदान
में मुकाबला करना हमारे लिए वज्रघात होगा। नेसरी के जंगल में प्रतापराव गूजर ने
आदिलशाही फौज पर आक्रमण करके अपने प्राण गँवा दिये। वे अमर हो गये।
सम्भाजी :: ३४५

किन्तु अब हमें भावावेश में नहीं, बहुत सोच समझकर सुनियोजित ढंग से अत्यन्त
सावधानीपूर्वक कदम बढ़ाना होगा। हम ऐसी खूबी से लड़ें कि इसी दक्षिण के
जंगल में उस पापी औरंगजेब की कब्र खोद दें। हमें महाराष्ट्र के ललाट पर शिवाजी
महाराज द्वारा अंकित हिन्दवी स्वराज्य की रक्षा करनी है। साथ ही अपने साढ़े तीन
सौ किलों और समुद्री जहाजों में से एक भी खोना नहीं है। "
अर्जोजी द्वारा बनाये गये मानचित्र की ओर उँगली से संकेत करते हुए
शम्भूराजा ने कहा, "हम मराठा लोग केवल सह्याद्रि के जंगलों में छुपकर नहीं बैठे
थे। बल्कि कुडाल मालवन से लेकर बसई और तारापुर तक का हब्शियों का सारा
क्षेत्र, अपवाद स्वरूप मुम्बई को छोड़कर सम्पूर्ण समुद्रतट, वहाँ के सारे बन्दरगाह,
सभी खाड़ियाँ हमारे अधिकार में रहे हैं। कुकड़ी नदी के पास से लेकर नीचे
कोल्हापुर, बेलगाँव तक का बारह-बारह चौबीस मावल और अड़तीस नेरे के क्षेत्र
में हर नदी, हर पहाड़, हर घाटी पर जगह-जगह हमारी चौकियाँ रात दिन पहरा
देती हैं। हमारे सह्याद्रि का प्रत्येक किला वस्तुतः पिघले लोहे का कुंड है।"
"महाराज ! फिर भी अपना प्राणतत्व क्या है ?" निलोपन्त पेशवा ने पूछा।
"जहाँ सम्भव हो वहाँ तत्काल आक्रमण करना जहाँ सम्भव न हो वहाँ कुछ
समय के लिए पीछे हट जाना। हमारा शत्रु होशियार और अनुभवी है। वह यकायक
सह्याद्रि पर आक्रमण कर देने की हिम्मत नहीं दिखाएगा। किन्तु यदि उसने आक्रमण
कर दिया तो यहाँ की घाटियों में हम मुगल सेना को अच्छा सबक सिखाएँगे।"
"परन्तु महाराज ! शत्रु जब तक सह्याद्रि की बाँहों में नहीं आ जाता क्या तब
तक हम उसकी प्रतीक्षा करेंगे ?" हंबीरराव ने पूछा।
"छि · छि : कतई नहीं।' शत्रु और सर्प को जिन्दा छोड़ना युद्धशास्त्र की दृष्टि
से घातक है। यह सच है कि एक ओर मुगलों की पाँच लाख की फौज है और
दूसरी ओर हमारे साठ-सत्तर हजार सैनिक। किन्तु इसीलिए हमें रुकना नहीं है।
अपनी सेना की छोटी-छोटी टोलियाँ बनाकर मुगलों की सेना और उनके प्रदेशों पर
टूट पड़ना है। उन्हें जला-जुलाकर और लूटपाटकर कंगाल करना है। यही हमारी
नीति है। हंबीरराव आप पहले की भाँति अपना आग का खेल जारी रखकर मुगलों
को अधिक से अधिक हानि पहुँचाएँ।"
इस विचार-विमर्श में छोटे से छोटे मुद्दों पर गम्भीरता से चर्चा की गयी।
अपने और पराये का विवरण प्रस्तुत किया गया। उसी समय सेनापति हंबीरराव
मोहिते बोले, "परम्परा के आधार पर विचार किया जाये तो हैदराबाद का
कुतुबशाह, बीजापुर का आदिलशाह, जंजीरे के सिद्दी, दिल्ली के मुगल और
पुर्तगाली ये पाँच हमारे प्रमुख शत्रु हैं।"
"परन्तु हंबीरराव एक ही समय में सभी शत्रुओं के साथ युद्ध छेड़ना,
386 :: सम्भाजी

युद्धशास्त्र की दृष्टि से मूर्खता होगी। सौभाग्य से आदिलशाह और कुतुबशाह हमारे
दोनों शत्रु पिताजी के अन्तिम दिनों में मित्र बन गये थे। इसके लिए पिताजी ने
राजनैतिक दबाव और कूटनीति का रास्ता अपनाया था। यह मैत्री भाव हम भी चालू
रखेंगे। हाँ, भविष्य में जब औरंगजेब और हमारी अन्तिम और निर्णायक लड़ाई
आरम्भ होगी तब दक्षिण के सभी राजा एकत्र होंगे। उस स्थिति के लिए हम रात
दिन प्रयास कर ही रहे हैं।''
सिद्दी का नाम आते ही कवि कलश अधीर होकर बोल पड़े—‘‘राजन, वह
सिद्दी नाम का नटखट चूहा उसी समय चीर दिया गया होता तो कितना
अच्छा होता ?’’
इस प्रसंग से शम्भूराजा कुछ विचलित हो गये। किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपने
को संभाल लिया। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे आक्रमण से जंजीरे के बुर्ज गिर गये हैं।
सिद्दी पराजित नहीं हुआ फिर भी वह अन्दर मे पूरी तरह हिल गया है। अब इसके
बाद सिद्दी बन्धु खुलकर औरंगजेब से मिलने के लिए भी नहीं दौड़ेंगे क्योंकि
पहले आक्रमण में ही हमने उनके हौसले पस्त कर दिये हैं।''
बीच में ही येसूबाई ने खंडो बल्लाल को सामने बुलाया। वे नम्र स्वर में
बोलने लगीं—‘‘एक बार युद्ध भूमि पर घोड़े नाचने लगें तो रसद की माँग बढ़ जाती
है। राजधानी की ओर रसद के माँगपत्र आने लगते है। यदि बिना रसद के अपने
सैनिकों के प्राण संकट में पड़ें तो इससे बड़ा दूसरा पाप नहीं। हमें नासिक से दक्षिण
में जिंजी और रामेश्वर तक सेना के लिए रसद पहुँचानी पड़ती है। स्वामी को पहले
ही इस ओर ध्यान देना चाहिए।''
शम्भूराजा ने तत्काल रसद सम्बन्धी जानकारी ली। विशेष रूप से उन्होंने
कर्जत, कोथलागढ़, शाहपुर, माहुली के शक्तिशाली किलों नासिक की ओर
अहिवन्तगढ़, साल्हेर और मुलेर के किलों, अष्टागार के सागरगढ़, सिंधुदुर्ग,
राजापुर, जैतापुर जैसे किलों में रसद और गोला बारूद की स्थिति का जायजा लिया।
सभी जगहों पर जाँच की गयी। जहाँ कुछ कमी थी वहाँ रसद भेजने का ओदश
दिया गया।
येसूबाई ने कहा, ‘‘इस वर्ष पूना की ओर भयानक दुर्भिक्ष पड़ा है। सरकार से
कहकर हमने पहले ही अनाज के बोरे और कोंकण से पिंजड़े वाली गाड़ियाँ वहाँ
भेजी हैं। इसके पहले अष्टागार का सूखा भी बहुत ही जानलेवा था।‘‘
शम्भूराजा का चेहरा तनावग्रस्त हो गया। वे कहने लगे—‘‘यद्यपि अतिवृष्टि
और अनावृष्टि के कारण आने वाला दुर्भिक्ष राज्य के सामने घोर सकट बना हुआ है।
अनेक बार प्रकृति के रौद्र रूप के सामने मनुष्य का कोई जोर नहीं चलता। किन्तु शत्रु
की इतनी बड़ी फौज का यहाँ रहना और लगातार लड़ाइयों का होते रहना, इस
सम्भाजी :: 387

दुर्भिक्ष के संकट को और भी बढ़ाने वाला है।"
"खंडोबा!"
"जी महाराज!"
"इस सम्बन्ध में सेना और प्रजा को सावधान रहने की सूचना जल्दी ही
दे दो।"
शम्भूराजा ने दरिया सारंग और दौलतखान को जानबूझकर जंजीरे की लड़ाई
से वापस बुला लिया था।
शम्भूराजा ने कहा, "हमारे समुद्रीतटों पर लगभग सौ वर्षों से पुर्तगालियों का
क़ब्जा बना हुआ है। उन्हें उखाड़ फेंकना सरल नहीं है। चौल, थाने, बसई , तारापुर
में फिरंगियों के साथ हमारी नोंक-झोंक जारी है। निलोपन्त, फिलहाल आपकी
नियुक्ति किसी न किसी बन्दरगाह या खाड़ी के किनारे होगी। बोलिएऽऽ"
महाराज, हमारी सेना ने माहिम और तारापुर की पुर्तगाली चौकियों पर पहले
ही झटके में कब्जा कर लिया था। उनमें माहिम पुनः फिरंगियों के क़ब्ज़े में चला
गया। किन्तु तारापुर को पुनः हमने अपने अधिकार में खींच लिया। चोल और
देवदंड क्षेत्र में हमारा आग का खेल चल ही रहा है।"
"वाह निलोपन्त आजकल पेशवा होने पर भी आपकी कलम से स्याही
गिरने की जगह आपकी तलवार से फिरंगियों का खून बहता है। 'निलोबा
आयाऽऽ' सुनते ही फिरंगियों की जहाजें पानी के पेट में बैठ जाती हैं। आपका यह
पराक्रम देखने के लिए मोरोपन्त को जीवित रहना चाहिए था।"
शम्भूराजा ने गोवा के पास अंजदीप टापू पर तटबन्दी निर्माण के लिए सेना
भेजी थी। आवश्यक पत्थर और चूना भी भेजा गया था। उसका स्मरण दिलाते हुए
राजा ने पूछा—"कविराज आप डिचौंली से होकर आये हैं। बतायें कि अंजदीप पर
किले का निर्माण कार्य कहाँ पहुँचा है?"
"निर्माण कार्य आरम्भ होते-होते ही पुर्तगालियों के जहाज वहाँ आ गये।
उन्होंने निर्माण का कार्य रोक दिया।"
"लेकिन आज तक तो वह जगह मुक्त ही थी। कविराज, आप लोगों की
समझ में क्यों नहीं आता कि भविष्य में गोवा के फिरंगियों की छाती पर पाँव जमाने
के लिए वह जगह बहुत ही उपयोगी है।
"वस्तुतः यही बात उस काँट दी आल्व्होर ने भी अनुभव की है इसीलिए तो
उन्होंने तत्काल काम को रोक दिया।"
सम्भाजी महाराज विचारमग्न हो गये। फिर वे एक उच्छवास छोड़ते हुए
बोले, "सिद्दियों की तरह ही इन फिरंगियों को भी अपाहिज बनाकर छोड़ना
चाहिए। गोवा के साथ ही इस वाइसराय को भी पानी में डुबो देना चाहिए। नहीं तो
388 :: सम्भाजी

यह रँगा सियार जल्दी ही उस औरंगजेब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो
जाएगा।"
इस विचार गोष्ठी में अनेक नये निर्णय लिए गये। घोड़ों की नस्ल सुधारने के
लिए सरदारों, थानेदारों, देशमुख और देशपांडे को रुपये दिये गये।
औरंगजेब के आक्रमण को किस प्रकार रोका जाय? इस विषय पर शम्भूराजा
ने बहुत विस्तार से चर्चा की। येसाजी और हंबीरराव से प्राप्त सूचनाओं पर गम्भीरता
से विचार किया। शम्भूराजा सन्तुष्ट दिख रहे थे। उन्होंने कहा-
"फिलहाल अपने राज्य में भाईबन्दी में धोखेबाजी घुला पानी स्वच्छ होता
दिखाई पड़ रहा है। वैसे तो स्त्रियों के बारे में छोटी-मोटी कहानियाँ गढ़कर बाजार
में गप्पें लगाने और अफवाहों को फैलाने में दिमाग की कोई जरूरत नहीं होती।
किन्तु औरंगजेब जैसे बलशाली शत्रु और समुद्र सी उफनती उसकी विशाल सेना
का मुकाबला करने के लिए पहाड़ जैसी बलवान छाती चाहिए। शेर की तरह साहस
चाहिए। माँ भवानी की कृपा और पुण्यवान पिता के आशीर्वाद से हम इस अग्निदाह
से अवश्य ही सही-सलामत बाहर निकलेंगे।"
बोलते बोलते शम्भूराजा यकायक चुप हो गये। सभा में गाते हुए जैसे कोई
सिद्ध गायक अपनी गायनकला में तल्लीन हो जाता है उसी प्रकार युद्ध की योजना
बनाते समय शम्भूराजा की स्थिति हो रही थी। वे बोले-"कोई भी किला यदि
अजेय रह सकता है तो उसमें संचित गोला बारूद के भंडार और साहसी सैनिकों
के बल पर ही। गोले बारूद की आग एक बार बुझ जाये तो भी कोई बात नहीं
किन्तु घोर प्रतिकार करने वाले जवानों के सीने की आग कभी ठंडी नहीं पड़नी
चाहिए। क्यों हंबीरराव?"
"बिलकुली ठीक सम्भाजी राजा।"
अचानक शंभूराजा को अपनी दादी जीजामाता का स्मरण हो आया। वे
प्रसन्नता से हँसे। पूर्णिमा की ज्योत्स्ना उनके चेहरे पर फैल गयी। उसी समय एक
पुरानी बात उनकी स्मृति में उछली। वे भावुक होकर कहने लगे-
"किसी किले को जीतने के लिए आक्रमण कैसे करना चाहिए? और उसे
किस प्रकार कब्जे में लेना चाहिए? इसकी वीरतापूर्ण कहानियाँ मैंने दादी की गोद में
सिर रखकर सुनी हैं। देवगिरी का किला अजेय था। किन्तु हमारे परदादा-लखुजी
जाधवराव साहब ने कैसे आक्रमण किया? इसकी कथा दादीजी ने मुझे सुनाई थी।
वह मैं आप लोगों को बताऊँ?"
"हाँ, हाँ, महाराज अवश्य सुनाइये।" बैठक में चारों ओर से आवाज आयी।
"देवगिरी का किला ऊँचाई पर बना है। किले के ऊपरी हिस्से में जाते समय
अनेक गुप्त रास्ते बने हैं। ये रास्ते अँधेरे से होकर जाते हैं। बीच में आग और पानी
की खंदकें बनाई गयी हैं। यदि किसी ने इस विशालकाय किले पर आक्रमण करने
सम्भाजी :: 389