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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 793 में से

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पृष्ठ 378

के पंखों को पानी पर कैसे उतारा जाये? इन हिंसक लहरों के आघात में सेतु टिकेगा
कैसे?
शम्भुराजा अपने निर्णय से हटने को तैयार नहीं थे। तलवार चलाने वालों ने
अपने शस्त्र अलग रखकर हाथों में कुल्हाड़ी उठा ली। दूसरे दिन ही राजपुरी की
पहाड़ी की बगल के बड़े-बड़े वृक्ष कटकर गिरने लगे। जंजीरे के बुर्ज पर हब्शी
सैनिकों की भीड़ एकत्र हो गयी थी। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उन्हें
लगा मराठों का राजा कहीं पागल तो नहीं हो गया?
उस दिन बहुत से सैनिक, घुड़सवार, सरदार और अधिकारी इस कार्य में जुटे
थे। इनमें कामाठियों और बेलदारों ने बहुत परिश्रम किया। दिनभर परिश्रम करने के
कारण उनका शरीर थक गया था। शम्भुराजा भी दोपहर की कड़ी धूप में समुद्र के
किनारे खड़े थे। 'चलो, उठाओ, ढकेल दो।' ऐसी हिदायत दे रहे थे। कभी कभी
स्वयं भी वे वृक्ष के तने या बड़े पत्थर को ढकेलने के लिए हाथ लगाते थे। शारीरिक
परिश्रम और मानसिक त्रास से शम्भुराजा बहुत थक गये थे। उन्होंने रात को तम्बू के
अन्दर बिस्तर में अपना शरीर झोंक दिया।
बाहर जल रहे अलाव का प्रकाश बहुत दूर तक फैला था। अलाव के पास
बैठे कविराज कलश, दुर्गादास, भायनाक, दादजी देशपांडे, गोविन्दराव काथे सभी
चुप थे। बीच बीच में एक दूसरे की ओर चोर नजरों से देख लेते थे। सारांशतः
शम्भुराजा का जो नया अभियान चल रहा था उस पर उन लोगों का भरोसा नहीं था।
उस समूह में अरबी सूबेदार जंगेखान भी सम्मिलित था। मराठों की चोर नजरें उससे
छिपी नहीं थीं।
"कहाँ रामायण के सपने और कहाँ शरीर को भस्म करने वाली शत्रुओं की
तोपें? दोनों में कोई मेल नहीं।" दादजी बोले।
जंगेखान हँसते हुए बोला, "देखो भाई, जो जाति से ही युद्धवीर होता है,
उसने यदि एक बार टक्कर देना निश्चित कर लिया तो उसके लिए पर्वत क्या और
पानी क्या?"
"खान साहब तुम्हारे लोग भी काम पर गये हैं शायद?" गोविन्दराव ने
पूछा।
"गोविन्दराव, भायनाक! तुम्हारे रामायण में क्या सच है? क्या झूठ है? मुझे
कुछ भी पता नहीं है किन्तु वहाँ पश्चिम में एक जंग बहादुर समुद्र पर सेतु बाँधकर
अपने मकसद में कामयाब हुआ था। इसका मुझे पक्का पता है।"
"कौन? कौन था वह?" बहुत देर से सिर नीचे झुकाए सब की बातें सुन रहे
कवि कलश एकदम उनक' खड़े हो गये
"सिकन्दर! अलेक्झाइंडर द ग्रेट' 'डे हजार वर्ष पहले की बात है। न्यू
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