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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 793 में से

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पृष्ठ 377

अपने बचाव की लड़ाई लड़ रहे थे। किन्तु अब तक हब्शियों की असीम हानि हो
चुकी थी। इतना होने पर भी वे किला छोड़कर जाने के लिए तैयार न थे। क्योंकि
यह अजेय जंजीरा और उसकी कृपा से प्राप्त यह समुद्री हुकूमत हब्शियों के
गंडस्थल के समान था। उसके फूटने से सिद्दी हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाने
वाले थे। इसीलिए उन्होंने अल्लाह और औरंगजेब की शरण ली थी।
इतनी दुर्दशा होने पर भी सिद्दी किला छोड़ नहीं रहा था। यह देखकर
शम्भुराजा बेचैन हो गये। उन्होंने कवि कलश से कहा, "समझ में नहीं आता कि
किस भूत ने घेर रखा है इस किले को ? आधा किला पानी में गिर चुका है फिर भी
सिद्दी न तो आत्मसमर्पण करता है और न किला ही छोड़ता है।"
जंजीरे का किला अजेय है, इसलिए हब्शी कभी भी पराजित नहीं होंगे।
हब्शियों की प्रजा में इस प्रकार का विश्वास दृढ़ हो गया था। यही कारण था कि
कोंकण के लोग हब्शियों से बहुत घबराते थे। लेकिन प्रजा ने जब शम्भुराजा को
हब्शियों की आँखें सफेद करते देखा तो उनमें साहस आ गया और वे बाहर आने
लगे। नादगाँव और नागाँव के लोगों ने शम्भुराजा के पैर छूते हुए कहा, "हमें इन
हब्शियों के बन्धन से मुक्त करायें। हाँ महाराज, यदि कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका
निभानी पड़ी तो हम भी उस गिलहरी की तरह निभाएँगे।"
गाँव के लोग आकर मिले किन्तु अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण
शम्भुराजा बहुत सन्त्रस्त थे। इसी बीच ग्रामीणों के मुख से निकला 'गिलहरी' शब्द
उनके मस्तिष्क मे चक्कर काटने लगा। एकाएक उनके भीतर एक ज्योति फूटी।
बचपन में श्रृंगारपुर के केशव पंडित और रमाजी पंडित से सुनी हुई रामायण की
एक कथा याद आयी। लंका में जाने के लिए प्रभु रामचन्द्र द्वारा वानर सेना के साथ
निर्माण किया गया वह सेतु और थोड़ी थोड़ी रेत लाकर दरारों को भरने वाली वह
गिलहरी याद आयी। शम्भुराजा का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने ताली बजायी।
रात में विचार विमर्श करते समय शम्भुराजा ने प्रश्न किया-
"कविराज, दादजी सामने के इस समुद्र में ही रास्ता तैयार किया जाये तो ?"
"क्या ? क्या कह रहे हैं आप ? कहाँ से महाराज ?"
"समुद्र मे !" शम्भुराजा धीमे स्वर में गरजे।
"क्यों नहीं ? क्या यह असम्भव है? प्रभु रामचन्द्र ने लंका जीतने के लिए
जिस तरह सेतु का निर्माण किया था वैसे इस जंजीरे को पराजित करने के लिए हम
भी सेतु का निर्माण करेंगे।"
शम्भुराजा के सभी सहयोगी घबराये, विचलित हुए, किन्तु राजाज्ञा को कौन
नकार सकता था ? शम्भुराजा अपनी सेना के लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय थे।
शम्भुराजा कवि हृदय ही नहीं सचमुच कवि थे। किन्तु उनकी इस प्रकार की कल्पना
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