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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 793 में से

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पृष्ठ 372

समय शम्भूराजा झट से उठकर खड़े हो गये। उन्होंने म्यान खींचकर तलवार बाहर
निकाल ली। सामने हो हल्ला मचाने वाली भीड़ को शस्त्र दिखाते हुए वे
चिल्लाये- "शान्ति रखो नहीं तो एक-एक के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा।"
महाराज की उस गर्जना से सभी स्तब्ध हो गये। हताश महाराज वहीं पर
घुटनों के बल बैठ गये। जिस प्रकार पुजारी भगवान की मूर्ति को बड़े भक्ति भाव से
हाथ में लेता है उसी प्रकार शम्भूराजा ने कोंडाजी के सिर को अपने हाथ में ले
लिया। दूसरे ही क्षण उन्होंने दिल दहला देने वाली दर्द भरी चीत्कार की-
"कोंडाजी बाबाऽऽ! कैसे हुआ यह ?"
निराश भाव महाराज ने उस आगन्तुक की ओर देखा।
वह वीर पूरी तरह विचलित हो गया था। उसकी दोनों आँखें छलछलाने
लगीं। उन्हें किसी प्रकार सँभालते हुए उद्विग्न व्यक्ति की तरह कहने का प्रयास
करने लगा- "महाराज, आप और कोंडाजी के द्वारा बनाई गयी गुप्त योजना के
अनुसार ही सब कुछ हो रहा था। उस योजना को कार्यान्वित करने के लिए हम
बारह जन हब्शियों के गढ़ में घुसे थे। वहाँ हम सबों ने तेरह-चौदह महीने किस
तरह काटे इसे हमारा जी ही जानता है।"
"अरे, लेकिन यह धोखा हुआ कैसे?" शम्भूराजा ने प्रश्न किया।
"महाराज, कुदरत ने और खुदा ने थोड़ी मेहरबानी कर दी होती तो कल रात
ही जंजीरे के सभी बारूदखाने जलकर खाक हो गये होते। आसमान में उठने वाली
लपटों ने कल रात ही हमारा अभिनन्दन किया होता।"
"लेकिन हमारे कोंडाजी बाबा कितने बली और बुद्धिमान वीर थे!"
"क्या बताऊँ महाराज ? विगत चौदह महीनों हम बारह व्यक्तियों ने अपनी
योजना के सम्बन्ध में रंचमात्र भी संशयात्मक स्थिति नहीं पैदा होने दी। वे सिद्दी
बन्धु और उनकी फौज के सभी कालसर्प पूरी तरह असावधान थे। कोंडाजी ने
आपसे भीषण झगड़ा करके चले आने के बाद बड़ी-बड़ी कहानियाँ सुनायी थीं।
एक नम्बर के बहुरूपी कासिम का बाबा पर इतना विश्वास हो गया था मानो उसे
बाबा के रूप में कई जन्मों का मित्र मिल गया हो। अपनी प्रिय रक्षिता ईरानी सुन्दर
युवती दिलरुबा को कासिम ने कोंडाजी बाबा को समर्पित कर दिया। दिलरुबा भी
बाबा पर जान देने लगी थी। कोंडाजी और ग्यारह जन जंजीरे किसलिए प्रविष्ट हुए
हैं इसका उस स्त्री को पिछले महीने तक कुछ भी पता न था।"
"चलोऽऽ इसका मतलब उसी ने अन्त में धोखा किया।"
"नहीं, नहीं, महाराज, वैसा नहीं...."
"तो फिर?"
"कल रात तक हमारी सारी योजना ठीक थी। जंजीरे के आठ बड़े
बारूदखानों में एक ही समय आग लगाकर उड़ा देने की पूरी तैयारी हो चुकी थी।
370 :: सम्भाजी