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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

से-कम बोलने वाले और फूँक-फेंक कर कदम रखने वाले अण्णाजी आज अपनी
भीतरी बेचैनी रोक नहीं पाये। वे शम्भूराजा की ओर देखते हुए शिवाजी महाराज से
बोले, "महाराज फिरंगी गढ़ाई के रत्नहार बहुत सुन्दर होते हैं। इसीलिए पैसे
भेजकर गोवा से मैंने दो हार मँगवाये थे।"
"कुछ तो हम भी सुन चुके हैं।" महाराज ने कहा।
"परन्तु उनकी गढ़ाई इतनी अच्छी निकली, शम्भूराजा को इतनी अच्छी लगी
कि क्या बताऊँ? उन्होंने उन हारों को अपने पास रख लिया।" अण्णाजी ने स्पष्ट
किया।
अण्णाजी के तीरों के निशाने से शम्भूराजा तनिक भी विचलित न हुए।
उन्होंने तत्काल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की-
"आप इसी क्षण पता करवा सकते हैं। वह चीज मैंने सरकारी रत्नशाला में
जमा की है। उसकी रसीद हमारे पास है।"
अण्णाजी एकदम चुप हो गये। सरकारी लिपिकों के चेहरे भी देखने लायक
हो गये थे।
शम्भूराजा की तरुणाई और उनका चुलबुला स्वभाव उन्हें चुप नहीं बैठने दे
रहे थे। महाराज की ओर देखते हुए उन्होंने कहा-
"पिताजी। आप ही हमेशा सबको बताते रहते हैं कि हमारे कर्मचारियों और
सरदारों को दूसरे राजाओं के वकीलों और दीवानों का एहसानमन्द नहीं होना
चाहिए। इसका परिणाम अपने राज्य के भीतर की कार्यप्रणाली पर होता है, राज्य को
हानि पहुँचती है।"
शम्भूराजा की बात समाप्त होने पर राहुजी सोमनाथ को जोर की खाँसी
आयी। अन्य लोगों की स्थिति भी कुछ विचित्र सी हो गयी। शम्भूराजा की बात पर
बड़े महाराज कुछ नहीं बोले। इससे सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।
दूसरे दिन शाम को अण्णाजी के घर पर शतरंज की बाजी खेली जा रही थी।
राहुजी सोमनाथ को खेल के राजा, ऊँट और हाथी के बदले बाहर के गधे की याद
आयी। सामने एक मोहरा रखते हुए वे बोले, "गधे के कान कभी लम्बे होने से कुछ
नहीं बिगड़ता। लेकिन युवराज के कान लम्बे हो गये तो खतरा उत्पन्न करते हैं।
करो रे करो। कुछ दवा दारू करो। वैद्य को बुलाओ।"
इस बात पर अण्णाजी विषादपूर्वक हँसते हुए इतना ही बोले—"चलता है
राहुजी! अनादिकाल से चलता आया है, कर्मचारी और सैनिक अनेक प्रकार की
कठिनाइयाँ उठाकर राज्य को बढ़ाते हैं। किन्तु थोड़े आराम के दिन आने पर वे जब
खुली हवा खाने के मनसूबे बनाते हैं तो मन को मारना पड़ता है। उस समय तक
सरलता से उपलब्ध सुख भोगने के लिए उत्तराधिकारी नाम के गुंडे राजमहल में
तैयार हो ही जाते हैं। अपने भाग्य में ऐसा ही लिखा होगा तो हम क्या करेंगे?"
32 :: सम्भाजी

"नहीं, नहीं! चाहें तो अपने लेख को लपेट लीजिए। किन्तु इस प्रकार
अनधिकारी व्यक्ति से ऐसा अपमान नहीं होना चाहिए।" गहुर्जी सोमनाथ ने स्पष्ट
शब्दों में कह दिया।
चार
सन्ध्या समय की शीतल वायु मन्द मन्द बह रही थी। शम्भुराजा के महल के पीछे
एक छोटा सा बगीचा था। संभाजी और येसूबाई की गृहस्थी के साथ वह भी
फलता फूलता गया। बगीचे में ही एक पुराना गूलर का पेड था और बेंत का वन
था। उस वृक्ष की एक मोटी टहनी पर पीतल की जंजीरों से बना झूला पड़ा था।
उसी झूले पर युवराज और युवराज्ञी बैठे कुछ बातें कर रहे थे। सामने हिरनों के बच्चे
खेल रहे थे। बीच बीच में गूलर के फल नीचे टपक जाते थे।
युवराज और युवराज्ञी को इस प्रकार की शान्ति बहुत दिनों बाद मिली थी।
येसूबाई ने युवराज को टटोलते हुए गम्भीरता से कहा "राजा को सभी प्रकार के
अधिकार होते हैं। राजा की इच्छा ही अन्तिम आदेश बन जाती है। अपने राज्य की
प्रत्येक उत्तम और सुन्दर वस्तु पर उसी का अधिकार होता है। इसीलिए राजा, यदि
राज्य की यदि कोई सुन्दर युवती मन को भा गयी तो गाय बैल की तरह कभी
भी उसे भगाकर अपने जनानखाने में कैद करके रखने का जुर्म भी करता है। ऐसा
नहीं है क्या?"
"येसू! आप यह क्या कह रही हैं? ऐसे निर्लज्ज अत्याचार केवल यवनों
और सुल्तानों के ही राज्य में होते हैं। शिवाजी महाराज के स्वराज्य में नहीं।"
"युवराज! सच बोल रहे हैं आप?" हँसते हँसते येसूबाई की पुतलियाँ
कठोर हो गयीं—"तो फिर युवराज! महाराज के पुत्र संभाजी राजा द्वारा ऐसा
अत्याचार क्यों किया गया?"
"कौन सा अत्याचार?"
"अण्णाजी दत्तो प्रभुणीकर तो शिवाजी महाराज के एक आधारस्तम्भ हैं।
उनकी लाड़ली बेटी हंसा पर अत्याचार करके आपने कौन सी बहादुरी दिखायी?'
संभाजी राजा जैसा शीघ्र क्रुद्ध हो जाने वाला व्यक्ति भी येसूबाई के
अप्रत्याशित हमले से हड़बड़ा गया। रायगढ़ के परिसर में एक समय शिवराजा
सम्भाजी ३३

१. युवराज शम्भु राजे का बाल्यकाल, पुरन्दर सन्धि, आगरा प्रवास एवं विद्याभ्यास

महाराज की माता जीजाबाई के शब्दों का जो आदर और प्रभाव था, वही
उत्तराधिकार येसूबाई के पास अपने आप चला आया था।
शम्भूराजा से वे एक-डेढ़ वर्ष छोटी थीं। किन्तु, उनके ममतांलु, कर्तव्यपरायण
और सर्वसमावेशक व्यक्तित्व ने एक अलग ऊँचाई प्राप्त कर ली थी। कद से ऊँची,
लम्बोतरे चेहरे वाली, देखने में सुन्दर नाक नक्श वाली, तन्वंगिनी, झुमकेदार नथ
पहनने वाली, उत्साही तरुणी येसूबाई रायगढ़ के अन्तःपुर में आकर्षण का केन्द्र थीं।
शम्भ्रूराजा की सोयराबाई जैसी अनेक मातायें वहाँ रह रही थीं। परन्तु येसूबाई जैसी
चमक और आदर किसी के भी व्यक्तित्व को नहीं मिल पाया था।
संगमेश्वर नगर के पास, कुछ ही कोसों की दूरी पर अन्दर पहाड़ियों में
श्रृंगारपुर की बस्ती थी। वहाँ के सूर्यराव सुर्वे स्वयं को श्रृंगारपुर का शाहंशाह मानते
थे। उनका व्यवहार भी उसी तरह निरंकुश था। दाभोल और संगमेश्वर जैसे बड़े दो
बन्दरगाह उनके अधिकार में थे। अनुमानतः सौ सौ से अधिक बड़े जहाज सूर्यराव
ने बनवाये थे या चुराकर प्राप्त किये थे। रत्नागिरी, दाभोल से लेकर हरिहरेश्वर तक
के समुद्र तट पर उनका शासन था। विशेषरूप से मक्का-मदीना जाने वाले यात्रियों
और विदेशी जहाजों को लूटकर सारी सम्पत्ति हड़प लेना सूर्यराव का मुख्य कार्य
था। यही सूर्यराव येसूबाई के नाना थे।
येसूबाई के पिता पिलाजी शिर्के एक प्रमुख सरदार के रूप में सूर्यराव के
दरबार में सेवारत थे। वे वहीं समीप के कुटरे गाँव के निवासी थे। पिलाजी राव
शिर्के भी शिवाजी महाराज के पराक्रम को वर्षों से सुनते आये थे। किन्तु महाराज ने
जब से स्वराज्य की स्थापना की, तभी से महाराष्ट्र के मुसलमान और मुसलमानों का
पक्ष लेने वाले जागीरदार मराठे उनका घोर विरोध कर रहे थे। ये तथाकथित
जागीरदार एक ओर तो विदेशियों के जूते पोंछते थे और दूसरी ओर जाति और कुल
के आधार पर स्वयं को शिवाजी महाराज से श्रेष्ठ मानते थे। सूर्यराव भी उसी जाति
कुल के थे। शिवाजी महाराज के साथ सूर्यराव का द्वेष इतना बढ़ गया था कि वे
महाराज के विरोध में ऐन मौके पर उनके विरोधी जावलीकर मोरे से जा मिले और
महाराज के विरोध में लड़े थे। सिद्धी और जौहर ने जब पन्हाला पर घेरा डाला था
तब भी सूर्यराव जौहर की सहायता के लिए दौड़े थे।
कुछ साल पहले शिवाजी महाराज कोंकण की लड़ाई के लिए गये थे। तभी
उन्होंने सूर्यराव के सारे अपराध क्षमा करके सूर्यराव को सुधरने का एक अवसर दिया
था। किन्तु अपने स्वभाव के अनुसार सूर्यराव साँप के तरह उन्हीं पर उलट पड़ा।
उसने महाराज के सैनिकों को बहुत कष्ट दिया ही, महाराज के बुलाने पर भी
पालवण में उनके सामने हाजिर नहीं हुआ। सूर्यराव के स्वराज्यद्रोह से महाराज
बहुत क्रुद्ध हुए। एक बार इस संकट को मिटा देने का निश्चय करके महाराज ने
34 • सम्भाजी

श्रृंगारपुर पर आक्रमण किया। इस खबर के मिलते ही सूर्यराव अपनी राजधानी
छोड़कर पास के जंगलों में भाग गया।
सूर्यराव की गद्दारी से सन्तप्त शिवाजी महाराज ने उनके सिंहासन को पैर
की ठोकर से गिरा दिया। संयम का बाँध टूट चुका था। महाराज ने श्रृंगारपुर पर छापा
मारा था। सुर्वे की सम्पत्ति जब्त की जा रही थी। तभी छः-सात साल की गोदू कभी
झरोखे से तो कभी पर्दे के पीछे से बड़े महाराज को बड़े आदर से, भय‌मिश्रित आदर
से देख रही थी। अपने नानाजी का भाग जाना उसे बहुत बुरा लग रहा था। उसके
पिता पिलाजी शिर्के बड़े धैर्य के साथ वहीं पर रुके हुए थे।
सुर्वे की सम्पत्ति की गिनती हो रही थी। कर्मचारी वहाँ के सोने चाँदी के बड़े
बर्तन, सिर तक ऊँचे दीपाधार, नक्काशीदार बड़े बड़े हंडे, कलश आदि सामान बाँधे
जा रहे थे। उसी समय महाराज उन्हें देखने के लिए वहाँ आये। चमकते हुए
दीपाधार और साफ सुथरे सोने चाँदी के बर्तन देखकर महाराज चौंक गये। उन्होंने
कहा, "ऐसी वस्तुएँ राजमहलों में भरी पड़ी मिलती हैं किन्तु ऐसी स्वच्छता,
सफाई, इतना सुन्दर रखरखाव, ऐसी सजावट बिना किसी जानकार और समझदार
स्त्री की देख-रेख असम्भव है।"
"महाराज ! यह जादुई करामात मेरी कन्या येसू की है।"
पिलाजी ने निवेदन किया।
महाराज दूमरे दालान में प्रविष्ट हुए। तभी नौकरों को हिदायत देती हुई छोटी
सी येसू उनको दिखी। वह बड़े आत्मविश्वासपूर्वक खड़ी थी। शीशे के सामान को
बाँधते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए, ऊँचे सामानों को कैसे बाँधना चाहिए,
ऐसी हिदायतें वह नौकरों को दे रही थी।
महाराज धीरे धीरे आगे बढ़े। उन्होंने येसू के मस्तक पर कोमलता से अपना
हाथ रखा। उस हँसमुख, उत्साही, प्रसन्न, स्वच्छता और अनुशासन की आग्रही येसू
को महाराज ने अपनी बाँहों में भर लिया। उन्होंने पिलाजी से कहा, "पिलाजी राव !
आपके ससुर सूर्यराव पर हमें इतना क्रोध आया था कि सारे श्रृंगारपुर को भस्म कर
देने का हमने निश्चय कर लिया था। किन्तु आपकी इस छोटी बच्ची ने हम पर जादू
का असर डाला है। यह सारी सम्पदा तुम अपने पास रख लो। हम तुम्हारे राजमहल
से केवल एक बहुमूल्य चीज लेकर जाने वाले हैं।"
महाराज की बातों से चिन्ताग्रस्त पिलाजी राव को सुखद धक्का लगा।
महाराज ने कृतज्ञता के भाव से पिलाजी राव से कहा, "अपने शम्भूराजा के लिए हमें
एक अच्छी कन्या की तलाश थी। ऐसी सुन्दर और कर्तव्यकुशल लड़की हमें दूसरी
कहाँ मिलेगी ?
पिलाजी राव की आँखों में आँसू उमड़ आये। उन्होंने महाराज के पैर पकड़
सम्भाजी · 35

लिए। उन्होंने कहा, “महाराज! हम पराजित हैं। उससे भी अधिक हम
स्वराज्यद्रोही हैं। आप मेरी बेटी को इतना बड़प्पन क्यों दे रहे हैं? आपके शम्भू के
लिए ऐसी बहुत सी लड़कियाँ मिल जाएँगी।”
“नहीं पिलाजी राव, घर के किसी बर्तन पर जरा सा दाग लगने पर भी
जिसकी जान निकलने लगती है, वही बच्ची कल जब गृहलक्ष्मी बनकर हमारे
महल में आयेगी तो उसके चरण स्पर्श से हमारा राजमन्दिर असली मन्दिर के रूप में
बदल जाएगा।”
उन दो तीन दिनों में बहुत सी घटनाएँ घटीं। शिवाजी महाराज ने येसूबाई
और शम्भूराजा का विवाह तो निश्चित किया ही साथ ही पिलाजी राव और उनके
घर के संस्कार को इतना पसन्द किया कि महाराज ने अपनी कन्या, नानीबाई उर्फ
राजकुँवर की सगाई पिलाजी राव के पुत्र गणेशजी के साथ पक्की कर दी। सूर्यराव
के उद्धत स्वभाव और निरंकुश व्यवहार की छाया पिलाजी राव ने अपने ऊपर नहीं
पड़ने दी थी। पिलाजी राव के नेतृत्व में ही दूर दराज में बसा यह श्रृंगारपुर महाराष्ट्र
की प्रतिष्ठित विद्यानगरी में परिवर्तित हो गया था। तमाम देशों के बहुत से पंडित,
विद्वान, तान्त्रिक, अनेक विद्याशाखाओं के अग्रदूत इस परिसर में अपना मठ बनाकर
या गुफाओं में पनाह लेकर विराजमान थे। पिलाजी राव ने केशव पंडित और रघुनाथ
पंडित जैसे विद्वानों से अपने बच्चों को पढ़ाया था। किन्तु पढ़ाई में गणेशजी की
अपेक्षा येसूबाई की लगन अधिक थी।
कर्तव्यपरायण पिलाजी राव ने येसूबाई के दहेज में हीरे मोतियों से भरी
बोरियाँ रायगढ़ नहीं भेजी थीं। परन्तु केशव पंडित और रघुनाथ पंडित दोनों बन्धुओं
को ससुराल जाती गोद के साथ भेजना नहीं भूले।
रायगढ़ में पाठशाला आरम्भ हो गयी। अन्य बच्चों के साथ छोटी येसू और
शम्भूराजा एक साथ ही पढ़ रहे थे। अपनी धर्मपत्नी समझने के पहले शम्भूराजा ने
येसूबाई को अपनी सहपाठिनी और सहयोगिनी के रूप में मन में बिठा लिया।
आज अचानक येसूबाई ने हंसा की बात छेड़ी तो शम्भूराजा कुछ हड़बड़ा
गये। येसूबाई का राजमहल और शम्भूराजा के हृदय में कुछ विशिष्ट स्थान था।
इसीलिए शम्भूराजा उठ खड़े हुए और बेचैनी से इधर उधर घूमते हुए, हाथ
हिलाकर बोले-
“युवराज्ञी! आप यह कैसे भूल रही हैं कि हम युवराज हैं। यदि कोई युवती
हमारे मन में बैठ गयी तो हम उसके साथ सीधे सीधे विवाह करेंगे और एक रानी
के लिए महल बनवाने के लिए रायगढ़ में जगह की कमी है क्या?”
“मगर युवराज हंसा अण्णाजी पन्त की कन्या थी।”
“किसी की भी होने दो। परन्तु यहाँ तो सुन्दर स्त्रियों का नाम मेरे साथ
36 · सम्भाजी

चिपकाने का सभी को शौक चढ़ा है।"
येसूबाई हल्के से हँसी। अपनी हँसी को दबाते हुए किन्तु बड़े आत्मविश्वास
के साथ कहने लगी—"स्वामीजी के सौन्दर्य की प्रशंसा और वाहवाही की एक से
बढ़कर एक कहानियाँ आजकल सुनने को मिलती हैं। परसों रायप्पा और जोत्याजी
बता रहे थे..."
"क्या?"
"...स्वामी पर भगवान ने सौन्दर्य का सारा वैभव, सब कुछ इस तरह
निछावर कर दिया है कि आजकल स्वामी कहीं शिकार खेलने जाते हैं तो नदी में या
किसी खुली जगह पर स्नान नहीं करते। क्योंकि युवराज का कम कपड़ों में गोरा
चिट्टा शरीर जादू का असर करने लगता है। कलशे लेकर पानी भरने आने वाली
युवतियाँ वहीं पर बेहोश होकर गिर पड़ती हैं। ऐसा चार पाँच बार हो चुका है।"
"युवराज्ञी ! ऐसा लगता है कि आपका भी अपने पति राजा पर पूरा ध्यान
रहता है।"
"मेरे स्वामी में कितने विलक्षण गुणों का समन्वय है। तलवार हो या कलम
दोनों ही स्वामी के वश में हैं। दोनों ही तेजी से चलती हैं। दोनों से संगी-साथी
और शत्रु-मित्र डरते हैं। सौन्दर्य के बारे में तो कहना ही क्या ? एक बार भूल से भी
स्वामी मदन के महल के सामने से गुजरें तो मदनदेवता अपने आसन से तुरन्त खड़े
हो जाएँगे और स्वामी का हाथ पकड़कर अपने साथ भोजन पर बिठाकर सम्मानित
करेंगे।"
"परन्तु येसू, प्रेम करने की ठान लेने पर राजा को कोई कमी रहती है क्या ?
सत्ताधीश से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले ऐसे दुष्ट नामर्दों की कमी है क्या जो
अपनी पत्नियों, जवान बहू-बेटियों का हाथ पकड़कर पीछे के दरवाजे से आ जाते
हैं।
परन्तु एकतरफा प्रेम करके कोई हंसा मेरे लिए पागल हो जाय तो इसमें मेरा
क्या दोष है?"
येसूबाई शम्भूराजा को एकटक देखने लगी। पवन की गति तेज हो गयी।
झूले में लगी जंजीरों की कड़ियाँ करकराने लगीं। उसी समय किसी जरूरी काम से
गोदू पीछे के दरवाजे से आयी। हंसा नाम जब उसके कान में पड़ा तो वह वहीं
दीवार के साथ छिपकली-सी चिपककर अपने प्राण को कानों में रोककर सुनने
लगी।
शम्भूराजा उसी वेग से आगे कहने लगे, "येसू! वह हंसा हर जगह मेरा
पीछा करती थी। देखने में वह चित्र जैसी सुन्दर थी। बहुत ही सात्विक स्वभाव की।
अण्णाजी काका की पुत्री होने के कारण वह छोटी उम्र से ही राजमहल में खेलती-
सम्भाजी :: 37

कूदती थी। बचपन में कभी हमारी पीठ पर भी बैठती थी। लड़कियाँ जवान होने
लगती हैं तो तीन-चार सालों में ही बहुत बड़ी दिखने लगती हैं। एक कीट का
रूपान्तर तितली के रूप में कब हो जाता है, पता ही नहीं चलता। बड़ी होने पर हंसा
को मैं टालने लगा। अण्णाजी पन्त तो हमारे पिताजी के बड़े भाई जैसे हैं।"
"इसका मतलब भविष्य के परिणामों की कल्पना स्वामी को थी?"
"हमें ही नहीं अण्णाजी पन्त को भी हंसा के पागलपन का अनुमान हो गया
था। इसीलिए उन्होंने आनन-फानन में उसकी शादी निश्चित कर दी। शादी के बाद
वह पहली बार पाचाड़ अपने मायके आयी थी।"
उसी समय वसंत पंचमी का दुर्भाग्यपूर्ण त्योहार आया। दोपहर के समय उस
पार के महल में महिलाओं और लड़कियों की हुड़दंग मची थी। उस समय येसू
आप भी वहीं पर थीं। यह पागल लड़की उस भीड़ से बाहर निकल आयी। मैं उस
समय अपने महल में कविताएँ रचने में विभोर था। मैंने पहरेदारों को आदेश दिया था
कि वे किसी को भी अन्दर न आने दें। परन्तु हंसा यह झूठ बोलकर मेरे महल मे
घुस आयी कि मैंने ही उसे बुलाया है। प्रेम के ज्वर ने उसे इतना उन्मत्त कर दिया था
कि पीछे से आकर उसने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। वह अपने प्यासे ओठों से
मेरे मस्तक को चूमने लगी। हमने उसके कान के नीचे एक जोर का तमाचा मारा
और चिल्लाकर कहा, "शर्म नहीं आती तुम्हें? पन्त काका की बेटी हो तुम! किसी
की विवाहिता पत्नी हो तुम!" मेरी बात सुनकर वह पागल की तरह हँसी और
घायल पंछी की तरह हमारे पास आकर मेरा हाथ पकड़कर बोली, "हमारी देह से
जवानी फूटी पड़ रही है। उसका अभिषेक तुम पर कराने के लिए मैं आयी हूँ,
राजा।" मैंने उसको दूर धकेल दिया और उससे कहा, "मूर्ख लड़की! तेरी इस
मूर्खतापूर्ण हरकत से महल में सुरंग लग जाएगी।" तब भी वह जाने को तैयार न
थी, हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। तब मैंने उसे दो तीन तमाचे लगाये। हमने
उससे पूछा, "तुम पागल हो गयी हो क्या?" वह जोर हँसी और बोली, "राजा
प्रेम में जो पंछी अन्धा हो जाता है उसे तो कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। इसीलिए तो
परवाना शमा पर झपट पड़ता है और आग में मिट जाता है।"
अन्त में मैंने हंसा को समझाते हुए पूछा, "तुमको क्या चाहिए?" वह फिर से
हँसने लगी। उसकी हँसी बहुत ही रहस्यमयी और भयानक थी। वह बोली,
"आपकी पौरुषेय सुन्दरता के सामने मुझे मेरा पति एकदम लल्लू लगता है, राजा।
पिछले तीन सालों से मैं आपके लिए मशाल की तरह दिन-रात जल रही हूँ सिर्फ
एक बार मुझे अपनी बाँहों में ले लो।"
वह किसी भी तरह मुझे छोड़ने को तैयार न थी। मेरी कमर को उसने
मगरमच्छ की तरह लपेट रखा था। उसके इस पागलपन और पन्त के महल के साथ
38 :: सम्भाजी

रिश्ते आदि को समझाने का मैंने बहुत प्रयास किया। मैंने यह भी स्पष्ट शब्दों में
कहा कि, “तुम्हारे इस पागलपन का मुझ पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।" मेरा
एक घूँसा उसके मुँह पर लगा। उसके दाँतों से खून टपकने लगा। उसके होंठ का
एक कोना सृज गया। मेरे स्पष्ट अस्वीकार से वह दुखी और घायल हो गयी। हमारे
महल से बाहर निकलते समय उसकी लाल लाल आँखों में आँसू टपक रहे थे।
मुझे देकर आँखें नचाते हुए उसने केवल इतना कहा, “राजा तुम्हारी 'हाँ' का मैं
सिर्फ तीन दिन प्रतीक्षा करूँगी। इसके बाद चौथे दिन आप मेरा शव देखेंगे।"
हमारे महल से हंसा तुरन्त बाहर निकली। उसी समय पन्त काका उसे ढूँढ़ते
हुए आये और अस्त व्यस्त वस्त्रों में मेरे दरवाजे से उसे निकलते हुए देखा। किन्तु
अपने लोगों को हर कठिनाई से बचाने के लिए संकल्पित मेरा मन किसे दिखाई
पड़ता ? येसू रानी इस घटना को मैं किस मुँह से तुम्हें, पिताजी को या पन्त काका को
सुनाता ? इसके अतिरिक्त भविष्य में ऐसा कुछ घटित होगा, इसकी कल्पना मुझे
नहीं थी। चार पाँच दिन बाद लोगों ने पाचाड़ के एक कुएँ में हंसा के शव को देखा।
मैंने भी यह खबर सुनी। मेरी तो बोलती ही बन्द हो गयी। जवानी की बेहोशी में,
प्रेम के पागलपन में हंसा जैसी बहू इतनी सरलता से चली गयी। किन्तु जो अपराध
हमारे हाथ से हुआ ही नहीं उस अपराध का लांछन हमारे कलेजे पर लगाने और
बदनामी की आग में जलाने के लिए यह दुनिया हमारी कल्पित प्रेम कहानी को
गढ़ती बैठी है और आगे भी गढ़ती रहेगी।
पाँच
शम्भूराजा ने रात का भोजन समाप्त किया। शयनकक्ष में जाने से पहले उन्होंने
येसूबाई से सहज ही पूछा, "फिर क्या करना होगा गोदू का?"
"कहाँ जाएगी बेचारी ?" येसूबाई ने कहा, "उसके तो न रही ससुराल और
न रहा मायका।"
"यहाँ पर बहुत से लोग शरण लिए हैं। दास-दासी महल में रहते हैं। वह
भी उन्हीं के साथ रह लेगी।"
वाड़कर का घर महाड़ के समीप था। वैसे वहाँ हर प्रकार की सुविधा थी।
किन्तु गोदू के लिए वहाँ की दुनिया समाप्त हो चुकी थी उसके ससुर और पति
किले में बन्दी होकर सजा भोग रहे थे। गोदू जब घबराई हुई शम्भूराजा के महल में
सम्भाजी :: 39

आयी थी तभी येसूबाई ने उसकी पीठ पर अपना कोमल हाथ रख दिया था। इतना
बड़ा राजमहल छत से लटकती बड़ी-बड़ी झूमरें, कमर तक ऊँचे दीपाधार। यह
महल गोदू को गन्धर्वनगरी के महल जैसा लगा था।
येसूबाई के महल के पीछे उनकी खास दासियों के कमरे थे। उसी में गोदू
की व्यवस्था की गयी थी। किन्तु महल में आने के बाद से ही वह येसूबाई की छाया
बन गयी थी। युवराज्ञी रसोईघर में, आँगन में, तुलसी वृन्दावन के पास, समीप के
बगीचे में जहाँ कहीं भी हों, गोदू हर समय उनके साथ रहती थी। भगवान की पूजा
के लिए फूल सजाकर रखना हो, दूर्वादल को साफ-सुथरा करके रखना हो या दीप
जलाना हो, या जहाँ कहीं भी ऐसी आवश्यकता हो युवराज्ञी को गोंदू की ही याद
आती थी। गोदू भी सदैव उत्साह से तैयार रहती थी। गोदू जवाकुसुम के बड़े फूल
जैसी हँसमुख और तेजस्वी थी। येसूबाई की सौत दुर्गादेवी को भी गोदू से प्यार हो
गया था। राजमहल में हर जगह गोदू का आना जाना बढ़ गया था। अनेक वर्षों से
महल में काम करने वाली दासियाँ और साफ-सफाई करने वाली नौकरानियाँ गोदू
को शक और ईर्ष्या की दृष्टि से देखने लगी थीं। उनका मानना था-
"ये गोदू बहुत साहसी और षड्यन्त्रकारी दिखती है। वे गरीब इसके ससुर
और पति शम्भुराजा पर आरोप लगाने गये थे और कैदखाने में सड़ रहे हैं। और यह
औरत घुस गयी युवराज के महल में। युवराज पर तो पहले ही इसका जादू चल गया
है। पर यह औरत इतनी होशियार है कि येसूबाई के हृदय में भी अपनी जगह बना
ली है। पता नहीं किसी से यह सब कैसे हो पाता है?"
युवराज ने दोपहर को.एक बार फिर पूछा, "येसू! क्या करना है गोदू का?"
"कितना खर्च होता है उसके पेट के लिए? रहने दो बेचारी को यहीं पर।
हमें भी उससे सहायता मिलती है।"
"येसूबाई आपका हृदय बहुत बड़ा है। एकदम आसमान जैसा। परन्तु लोगों
की जबान में जहरीले काँटे होते हैं। उनके भीतर का जहर जबान से टपके बिना नहीं
रहता। फिर सामने चाहे राजा हो या रंक।"
कुछ और दिन इसी तरह बीते।
एक दिन राहुजी सोमनाथ के हाथ एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण थैली लगी।
वाड़कर पिता पुत्र ने बहादुर गड़की और औरंगजेब के दूध भाई बहादुर खान
कोकल्ताश को एक गुप्त सन्देश भेजकर कहा था- "जैसे पहले हमारी बात हुई है
उसके अनुसार हमारी सहायता कीजिए। हमें मुक्त कराकर शाही सेवा का अवसर
दीजिए। अन्ततः वाड़कर का भंडा फूट गया। 'धोखेबाज कैदी' के रूप में उन्हें
लिंगाणा की काल कोठरी में भेज दिया गया। इस बात से गोदू की भूमिका दुनिया
के सामने आ गयी। सभी को विश्वास हो गया कि अपने महाराज पर जो संकट
40 . : सम्भाजी

आया था वह गोदू की बहादुरी से ही टला।
इस सच्चाई का पता लगने पर युवराज और युवराज्ञी ने गोदू की बड़ी प्रशंसा
की। येसूबाई ने कहा, "गोदू तू दिल की इतनी नेक और पाक है कि क्या कहूँ?
तुमने अपनी ससुराल का सुख छोड़कर मराठों के राजा की जान बचाई।"
"युवराज्ञी ! शिवाजी महाराज हम गरीबों के भगवान हैं।" भावना से
अभिभूत गोदू ने अपने साहस के रहस्य को स्पष्ट कर दिया।
येसूबाई ने शम्भूराजा की ओर नजर घुमाते हुए कहा-
"युवराज ! इस लड़की को भगाकर लाने का आरोप इसके परिजनों ने न
लगाया होता तो आज इसकी बहादुरी का स्मरण करके महाराज ने इसके सम्मान में
रायगढ़ पर आनन्द यात्रा निकाली होती।"
दिन बीत रहे थे। अपने सम्बन्धियों के राजद्रोही होने का धक्का अण्णाजी
पन्त को भी लगा था। उन्होंने गोदू को अपने घर ले जाने का पुनः आग्रह किया।
किन्तु गोदू के दृढ़ निश्चय के सामने किसी की कुछ न चली।
बीच में एक बार शम्भूराजा की बहन राणूबाई आक्का साहेब वाई से आयीं।
वे अपने छोटे भाई के घर पर ठहरी थीं। उन्हें भी गोदू बहुत अच्छी लगी। किन्तु
अपनी ससुराल वापस जाने हुए उन्होंने येसूबाई के कान में धीरे से कहा, "लड़की
नक्षत्र जैसी है। गुणवान है। परन्तु जो भी हो है तो पराये घर की। उस पर भी इतनी
स्वस्थ और सुन्दर। तुम किसका किसका मुँह बन्द करोगी, येसू !"
आक्काबाई साहेब के विचार से धीरे धीरे येसूबाई भी सहमत होने लगीं।
एक दिन शम्भूराजा की उपस्थित में येसूबाई ने बात छेड़ी-"गोदू तेरे घर गृहस्थी
का क्या होगा?"
"क्या करना है युवराज्ञी साहेब? पति स्वराज्य द्रोही हो गया, उसे जिन्दगी
भर कैद काटना है। वह धोखेबाज जिन्दा रहे या मर जाय मेरे लिए बराबर है। अब
उसका नाम भी जबान पर क्यों लाना ?"
"फिर से शादी करो। हम लोग शादी के सारे खर्च, दहेज आदि की व्यवस्था
करेंगे।"
"शादी ! शादी करनी हो तो बस एक से ही।" गोदू स्वप्न देखती-सी
बोली।
"कौन है वह ?"
गोदू की नजर यकायक शम्भूराजा के ऊपर से उड़ती हुई खिड़की के रास्ते
आसमान पर पहुँच गयी। आकाश में उसने एक सफेद बादल का गुच्छा देखा। एक
लम्बी और गहरी साँस छोड़ते हुए वह चुपचाप बैठी रही। शम्भूराजा ने बड़े स्नेह से
पूछा, "किसी के प्रेम-व्रेम में फँस गयी है क्या गोदू?"
युवराज के प्रश्न पर गोदू ने न हाँ कहा न ना। वह चुपचाप वैसे ही बैठी रही।
सम्भाजी :: 41

येसूबाई ने गोदू के लिए योग्य रिश्ता ढूँढ़ना आरम्भ कर दिया। इस समाचार से गोदू
एकदम जाग गयी। एक दिन उसने येसूबाई से कहा, "रानी साहेब एक बात कहूँ तो
गुस्सा तो नहीं करेगी न?"
"बोलो।"
"उस पार की पहाड़ी में मेरी एक बुवा रहती हैं। बूढ़ी हो गयी हैं और
अकेली रहती हैं। आप आज्ञा दें तो वहाँ जाकर रहूँ और उनकी सेवा करूँ।"
येसूबाई कुछ रुककर बोलीं, "ठीक है जैसी तेरी इच्छा।"
येसूबाई ने गोदू के लिए बहुत-सा सामान तैयार करवाया। राजा के कर्मचारी
उसके संरक्षक बनकर साथ चले। शम्भुराजा ने सारवट गाँव के पाटिल के नाम एक
पत्र लिखकर दिया। इसी गाँव में गोदू की बुवा रहती थी। शम्भुराजा ने पाटिल को
लिखा था कि गोदू को जिस चीज की आवश्यकता हो उसकी व्यवस्था करें और
खर्च हो उसे बाद में सरकार से माँग लें। येसूबाई से बिदा होते समय गोदू की आँखें
डबडबा आयीं। महल के आँगन में चन्दन के झूले पर बैठे हुए शम्भुराजा ने झूले की
जंजीरों को खींचते हुए कहा, "गोदू तुमने बड़ी बहादुरी से मेरे पिताजी की जान
बचाई है। किसी भी चीज की आवश्यकता हो तो अपना अधिकार समझकर माँग
लेना।"
सिर हिलाकर, राजमहल और शम्भुराजा को एक बार उड़ती नजर से देखकर
गोदू राजमहल से बाहर निकली।
छह
एक दिन बालाजी आवजी चिटणीस खास दरबार के पास बड़े महाराज की प्रतीक्षा
करते बैठे थे। उसी समय शम्भुराजा वहाँ पर आ गये। उन दोनों के अतिरिक्त वहाँ
और कोई नहीं था। एकान्त देखकर बालाजी ने शम्भुराजा से कहा, "युवराज!
आजकल आप अष्टप्रधानों से बहुत सख्ती से पेश आते हैं, ऐसा लोगों का कहना
है।"
"क्यों? बालाजी काका, मुझसे कोई भूल हो गयी है क्या? मैंने स्वराज्य की
हानि वाला कोई कदम तो नहीं उठाया?" शम्भुराजा ने पूछा।
"ऐसा कुछ नहीं है किन्तु..." चिटणीस थोड़ा रुककर स्पष्ट रूप से बोले,
"युवराज! आपकी यह सख्ती आपकी उम्र के लिए शोभाकारक नहीं है। दुनिया के
42 :: सम्भाजी

बुद्धिमान शासक अपने शत्रु से अन्धे होकर भिड़ते हैं किन्तु वही शासक अपने
कर्मचारियों से शत्रुता मोल लेना टालते हैं। इसलिए जरा सँभलकर...''
बालाजी पन्त जैसे अनुभवी व्यक्ति ने ऐसी सलाह दी तो शम्भूराजा शर्मिन्दा
हो गये। यह देखकर चिटणीस उनके पास सरक आये। प्यार से शम्भूराजा का हाथ
अपने हाथ में लेकर बोले, "युवराज! आपको हतोत्साह करने का मेरा उद्देश्य
एकदम नहीं था। पर क्या किया जाय? यह दुनिया ही उल्टी है। योद्धाओं का
रणभूमि में गिरा रक्त वर्षा की हल्की बौछार से धुल जाता है किन्तु लिपिकों द्वारा
कागज पर गिराई गयी स्याही, लिखी गयी बातें, विशेष रूप से गुप्त बातें, अनेक
पीढ़ियों के लिए जानलेवा बन सकती हैं। यह खतरा अपने आप क्यों निमन्त्रित करते
हैं?"
सम्भाजी :: 43

विरह वेदना
एक
राज्याभिषेक के बाद शिवाजी महाराज पहली बार युद्ध के लिए बाहर निकल रहे
थे। कर्नाटक के साथ युद्ध की तैयारी जोरों पर थी। चालीस हजार पैदल और बीस
हजार घुड़सवार सैनिक लेकर शिवाजी महाराज और शम्भुराजा युद्ध के लिए
निकलने वाले थे। दूसरे प्रदेश में इतनी बड़ी सेना के खाने पीने की उत्तम व्यवस्था
भी आवश्यक थी। अस्त्र शस्त्र भी पूरे होने चाहिए थे। इस तैयारी के लिए किले के
नीचे रायगढ़वाड़ी के जंगल में अठारह कारखाने रात दिन काम कर रहे थे।
यन्त्रशालाओं, बारूदखानों और दरबार में बड़ी व्यस्तता थी।
बड़े महाराज के सामने अनेक प्रश्न थे। शम्भुराजा भोर में उठकर दिन
निकलने से पहले ही दरबार में आकर बैठ जाते थे। उनसे भी पहले इनामी रायप्पा
आकर युवराज की राह देखते रहते थे। रात को अपने महल में लौटने के लिए
शम्भुराजा को विलम्ब हो जाता था। येसूबाई और दुर्गाबाई शम्भुराजा की बाट
जोहती रहती थीं।
युवराज बहुत समझदार हो गये थे। बड़े महाराज द्वारा दी गयी प्रत्येक
जिम्मेदारी बड़ी तत्परता से पूरी करते थे। समझदार पुत्र के सुख को महाराज पूरी
तरह अनुभव कर रहे थे। सरदारों और मनसबदारों को अनेक बार वे स्वयं कहते
थे—'इतने छोटे से कार्य के लिए मेरे पास क्यों दौड़ते हो? युवराज से मिलो। वे
सक्षम हैं।' युद्ध में युवराज की महत्त्वपूर्ण भूमिका से उनके यार दोस्त बहुत प्रसन्न
थे। शम्भुराजा की तैयारी के निरीक्षण और सहयोग के लिए महाराज ने बालाजी
चिटणीस को अनेक हिदायतें दे रखी थीं। बालाजी पन्त युवराज के प्रत्येक कार्य पर
बारीकी से ध्यान दे रहे थे। अपने साथियों के साथ घोड़ों को तेज दौड़ाते हुए
शम्भुराजा आसपास के देहातों में जाते थे। चांदोशी गाँव में कोकणदिवा की ऊँची
पहाड़ी की चोटी तक, लगभग चार हजार फीट की ऊँचाई तक दौड़ते हुए चढ़ने की
44 :: सम्भाजी

उनमें होड़ लगती थी। कभी शम्भूराजा अपने साथियों के साथ लिंगाड़े की भयंकर
पहाड़ी पर रातभर रहते थे, कभी भरी हुई कालगंगा नदी में बड़ी-बड़ी जालियाँ
बाँधकर मछलियाँ पकड़ते थे, कभी बाणगंगा की खाड़ी में जाकर अपने मित्रों के
साथ समुद्र में स्नान करने का आनन्द लेते थे। छोटे गाँवों में गरीबों की शादी में
सम्मिलित होकर युवराज लेजिम और गतका खेलते थे। इससे प्रजा युवराज की
बड़ी प्रशंसा करती थी। पहाड़ियों में रहने वाले बहादुर युवक युवराज से मिलते थे
और युवराज उन्हें अपनी सेना में भर्ती करते थे।
एक दिन भोगावती नदी के किनारे रहने वाला जोत्याजी कोल्हापुर से चलकर
आया। उसके मन में यह देखने की बड़ी उत्सुकता थी कि शिवाजी महाराज का पुत्र
कैसा है? युवराज से उसकी भेंट हो गयी। छोटी सी भेंट का ऐसा प्रभाव पड़ा कि
जोत्याजी जन्म-भर के लिए युवराज का मित्र बन गया। एक जंगली सुअर युवराज के
निशाने से छूटकर निकला तो रायप्पा ने उस पर छलाँग दी। सुअर अपने नुकीले दाँतों
से उस पर वार करने लगा किन्तु रायप्पा ने उसकी गर्दन इस तरह दबोचा कि उसके
प्राण ही निकल गये। इसी प्रसंग के प्रभाव से रायप्पा युवराज की सेवा में आ गया
और आजन्म सेवक बना रहा। दरबार हो या मन्दिर, रायप्पा सच्चे मित्र की तरह
युवराज के साथ सदैव बना रहता था। केवल कवि कलश युवराज से उम्र में दस वर्ष
बड़े थे। शेष सभी यार-दोस्त युवराज ने अपनी ही उम्र के अपने आसपास जमा
किये थे। ये लोग अपने लाड़ले युवराज के लिए प्राण निछावर करने के लिए तैयार
रहते थे।
विशेष रूप से राज्याभिषेक समारोह के बाद शम्भूराजा के व्यवहार से कुछ
पंडित, शास्त्री, खानदानी मराठे रुष्ट हो गये थे। बड़े महाराज तक भी यह शिकायत
गयी थी कि "संभाजी तेजस्वी हैं। बहादुर हैं। परन्तु आजकल उनका घोड़ा चारों
दिशाओं में बेलगाम दौड़ने लगा है। युवराज के रूप में उनका मान-सम्मान बचा
नहीं है। कहीं भी—गलियों, घरों, पहाड़ों, जंगलों में भटकते रहते हैं। महार, माँग
कोली, कोष्टी, धनगर, हटकरी जैसे नीच जाति के लोगों में घुले-मिले रहते हैं।"
एक दिन दोपहर को शिवाजी महाराज ने युवराज को अपने पास बुलाया। उस
समय महाराज मन्दिर में बैठे थे। युवराज भयभीत और सहमे हुए वहाँ पहुँचे।
महाराज ने हँसकर कहा, "आप सिर्फ घाटियों में ही अपना घोड़ा बेलगाम करके न
दौड़ाओ। ऐसे सच्चे लोग वहाँ रहते जिन्हें स्वार्थ की तनिक भी हवा नहीं लगी है।
उन्हें जमा करो। वह धन जीवन-भर आपके काम आएगा। शम्भू बेटे, तुम्हारा घोड़ा
सही रास्ते पर दौड़ रहा है। ऐसे ही दौड़ते रहो।"
शिवाजी महाराज की मुख-मुद्रा ऐसी लग रही थी जैसे कहीं दूसरे लोक में
खो गये हों। उनके चेहरे पर ऐसी तेजस्वी आभा दमक रही थी जैसे आग के भीतर
सम्भाजी 45

सोना चमक रहा हो। देव सृष्टि लज्जित हो जाय ऐसा भव्य समारोह राज्याभिषेक
के समय रायगढ़ पर हुआ था किन्तु तब भी शिवाजी महाराज के मुख पर ऐसी आभा
दिखाई नहीं पड़ी थी। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर महाराज भाव विभोर
होकर बोले, "शम्भू बेटा! महाराष्ट्र केवल मराठों का राज्य नहीं है। यह देव या
ब्राह्मण का भी राज्य नहीं है। महाराष्ट्र का अर्थ है महार लोगों का राज्य—परिश्रम
करने वालों का राज्य। यहाँ हर एक किले के लिए एक-एक पत्थर गढ़ने के लिए,
हथौड़े के साथ खेलते हुए जिन्होंने अपनी उँगलियाँ कुचल डालीं, किले के कलश
की नींव में अपनी बलि चढ़ाई, उन सभी का राष्ट्र अर्थात् महाराष्ट्र।"

दो

मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "दत्तो बा, कल आन्ध्रभावाल के कुनबी राजा से
मिले।"
"अच्छा?" मोरोपन्त की बात सुनकर अण्णाजी दत्तो हड़बड़ा गये। बड़े
महाराज मान गये। वहाँ भीषण अकाल पड़ा हुआ है। महाराज ने स्वीकृति दे दी।
महसूल माफी का निर्णय भी उन्होंने तत्काल घोषित कर दिया।
अण्णाजी को यह तरीका अच्छा नहीं लगा। वे क्रोध के आवेश में बोलने
लगे—"मैं उसी समय दरबार में सभी से कहकर आया था कि उस कुनबट सीधे
महाराज के पास मत जाने देना। मन लगाकर खेती नहीं करेंगे, मेहनत नहीं करेंगे।
राज्य के किस किस कोने से ये ग्रामीण लोग दौड़े दौड़े चले आते हैं। उठते बैठते
शम्भूराजा, शम्भूराजा कहकर गला फाड़ते रहते हैं। वसूली और महसूल माफी में
भी युवराज हस्तक्षेप करने लगे तो समझो कि बड़ा कठिन समय आने वाला है।"
अण्णाजी के आवेश पर मोरोपन्त ठठाकर हँसे। इस पर अण्णाजी की भौंहें
और भी तन गयीं। उसी समय मोरोपन्त उन्हें शान्त करते हुए गम्भीर आवाज में
बोले, "राज्य की प्रजा की शिकायतें युवराज को नहीं सुननी चाहिए क्या? क्या
राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में युवराज केवल गोटियाँ खेलते रहेंगे?"
"बोलो मयूरेश्वर! आप सभी युवराज के पक्ष के हो।" अण्णाजी को क्रोध
आ गया।
"अण्णाजी! प्रश्न यह नहीं है कि कौन किसके पक्ष का है। प्रश्न है प्रजा की

46 :: सम्भाजी

शिकायतों को दूर करने का। वह आवश्यक है। "
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "कुछ दिन
पहले विशालगढ़ के कुछ लोग उनसे मिले। एक झरने पर बड़ा बाँध बाँधकर पानी
को घुमाकर खेती के लिए उपयोग में लाने की माँग कर रहे थे। युवराज उसे
उत्साहपूर्वक स्वीकार कर लिए। चलता है अण्णाजी! जब नया खून कार्यभार उठाता
है तो उसकी उड़ान भी फौवारे की तरह उछलती रहती है। हम जैसे बुजुर्गों को दो
कदम पीछे
हटकर उन्हें रास्ता देना चाहिए।"
अण्णाजी दिल खोलकर हँसे। युवराज का उपहास करते कहने लगे—
"अच्छा! तो अब झरनों के बहने की दिशा भी बदल देंगे। कल बहती नदियों पर
बाँध बाँधकर पानी रोकने की बात करेंगे।"
"इतने विस्तार से तो मुझे कुछ नहीं ज्ञात है। किन्तु कर्नाटक की लड़ाई में
शम्भूराजा अनेक नयी कल्पनाओं और योजनाओं को लेकर महाराज के साथ
विचार विमर्श करने वाले हैं।"
"चलता है। हमारे युवराज को कवि कलश के साथ रहकर कविता का रोग
लग गया है। कवियों और बैलों का दिमाग अलग अलग रहता है परन्तु उद्देश्य
दोनों का एक ही होता है। एक कागज के साथ खेलता है तो दूसरा सींग से मिट्टी
उखाड़ता है। सारा श्रम व्यर्थ।"
मोरोपन्त खास दरबार की ओर चले गये। किन्तु अण्णाजी के मस्तिष्क में एक
ही विचार मन्थन चल रहा था। उन्हें चार दिन पहले की बात याद आ गयी। उस
समय दरबार में कार्य में व्यस्त शिवाजी महाराज से मोरोपन्त ने प्रश्न किया था—
"महाराज! कर्नाटक की लड़ाई में शम्भूराजा तो जाएँगे न?"
शिवाजी महाराज ने पेशवा की ओर चौंककर देखा। तब उन्होंने हँसते हुए
उत्तर दिया—"मोरोपन्त अपनी सहायता के लिए भविष्य में तैयार होने वाले युवराज
को राजा युद्ध में नहीं ले जाएगा तो क्या उसको घर में मुर्गी की तरह बन्द रखेगा?"
"युद्ध की तैयारी करने, योजना बनाने और राजकीय कार्य व्यापार की
विभिन्न स्थितियों का ज्ञान युवराज को उचित उम्र में नहीं होना चाहिए क्या?"
बालाजी आवजी बीच में ही बोल पड़े।
बिना पूछे ही बालाजी का बोलना अण्णाजी दत्तो को अच्छा नहीं लग रहा
था। जिस संकट का अण्णाजी को भय था, वही घटित होने जा रहा था। कर्नाटक
युद्ध में युवराज संभाजी को साथ ले जाने के लिए महाराज ने निश्चय कर लिया था।
अण्णाजी के विचार से यहीं से दुष्टचक्र का आरम्भ होने वाला था। हजारों की भीड़
सम्भाजी :: 47

में शम्भूराजा का व्यक्तित्व चमकने वाला था। युद्ध में तलवार भाँजेंगे, बातचीत में
हीरे की तरह चमकेंगे। भविष्य की बात सोचकर अण्णाजी अपना धीरज खो बैठे।
दरबार में उनसे और अधिक रुका न गया। वे तेज गति से बाहर निकले। उनके पाँव
उन्हें सोयराबाई के महल की ओर खींचे लिए जा रहे थे।
अष्टप्रधानों में अण्णाजी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। लम्बे शरीर, मजबूत कद
काठी, साँवले रंग, सिर पर तिरछी पगड़ी, कानों में झूमती मोतियों की बाली,
शानदार चाल वाले अण्णाजी दरबार की शोभा थे। वे संगमेश्वर के कुलकर्णी
परिवार के थे। उन पर शिवाजी महाराज की नजर पड़ी और उनके जीवन में
परिवर्तन आ गया। वे हिन्दवी स्वराज्य के सुरनवीस बन गये। महाराज के निजी
पत्राचार, राजनीति सम्बन्धी कार्य, महसूल की वसूली जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य उन्हीं के
पास थे। स्वराज्य की भूमि व्यवस्था का काम भी वही देखते थे। छोटी से छोटी
त्रुटि भी उनकी नजर से छूटती नहीं थी। अण्णाजी का आतंक इतना भयानक था कि
उनके नाम से ही लिपिक और अधिकारी भय से काँप उठते थे।
अण्णाजी ने स्वराज्य के लिए कुछ कम परिश्रम नहीं किया था। पन्हाला और
रांगणा किला जीतने के लिए अण्णाजी ने स्वयं तलवार चलाई थी। कोंकण प्रान्त में
स्वराज्य की व्यवस्था करने के लिए उन्होंने घोर परिश्रम किया था। उसी श्रम के
पुरस्कार के रूप में महाराज ने दक्षिण कोंकण का दाभोल, राजापुर कुडाल से लेकर
फोंडा तक का सारा प्रशासनिक कार्यभार उन्हीं को सौंप दिया था। रायगढ़ के
राजकीय कार्य व्यापार में अण्णाजी का स्थान एक किले की ही तरह मजबूत था।
संभाजी स्वभाव से मुँहतोड़ जवाब देने वाले व्यक्ति थे। युवावस्था के कारण
अपेक्षाकृत निश्चिन्त भी थे। यहाँ तक तो ठीक था। किन्तु शम्भूराजा के तीखे
स्वभाव की आग जब प्रमुख कर्मचारियों को लगने लगी तो अण्णाजी पूरी तरह
सावधान हो गये। शिवाजी महाराज को मिलने के लिए रायगढ़ जब कोई अंग्रेज,
डच या पुर्तगाली आते थे तो महाराज के साथ ही मोरोपन्त, अण्णाजी और राहूजी
सोमनाथ इन तीनों के लिए भी उपहार ले आना नहीं भूलते थे। यदि द्रव्य थोड़ा भी
कम हुआ तो अण्णाजी बहुत क्रुद्ध होते थे। कभी कभी इस प्रकार वसूली के लिए
अपने कर्मचारियों को चुपके से फिरंगियों की कोठी तक भेज देते थे। दक्षिण कोंकण
से आने वाली वसूली में अनेक बार कम रकम दिखाई जाती थी। अण्णाजी के
कृपापात्र अनेक लिपिक और वरिष्ठ लिपिक तो वहाँ थे ही।
सत्ता भी जब अचार की तरह पुरानी हो जाती है तो अधिकारियों के मुँह में
भी पानी आने लगता है। शिवाजी महाराज को ज्ञात था कि इस प्रकार की गड़बड़ियाँ
राज्य में चल रही हैं। परन्तु प्रमुख लिपिक की उम्र, उनके अनुभव, पहले के कार्य
48 सम्भाजी

उनके पूर्व चरित्र का स्मरण करके वे उस ओर अधिक ध्यान नहीं देते थे। किन्तु
शम्भूराजा के उफनते हुए गर्म खून को ये बातें सह्य न थीं। उन्होंने अनेक लोगों की
चोरी पकड़ी थी। जवानी के जोश में वे अनेक बार अण्णाजी की उम्र का ध्यान नहीं
रख पाते थे। और भरी सभा में बोल देते थे—"देखो आ गये मुफ्त का खाने वाले।
ये आ गये धन का अपहरण करने वाले।'' युवराज के इस प्रकार के स्पष्ट उद्गार को
सुनकर अण्णाजी जैसे अनुभवी लोगों के हृदय को ठेस लगती थी।
संभाजी अठारह उन्नीस वर्ष के हो गये थे। वे दिनोंदिन शक्तिशाली बनते
जा रहे थे। उनके और सुरनबीस अण्णाजी के बीच एक दरार बढ़ती जा रही थी।
हंसा की घटना के बाद से तो युवराज अण्णाजी को कई जन्मों के शत्रु से भी अधिक
दुष्ट लगते थे। अण्णाजी को आया देखकर सोयराबाई आनंदित हो गयीं। दोनों की
राह का काँटा एक ही था। इसी कारण सोयराबाई ने अपने मन की बात अण्णाजी से
कह दी। "अण्णाजी पन्त हमारे बेटे राजाराम यदि शम्भूराजा से उम्र में बड़े होते तो
कितना अच्छा होता?''
राजगद्दी के लिए उम्र का ख्याल अनेक बार नहीं किया जाता, महारानी! गर्भ
में स्थित राजमाता के पुत्र को आदर के कारण राजगद्दी का अधिकारी बनाया जाता है।
ऐसे कितने उदाहरण मैं आपको दूँ? हमारे राजाराम साहेब तो छः सात मास के हो
गये हैं।'' राजाराम के राज्याभिषेक की कल्पनामात्र से ही अण्णाजी दत्तो प्रसन्न हो
गये।
सोयराबाई थोड़ी देर तक चुप बैठी रहीं। फिर कुछ स्मरण करके बोलीं,
"एक बात तो अच्छी हुई। बिना सोंठ के ही कुछ समय के लिए खाँसी चली गयी।
शिवपुत्र कर्नाटक की लड़ाई में जा रहे हैं न? उनकी अनुपस्थिति में रायगढ़ के लोग
कुछ महीने बिना किसी बाधा के बिताएँगे।''
"नहीं, नहीं महारानी जी! आप यह क्या कह रही हैं?'' अण्णाजी
कड़वाहट भरे स्वर में बोले, "कैसे भयंकर सपने आप देख रही हैं इसकी कल्पना
क्या है आपको? इस लड़ाई में स्वयं को महाराज की दृष्टि में महापराक्रमी सिद्ध
करने का अवसर शम्भूराजा बिल्कुल नहीं छोड़ेंगे। उनके मुकुट में यह अतिरिक्त
सम्मान चिह्न होगा। हिन्दवी स्वराज्य के योग्य उत्तराधिकारी बनकर वही घूमेंगे।"
सोयराबाई ने माथे का पसीना अपने पल्लू से पोंछ लिया। लम्बी गहरी साँस
लेकर बोलीं, "पन्त! वायु की दिशा कुछ अच्छी नहीं है।"
"परन्तु इसके लिए जिम्मेदार कौन है? आप या हम?'' सोयराबाई चुप रहीं।
उनके मन में द्वन्द्व चल रहा था। हंसा प्रसंग की जाँच का दायित्व मुझे क्यों दिया
गया! शिवाजी महाराज के करोड़ों मुहरों के ज्येष्ठपुत्र, आम जनता की आशा के
केन्द्र, हिन्दवी स्वराज्य के उत्तराधिकारी शम्भूराजा पर अत्यन्त हीन कोटि का कार्य
संभाजी :: 49

करने का आरोप लगाया गया था। वसन्त पंचमी के त्योहार के दिन राजमहल में
आयी एक ब्राह्मण कन्या के साथ अत्याचार करने का आरोप। वह भी दिन दहाड़े।
वह कन्या भी किसी ऐरे-गैरे की नहीं, अष्टप्रधानों में से तीन क्रमांक के अधिकारी
सुरनबीस अण्णाजी दत्तो की लाड़ली कन्या। सोयराबाई स्मृति भ्रमित हो गयी थीं।
बड़े महाराज द्वारा दिये गये दायित्व को उन्होंने बड़ी निष्ठा से पूरा किया था। मूल
प्रश्न यह था कि जब सभी बहू-बेटियाँ वसन्त पंचमी के उत्सव के लिए अन्तःपुर में
एकत्र थीं तो हंसा उन सभी को छोड़कर दो महलों को छोड़कर तीसरे महल में क्यों
गयी? सोयराबाई ने पहरेदारों, खिदमतदारों, महल की दासियों आदि सभी की
साक्षी ली। दुख से विह्वल हंसा की माँ से भी मिली और उन्हें सान्त्वना दी। जिस
कुएँ में हंसा ने आत्महत्या की थी उसका भी मुआयना किया। अन्त में उन्होंने
शम्भूराजा को उपस्थित होने का आदेश दिया।
आरम्भ में युवराज कुछ भी बोलने के लिए तैयार न थे। अन्त में वे इतना ही
बोले, “माताजी, हमारे हर महल के आसपास इतने मन्दिर हैं, तुलसी के वृंदावन
हैं, इतना ही नहीं हर दरवाजे की चौखट के साथ श्री गणेशजी की मूर्ति रखी है, हर
गवाक्ष में भगवान प्रस्तर की मूर्तियाँ विराजमान हैं। इतने मंगलमय वातावरण और
उसकी पवित्रता को हम कैसे भूल सकते हैं?”
“किन्तु शम्भूराजा! तुम पर जो आरोप लगाया गया है वह सच है, या झूठ?
इसी का स्पष्ट उत्तर दो।”
“आप इस तरह पूछ ही कैसे सकती हैं, माताजी? इधर-उधर हजारों लोगों
की भीड़ में दिन दहाड़े किसी जवान युवती को अपने पलंग पर खींचने वाले क्या
हम कौवों की औलाद हैं? मैं सिंह का बच्चा हूँ, जंगल का तोता हूँ।”
सोयराबाई ने सारे बयान दर्ज कर लिए। साथ में बालाजी चिटणीस तो थे ही।
उन्हीं के द्वारा सारा वृत्तान्त लिखकर तैयार हुआ। जब महाराजा ने सारे विवरण पर
निगाह दौड़ाई तो एक लम्बी साँस लेकर राहत का अनुभव किया। महाराज ने
सोयराबाई से केवल इतना पूछा, “रानी साहब यदि वास्तव में इस प्रकार का पाप
घटित हुआ होता तो आप क्या करतीं?”
बिना एक क्षण रुके और बिना महाराज को देखे सोयराबाई ने कहा,
“युगप्रवर्तक और पुण्यवान पिता ऐसा बदनाम पुत्र देखकर हमें अत्यन्त क्षोभ होता।
मैंने महाराज से अनुरोध किया होता कि ऐसे अपराध के लिए किसी ऊँची पहाड़ी से
खाई में गिरा देने का नया नियम बनायें।”
इस उद्गार से महाराज प्रसन्नतापूर्वक हँसे। सोयराबाई कुछ अचकचा गयीं।
उन्होंने महाराज से पूछा, “दरबार में प्रह्लाद निराजी और काजी हैदर जैसे बड़े-
बड़े न्यायाधीश के होते हुए इस जाँच का कार्य आपने मुझे क्यों सौंपा?”
50 :: सम्भाजी

महाराज मन्द-मन्द मुस्कराते हुए बोले, "एक तो यह घटना ही बहुत
संवेदनशील थी। दूसरे आप शम्भू की सौतेली माँ। इसलिए मुझे विश्वास था कि
आरोपी के प्रति जरा भी सहानुभूति रखे बिना आप कठोरता से पूछताछ करेंगी।
इससे जो सच्चाई होगी वह अन्त में सामने आ जाएगी। इसलिए आपको यह दायित्व
सौंपा।"
वे सारी बातें सोयराबाई को स्मरण हो आयीं। वह अण्णाजी से स्पष्ट शब्दों
में बोली, "हंसा ने एकतरफा प्यार में असफल होने के कारण कुएँ में कूदकर
आत्महत्या की। अपना यह अनुमान मुझे आज भी सत्य लगता है, पन्त।"
"देखिए महारानी जी! शम्भूराजा नाम के युवराज के लिए मेरी बेटी अकारण
अपनी जिन्दगी से हाथ धो बैठी। यही शम्भू हमारे सारे विनाश की जड़ है, यही
शम्भू हमारा घातक है। इस बात को मैं अपनी आखिरी साँस तक नहीं भूल
सकता।"
"फिर मुझे क्या करना चाहिए था, पन्त?"
"महारानी जी, भविष्य में बनने वाली राजमाता के जरीदार वस्त्रों और मंगल
शहनाई की थोड़ी भी याद की होती तो आपके हाथ में आयी न्याय के तराजू की
डंडी सही दिशा में झुक गयी होती।"
बहुत समय तक दोनों में बातचीत होती रही। अन्त में थके हुए अण्णाजी
अलसाते हुए उठे। धीमी आवाज में सोयराबाई से बोले, "देखिए महारानी जी, आप
ही सोचिए। यदि शम्भूराजा कर्नाटक गये तो लड़ाई में बहादुरी दिखाएँगे और
महाराज की नाक का बाल बनेंगे।"
"परन्तु अण्णाजी पन्त, इस सम्बन्ध में महाराज के साथ मेरी बात हो चुकी
है। वे शम्भूराजा को साथ ले जाने का निश्चय कर चुके हैं। उनका मन
बदलना कठिन है।"
"क्यों?"
महाराज ने कहा, "जैसे रात के पीछे दिन दौड़ता है, उसी तरह राजा के साथ
युवराज का युद्ध पर जाना योग्य और आवश्यक है। कल राज्य का कार्य भार युवराज
को ही सँभालना है।"
"अच्छा। इसका मतलब बड़े महाराज ने एक बार उत्तर दे ही दिया है,
तो?"
अण्णाजी ने पहेली सुलझाई। उस समय सोयराबाई की सारी हिम्मत समाप्त
हो चुकी थी। वे पत्थर की मूर्ति जैसी चुपचाप बैठी थीं। उनके समीप सरककर
अण्णाजी बोले, "यदि आपको स्मरण हो तो एक बार महाराज के मन में कर्नाटक
राज्य और रायगढ़ राज्य ऐसे हिन्दवी राज्य के बँटवारे का विचार आया था। आप
सम्भाजी :: 51