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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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पृष्ठ 359

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(रीडैन्ट्स ३१६)
जवाब दादने मैना भाजी बर मैना रा
(माझीका मैनाको उत्तर)
महि नहिँ कुरबी हा परदेसी। ताहि सँझाइ मोर सहदेसी ॥१
सो देखि मैंइकोँ घरहिँ चलावा। गोचर बसद् मैं देखन आवा ।२
महरि देखि हाँ दही फइँ आयउँ । तोर बिरह अस अउर न पायउँ ॥३
सब तूँ सुधि लोर कै पावसु । उइँकै दूध जो बेगों आनसु ॥४
फूल मोर तोरें झार सुखाने। छार भये औ खरि डुँबलाने ॥५
बहुत लोग पुर आवा, महु न बोल सुधि कोइ ।६
बेर्गा आउ तिह बेचैं, औ तहाँ मिरावा होइ ॥७
टिप्पणी-(१) कुरबी—घर-परिवारका व्यक्ति। सहदेसी—समान देशका वासी;
अपने देशका निवासी। यहाँ तात्पर्य अपने गाँव नगरके निवासी
से है।
(२) बसद्—बस्ती।
( ) झार—(स ज्वाल) अग्नि। छार—(स क्षार), राख।
(७) मिरावा—मिलाप भेंट।
४४२
(रीडैन्ट्स ३१७)
रफ्तने मैना बा सहेलियान दर बेर्गों व तलबीदन लोरक मैना रा
(सहेलियोंके साथ मैनाका बेर्गों जाना और लोरकका मैनाको बुलाना)
दिन भा मैनों बेर्गा गई। और सहेली चुनी दस तईँ ॥१
बेचत दूध घर [पर] गई। दही कइँ लोरहिँ महरि बुलाई ॥२
महरी बय मध लोरक देखी। देखत मैनाँ और न लेखीँ ॥३
[—] सार चौदा कइँ बोलसु। सीप सिंदूर चन्दन वन पावसु ॥४
[मागौं*] छाड़ि जो पाछों आवा। चपक चमक धनि पाउ उठावा ॥५