चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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१-कसि । १-ख०-पौगा (पे के नीचे गुच्छे का अभाव है जिससे खेंया
पढ़ा जाता है) । ३-पीहर । ४-कौरव कहें । ५-सँजोरि कराई ।
६-बींग ।
१२२
( रौदीन्हस ६८ )
आमदने मैना पेशि लोरक व गिरिया कर्दैन घ
( लोरकके सामने जाकर मैनाका विलाप )
आगे आइ ठाढ़ि धनि मैनाँ । नीर समुँद जस उलटै नैनाँ ॥१
चुइ-चुइ बूँद परहिं घनहारा । खनु टूटहिं गज मोतिहूँ हारा ॥२
जो तुम्ह है जूझे कै साधा । महिं सू मारि करहु दुइ आधा ॥३
तौ पीछे उठ सूझे आयहू । मोर असीस जीत घर जायहू ॥४
बाफर नारि सो झूझि न बाई । बाबन सिखण्डि रहा लुकाई ॥५
देहु असीस रोषन, मारि भाँठ घर आवहूँ । ६
सोने बेड़ि गड़ाइ, मोतिहूँ माँग भरावहूँ ॥७
टिप्पणी-(१) धनि-स्त्री पत्नी । मैना-लोरक्की पत्नी ।
(२) घनहारा-ठान ।
(५) सिखण्डि-शिखण्डी, महाभारत का एक पात्र जो नपुंसक था ।
(६) रोचन-टीका ।
(७) बेड़ि-पैर का एक आभूषण ।
१२३
( अप्राप्य )
१२४
( रौदीन्हस ८५ ; बम्बई ७ )
रफतन लोरक दर खानये अजबी व खदाना-ये मर्थ कर्दैन ङ
( लोरकका अजबीके घर जाना )
जैस अमीम दत गम पायहु । लारक राठ' जीति घर आयहु ॥१
लारक गा अजबी के धारा । भीतर हुवै सो आइ हँकारा ॥२