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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

42 सारा दिन और रात का प्रथम व अन्तिम भाग (= याम) योगाचार में बिताओ और मध्य
भाग में स्मृतिपूर्वक सोओ, जिससे कोई अनर्थ न हो।
43 कालरूपी अग्नि से संसार के जलते रहनेपर क्या सारी रात सोना उचित है? जब कि हृदय में
रहनेवाले दोष शत्रुओं के समान प्रहार करते हैं, तब कौन नींद के वशीभूत हो?
44 इसलिए, जैसे कि मन्त्र आदि से कृष्ण सर्प को घर से बाहर किया जाता है, वैसे ही ज्ञान
और मन्त्रोच्चारण द्वारा हृदय में रहनेवाले दोषरूपी साँपों को भगाकर तुम्हें सोना चाहिए, ....
.... ।
45 लज्जा (= ह्री) एक आभूषण है और उत्तम वस्त्र है, मार्गभ्रष्टों के लिए अङ्कुश है। ऐसा होनेपर
तुम्हें लज्जा होनी चाहिए; क्योंकि निर्लज्ज होना गुण-हीन होना है।
46 मनुष्य जितना ही लज्जावान् होता है, उतना ही उसका (आदर होता) है, और जो निर्लज्ज
तथा हित-अहित के विवेक से शून्य है वह नर पशु-तुल्य है।
47 यदि कोई आदमी तलवार से तुम्हारी भुजाएँ और अङ्ग काट डाले तो भी तुम्हें उसके प्रति
पाप-भाव का पोषण न करना चाहिए और न उसे अशान्त शब्द ही कहना चाहिए, क्योंकि
ऐसा करने से तुम्हें ही विघ्न होगा।
48 क्षमा के समान कोई तप नही, जो क्षमावान् है उसे शक्ति है, धैर्य है और जो दूसरों का
कठोर व्यवहार नही सह सकते वे न तो धर्म-संस्थापकों के मार्गपर ही चलते हैं और न उनका
त्राण ही होता है।
49 क्रोध को थोड़ा-सा भी अवकाश (प्रश्रय) न दो, यह धर्म और यश को नष्ट करता है, रूप का
शत्रु है, हृदय की अग्नि है; गुणों के लिए इसके समान कोई शत्रु नही।
50 क्रोध प्रव्रज्या के लिए प्रतिकूल है, वैसे ही जैसे कि बिजली की अग्नि शीतल जल के लिए,
किन्तु क्रोध गृहस्थ-जीवन के लिए प्रतिकूल नही है; क्योंकि गृहस्थ इच्छाओं से भरे होते हैं
और इसके सम्बन्ध में कोई व्रत लिए नही होते हैं।
51 यदि तुम्हारें हृदय में अभिमान का उदय हो, तो सुन्दर बालों से विहीन मस्तक को छूकर
अपने काषाय वस्त्र एवं भिक्षा-पात्र को देखकर, और दूसरों के कर्म (= कमांत) और आचरण
का चिन्तन कर, इसे दूर करो।
52 यदि अभिमान-युक्त सांसारिक मनुष्य अभिमान को जीतने के लिए (यत्न करे), तो फिर
उनका क्या कहना, जिनके मस्तक मुड़े हुए हैं, जिन्होंने अपने को निर्वाण (-धर्म) में लगाया
है, जो भिक्षा का अन्न खाते हैं और जिन्होंने अपने को प्रमाणित किया है?
53 कपट और धर्माचरण असङ्गत है, इसलिए कुटिल उपायों का सहारा न लो। छल (कपट)
और छद्म (= माया) ठगने के लिए हैं किन्तु जो धर्म में लगे हुए हैं, उनके लिए ठगना-जैसी
कोई चीज नही।


54 बड़ी-बड़ी इच्छाएँ रखनेवाले को जो दुःख होता है वह अल्प इच्छावाले को नही होता है।
इसलिए अल्पेच्छता का अभ्यास करना चाहिए और विशेषतः उन्हें, जो गुणों की परिपूर्णता
चाहते हैं।
55 जो धनवानों से बिलकुल नही डरता वह कृपणों को देखने से नही डरता; जिसकी इच्छाएँ
अल्प हैं और जो "कुछ नही है" यह सुनकर उदास नही होता, उसी को निर्वाण प्राप्त होता
है।$^{96}$
56 यदि तुम निर्वाण चाहते हो तो सन्तोष का अभ्यास करो, सन्तोष होनेपर ही यहाँ (सच्चा) सुख
मिलता है और सन्तोष ही धर्म है। सन्तुष्ट मनुष्य भूमिपर भी शान्तिपूर्वक सोते हैं और
असन्तुष्ट मनुष्य स्वर्ग में भी जलते रहते हैं।
57 असन्तुष्ट मनुष्य अत्यन्त धनवान् होनेपर भी सदा दरिद्र ही रहता है और सन्तुष्ट मनुष्य
अत्यन्त दरिद्र होनेपर भी सदा धनी ही रहता है। प्रिय विषयों की खोज करनेवाला असन्तुष्ट
मनुष्य, तृप्ति पाने के लिए श्रम करता हुआ, अपने ही लिए दुःख पैदा करता है।
58 जो परम शान्ति-सुख पाना चाहते हैं, उन्हें सुख में इतना आसक्त न होना चाहिए। क्योंकि
इन्द्र और दूसरे देवगण भी संसार के उस मनुष्य से ईर्ष्या (= स्पृह) करते हैं जो केवल शान्ति
(की प्राप्ति) में लगा हुआ है।
59 आसक्ति दुःख का निवास-वृक्ष है; इसलिए स्वजनों में या दूसरों में आसक्ति छोड़ो। इस
संसार में अत्यन्त आसक्त मनुष्य दुःख में वैसे ही फँसता है, जैसे कि जरा-जीर्ण हाथी कीचड़
में।
60 नदी द्वारा-जिसका जल निरन्तर बह रहा हो, अत्यन्त धीरे धीरे ही क्यों नही-काल-क्रम से
चट्टान की सतह घिस जाती है। वीर्य (उद्योग) के लिए कुछ भी दुर्लभ नही। अतः उद्यमी
बनो और अपने भार को न फेको
61 जो मनुष्य अरणियों को रगड़ने में बार-बार रुकता है उनके लिए काठ से आग निकालना
कठिन हो जाता है, किन्तु उद्योग करने से यह आसानी से निकल आती है। अतः जहाँ
परिश्रम है वहाँ सिद्धि है।
62 स्मृति (जागरूकता) रहनेपर दोष काम नही करते (अर्थात् निष्क्रिय हो जाते हैं); स्मृति के
समान न कोई मित्र है, न कोई रक्षक, और स्मृति के नष्ट होनेपर अवश्य ही सब कुछ नष्ट हो
जाता है। अतः शरीर में लगी (= कायगता) स्मृति को शिथिल न करो।
63 जिनका चित्त दृढ़ है वे शरीर के लिए स्मृतिरूपी कवच पहनकर विषयों की रण-भूमि में उन
वीरों की तरह आचरण करते हैं, जो कवच पहनकर शत्रु-व्यूह में निर्भयतापूर्वक घुस जाते हैं।


$^{96}$ - पूर्वार्ध का अनुवाद अनिश्चित कहा गया है।

बुद्धचरित 111

64 इसलिए अपने भावों को सम तथा चित्त को नियन्त्रित रखते हुए संसार के उदय और व्यय
को जानो और समाधि का अभ्यास करो। क्योंकि जिसने मानसिक समाधि प्राप्त कर ली है उसे
कोई आधियाँ स्पर्श नहीं करतीं।
65 जैसे बढ़ते हुए पानी को रोकने के लिए मनुष्य परिश्रमपूर्वक बाँध बनाते हैं, वैसे ही समाधि
को उस बाँध के समान बताते हैं जिसके द्वारा विचाररूपी जल स्थिर किया जाता है।
66 उस बुद्धिमान् मनुष्य (= प्राज्ञ) का, जो सदा अपनी सम्पत्ति (ऐश्वर्य) दान करता है और हृदय
से अत्यन्त धर्माभिमुख रहता है, त्राण होता है; फिर उस भिक्षु के त्राण का क्या कहना, जिसे
घर भी नहीं है।
67 प्रज्ञा, जरा-मरणरूपी महासागर में एक नौका है, मोहान्धकार में मानो एक प्रदीप है, सब
व्याधियों को दूर करनेवाली ओषधि है, दोषरूपी वृक्षों को काटनेवाली तेज कुल्हाड़ी है।
68 इसलिए प्रज्ञा की वृद्धि के लिए विद्या, ज्ञान और भावना का अभ्यास करो; क्योंकि जिसे
प्रज्ञा-चक्षु है, उसे ही वास्तविक दृष्टि है, यद्यपि उस चक्षु में (स्थूल पदार्थों को) देखने की
शक्ति नहीं होती।⁹⁷
69 घर छोड़नेपर भी यदि कोई मनुष्य चित्त के विविध व्यापारों में लगा रहे तो उसका त्राण नहीं
होता; जो लोग परम शम प्राप्त करना चाहें वे इसे जानें और सब व्यापारों से मुक्त हो जायें।
70 इसलिए अप्रमाद में वैसे ही लगो जैसे कि गुरु में और प्रमाद का वैसे ही परित्याग करो जैसे
कि शत्रु का। अप्रमाद द्वारा इन्द्र ने राज्य प्राप्त किया और प्रमाद द्वारा उद्धत असुरों ने
विनाश।⁹⁸
71 करुणामय, सहानुभूतिपूर्ण एवं हितैषी गुरु को जो कुछ करना चाहिए वह सब मैंने किया;
अब अपने को लगाओ और चित्त को शान्त करो।
72 तब, जहाँ कहीं रहो, पर्वतपर या शून्य भवन में या जङ्गल में, धर्माचरण में सदा प्रयत्नशील
(अप्रमत्त) रहो और पश्चाताप न करो।
73 रोगियों की शारीरिक अवस्थाओं का पूरा-पूरा विचारकर, उन्हें उचित ओषधि बताना वैद्य का
काम है; किन्तु उचित समय पर ओषधि-सेवन का उत्तरदायित्व रोगी पर ही है, न कि वैद्य
पर।
74 पथ-प्रदर्शक (= देशिक) द्वारा उत्तम सीधा समतल एवं निरापद मार्ग बताये जानेपर, यदि
सुननेवाले उसपर नहीं चलें और विनाश को प्राप्त हों, तो पथ-प्रदर्शक के ऊपर आदेशरूपी
ऋण शेष नही रहता।


75 तुम लोगों में जिस किसी को दुःख आदि चार सत्यों के मेरे उपदेश के बारे में (कुछ भी
जानने की) इच्छा हो, वह तुरन्त मुझसे विश्वासपूर्वक कहे और अपना संशय दूर करे।”
76 महामुनि द्वारा इस तरह जोरों से कहे जानेपर वे सब संशय-रहित थे और वे कुछ नहीं बोले।
तब अपने चित्त से उनके चित्तों में प्रवेशकर, साधु (= कृती) अनिरुद्ध ने ये वचन कहे:—
77 “हवा का बहना बन्द हो जाय, सूरज सीतल हो जाय और चाँद गर्म, तो भी जगत् में चार
सत्त्वों को मिथ्या प्रमाणित करना शक्य नही।
78 जिसे दुःख कहा गया है वह सुख नही; दुःख के कारण को छोड़कर दुःख पैदा करनेवाला
दूसरा कुछ नही; कारण का निरोध होने से मुक्ति अवश्य होती है और (-निरोध) मार्ग ही
उपाय है।
79 इसलिए, हे महात्मन्, चार सत्यों के बारे में शिष्यों को कुछ संशय नही है; किन्तु जिन्होंने
अपना लक्ष्य सिद्ध नही किया है वे यह सोचकर दुःखी हो रहे हैं कि विनायक जा रहे हैं।
80 इस सभा में, जिसने नये व्रत (नई दीक्षा) के कारण अपने लक्ष्य को नही देखा था, वह भी
आज आपके इस उपदेश से अपने सम्पूर्ण लक्ष्य को वैसे ही देख रहा है जैसे कि बिजली की
चमक में (देख रहा हो)।
81 किन्तु वे भी, जिन्हें कुछ भी करना शेष नही है और जो भवसागर के उस पार चले गये हैं,
यह सुनकर हृदय से चिन्तित हो रहे हैं कि पूर्ण शास्ता विदा हो रहे हैं।”
82 आर्य अनिरुद्ध के ये वचन सुनकर बुद्ध ने, असलियत को जानते हुए भी, इसे फिर से सुना
और अपने शिष्यों के चित्त दृढ़ करने के लिए उनसे स्नेहपूर्वक कहा:—
83 “युगपर्यन्त रहनेपर भी प्राणी का विनाश होता ही है, इसलिए पारस्परिक संयोग या मिलन
जैसी कोई (स्थायी) वस्तु नही है। मैंने अपना और दूसरों का काम पूरा कर लिया है, अब
और जीवित रहने में कोई लाभ नही है।
84 स्वर्ग में और पृथ्वी पर जिन्हें दीक्षित करना था वे सब बचाये गये और मार्गपर लाये गये
(स्रोत-आपन्न किये गये)। इसके बाद मेरा यह धर्म भिक्षुओं की वंश-परम्परा से मनुष्यों के
बीच रहेगा।
85 जगत् के वास्तविक स्वभाव का पहचानो और चिन्तित मत होओ; क्योंकि वियोग
अवश्यम्भावी है। संसार को ऐसा जानकर वैसा यत्न करो जिससे यह फिर कभी न हो।
86 जब ज्ञानरूपी प्रदीप से अन्धकार में प्रकाश हो जाता है और भवों को असार देख लिया
जाता है, तब आयु का निरोध होनेपर वैसे ही संतोष होता है, जैसे कि रोगों के दूर होनेपर।
87 जब द्वन्द्वों सहित छूटनेवाले शरीर नामक भव-सागर की धारा कट रही हो, तब जीवन का
अन्त होनेपर, जैसे कि विपत्ति-प्रद शत्रुओं का नाश होनेपर, किसे आनन्द न होगा।


⁹⁷ - “प्रज्ञामयं यस्य हि नास्ति चक्षुश्चक्षुर्न तस्यास्ति सचक्षुषोऽपि”—सौन्दरनन्द 18.35
⁹⁸ - “अप्रमाद से ही इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ बना”—धम्मपद, 2.10

112 अश्वघोष

88 सब चराचर का विनाश होता है, अतः जागरूक रहो; मेरी निर्वाण-प्राप्ति का समय आ गया
है। विलाप मत करो; ये मेरे अन्तिम वचन हैं।”
89 तब वह श्रेष्ठ ध्यानज्ञ उस समय प्रथम ध्यान में प्रविष्ट हुए और उससे निकलकर दूसरे में,
और इसी तरह उचित क्रम से वह किसी को छोड़े बिना सब (ध्यानों) में प्रवृष्टि हुए।
90 तब सब ध्यानों से, नौ समापत्तियों से ऊर्ध्व (अनुलोम) क्रम से निकलकर, महामुनि फिर
निम्न (प्रतिलोम) क्रम से प्रथम ध्यान में लौट आये।
91 उससे भी निकलकर वह उचित क्रम से चतुर्थ ध्यान में आये और चतुर्थ ध्यान से निकलकर
वह अनन्त शान्ति अनुभव करने को चले गये।
92 तब मुनि का परिनिर्वाण होनेपर, तूफान से प्रतिहत नौका के समान पृथ्वी काँप उठी, और
आकाश से उल्काएँ गिरीं, जैसे दिग्गजों द्वारा फेंकी गई हों।
93 जलावन और धुएँ से रहित आग, हवा से प्रेरित हुए बिना ही दिशाओं को जलाने लगी, जैसे
दिव्य चित्ररथ वन को जलाने के लिए आकाश में दावानल उठा हो।
94 भयङ्कर वज्र, शत शत अङ्गारों से आग उगलते हुए, गिरने लगे, जैसे युद्ध में असुरों को
जीतने के लिए इन्द्रदेव क्रोधपूर्वक उन्हें (वज्रों को) फेंक रहा हो।
95 धूल-भरी हवा लताओं को टुकड़े-टुकड़े करती हुई जोरों से बही, और क्रुद्ध झंझावात से
आहत हुए पर्वतों की चोटियाँ गिर पड़ीं।⁹⁹
96 चाँद का प्रकाश क्षीण हुआ और यह अपनी निष्प्रभ किरणों से वैसे ही शोभित हुआ, जैसे
पङ्किल जल से लिप्त राजहंस, जिसका शरीर छोटे छोटे बेतों (या नरकटों) से घिरा हो।
97 यद्यपि आकाश अनभ्र था और चाँद उगा हुआ था, तो भी अपवित्र अन्धकार चारों ओर फैल
गया था। और उस समय नदियों का जल मानो शोक से खौल रहा था।
98 तब समीपवर्ती शाल-वृक्षों ने झुककर असमय के सुन्दर फूल बुद्ध के शरीर पर... ...
...बरसाये।
99 आकाश में पाँच शिरवाले नाग निश्चल खड़े रहे, वे मुनि को भक्तिपूर्वक देख रहे थे, उनकी
आँखें शोक से लाल थीं, उनके फन बन्द थे, और उनके शरीर नियन्त्रित थे।
*100 मानसिक पीड़ा के कारण उन्होंने गर्म निश्वास छोड़े, किन्तु यह सोचकर कि जगत्
स्वभावतः अनित्य है, उन्हें शोक से विरति एवं जगत से घृणा हो गई।
101 दिव्य लोक में नैष्ठिक धर्म के आचरण में रत राजा वैश्रवण की धर्मसभा ने धर्म में आसक्ति
होने के कारण न शोक किया न आँसू बहाये।
102 पवित्र (=कृती) शुद्धाधिवास देवगण, यद्यपि वे महामुनि का अत्यन्त सम्मान करते थे, शान्त
रहे और मन में क्षुब्ध नही हुए; क्योंकि उन्हें जगत के स्वभाव से घृणा थी।
103 सद्धर्म में आनन्द पानेवाले देवगण, गन्धर्व-राज, नाग-राज और यक्ष अत्यन्त शोक-मग्न और
व्याकुल होकर आकाश में खड़े रहे।
104 किन्तु, मार की हार्दिक अभिलाषा पूरी हुई, उसके दल ने आनन्द में आकर अट्टहास किया,
उच्छल-कूद की, साँपों के समान फूत्कार किया, नृत्य किया और बड़े बड़े मृदङ्ग एवं पटह
बजाये।
105 तब ऋषि-ऋषभ (बुद्ध) के उस पार चले जानेपर संसार उस पर्वत के समान दिखाई पड़ा,
जिसकी चोटी वज्र से कट गई हो, या उस उदास हाथी के समान जिसका मद बन्द हो गया
हो, या उस वृषभ के समान जिसका ककुद नष्ट हो गया हो।
106 उन जन्म-विनाशक को खोकर, संसार वैसा ही दिखाई पड़ा जैसे कि बिना चाँद का
आकाश, या हिम से सूखे कमलों का सरोवर या धन के अभाव से निष्फल हुई विद्या (दिखाई
पड़े)।
॥बुद्धचरित महाकाव्य का “महापरिनिर्वाण” नामक 26वाँ सर्ग समाप्त॥
सत्ताईसवाँ सर्ग
निर्वाण की प्रशंसा
1 तब किसी बड़े देवता ने विमान से अपना शिर कुछ बाहर झुकाकर सर्वज्ञ की ओर एक क्षण
तक देखा और कहाः-
2 “आहो! सब जीव अनित्य हैं और जन्म एवं विनाश के नियम के अधीन हैं, जो जो जन्म लेते
हैं उनके भाग्य में दुःख है। इस प्रकार शान्ति उसी शान्ति से मिलती है, जो अपने पीछे कुछ
छोड़ नही जाती।
3 जैसे कि जल अग्नि को शान्त करता है वैसे ही कालरूपी जल को तथागतरूपी अग्नि शान्त
करनी पड़ी, जिसकी ज्वाला ज्ञान है, जिसका धुआँ यश है, और जिसने जन्मरूपी इन्धन को
निःशेष जला डाला है।”
4 तब श्रेष्ठ ऋषि के समान दिखाई पड़नेवाले दूसरे ऋषि ने, जो स्वर्ग में रहते हुए भी उसके
उपभोगों से आकृष्ट नही हुआ, अर्हत् ऋषि की ओर देखा, जिन्होंने शान्ति प्राप्त कर ली थी;
और गिरिराज के समान धैर्य धारण करते हुए, उसने ये वचन कहेः-
5 “इस संसार में ऐसा कुछ नही जो नाश को नही प्राप्त होता है, जो नाश को नही प्राप्त हुआ
और जो नाश को नही प्राप्त होगा, यह देखकर कि अनुपम गुरु, जिन्होंने परम ज्ञान प्राप्त किया
था और जो उत्तम लक्ष्य (=परमार्थ) को जानते थे, शान्ति को प्राप्त हुए।

⁹⁹- इसका उत्तरार्द्ध चीनी अनुवाद से लिया गया है।
बुद्धचरित 113

6 जीवलोक, जिसकी आँखें मोह से अवश्य ही अन्धी हो गई हैं, इन नेता से वञ्चित हुआ,
जिनकी प्रज्ञा विशुद्ध थी और जिन्हें उत्तम दृष्टि प्राप्त थी; और होश खोकर यह लोक कुमार्ग में
स्थित है।”
7 तब मुनि का निर्वाण होनेपर अनिरुद्ध ने, जिसने संसार को जीत लिया था, जिसकी आसक्ति
नष्ट हो गई थी और जिसने जन्म-निरोध कर लिया था, जगत् को प्रकाश से वञ्चित हुआ
देखकर, शान्तिपूर्वक यों कहा:-
8 “संस्कारों के अधीन रहनेवाले बुद्धिमान् मनुष्य को इस समय विश्वास नही करना चाहिए, जब
कि ऋषिरूपी महापर्वत पर अनित्यता रूपी वज्र के गिरने से चोट पड़ी है।
9 अहो! इस असार अनात्म एवं विनाशधर्मा जगत् को जीवलोक कहते हैं, जिसमें मुनि-दुर्धर्ष
सिंह-दोषरूपी हाथियों को नष्ट करके स्वयं नाश को प्राप्त हुए।
10 जगत् सदा कर्मशील और कामासक्त है; अब किसका हाथ सुरक्षा प्रदान करेगा, जब कि
तथागत भी साधारण भाग्य के अधीन होकर सुवर्ण-स्तम्भ के समान गिर पड़े?
11 मुनिरूपी हाथी ने दोषरूपी वृक्ष को-जिसके बीज छः हैं, अङ्कुर एक, बलि एक, मूल छः,
फल पाँच, शाखाएँ दो, . ., और तना एक-उखाड़ डाला; तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं।
12 सम्राट के समान सभी शत्रुओं को जीतकर, ग्रीष्म ऋतु में मोर के समान आसक्ति-रहित
होकर, घोड़े के समान अपनी यात्रा पूरी कर, (इन्धन-रहित) अग्नि के समान जन्म-मुक्त होकर,
मुनि शान्ति को प्राप्त हुए।
13 जैसे कि वज्र-चालक स्वर्ग-पति प्रसन्न होकर तृप्ति-कर जल-धाराएँ भेजता है, वैसे ही गुरु ने
अपने उपदेश भेजे और प्रखर दीप्ति से पीड़ित वृषभ के समान पृथ्वी पर घूमते हुए उन्होंने
अपने यश से दिशाओं को व्याप्त किया; तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं।
14 वह नर-सूर्य द्रविण-पति वैश्रवण के दल से परिवृत होकर अपने मार्गपर चले, और उन
यशस्वी और तेजस्वी ने नदी (=सिन्धु) के समान सुवर्ण-राशि दी, तो भी उनका अस्त हुआ।
15 आज मुनि का निर्वाण होनेपर जगत् वैसे ही निष्प्रभ है जैसे कि कुहासे से भरी दिशाएँ, जैसे
कि सूरज जिसकी किरणें बादलों से कट रही हों, जैसे कि आहुति पूरी होनेपर घी-रहित आग।
16 कुटिलता (= ग्रन्थि)-रहित होकर उन्होंने सत्य का (सीधा) मार्ग ग्रहण किया और बन्धन
(= ग्रन्थि)-रहित होकर उन्होंने शम-धर्म प्राप्त किया। ऋद्धि द्वारा जीवन-धारण करने में समर्थ
होनेपर भी उन्होंने शरीर नामक दुःख-निवास का परित्याग किया।
17 जैसे सूर्य अन्धकार को दूर करता है, वैसे ही अज्ञान को जीतकर और जैसे जल-धारा धूल को
शान्त करती है, वैसे ही काम को शान्तकर, मुनि......चले गये, घूमते हुए दुःख-चक्र में फिर
कभी लौटने को नही।


18 जन्मरूपी दुःख को नष्ट करने के लिए उनका जन्म हुआ था, शान्ति के लिए जगत् उनकी
शरण में आया, वह उज्ज्वल तेज से चमके और उन्होंने विशिष्ट बुद्धि से प्रकाशित किया।
19 उन्होंने लोगों को श्रेय की ओर भेजा, उन्होंने पृथ्वी को अपने उत्तम गुणों से व्याप्त किया,
उनके यश में वृद्धि हुई।¹⁰⁰
20 अपनी विपुल विद्या के कारण वह निन्दा सुनकर उदास नही होते थे, वह दुखियों से दयापूर्वक
बोलते थे, वह दूषित भोजन ग्रहण नही करते थे और अच्छा भोजन पाकर उन्हें आनन्द नही
होता था।
21 वह अपनी चञ्चल इन्द्रियों को शान्त रखते थे और अपनी मानसिक शक्ति (इच्छा-शक्ति) के
कारण ठीक ही विषयासक्त नही होते थे। दूसरों द्वारा अप्राप्त मार्ग को पाकर उन रसज्ञ ने
नैष्क्रम्य-रस का आस्वादन किया।
22 उन्होंने वह दिया, जो पहले किसी मनुष्य ने नही दिया था और उनके दान, फल की इच्छा से
प्रेरित नही होते थे; उन्होंने अविचल चित्त से राज्य छोड़ा और अपने गुणों से सज्जनों के चित्त
आकृष्ट किये।
23 उन्होंने दृढ़तापूर्वक अपनी चञ्चल आँखों की रक्षा की। वह सदाचार द्वारा अपने चित्त की रक्षा
किया करते थे। उन्होंने श्रेय की रक्षा एवं वृद्धि की। उन्हें किसी उत्पन्न धर्म (वस्तु) की
अभिलाषा नही हुई।
24 बुरे कर्मों को बुरा समझकर उन्होंने छोड़ दिया और श्रेय द्वारा दोषरूपी शत्रुओं से अपने को
मुक्त किया। उन्होंने बुद्धि द्वारा पापों को सर्वथा उन्मूलित किया, तो भी वह (मुनि), अनार्य
अनित्यता के वशीभूत हुए।
25 उन्होंने ठीक-ठीक धर्म का पालन किया और आनन्दपूर्वक उत्तम निश्चय ग्रहण किये; तो भी
वह शास्ता, जिन्हें ज्ञान का खजाना था, उस अग्नि के समान शान्त हो गये, जिनका
इन्धनरूपी कोष समाप्त (उपभुक्त) हो गया हो।
26 गुरु वहाँ पड़े हुए हैं, जिन्होंने आठ के बारे में पाँच के समूह को अच्छी तरह जीता, जिन्होंने
तीन को देखा, जिन्होंने त्रिविध आचरणों का अन्त किया, जिन्हें त्रिविधि दृष्टि थी, जिन्होंने एक
की रक्षा की, जिन्होंने एक को प्राप्त किया, जिन्होंने एक का चिन्तन किया, जिन्होंने सात भारी
चीजों (= गुरूणि ?) का परित्याग किया।
27 उन्होंने शान्ति के लिए मार्ग को प्रकाशित किया और कृपापूर्वक सज्जनों को श्रद्धावान् बनाया।
उन्होंने पापरूपी वृक्षों को काटा और श्रद्धावानों को भवों से मुक्त किया।


¹⁰⁰ _ अर्थ अनिश्चित है।


114 अश्वघोष

28 अपने वचनामृत से उन्होंने जगत् को खूब तृप्त किया और क्षमा द्वारा क्रोध को जीता। उन्होंने
अपनी शिष्यमण्डली को श्रेय में रमाया और श्रेय चाहनेवालों को सूक्ष्म परीक्षण में लगाया।
29 उन्होंने सज्जनों के भीतर धर्माङ्कुर उत्पन्न किया और वह उन्हें आर्य-मार्ग पर ले आये, जिसका
सार है “कारण”; यद्यपि उन्होंने अनायों को लोकोत्तर तरीके से नही सिखाया तो भी उन्हें
सद्धर्म के अतिरिक्त दूसरे मार्गपर नहीं स्थापित किया।
30 काशी में उन्होंने धर्म-चक्र-प्रवर्तन किया और अपने ज्ञान द्वारा जगत् को संतोष का दान
दिया; जिन्हें दीक्षित करना था उनसे उन्होंने धर्माचरण कराया और हमारे हित के लिए हमें
सुख दिया।
31 दूसरों को उन्होंने अदृष्टपूर्व तत्त्व का दर्शन कराया और धर्म पर चलनेवालों को उन्होंने गुणों
से युक्त किया। दूसरे दर्शनों को खण्डनकर, युक्ति द्वारा उन्होंने लोगों को दुर्बोध अर्थ का बोध
कराया।
32 सब कुछ अनित्य और अनात्म है, ऐसा उपदेश देकर और भवों में कुछ भी सुख नहीं है, ऐसा
बतलाकर उन्होंने अपनी यश-पताका ऊँची उठाई और अभिमान के ऊँचे खम्भों को उलट
दिया।
33 निन्दा से उनके चित्त में क्षोभ नहीं हुआ और किसी भी बात में उन्हें सांसारिक प्रवृत्ति की
इच्छा नहीं हुई........।
34 स्वयं पार होकर उन्होंने डूबते हुए लोगों को पार किया; स्वयं शान्ति प्राप्तकर उन्हें शान्ति दी,
जो क्षुब्ध थे; स्वयं मुक्त होकर उन्हें मुक्त किया जो बँधे हुए थे; स्वयं प्रकाश पाकर दूसरों के
मोहान्धकार को प्रकाशित किया।
35 न्याय एवं अन्याय को जाननेवाले महामुनि जगत् को सदुपदेश से अनुगृहीत कर चले गये,
जैसे कि आपत्काल में, जब कि जीव अन्याय-मार्गपर चलते हैं और उसी में प्रसन्न रहते हैं,
धर्म चला जाता है?
36 संसार की दृष्टियों (मतों) को जीतकर भी, वह सजल मेघ के समान, पहाड़ पर के जङ्गल के
समान, गौरवशाली वृद्ध पुरुष के समान और दीप्तिमान् युवक के समान, संसार की दृष्टि को
आकृष्ट करते हुए चले।
37 ........वह परम शान्ति के मार्गपर चले, और श्रद्धावान् जगत्, जिसने उन्हें शान्ति प्राप्त करते
देखा, आज उस स्नेही पुरुष के समान है जो पितृ-विहीन हो गया हो।
38 मार भी, जिसने अपने दल-बल के साथ मुनि को नष्ट करने के लिए प्रचण्ड क्रोध किया था,
उनका मुकाबला न कर सका; तो भी उन्हें नष्ट करने के लिए प्रचण्ड क्रोध करनेवाला मार
आज मौत से मिलकर उन्हें गिराने में समर्थ हुआ।

39 सब जीव जिनके लिए भव-चक्र का भय अबतक दूर नहीं हुआ है, देवताओं के साथ एकत्र
हुए हैं और दुःख से अभिभूत हैं; क्योंकि शोक के परे जो उत्तम मार्ग है, वह उन्हें प्राप्त नहीं
हुआ है।
40 सब जीवों को आलोकित करते हुए उन्होंने जगत् को ऐसे देखा, जैसे दर्पण में प्रतिबिम्बित हो
और अपनी दिव्य श्रवण-शक्ति से उन्होंने दूर एवं निकट के, स्वर्ग तक के भी, सब शब्द
सुने।¹⁰¹
41 वह आकाश के नक्षत्र-प्रासाद पर चढ़े, पृथ्वी में बिना किसी बाधा के प्रविष्ट हुए, पानी पर
बिना डूबे हुए चले और अपने शरीर से उन्होंने विविध रूप पैदा किये।
42 उन्हें अपने बहुत-से (पूर्व-) जन्म याद थे, जैसे कि यात्री को मार्ग के विविध विश्राम-स्थल
याद रहते हैं और उन्होंने अपने चित्त से दूसरों के मानसिक व्यापारों को (=मनः प्रचारान्)
जाना, जो इन्द्रियों की बोध-शक्ति के क्षेत्र से परे हैं (अर्थात् इन्द्रियों द्वारा नहीं जाने जा
सकते)।
43 वह सब के साथ समान व्यवहार करते थे और सर्वज्ञ थे, उन्होंने सब आस्रवों (चित्त-मलों) को
काट डाला और सब कार्य को पूरा किया, ज्ञान द्वारा उन्होंने दोषों को छोड़ा और ज्ञान-तत्त्व
प्राप्त किया, तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं।
44 उन्होंने उन लोगों को दीक्षित किया, जिनके चित्त पटु थे और मन्द चित्तों को धीरे-धीरे पटुता
की ओर प्रेरित किया। धर्म-ज्ञान द्वारा उन्होंने उन लोगों से पाप छुड़वाया। अब अमृत प्राप्त
करने का धर्म कौन बतायेगा?
45 उत्पीड़ित और निराश जगत् की शान्ति के लिए कौन धर्म प्रदान करेगा? अपना कार्य पूरा कर
कौन दयालु दूसरों को दोष-जाल काटेगा?
46 भवचक्र के महासागर में डूबे हुए जगत् की शान्ति के लिए उत्तम ज्ञान कौन बतायेगा?
अज्ञान-मग्न संसार के सुख के लिए उत्तम-ज्ञान कौन बतायेगा?
47 उन संसारज्ञ के बिना यह संसार, प्रकाश-रहित दिवाकर के समान है या प्रवाह-रहित नदी
(=सिन्धु) के समान या उस राजा के समान, जिसका राज्य नष्ट हो गया हो।
48 उन नर-श्रेष्ठ के बिना यह संसार बुद्धि-रहित विद्या के समान, विवेक-रहित परीक्षण के समान,
प्रताप-रहित राजा के समान, क्षमा-रहित धर्म के समान, होकर भी नहीं है।


¹⁰¹ - 40-43:-40-42 में अभिज्ञाओं का वर्णन है और 43 में आस्रवक्षयज्ञान का;
विशेष विवरण के लिए देखिए-अभिधर्मकोष 7.42

बुद्धचरित 115

49 सुगत को खोकर संसार, सारथि द्वारा परित्यक्त रथ के समान, या कर्णधार द्वारा परित्यक्त नाव
के समान या सेनापति द्वारा परित्यक्त सेना के समान, या नायक द्वारा परित्यक्त काफ़िले
(=सार्थ) के समान, या वैद्य द्वारा परित्यक्त रोगी के समान है।
50 आज निर्वाण चाहनेवालों का दुःख वैसे ही है जैसे कि शरद् ऋतु में बिना बादल का
आसमान जो चाँद से सूना हो, जैसे कि आकाश जिसमें हवा नहीं बह रही हो, जैसे कि उन
लोगों का दुःख जो जीवित रहना चाहते हों (किन्तु मर रहे हों)।”
51 यद्यपि वह अर्हत् था, जिसने अपना अच्छा काम पूरा कर लिया था, तो भी जन्म (जीवन,
संसार) की बुराइयों तथा गुरु के गुणों के बारे में उसने बहुत कुछ कहा; क्योंकि वह गुरु के
प्रति कृतज्ञ था।
52 जो निष्काम नहीं हुए थे उन्होंने आँसू बहाये और भिक्षुओं ने धैर्य खोकर शोक किया; किन्तु
जिनका (भव-) चक्र पूरा हो गया था उन्होंने सोचा कि जगत् मरणशील (व्ययधर्मा, नाशवान्)
है और वे आत्मसंयम से विचलित नहीं हुए।
53 तब समाचार सुनकर, मल्ल लोग विपत्ति के बोझ से दबे हुए यथासमय तेजी से निकल आये
और बाज की शक्ति से अभिभूत बगलों के समान वे कष्टपूर्वक बोले, “हा! त्राता!”
54 जब उन्होंने मुनि को प्रकाश-रहित सूर्य के समान वहाँ पड़ा हुआ देखा, तब मन के महा-
अन्धकार के कारण वे रोये और भक्ति-वश ऊँचे स्वर से उन्होंने विलाप किया, जैसे सिंह के
द्वारा गवांमति के मारे जानेपर गाय-बैल (रोते बिलखते हैं)
55 धर्म-गुरु का निर्वाण होनेपर जिन लोगों की आँखें आँसुओं से अभिभूत थीं और जो लोग
अपने अपने विश्वास (पंथ) एवं स्वभाव के अनुसार शोक कर रहे थे, उनमें एक अत्यन्त
तेजस्वी एवं धर्म-रत पुरुष था, उसने ये वचन कहेः—
56 “जिन्होंने सोये हुए जगत् (जीव-लोक) को जगाया, अब वह अन्तिम शय्या पर पड़े हुए हैं।
धर्म की मूर्ति, यह पताका, गिरी हुई है, जैसे कि उत्सव का अन्त होनेपर इन्द्र की पताका
(गिर पड़ती है)।
57 तथागतरूपी सूर्य ने बुद्धत्वरूपी तेज से, उद्योगरूपी गर्मी से, और ज्ञानरूपी सहस्र किरणों से,
अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर किया; अब अस्त होकर इस (सूर्य) ने संसार में फिर अन्धकार
फैला दिया।
58 अब जगत् का नेत्र निष्ठुरतापूर्वक बन्द हो गया, जिसने अतीत अनागत और वर्तमान को
देखा; बाँध निष्ठुरतापूर्वक टूट गया, जिसने दुःखरूपी महासागर की .... तरङ्गों से हमें
बचाया।”
59 इस तरह वहाँ कुछ लोगों ने दीनतापूर्वक विलाप किया, दूसरों ने रथ के घोड़ों के समान
झुककर शोक किया, कुछ लोग रोये, दूसरे भूमि पर पड़े रहे। प्रत्येक आदमी ने अपने स्वभाव
के अनुसार आचरण किया।
60 तब रोते हुए मल्लों ने बड़े बड़े हाथियों की सूड़ों के सदृश भुजाओं से मुनि को यथासमय एक
नई बहुमूल्य एवं सुवर्ण-खचित पालकी (=शिविका) पर रक्खा।
61 तब समयोचित विधि से उन्होंने भाँति भाँति की मनोहर मालाओं एवं अति उत्तम सुगन्धों से
उनका सम्मान किया और फिर स्नेह एवं भक्ति से उन सबने पालकी पकड़ी।
62 तब कोमलाङ्गी कुमारियों ने, जिनके नूपुर बज रहे थे, अपने ताम्रवर्ण हाथों से उस (पालकी)
के ऊपर एक बहुमूल्य वितान धारण किया, जो बिजली की चमक से उज्ज्वल बादल के
समान जान पड़ा।
63 उसी प्रकार कुछ लोगों ने श्वेत मालाओं से युक्त छत्र पकड़े, और दूसरों ने सोने से मढ़े सफेद
चँवर डुलाये।
64 तब वृषभ की-सी लाल आँखोंवाले मल्ल पालकी को धीरे-धीरे ले जाने लगे, और श्रुति-सुखद
तूर्य आकाश में बजने लगे, जैसे वर्षा-ऋतु में बादल गरज रहे हों।
65 दिव्य कुसुम, कमल और भाँति-भाँति के फूल आसमान से गिरे, मानो दिग्गजों से प्रकम्पित
चित्ररथ-वन के वृक्षों द्वारा (वे फूल) गिराये गये हों।$^{102}$
*66 ऐरावत से उत्पन्न बड़े-बड़े हाथियों ने मणिमय भीतरी भागवाले कमल और जल-कण-वर्षा...
...मन्दारव फूल बरसाये।
*67 तब गन्धर्वों की रानियों ने, जिनके शरीर आनन्द-मुहूर्त के लिए उत्पन्न हुए थे, लाल चन्दन
को मिटाकर, श्वेत वस्त्र फेंके, जो लीलापूर्वक सजाये गये थे।
68 चञ्चल पताकाओं को ऊपर उठाये हुए और सब प्रकार की मालाएँ चारों ओर बिखरते हुए, वे
पालकी (=शिविका) को मङ्गल के लिए (=शिवाय) मङ्गलमय (=शिवेन) मार्ग से सङ्गीत के
साथ-साथ ले गये।
69 मुनि की दिव्य (पारमार्थिक) शक्ति के कारण सौ-सौ बार प्रणाम करते हुए और उनकी मृत्यु
पर रोते हुए, मल्लों ने भक्तिपूर्वक पालकी ढोई और इस प्रकार इसे वे नगर के मध्य भाग से ले
गये।
70 नाग-द्वार से बाहर होकर उन्होंने हिरण्यवती नामक नदी पार की और मुकुट नामक चैत्य के
नीचे उन्होंने उनके यश के अनुरूप एक चिता बनाई।
$^{102}$. पाद 2-4 की तुलना सौन्दरनन्द दो 53 के पाद 2-4 से कीजिए-
“...पुष्पवर्षं पपात खात्।
दिग्वारणकराधूतान्नानाच्चैत्ररथादिव ॥”
116 अश्वघोष

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:


[बायाँ स्तम्भ]

71 तब उन्होंने चिता के ऊपर सुगन्धित वल्कलों, पत्तों, अगुरु, चन्दन और एलगज का ढेर लगा
दिया और शोक से साँपों के समान लम्बी साँसे लेते हुए, चञ्चल आँखों से मुनि के शरीर को
उसपर रख दिया।$^{103}$
72 तब यद्यपि उन्होंने प्रज्वलित दीप को तीन बार उसमें लगाया, तो भी महामुनि की चिता में
आग नही लगी, जैसे क्लीव राजा की, .... ....., राज्य-लक्ष्मी अग्नि ग्रहण नही करती है।
73 काश्यप, विशुद्ध चित्त से भावना करते हुए, मार्ग होकर आ रहा था और भगवान् के पवित्र
अवशेषों को देखने की उसकी इच्छा-शक्ति के ही कारण आग नही लगी।
74 तब उस समय गुरु को देखने की इच्छा से शिष्य शीघ्र ही आ गया और जैसे ही उसने
मुनिवर को प्रणाम किया कि अग्नि स्वयं प्रदीप्त हो उठी।
75 अग्नि से मुनि के शरीर के चर्म, मांस, बाल और अवयवों को, जो पापों से नही जले थे, जला
डाला; किन्तु घी और जलावन की (पर्याप्त) मात्रा तथा हवा के रहनेपर भी यह हड्डियों को नही
जला सकी।
76 तब उचित समय पर उन्होंने मृत महात्मा की हड्डियों को उत्तम जल से शुद्ध किया और मल्लों
के नगर में सोने के घड़ों में उन (हड्डियों) को रखकर, उन्होंने प्रशंसा के स्तोत्र गाये:- $^{104}$
77 “कलशों में उत्कृष्ट महाधातु है, जैसे कि महापर्वत की मणिमय धातु हो, और ये धातुएँ अग्नि
से नष्ट नही हुईं, जैसे कि स्वर्ग में देवेन्द्र (ब्रह्मा) का धातु (कल्पान्त की अग्नि से नष्ट नही
होता)।$^{105}$
78 ये मैत्रीमय तथा कामाग्नि से नही जल सकने योग्य हड्डियाँ (= अस्थि) उन (तथागत या
हड्डियों) की भक्ति के प्रभाव से रक्खी गई हैं, और शीतल होनेपर भी हमारे हृदय को गर्म कर
रही हैं।
79 जिन्होंने इच्छा को जीता और जो संसार में अद्वितीय थे उनकी हड्डियाँ, उनकी पारमार्थिक
शक्ति के कारण, विष्णु के (वाहन) गरुड़ द्वारा भी नही ढोये जा सकते, तो भी हम मानव उन्हें
ढोते हैं।
80 अहो! संसार के नियम का प्रभाव निष्ठुर है और इसकी शक्ति के वशीभूत वह भी हुए, जिनकी
शक्ति धर्म पर थी और इसलिए, जिनका यश सारी सृष्टि में व्याप्त हुआ उनके ये शारीरिक
अवशेष इन घड़ों में रक्खे जाते हैं।
81 उनकी दीप्ति दूसरे सूर्य की दीप्ति के समान थी और इससे उन्होंने पृथ्वी को प्रकाशित किया।
उनके शरीर का रङ्ग सुनहला था, तो भी अग्नि ने केवल बची हुई हड्डियों को ही छोड़ा है।


पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes):
$^{103}$ - एलगज = इलायची या दालचीनी।
$^{104}$ - “घड़ों में” बहुवचन है, एकवचन होना उचित था।
$^{105}$ - ब्रह्मा का धातु = ब्रह्मा का पद।


[दायाँ स्तम्भ]

82 मुनि ने दोषों के बड़े बड़े पर्वतों को विदीर्ण किया, और जब उनपर दुःख आया, तो उन्होंने
धैर्य नही छोड़ा; उन्होंने सब दुःख का निरोध किया, तो भी अग्नि ने उनके शरीर को जला ही
डाला।
83 युद्ध में मल्ल दुश्मनों को रुलाते हैं, अपने आश्रितों के आँसू पोछते हैं, और प्रियजन के लिए
भी आँसू बहाने से विरत रहते हैं, तो भी इस समय मार्ग पर आँसू बहाते हुए वे शोक कर रहे
हैं।”
84 अभिमान एवं बाहुबल होनेपर भी उन्होंने विलाप किया और नगर में ऐसे प्रवेश किया, जैसे
जङ्गल में और वीथि-वासियों (नागरिकों) द्वारा धातुओं की पूजा हो जानेपर, उन्होंने उनकी
पूजा के लिए एक उज्ज्वल महल बनाया।
॥बुद्धचरित महाकाव्य का “निर्वाण की प्रशंसा” नामक 27वाँ सर्ग समाप्त॥
अट्ठाईसवाँ सर्ग
धातु-विभाजन
1 कुछ दिनों तक उन लोगों ने विधिवत् समुचित रीति से धातुओं की पूजा की; तब उन धातुओं
को लेने के लिए उस नगर में सात पड़ोसी राजाओं के दूत क्रम से आये।
2 तब यथासमय उनकी बात सुनकर मल्लों ने अभिमान-वश और धातुओं के प्रति भक्ति होने के
कारण उन्हें नही देने का निश्चय किया, बल्कि युद्ध करना पसन्द किया।
3 तब उनका उत्तर जानकर सातों राजा, सात मारुतौं के समान, कुश के नाम से विख्यात उस
नगर में अत्यन्त वेगपूर्वक अपनी सेनाओं के साथ आये, जो बढ़ती हुई गङ्गा की धारा के
समान थीं।
4 तब उन राजाओं के घोड़ों का शब्द सुनकर नगर-निवासी जङ्गल से शीघ्रतापूर्वक नगर में घुसे
गये, उनके चेहरे भयभीत थे ।
5 तब राजाओं ने दूरवर्ती वनों में हाथियों को बाँधकर नगर को घेर लिया और उचित-रीति से
व्यूह-रचना कर अच्छे मल्लों के प्रतिकूल आचरण किया।
6 तब वह नगरी, शोकाकुल स्त्री के समान, छत्ररूपी भुजाओं को ऊपर फेंककर और चँवररूपी
सुन्दर एवं लम्बी पपनियों से द्वाररूपी आँखों को बन्दकर, शोक-मग्न हो गई।
7 जब सातों राजा एककार्य होकर अपने प्रताप से चमकने लगे, तब पृथ्वी आकाश के समान
भयङ्कर हो गई, जिसमें सातों ग्रह एक साथ ही एक ही समय चमक रहे हों।
8 तब स्त्रियों की भी नाकें मदस्रावी हाथियों की गन्ध से, उनकी आँखें हाथियों की सूँड़ों द्वारा
उड़ाई गई धूल से, और उनके कान घोड़ों हाथियों एवं दुन्दुभियों की ध्वनि से आक्रान्त हुए।
9 घेरे में चारों ओर युद्ध ही दिखाई पड़ता था, द्वार हाथियों और घोड़ों से घिर गये ।


बुद्धचरित 117

10 तब डरे हुए नगर-निवासियों ने साहस करके घबराहट छोड़ी और वे प्राकारों पर एकत्र हो गये;
उनकी बर्चियां तलवारें और तीर शत्रुओं पर बाज के समान चमक रहे थे।
11 कुछ लोग उत्तेजित होकर गरजे, वैसे ही दूसरों ने एकत्र होकर शङ्ख फूँके। कुछ लोग इधर
उधर तेजी से गए, वैसे ही दूसरों ने अपनी तेज तलवारें चमकाईं।
12 तब मल्लों को विजय-प्राप्ति के लिए लड़ने को तैयार तथा मल्लों (पहलवानों) के समान गरज
गरजकर अपना अपना नाम बताते देखकर, उन योद्धाओं की पत्नियों ने एक ही साथ उनके
चित्त ओषधि और पुरस्कार तैयार किये।
13 योद्धाओं की काँपती हुई स्त्रियों ने अपने पुत्रों को कवच पहनाये, जो युद्ध के अग्रभाग में जाना
चाहते थे, और उन्होंने उनके लिए मङ्गल-कर्म किये, उन (स्त्रियों) के मुख उदास थे और आँसू
अनियन्त्रित।
14 हरिणों के समान अधोमुख अन्य स्त्रियों ने अपने अपने पति के पास जाकर उस धनुष को
पकड़ रखा, जिसे वह लेना चाहता था और रणोन्मुख वीर को देखते ही (उनके पग) रुक गये
और वे न तो आगे ही गईं और न स्थिर ही खड़ी रहीं।
15 जब राजाओं ने मल्लों को इस तरह सुसज्जित एवं घड़े में बन्द साँपों के समान युद्ध के लिए
निकलते देखा, तब उन्होंने युद्ध करने का निश्चय किया।
16 द्रोण नामक ब्राह्मण ने रथ हाथी घोड़े और पैदल सेना को उत्तेजित और युद्ध के लिए पूरा
तैयार (कृतसङ्कल्प) देखा, और अपनी विद्वता एवं प्रेमपूर्ण दया के कारण उसने ये वचन
कहे:-
17 “युद्धस्थल में आप तीरों से शत्रुओं के क्रोध और जीवन को शान्त कर सकते हैं, किन्तु किलों
में रहनेवालों के साथ आप आसानी से वैसा नहीं कर सकते, उन शत्रुओं के साथ तो और भी
नहीं जिनका चित्त (= कार्य) एक है।
18 यदि आप घेरा डालकर शत्रुओं को जीत भी लें, तो क्या दृढ़चित्त होकर उन्हें उन्मूलित करना
तथा निर्दोष नगर-निवासियों को घेरे में डालकर हानि पहुँचाना धर्मसङ्गत है?
19 जैसे कि बिल में घुसते समय कृष्ण सर्प रास्ते में मिलकर एक दूसरे को काटते हैं, वैसे ही घेरा
डालने से या तो आपकी एकान्त (पूरी) जीत नहीं होगी, या जो घेरे जायेंगे, उन्हीं की जीत
होगी।
20 क्योंकि तुच्छ मनुष्य भी नगर के घेरे का समाचार सुनने पर उत्तेजित होकर बड़े काम के हो
जायेंगे, जैसे कि थोड़ी सी भी आग जलावन पाकर बढ़ जाती है।
21 नगर में घिरकर भी धर्मात्मा मनुष्यों ने तपस्या द्वारा उन्हें पीछे हटाया, जो उनकी हत्या करने
आये थे और अशक्त शस्त्रों के होनेपर भी उन्होंने धर्म-बल से कुश-नगर में करन्धम को जीता।
22 उन राजाओं को, जिन्होंने यश या राज्य (या विषय) के लिए सारी वसुधा को प्राप्त किया, इसे
छोड़कर धूल में लौट जाना पड़ा, जैसे कि पोखर से पानी पीनेपर बैलों को चारागाह में लौट
जाना पड़ता है।
23 अतः धर्म और अर्थ के लिए क्या जरूरी है, इसे ठीक ठीक देखकर आपको शान्तिपूर्ण उपायों
(= साम) से प्रयत्न करना चाहिए; क्योंकि जो तीरों द्वारा जीते जाते हैं वे फिर प्रदीप्त हो सकते
हैं; किन्तु जो शान्तिपूर्ण उपायों से जीते जाते हैं उनका विचार नहीं बदलता है।
24 यह सब आपकी शक्ति से परे है, आपकी सेना शत्रु की सेना का मुकाबला नहीं कर सकती।
जिन शाक्य-मुनि का सम्मान करना आपको अभीष्ट है, उन्हीं के उपदेश के अनुसार आपको
सहनशीलता (क्षमा) का आचरण करना चाहिए।”
25 यद्यपि वे राजा थे, तो भी उस भले मनुष्य ने उन्हें दृढ़तापूर्वक उपदेश दिया और ब्राह्मणोचित
स्पष्टवादिता एवं प्रेमपूर्ण दया के साथ उन्हें वास्तविक हित की बात कही। तब उन्होंने उत्तर
दिया:-
26 “आपके ये शब्द समयानुकूल और बुद्धिमत्तापूर्ण हैं और हमारी भलाई के लिए मित्रतापूर्वक
कहे गये हैं; अब आपको हमारा आशय विदित हो, जिसका कारण है हमारी धर्म-रति और
अपने बल का भरोसा।
27 नियमतः मनुष्य काम और क्रोध के कारण अथवा शक्ति या मृत्यु (हिंसा ?) के लिए कार्य-भार
उठाते हैं; किन्तु हमने श्रद्धा से प्रेरित होकर (= साभिमाना:) केवल बुद्ध का सम्मान करने के
लिए शस्त्र ग्रहण किया है।
28 शिशुपाल और चेदियों ने ... ... अहङ्कारवश कृष्ण के साथ युद्ध किया; तब जिन्होंने अहङ्कार
को जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन तक सङ्कट में डालें?
29 पृथ्वी पालन करनेवाले वृष्णि-अन्धक नामक राजाओं ने एक कन्या के लिए युद्ध किया, तब
जिन्होंने काम (-वासना) का जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन भी
सङ्कट में डालें?
30 भृगु के पुत्र उस क्रोधी मुनि ने क्षत्रियों को उन्मूलित करने के लिए शस्त्र ग्रहण किया? तब
जिन्होंने क्रोध को जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन तक सङ्कट में
डालें?
31 दैत्य, यद्यपि वह अत्यन्त भयङ्कर था, सीतारूपी (सीताभिधान) मृत्यु को ग्रहणकर विनाश को
प्राप्त हुआ; तब जिन्होंने सब परिग्रह छोड़े उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन
भी सङ्कट में डालें।
118 अश्वघोष

32 उसी प्रकार एलि और पक, जिनकी पारस्परिक शत्रुता बढ़ती ही गई, (मोह-वश) नाश को
प्राप्त हुए; तब जो मोह से मुक्त थे उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन भी
खतरे में डालें?
33 संसार में ये और बहुतेरे दूसरे युद्ध अनुचित कारणों से हुए; तब हम क्यों न लड़ें, जब कि हम
बुद्ध की भक्ति से बँधे हुए हैं और यह (युद्ध) हमारे लिए हितकारी है?
34 यही हमारा उद्देश्य है; आप शीघ्र ही हमारा दूत बनकर जायें और अपनी सारी शक्ति लगाकर
(= सर्वात्मना) प्रयत्न करें जिससे यह उद्देश्य बिना युद्ध किये ही सिद्ध हो जाय।
35 यद्यपि हम लड़ने के लिए तैयार हैं और हमें तेज तीर हैं, तो भी धर्मानुसार कहे गये आपके
वचनों ने हमें रोक लिया है, जैसे कि मन्त्र साँपों को रोक लेते हैं जो अपने फैलते हुए विष को
पी जाते हैं।"
36 “मैं ऐसा ही करूँगा” यह कहकर ब्राह्मण ने राजाओं का आदेश ग्रहण किया और नगर में
प्रवेश किया; यथासमय उसने मल्लों से भेंट की और उनसे मिलकर उसने उचित समयपर उनसे
ये वचन कहे-
37 “ये नृप, जिनके हाथों में तीर हैं और जिनके चमकीले कवच सूर्य के समान उज्जवल हैं,
आपके इस नगर के द्वारों पर, मांस के टुकड़ों को चाटते हुए सिंहों के समान, उछलने को
तैयार हैं।
38 म्यानों में रखी हुई अपनी तलवारों को तथा सुनहली पीठवाले अपने धनुषों को देखते हुए वे
युद्ध की पुकार से नहीं डरते, किन्तु मुनि के धर्म का स्मरण करते हुए वे धर्म-विरुद्ध आचरण
करने से डरते हैं।
39 वे कहते हैं 'आपको हमारे उद्देश्य का आदर करना चाहिए; क्योंकि हम राज्य या सम्पत्ति के
लिए नही, अहङ्कार या शत्रुता से नही, किन्तु मुनि की भक्तिवश आये हैं।
40 मुनि समान रूप से हमारे और आपके गुरु थे; इसी कारण यह सङ्कट आया है। इसलिए यह
बन्धु-वर्ग एकत्र हुआ है और मुनि की धातुओं की पूजा करने के एकमात्र उद्देश्य से यहाँ आया
है।
41 धन की कृपणता उतना बड़ा पाप नही जितना कि धर्मानचरण की कृपणता। कृपणतापूर्वक
बोलने का निश्चय करना पाप है और पाप तो धर्म का शत्रु है ही।
42 यदि आप देने का निश्चय नही करते हैं तो किले से निकलकर अपने अतिथियों की सेवा-
शुश्रूषा कीजिए। जिनका बल (किले के) फाटकों में है, तीरों में नहीं, वे क्षत्रिय-वंश में उत्पन्न
नही हुए हैं।'
43 राजाओं ने यही सन्देश आपको दिया है, और यह सद्भावना एवं साहस से भरा है। मैंने भी
इस विषयपर अपने मन में स्नेहपूर्वक विचार किया है, अब मेरा वक्तव्य ध्यानपूर्वक सुनिये।
44 दूसरों के साथ विवाद करने से न सुख होता है, न धर्म; दुर्भावना को प्रश्रय न देकर शान्ति-
मार्ग का अनुसरण कीजिए। क्योंकि मुनि क्षमा का उपदेश दिया करते थे, जिससे भक्ति की
अग्नि सदा बढ़ती ही रहती है।
45 मनुष्य, अर्थ या काम, इन दो में से एक के लिए सङ्घर्ष करते हैं, किन्तु जो मनुष्य धर्म के
निमित्त आर्य (साधु) हो गया है उसके लिए शम (शान्ति) और शत्रुता परस्पर-विरोधी हैं।
46 जिन्होंने स्वयं शान्ति प्राप्त कर उदार हृदय से जीवों को करुणा का उपदेश दिया उन
करुणामय की पूजा करते हुए आप (दूसरों को) क्लेश पहुँचायें, यह आपके सिद्धान्त के प्रतिकूल
है।
47 अतः धातुओं को देकर आप उनके साथ यश और धर्म के भागी बनें। इस प्रकार आप उनके
मित्र बनेंगे और वे भी धर्म व यश प्राप्त करेंगे।
48 हम धर्मानुयायियों को, धर्म से गिरे हुए लोगों को प्रयत्नपूर्वक भी धर्म से युक्त करना चाहिए।
क्योंकि जो दूसरों को धर्म से युक्त करते हैं वे धर्म को चिर-स्थायी बनाते हैं।
49 परम पवित्र मुनि ने कहा है कि धर्म का दान सब दानों से श्रेष्ठ है (= सर्वेषामेव दानानां
धर्मदानं विशिष्यते); जो कोई भी धन-दान कर सकता है, किन्तु धर्म का दाता दुर्लभ है।"
50 जब उन्होंने (आचार्य) द्रोण के समान ज्ञानी ब्राह्मण (द्रोण) से विख्यात व आनन्ददायक धर्म
वचन सुने, तब अत्यन्त लज्जित होकर एक-दूसरे को देखते हुए उन्होंने उस (ब्राह्मण) से
कहा:-
51 “आपका निश्चय सन्मित्र का है और ब्राह्मणोचित गुणों से युक्त है। हम बुरे घोड़ों के समान
कुमार्ग पर भटक रहे थे, किन्तु आपने हमें सन्मार्ग पर स्थापित किया।
52 हमें अवश्य ही वैसा करना चाहिए जैसा कि आपने कहा है, क्योंकि दयालु मित्र का उपदेश
ग्रहण करना उचित ही है। क्योंकि जो लोग मित्र के वचन की अवहेलना करते हैं वे पीछे
विपत्ति में पड़कर शोक करते हैं।”
53 तब विप्र (= लोक धातु) को जाननेवाले बुद्ध की धातुओं को मल्लों ने आठ भागों में बाँटा और
तब अपने लिए एक भाग रखकर, उन्होंने शेष सात भाग दूसरों को दे दिये, प्रत्येक के लिए
एक।
54 मल्लों से इस प्रकार सम्मानित होकर राजा लोग भी, जिनका लक्ष्य सिद्ध हो गया, आनन्दपूर्वक
अपने अपने देश को लौट गये। तब उन्होंने अपने अपने नगर में मुनि की धातुओं (को रखने)
के लिए विधिवत् स्तूप बनाये।
बुद्धचरित 119

55 तब अपने देश में मुनि के लिए एक स्तूप बनाने की इच्छा से द्रोण ने अपने हिस्से में घड़ा
लिया और पिसल नामक लोगों ने भक्तिपूर्वक बची हुई राख ली।$^{106}$
56 शुरु में श्वेत पर्वतों के समान आठ स्तूप थे, जिनके भीतर धातुएँ थीं। ब्राह्मण का घड़ावाला
स्तूप नवाँ था और राखवाला दसवाँ।
57 प्रजा-सहित राजाओं ने और बच्चों-सहित ब्राह्मणों ने पृथ्वी पर मुनि के इन विविध स्तूपों की
पूजा की, जिनपर पताकाएँ फहरा रही थीं और जो कैलास की बर्फीली चोटियों के समान
दिखाई पड़ते थे।
58 अनेक भूपों ने स्तोत्र-गान, उत्कृष्ट सुगन्धियों, सुन्दर मालाओं और गीत-ध्वनि से स्तूपों की,
जिनमें बुद्ध (= जिन) की धातुएँ थीं, उत्तम उपासना की।
59 तब कालक्रम से 500 अर्हत् 5 पर्वतों से चिह्नित नगर में एकत्र हुए और फिर से धर्म को
अच्छी तरह संस्थापित (स्थिर) करने के लिए उन्होंने पर्वत के ऊपर मुनि के उपदेशों का सङ्ग्रह
किया।
60 आनन्द ने ही महामुनि से सब उपदेश सुने थे, ऐसा निश्चयकर शिष्यों ने सङ्घ की सम्मति से
उस वैदेह मुनि से शास्त्र (= प्रवचन) दुहराने के लिए कहा।
61 तब वह उन लोगों के बीच बैठ गया और "मैंने ऐसा सुना है" इस तरह कहते हुए तथा
स्थान, प्रसङ्ग, समय और श्रोता की व्याख्या करते हुए, उसने उपदेशों को वैसे ही दुहराया जैसे
कि वक्ता-श्रेष्ठ (बुद्ध) ने कहा था।
62 इस प्रकार अर्हतों के साथ उसने मुनि का धर्म-शास्त्र निश्चित किया और प्रयत्नपूर्वक इसका पूरा
ज्ञान प्राप्त करनेपर ही मनुष्य दुःख के परे गये हैं, जा रहे हैं, और जायँगे।
63 काल-क्रम से धर्म-रत अशोक का जन्म हुआ; उसने अहङ्कारी शत्रुओं को शोकाकुल किया और
दुःखी लोगों का शोक दूर किया, वह फूलों और फलों से लदे अशोक-वृक्ष के समान प्रियदर्शन
था।
64 मौर्य-वंश के उज्ज्वल गौरव अशोक ने प्रजा की भलाई के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी पर स्तूप बनाने
का कार्य आरम्भ किया और इसलिए जो चण्डाशोक कहलाता था वह धर्म-राज अशोक बन
गया।
65 उस मौर्य ने मुनि की धातुओं को सात स्तूपों से जिनमें वे रक्खी गई थीं, लेकर एक ही दिन
में क्रम से 80,000 भव्य स्तूपों के बीच बाँट दिया, जो शरदृतु के उज्ज्वल मेघों के समान
चमक उठे।
66 रामपुर में स्थित आठवाँ मूल स्तूप उस समय विश्वस्त नागों से रक्षित था और इसलिए राजा
ने उस (स्तूप) से धातुओं को प्राप्त नही किया; किन्तु इससे उन (धातुओं) में उसकी श्रद्धा
बहुत बढ़ गई।
67 चञ्चल राज्य-लक्ष्मी की रक्षा करते हुए भी और चित्त के लिए शत्रुस्वरूप उपभोगों के बीच
रहते हुए भी, राजा ने काषाय-वस्त्र पहने बिना ही अपने चित्त को शुद्ध किया और प्रथम फल
प्राप्त किया।
68 इस प्रकार जिस किसी ने जहाँ कहीं मुनि का सम्मान (पूजा) किया है, करता है, या करेगा
उसे सज्जन-सुलभ परम फल प्राप्त हुआ है होता है या होगा।
69 हे बुद्धिमान् मनुष्यो, विदित हो कि बुद्ध के गुण ऐसे हैं कि समान मानसिक शुद्धि होनेपर,
ऐहिक जीवन में मुनि का सम्मान करने से या उनके परिनिर्वाण के बाद उनकी धातुओं को
प्रणाम करने से एक ही फल प्राप्त होता है।$^{107}$
70 इसलिए उदारचेता करुणामय परम पूज्य मुनि की पूजा करनी चाहिए, जो लाभप्रद, सदा-
अव्यर्थ, अविकारी (अपरिवर्तनशील) परम और उत्कृष्ट धर्म के ज्ञाता थे।
71 क्या इस जगत् में यह उचित नही कि कृतज्ञ बुद्धिमान् धर्मात्मा उन्हें धन्यवाद दें जिन्होंने,
मनुष्यों के आशय की सम्यक् जानकारी रखते हुए, करुणावश, परोपकार के लिए महान्
परिश्रम किया?
72 पृथिवी पर जरा और मरण के समान तथा स्वर्ग में वहाँ से गिरने के समान कोई विपत्ति नही,
यह देखते हुए कौन सज्जन उतना पूज्य है जितना कि वह जिन्होंने विश्व की इन दो विपत्तियों
को पहचाना?
73 जबतक जन्म है तबतक दुःख है, और पुनर्जन्म से मुक्ति के समान कोई सुख नही; कौन
सज्जन उतना पूज्य है जितना कि वह जिन्होंने इस मुक्ति को प्राप्तकर संसार को दिया?
74 मुनि-श्रेष्ठ के प्रति सम्मान-भाव से, मुनि के शास्त्रानुसार, मनुष्यों के हित व सुख के लिए, न
कि विद्वत्ता या काव्य-कौशल दिखाने के लिए, यह काव्य रचा गया।
॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "धातु-विभाजन" नामक 28वाँ सर्ग समाप्त ॥
॥ समाप्तसम्पूर्णबुद्धचरित ॥
$^{106}$ - पिसल के स्थान में "पिप्पल" पढ़ने का सुझाव जॉन्स्टन ने किया है, इसलिए कि मौर्य पिप्पलवनिक थे।
चीनी अनुवाद में है "कुशीनगर के लोग"।
120 अश्वघोष
$^{107}$ - "हे बुद्धिमान् मनुष्यो, विदित हो" या "बुद्धिमान् मनुष्य जानते हैं"।

परिशिष्ट 1
अतिरिक्त टिप्पणी एवं पाठान्तर

1.10 कक्षीवान्। “आसन्दीवद्दधी” (अष्टाध्यायी 8.2.12) इति निपात्यते, कक्षीवानृषिः।
1.18 अनुवाद और 13.56 क के आधार पर कोष्ठगत 'अदृश्यरूपाश्च' रखा है।
1.24 घ-अनुवाद के आधार पर रिक्त स्थान की पूर्ति की गई है।
1.61 संविष्टः = सुप्तः (रघुवंश 1.95)। देवी = पार्वती। अग्निपुत्र = कार्तिकेय।
2.1 पा० “जन्मजरान्तगस्य”
2.2 कृताकृत = घटिताघटित = गढ़ा हुआ और नहीं गढ़ा हुआ (चाँदी-सोना) - अमरकोष।
2.3 पद्म = दक्षिण दिशा में स्थित दिग्गज। मण्डल = राज्य, देश, हस्तिशाला, हाथियों का घेरा (दे० 5.23)।
2.7 ख-पा० “०मण्डितागः”।
2.25 घ- पा० 'वनं न यायादिति'।
2.33 घ- 'संविबभाज...' = या 'साधुओं की सेवा की'।
2.44 ख-अभिध्या = लोभ। अविवक्षीत्-वह् + सन् + लुङ्।
2.51 'स्वायंभुव सामवेदीय सूक्त का श्रद्धापूर्वक जप किया' - बंगला अनुवाद।
2.54 निपात-नि + पा + क्त। दे०- सो० 18.31
3.1 गीतैर्निबद्धानाि काननानि = संगीत से गूंजते हुए नगर-उद्यानों के बारे में; या उन उद्यानों के बारे में जिनके (सम्बन्ध में) गीत गाये जाते थे।
3.9 क-पा० '०पुष्पलाजं'।
3.26 ग-पा० 'प्रयातुं' के स्थान में 'प्रयान्तं'।
3.31 ख-पा० 'बालेन'-बालक होकर धूल में खेला।
3.53 ग-'स्याद् व्यत्यासो विपर्यासो व्यत्ययश्च विपर्यये'-अमरकोष।
3.57 घ-पा० 'प्रियः प्रियैस्'।
3.60 घ-पा० 'निर्हादवता'।
4.16 सम्भवतः 'काशिसुन्दरी' नाम नही, किन्तु विशेषण; इसका अर्थ होगा 'काशी की रूपवती (वेश्या)'।
4.38 घ-धीरलीलैया चेष्टितं = गम्भीरता का, स्थिर गति-विधि का।
4.56 क-उ + ईमाः = विमाः; पा० 'किं न्विमा'?
ग-पा० 'संमता'।
5.8 ख-पा० 'निवर्त्य'।


5.19 ग-परिग्रह = घर स्वजन साथी सम्पति आदि बन्धन।
5.22 ग-पा० 'परिवर्त्य जनं'।
5.32 ख-लक्ष्म = प्रधान, योग्य।
5.40 निदर्शित = उदाहरण और दृष्टान्त देकर समझाये जानेपर।
5.52 शालभञ्जिका = शालवृक्ष (के काष्ठ) से बनाई गई मूर्ति।
5.53 पा० 'मणिकुण्डलदष्टगण्डलेखम्'।
5.55 योक्त्र = मुख का कोई आभूषण।
5.59 'स्पृष्टं स्फुटं प्रव्यक्तमुल्बणम्'-अमरकोष।
5.66 तदन्तरं = स्वभाव और बाह्य आभूषण का अन्तर; या सुयोग।
5.75 पा०- 'यथा ततुरुग्रश्रेष्ठ'।
5.84 क-पा० 'विकचपङ्कजो'। विकच = विकसित।
घ-पा० 'पुनरहं'।
5.86 ग-पा० 'अकुरुत'।
6.34 ख-पा० 'यशोधर्मभृतां वरं'।
6.37 'उचितदर्शित्वात्' अन्तःपुर या छन्दक के लिए भी हो सकता है। शुभ वस्तुओं को ही देखनेवाले या शुभ संवाद ही सुननेवाले अन्तःपुर में। अथवा, न्यायोचित को देखनेवाला या उचित कर्म करनेवाला में (छन्दक)।
6.57-58 एनं और तं मुकुट के लिए प्रयुक्त हुआ है या असि के लिए? 8.48 से ज्ञात होता है मुकुट के लिए।
7.42 ख-पा० 'सङ्कीर्णधर्मे पतितो०'; 'सङ्कीर्णधर्मा पतितो०'।
7.43 घ-पा० 'बृहस्पतेरप्युदयावहः'।
7.50 बहुमानमीयुः = (उन तपस्वियों ने मन में) उनका बड़ा सम्मान किया।
8.13 रघुवंश 10.7 की व्याख्या में मल्लिनाथ द्वारा उद्धृत।
8.31 ख-'विषाद-जन्य बाष्प से अवरुद्ध वाणी में'। दे० 2.62 ग तथा 8.60 घ।
8.39 घ- 'श्रियं' = या 'राज्यलक्ष्मी को'
8.57 ग-या 'दान देने का अभ्यासी था, माँगने का नहीं'।
8.66 ग घ-'भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि स्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः।'-रघुवंश 14.66।
9.21 घ-पा० 'वित्ताधिपत्यं'। विद् ज्ञाने क्त वित्तम्।
10.2 ख-धृतं च पूतं च = पोषित एवं पवित्रीकृत-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र)
10.26 घ-'सहीया' यह शब्द केवल बौद्ध-साहित्य में ही पाया जाता है।
10.30 पा० 'स्ववंशप्रतिरूपरूपं' = अपने वंश के अनुरूप रूप को।

बुद्धचरित 121

11.41 ग-भावाः = पदार्थाः-सिद्धान्त कौमुदी, कृदन्त प्रकरण; और दे० बु० च०
12.27
11.45 ग-आसंगकाष्ठ = भारवाही दण्डकाष्ठ-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र)
11.49 ग घ 'मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः'-वैराग्य शतक ।
11.70 'अव' धातु के अनेक अर्थों को ध्यान में रखते हुए तथा 'आर्यैः' के स्थान में
'आर्यान्' पढ़ते हुए, इस श्लोक का अर्थ यह होगा-
इन्द्र के समान रक्षा करें, आकाश के सूर्य के समान सदा प्रज्वलित हों,
सद्गुणों से शोभित हों, इस संसार में श्रेय को समझें, पृथ्वी का पालन करें, (दीर्घ)
आयु प्राप्त करें, सज्जनों व सत्पुत्रों को तृप्त करें, ऐश्वर्य की वृद्धि करें; हे राजन्,
अपने धर्म से लिपटे रहें (या स्वधर्म का आचरण करें) ।
13.60 यही श्लोक परिमार्जित रूप से भास-प्रणीत प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटक में
आया है।
14.14 उत्तरार्ध का यह अर्थ भी होगा-
कोई-कोई लौहचंचु धृष्ट कौओं द्वारा, जो लोहे के बने-से लगते हैं, खाये जाते
हैं।
समाप्त
3.7.2021
122 अश्वघोष