बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें28 अपने वचनामृत से उन्होंने जगत् को खूब तृप्त किया और क्षमा द्वारा क्रोध को जीता। उन्होंने
अपनी शिष्यमण्डली को श्रेय में रमाया और श्रेय चाहनेवालों को सूक्ष्म परीक्षण में लगाया।
29 उन्होंने सज्जनों के भीतर धर्माङ्कुर उत्पन्न किया और वह उन्हें आर्य-मार्ग पर ले आये, जिसका
सार है “कारण”; यद्यपि उन्होंने अनायों को लोकोत्तर तरीके से नही सिखाया तो भी उन्हें
सद्धर्म के अतिरिक्त दूसरे मार्गपर नहीं स्थापित किया।
30 काशी में उन्होंने धर्म-चक्र-प्रवर्तन किया और अपने ज्ञान द्वारा जगत् को संतोष का दान
दिया; जिन्हें दीक्षित करना था उनसे उन्होंने धर्माचरण कराया और हमारे हित के लिए हमें
सुख दिया।
31 दूसरों को उन्होंने अदृष्टपूर्व तत्त्व का दर्शन कराया और धर्म पर चलनेवालों को उन्होंने गुणों
से युक्त किया। दूसरे दर्शनों को खण्डनकर, युक्ति द्वारा उन्होंने लोगों को दुर्बोध अर्थ का बोध
कराया।
32 सब कुछ अनित्य और अनात्म है, ऐसा उपदेश देकर और भवों में कुछ भी सुख नहीं है, ऐसा
बतलाकर उन्होंने अपनी यश-पताका ऊँची उठाई और अभिमान के ऊँचे खम्भों को उलट
दिया।
33 निन्दा से उनके चित्त में क्षोभ नहीं हुआ और किसी भी बात में उन्हें सांसारिक प्रवृत्ति की
इच्छा नहीं हुई........।
34 स्वयं पार होकर उन्होंने डूबते हुए लोगों को पार किया; स्वयं शान्ति प्राप्तकर उन्हें शान्ति दी,
जो क्षुब्ध थे; स्वयं मुक्त होकर उन्हें मुक्त किया जो बँधे हुए थे; स्वयं प्रकाश पाकर दूसरों के
मोहान्धकार को प्रकाशित किया।
35 न्याय एवं अन्याय को जाननेवाले महामुनि जगत् को सदुपदेश से अनुगृहीत कर चले गये,
जैसे कि आपत्काल में, जब कि जीव अन्याय-मार्गपर चलते हैं और उसी में प्रसन्न रहते हैं,
धर्म चला जाता है?
36 संसार की दृष्टियों (मतों) को जीतकर भी, वह सजल मेघ के समान, पहाड़ पर के जङ्गल के
समान, गौरवशाली वृद्ध पुरुष के समान और दीप्तिमान् युवक के समान, संसार की दृष्टि को
आकृष्ट करते हुए चले।
37 ........वह परम शान्ति के मार्गपर चले, और श्रद्धावान् जगत्, जिसने उन्हें शान्ति प्राप्त करते
देखा, आज उस स्नेही पुरुष के समान है जो पितृ-विहीन हो गया हो।
38 मार भी, जिसने अपने दल-बल के साथ मुनि को नष्ट करने के लिए प्रचण्ड क्रोध किया था,
उनका मुकाबला न कर सका; तो भी उन्हें नष्ट करने के लिए प्रचण्ड क्रोध करनेवाला मार
आज मौत से मिलकर उन्हें गिराने में समर्थ हुआ।
39 सब जीव जिनके लिए भव-चक्र का भय अबतक दूर नहीं हुआ है, देवताओं के साथ एकत्र
हुए हैं और दुःख से अभिभूत हैं; क्योंकि शोक के परे जो उत्तम मार्ग है, वह उन्हें प्राप्त नहीं
हुआ है।
40 सब जीवों को आलोकित करते हुए उन्होंने जगत् को ऐसे देखा, जैसे दर्पण में प्रतिबिम्बित हो
और अपनी दिव्य श्रवण-शक्ति से उन्होंने दूर एवं निकट के, स्वर्ग तक के भी, सब शब्द
सुने।¹⁰¹
41 वह आकाश के नक्षत्र-प्रासाद पर चढ़े, पृथ्वी में बिना किसी बाधा के प्रविष्ट हुए, पानी पर
बिना डूबे हुए चले और अपने शरीर से उन्होंने विविध रूप पैदा किये।
42 उन्हें अपने बहुत-से (पूर्व-) जन्म याद थे, जैसे कि यात्री को मार्ग के विविध विश्राम-स्थल
याद रहते हैं और उन्होंने अपने चित्त से दूसरों के मानसिक व्यापारों को (=मनः प्रचारान्)
जाना, जो इन्द्रियों की बोध-शक्ति के क्षेत्र से परे हैं (अर्थात् इन्द्रियों द्वारा नहीं जाने जा
सकते)।
43 वह सब के साथ समान व्यवहार करते थे और सर्वज्ञ थे, उन्होंने सब आस्रवों (चित्त-मलों) को
काट डाला और सब कार्य को पूरा किया, ज्ञान द्वारा उन्होंने दोषों को छोड़ा और ज्ञान-तत्त्व
प्राप्त किया, तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं।
44 उन्होंने उन लोगों को दीक्षित किया, जिनके चित्त पटु थे और मन्द चित्तों को धीरे-धीरे पटुता
की ओर प्रेरित किया। धर्म-ज्ञान द्वारा उन्होंने उन लोगों से पाप छुड़वाया। अब अमृत प्राप्त
करने का धर्म कौन बतायेगा?
45 उत्पीड़ित और निराश जगत् की शान्ति के लिए कौन धर्म प्रदान करेगा? अपना कार्य पूरा कर
कौन दयालु दूसरों को दोष-जाल काटेगा?
46 भवचक्र के महासागर में डूबे हुए जगत् की शान्ति के लिए उत्तम ज्ञान कौन बतायेगा?
अज्ञान-मग्न संसार के सुख के लिए उत्तम-ज्ञान कौन बतायेगा?
47 उन संसारज्ञ के बिना यह संसार, प्रकाश-रहित दिवाकर के समान है या प्रवाह-रहित नदी
(=सिन्धु) के समान या उस राजा के समान, जिसका राज्य नष्ट हो गया हो।
48 उन नर-श्रेष्ठ के बिना यह संसार बुद्धि-रहित विद्या के समान, विवेक-रहित परीक्षण के समान,
प्रताप-रहित राजा के समान, क्षमा-रहित धर्म के समान, होकर भी नहीं है।
¹⁰¹ - 40-43:-40-42 में अभिज्ञाओं का वर्णन है और 43 में आस्रवक्षयज्ञान का;
विशेष विवरण के लिए देखिए-अभिधर्मकोष 7.42
बुद्धचरित 115