बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें11.41 ग-भावाः = पदार्थाः-सिद्धान्त कौमुदी, कृदन्त प्रकरण; और दे० बु० च०
12.27
11.45 ग-आसंगकाष्ठ = भारवाही दण्डकाष्ठ-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र)
11.49 ग घ 'मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः'-वैराग्य शतक ।
11.70 'अव' धातु के अनेक अर्थों को ध्यान में रखते हुए तथा 'आर्यैः' के स्थान में
'आर्यान्' पढ़ते हुए, इस श्लोक का अर्थ यह होगा-
इन्द्र के समान रक्षा करें, आकाश के सूर्य के समान सदा प्रज्वलित हों,
सद्गुणों से शोभित हों, इस संसार में श्रेय को समझें, पृथ्वी का पालन करें, (दीर्घ)
आयु प्राप्त करें, सज्जनों व सत्पुत्रों को तृप्त करें, ऐश्वर्य की वृद्धि करें; हे राजन्,
अपने धर्म से लिपटे रहें (या स्वधर्म का आचरण करें) ।
13.60 यही श्लोक परिमार्जित रूप से भास-प्रणीत प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटक में
आया है।
14.14 उत्तरार्ध का यह अर्थ भी होगा-
कोई-कोई लौहचंचु धृष्ट कौओं द्वारा, जो लोहे के बने-से लगते हैं, खाये जाते
हैं।
समाप्त
3.7.2021
122 अश्वघोष