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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 122 में से

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पृष्ठ 113

88 सब चराचर का विनाश होता है, अतः जागरूक रहो; मेरी निर्वाण-प्राप्ति का समय आ गया
है। विलाप मत करो; ये मेरे अन्तिम वचन हैं।”
89 तब वह श्रेष्ठ ध्यानज्ञ उस समय प्रथम ध्यान में प्रविष्ट हुए और उससे निकलकर दूसरे में,
और इसी तरह उचित क्रम से वह किसी को छोड़े बिना सब (ध्यानों) में प्रवृष्टि हुए।
90 तब सब ध्यानों से, नौ समापत्तियों से ऊर्ध्व (अनुलोम) क्रम से निकलकर, महामुनि फिर
निम्न (प्रतिलोम) क्रम से प्रथम ध्यान में लौट आये।
91 उससे भी निकलकर वह उचित क्रम से चतुर्थ ध्यान में आये और चतुर्थ ध्यान से निकलकर
वह अनन्त शान्ति अनुभव करने को चले गये।
92 तब मुनि का परिनिर्वाण होनेपर, तूफान से प्रतिहत नौका के समान पृथ्वी काँप उठी, और
आकाश से उल्काएँ गिरीं, जैसे दिग्गजों द्वारा फेंकी गई हों।
93 जलावन और धुएँ से रहित आग, हवा से प्रेरित हुए बिना ही दिशाओं को जलाने लगी, जैसे
दिव्य चित्ररथ वन को जलाने के लिए आकाश में दावानल उठा हो।
94 भयङ्कर वज्र, शत शत अङ्गारों से आग उगलते हुए, गिरने लगे, जैसे युद्ध में असुरों को
जीतने के लिए इन्द्रदेव क्रोधपूर्वक उन्हें (वज्रों को) फेंक रहा हो।
95 धूल-भरी हवा लताओं को टुकड़े-टुकड़े करती हुई जोरों से बही, और क्रुद्ध झंझावात से
आहत हुए पर्वतों की चोटियाँ गिर पड़ीं।⁹⁹
96 चाँद का प्रकाश क्षीण हुआ और यह अपनी निष्प्रभ किरणों से वैसे ही शोभित हुआ, जैसे
पङ्किल जल से लिप्त राजहंस, जिसका शरीर छोटे छोटे बेतों (या नरकटों) से घिरा हो।
97 यद्यपि आकाश अनभ्र था और चाँद उगा हुआ था, तो भी अपवित्र अन्धकार चारों ओर फैल
गया था। और उस समय नदियों का जल मानो शोक से खौल रहा था।
98 तब समीपवर्ती शाल-वृक्षों ने झुककर असमय के सुन्दर फूल बुद्ध के शरीर पर... ...
...बरसाये।
99 आकाश में पाँच शिरवाले नाग निश्चल खड़े रहे, वे मुनि को भक्तिपूर्वक देख रहे थे, उनकी
आँखें शोक से लाल थीं, उनके फन बन्द थे, और उनके शरीर नियन्त्रित थे।
*100 मानसिक पीड़ा के कारण उन्होंने गर्म निश्वास छोड़े, किन्तु यह सोचकर कि जगत्
स्वभावतः अनित्य है, उन्हें शोक से विरति एवं जगत से घृणा हो गई।
101 दिव्य लोक में नैष्ठिक धर्म के आचरण में रत राजा वैश्रवण की धर्मसभा ने धर्म में आसक्ति
होने के कारण न शोक किया न आँसू बहाये।
102 पवित्र (=कृती) शुद्धाधिवास देवगण, यद्यपि वे महामुनि का अत्यन्त सम्मान करते थे, शान्त
रहे और मन में क्षुब्ध नही हुए; क्योंकि उन्हें जगत के स्वभाव से घृणा थी।
103 सद्धर्म में आनन्द पानेवाले देवगण, गन्धर्व-राज, नाग-राज और यक्ष अत्यन्त शोक-मग्न और
व्याकुल होकर आकाश में खड़े रहे।
104 किन्तु, मार की हार्दिक अभिलाषा पूरी हुई, उसके दल ने आनन्द में आकर अट्टहास किया,
उच्छल-कूद की, साँपों के समान फूत्कार किया, नृत्य किया और बड़े बड़े मृदङ्ग एवं पटह
बजाये।
105 तब ऋषि-ऋषभ (बुद्ध) के उस पार चले जानेपर संसार उस पर्वत के समान दिखाई पड़ा,
जिसकी चोटी वज्र से कट गई हो, या उस उदास हाथी के समान जिसका मद बन्द हो गया
हो, या उस वृषभ के समान जिसका ककुद नष्ट हो गया हो।
106 उन जन्म-विनाशक को खोकर, संसार वैसा ही दिखाई पड़ा जैसे कि बिना चाँद का
आकाश, या हिम से सूखे कमलों का सरोवर या धन के अभाव से निष्फल हुई विद्या (दिखाई
पड़े)।
॥बुद्धचरित महाकाव्य का “महापरिनिर्वाण” नामक 26वाँ सर्ग समाप्त॥
सत्ताईसवाँ सर्ग
निर्वाण की प्रशंसा
1 तब किसी बड़े देवता ने विमान से अपना शिर कुछ बाहर झुकाकर सर्वज्ञ की ओर एक क्षण
तक देखा और कहाः-
2 “आहो! सब जीव अनित्य हैं और जन्म एवं विनाश के नियम के अधीन हैं, जो जो जन्म लेते
हैं उनके भाग्य में दुःख है। इस प्रकार शान्ति उसी शान्ति से मिलती है, जो अपने पीछे कुछ
छोड़ नही जाती।
3 जैसे कि जल अग्नि को शान्त करता है वैसे ही कालरूपी जल को तथागतरूपी अग्नि शान्त
करनी पड़ी, जिसकी ज्वाला ज्ञान है, जिसका धुआँ यश है, और जिसने जन्मरूपी इन्धन को
निःशेष जला डाला है।”
4 तब श्रेष्ठ ऋषि के समान दिखाई पड़नेवाले दूसरे ऋषि ने, जो स्वर्ग में रहते हुए भी उसके
उपभोगों से आकृष्ट नही हुआ, अर्हत् ऋषि की ओर देखा, जिन्होंने शान्ति प्राप्त कर ली थी;
और गिरिराज के समान धैर्य धारण करते हुए, उसने ये वचन कहेः-
5 “इस संसार में ऐसा कुछ नही जो नाश को नही प्राप्त होता है, जो नाश को नही प्राप्त हुआ
और जो नाश को नही प्राप्त होगा, यह देखकर कि अनुपम गुरु, जिन्होंने परम ज्ञान प्राप्त किया
था और जो उत्तम लक्ष्य (=परमार्थ) को जानते थे, शान्ति को प्राप्त हुए।

⁹⁹- इसका उत्तरार्द्ध चीनी अनुवाद से लिया गया है।
बुद्धचरित 113