बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ बृहत्संहिता
अनिल से लेकर मृग तक आठ देवता दक्षिण भाग में अवस्थित होते हैं। उनमें से
अनिल के ऊपर द्वार हो तो अल्प पुत्रता, पौष्ण के ऊपर द्वार हो तो दासत्व, वितथ के
ऊपर द्वार हो तो नीचता, बृहत्क्षत के ऊपर द्वार हो तो भोजन, पानवस्तु और पुत्रों की
वृद्धि, याम्य के ऊपर द्वार हो तो अशुभ, गन्धर्व के ऊपर द्वार हो तो कृतघ्नता, भृङ्गराज
के ऊपर द्वार हो तो निर्धनता और मृग के ऊपर द्वार हो तो पुत्र के बल का विनाश होता
है।।७१।।
अनिले अल्पसुतत्वमल्पपुत्रता। पौष्णे प्रैष्यं दासत्वम्। वितथे नीचत्वं नीचता। बृहत्क्षते
भक्ष्यपानसुतानां वृद्धिः। याम्ये रौद्रमशुभम्। गन्धर्वे कृतघ्नं कृतं हन्तीति। भृङ्गराजे अधनं
धनवर्जितम्। मृगाख्ये सुतवीर्यघ्नं पुत्रबलनाशनम्। एवं याम्येन दक्षिणेन द्वारनिर्देशः।।७१।।
अथ पश्चिम आह—
सुतपीडा रिपुवृद्धिर्न सुतधनाप्तिः सुतार्थफलसम्पत्।
धनसम्पन्नृपतिभयं धनक्षयो रोग इत्यपरे ।।७२।।
पिता से लेकर पापयक्ष्मा तक आठ देवता पश्चिम भाग में अवस्थित रहते हैं। उनमें
से पिता के ऊपर द्वार हो तो पुत्रों की पीड़ा, दौवारिक के ऊपर द्वार हो तो शत्रु की वृद्धि,
सुग्रीव के ऊपर द्वार हो तो पुत्र और धन का लाभ, कुसुमदन्त के ऊपर द्वार हो तो पुत्र
और धन-सम्पत्ति की प्राप्ति, वारुण के ऊपर द्वार हो तो धन-सम्पत्ति का लाभ, असुर
के ऊपर द्वार हो तो राजभय, शोष के ऊपर द्वार हो तो धननाश तथा पापयक्ष्मा के ऊपर
द्वार हो तो रोग की प्राप्ति होती है।।७२।।
पित्र्ये सुतपीडा पुत्रव्यथा। दौवारिके रिपुवृद्धिः शत्रुबाहुल्यम्। सुग्रीवे सुतधनाप्तिः पुत्र-
धनावाप्तिः। कुसुमदन्ते सुतार्थफलसम्पत् पुत्रधनफलसम्पत्तिः। वारुणे धनसम्पद् धनानां
सम्पत्। असुरे नृपतिभयं राजभीतिः। शोषे धनक्षयो वित्तनाशः। पापयक्ष्माख्ये रोगो गद
इत्यपरे पश्चिमायां द्वारनिर्देशः।।७२।।
अथोत्तर आह—
वधबन्धो रिपुवृद्धिः सुतधनलाभः समस्तगुणसम्पत्।
पुत्रधनाप्तिर्वैरं सुतेन दोषाः स्त्रिया नैःस्वम् ।।७३।।
रोग से लेकर दिति तक आठ देवता उत्तर भाग में अवस्थित होते हैं। उनमें से रोग
के ऊपर द्वार हो तो मृत्यु और बन्धन, सर्प के ऊपर द्वार हो तो शत्रु की वृद्धि, मुख्य के
ऊपर द्वार हो तो पुत्र और धन का लाभ, भल्लाट के ऊपर द्वार हो तो सम्पूर्ण शौर्यादि
गुणों की सम्पत्ति, सोम के ऊपर द्वार हो तो पुत्र से द्वेष, अदिति के ऊपर द्वार हो तो स्त्री
के द्वारा दोष तथा दिति के ऊपर द्वार हो तो निर्धनता होती है।।७३।।
रोगाख्ये वधबन्धः। सार्पे रिपुवृद्धिः। मुख्याख्ये सुतानां पुत्राणां धनस्य च लाभः।
भल्लाटे समस्तानां निःशेषाणां शौर्यादीनां गुणानां सम्पत्तिः। सौम्ये पुत्रधनाप्तिः सुतवित्तलाभः।
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