बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतिथिकर्मगुणाध्यायः ५४१
मृगशिरा में जो कार्य कहा गया है वह पञ्चमी में, कृत्तिका में जो कार्य कहा गया है वह
षष्ठी में, ज्येष्ठा में जो कार्य कहा गया है वह सप्तमी में, हस्त में जो कार्य कहा गया है
वह द्वादशी में, पूर्वफाल्गुनी में जो कार्य कहा गया है वह चतुर्दशी में, उत्तराषाढ़ा में जो
कार्य कहा गया है वह पञ्चदशी में और मघा में जो कार्य कहा गया है वह अमावास्या
में करना चाहिये।
इसी प्रकार जिस नक्षत्र में जो कार्य कहा गया है वह उस नक्षत्र के देवता के करण
में भी करना चाहिये। जैसे—ज्येष्ठा में जो कार्य कहा गया है वह वव करण में, रोहिणी
में जो कार्य कहा गया है वह वालव में, अनुराधा में जो कार्य कहा गया है वह कौलव
में, उत्तरफाल्गुनी में जो कार्य कहा गया है वह तैतिल में, ज्येष्ठा में जो कार्य कहा गया
है वह गर में, श्रवण में जो कार्य कहा गया है वह वणिज में, भरणी में जो कार्य कहा
गया है वह विष्टि में, कृत्तिका में जो कार्य कहा गया है वह शकुनि में, रोहिणी में जो
कार्य कहा गया है वह चतुष्पद में, आश्लेषा में जो कार्य कहा गया है वह नाग में और
स्वाती में जो कार्य कहा गया है वह किंस्तुघ्न में करना चाहिये।
इसी प्रकार जिस नक्षत्र में जो कार्य कहा गया है, वह उस नक्षत्र के देवतासम्बन्धी
मुहूर्त्त में भी करना चाहिये। जैसे—आर्द्रा में जो कार्य कह गया है वह शिवमुहूर्त्त में,
श्लेषा में जो कार्य कहा गया है वह भुजग में, अनुराधा में जो कार्य कहा गया है वह
मित्र में, मघा में जो कार्य कहा गया है वह पिता में, धनिष्ठा में जो कार्य कहा गया है
वह वसु में, पूर्वाषाढ़ा में जो कार्य कहा कहा है वह जल में, उत्तराषाढ़ा में जो कार्य
कहा गया है वह विश्व में, अभिजित् में जो कार्य कहा गया है वह विरिञ्चि में, रोहिणी में
जो कार्य कहा गया है वह पङ्कजप्रभव में, विशाखा में जो कार्य कहा गया है वह
ऐन्द्राग्नि में, मूल में जो कार्य कहा गया है वह निर्ऋति में, शतभिषा में जो कार्य कहा
गया है वह वरुण में, उत्तरफाल्गुनी में जो कार्य कहा गया है वह अर्यमा में,
पूर्वफाल्गुनी में जो कार्य कहा गया है वह भाग्य में, पूर्वभाद्रपदा में जो कार्य कहा गया
है वह अजैकपाद में, उत्तरभाद्रपदा में जो कार्य कहा गया है वह अहिर्बुध्न्य में, रेवती
में जो कार्य कहा गया है वह पूषण में, अश्विनी में जो कार्य कहा गया है वह दस्र में,
भरणी में जो कार्य कहा गया है वह अन्तक में, कृत्तिका में जो कार्य कहा गया है वह
आग्नेय में, मृगशिरा में जो कार्य कहा गया है वह इन्दु में, पुनर्वसु में जो कार्य कहा गया
है वह अदिति में, पुष्य में जो कार्य कहा गया है वह गुरु में, श्रवण में जो कार्य कहा
गया है वह हरि में, हस्त में जो कार्य कहा गया है वह रवि में, चित्रा में जो कार्य कहा
गया है वह त्वष्टा में और स्वाती में जो कार्य कहा गया है वह अनिल मुहूर्त्त में करना
चाहिये।।१-३।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायान्तिथिकर्मगुणाध्यायो नवनवतितमः ॥९९॥
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