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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 760 में से

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पृष्ठ 568

अथ तिथिकर्मगुणाध्यायः
अथ तिथिकर्मगुणाध्यायो व्याख्यायते—
कमलजविधातृहरियमशशाङ्कषड्वक्त्रशक्रवसुभुजगाः ।
धर्मेशसवितृमन्मथकलयो विश्वे च तिथिपतयः ॥१॥
पितरोऽमावस्यायां संज्ञासदृशाश्च तैः क्रियाः कार्याः ।
नन्दा भद्रा विजया रिक्ता पूर्णा च तास्त्रिविधाः ॥२॥
यत् कार्यं नक्षत्रे तद्दैवत्यासु तिथिषु तत् कार्यम् ।
करणमुहूर्तेष्वपि तत् सिद्धिकरं देवतासदृशम् ॥३॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां तिथिकर्मगुणो
नामैकोनशततमोऽध्यायः ॥९९॥
ब्रह्मा, विधाता, विष्णु, यम, चन्द्र, कार्त्तिकेय, इन्द्र, वसु, सर्प, धर्म, शिव, सूर्य,
कामदेव, कलि—ये क्रम से प्रतिपदा आदि तिथियों के स्वामी कहे गये हैं। जैसे—
प्रतिपदा के ब्रह्मा, द्वितीया के विधाता, तृतीया के विष्णु इत्यादि स्वामी हैं तथा
अमावस्या के स्वामी पितर हैं। इन तिथियों में संज्ञातुल्य कार्य करना चाहिये। जैसे—
प्रतिपदा में ब्रह्मकर्म ( विवाह आदि ); द्वितीया में भवननिर्माण आदि; तृतीया में
चौलकरण, दमन आदि; चतुर्थी में शत्रु का मारण आदि; पञ्चमी में वमन, औषधिसेवन,
पौष्टिक कर्म आदि; षष्ठी में मित्रसंग्रह, अभिषेक आदि; सप्तमी में गाड़ी, सवारी, क्रिया,
गमन आदि; अष्टमी में शस्त्रग्रहण, दुर्ग, उपकरण आदि; नवमी में परविघात, मारण
आदि; दशमी में धर्म, ब्राह्मण, तर्पण आदि; एकादशी में स्थिर, चर, मृदु, सौम्य कर्म
आदि; द्वादशी में अग्न्याधान आदि; त्रयोदशी में मैत्री, कामसेवन आदि; चतुर्दशी में
विष, रस के प्रयोग आदि और पञ्चदशी में पितृतर्पण आदि कार्य करना चाहिये।
नन्दा, भद्रा, विजया, रिक्ता, पूर्णा—ये तिथियाँ तीन प्रकार की होती हैं, जैसे—
नन्दा ( १/६/११ ), भद्रा ( २/७/१२ ), विजया ( ३/८/१३ ), रिक्ता ( ४/९/
१४ ) और पूर्णा ( ५/१०/१५ ) तिथि होती है। जिस नक्षत्र में जो कार्य कहा गया
है, वह उस नक्षत्र के देवता की तिथि में करना चाहिये। जैसे—रोहिणी में जो कार्य कहा
गया है, वह उसके देवता ( ब्रह्मा ) की तिथि ( प्रतिपदा ) में करना चाहिये। इसी
प्रकार अभिजित् नक्षत्र में जो कार्य कहा गया है, वह द्वितीया में, श्रवण नक्षत्र में जो
कार्य कहा गया है वह तृतीया में, भरणी में जो कार्य कहा गया है वह चतुर्थी में,
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