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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 760 में से

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पृष्ठ 530

५०२ बृहत्संहिता
स्युर्भवेयुः। तद्यथा—अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः रवेः। क ख ग घ ङ
भौमस्य। च छ ज झ ञ शुक्रस्य। ट ठ ड ढ ण बुधस्य। त थ द ध न गुरोः। प फ
ब भ म सौरस्य। य र ल व श ष स ह चन्द्रस्य।।३।।
अथ राशिवशेन द्रेष्काणवशेन च नामाक्षरसंख्याज्ञानमाह—
द्रेष्काणवृद्ध्या प्रवदन्ति नाम त्रिपञ्चसप्ताक्षरमोजराशौ ।
युग्मे तु विन्द्याद् द्विचतुष्कषट्कं नामाक्षराणि ग्रहदृष्टिवृद्ध्या ॥४॥
द्रेष्काण की वृद्धि से नाम कहते हैं; जैसे—विषम राशि के प्रथम द्रेष्काण में तीन
अक्षरों का, द्वितीय द्रेष्काण में पाँच अक्षरों का और तृतीय द्रेष्काण में सात अक्षरों का
नाम जानना चाहिये। साथ ही सम राशि के प्रथम द्रेष्काण में दो अक्षरों का, द्वितीय
द्रेष्काण में चार अक्षरों का और तृतीय द्रेष्काण में छः अक्षरों का नाम जानना चाहिये।
ग्रहदृष्टि की वृद्धि से नामाक्षर होते हैं। यहाँ पर दो प्रकार से नामाक्षर लाते हैं, प्रथम—
स्थितिवश और द्वितीय—दृष्टिवश। दृष्टिवश नामाक्षर लाने में दृष्टिबल का विचार करना
चाहिये।।४।।
द्रेष्काणो राशित्रिभागः। तस्य वृद्ध्या वर्धनेनौजराशौ विषमर्क्षे त्रिपञ्चसप्ताक्षरं नाम।
प्रथमे त्र्यक्षरम्, द्वितीये पञ्चाक्षरम्, तृतीये सप्ताक्षरमिति। युग्मे समराशौ लग्नगते प्रथमे
द्रेष्काणे द्व्यक्षरं नाम विन्द्याज्जानीयात्। द्वितीये चतुष्कं चतुरक्षरम्। तृतीये षट्कं षडक्षरम्।
तानि च नामाक्षराणि नामवर्णा ग्रहदृष्टिवृद्ध्या। यतः केन्द्रस्थराशिभिरक्षराण्यानीयन्ते। केन्द्र-
चतुष्टयस्य प्रस्तुतत्वात् किल योगद्वयेनाक्षिप्तमिदं शास्त्रम्। तत्रैकः स्थितियोगः, द्वितीयो
दृष्टियोगः। स्थितियोगं परिहृत्य दृष्टियोगेनानीयन्ते। दृष्टियोगे तु बलाबलविचारः। उक्तं च—
त्रिदशत्रिकोणचतुरस्रसप्तमान्यवलोकयन्ति चरणाभिवृद्धितः।
रविजामरेज्यरुधिराः परे च ये क्रमशो भवन्ति किल वीक्षणेऽधिकाः।। इति।
एवं ग्रहदर्शनवृद्ध्या नामाक्षराण्यानीयन्ते।।४।।
अथ नवांशकवशेन नामाक्षरसङ्ख्याज्ञानमाह—
वर्गोत्तमे द्व्यक्षरकं चरांशे स्थिरर्क्षभागे चतुरक्षरं तत् ।
ओजेषु चैभ्यो विषमाक्षराणि स्युर्द्विस्वभावेषु तु राशिवच्च ॥५॥
चर राशि में प्रथम नवांश, स्थिर राशि में पञ्चम नवांश और द्विस्वभाव राशि में
नवम नवांश वर्गोत्तम संज्ञक हैं। यदि सम राशियों में चर राशि का वर्गोत्तम नवांश हो तो
दो अक्षरों का, स्थिर राशि का वर्गोत्तम नवांश हो तो चार अक्षरों का, विषम राशियों में
चर राशि का वर्गोत्तम नवांश हो तो तीन अक्षरों का और स्थिर राशि का वर्गोत्तम नवांश
हो तो पाँच अक्षरों का नाम होता है। द्विस्वभाव राशियों में राशि की तरह ही नामाक्षरों
की भी संख्या होती है। जैसे—द्विस्वभाव राशियों में विषम राशि ( मिथुन या धनु )
वर्गोत्तम नवांश हो तो तीन या सात अक्षरों का और सम राशि ( कन्या या मीन ) का
नवांश हो तो चार-छः अक्षरों का नाम होता है।।५।।
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