सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 378

अथ रत्नपरीक्षाध्यायः
अथ रत्नपरीक्षा व्याख्यायते। तत्र मणीनां तावद्गुणप्रधानार्थलक्षणमाह—
रत्नेन शुभेन शुभं भवति नृपाणामनिष्टमशुभेन।
यस्मादतः परीक्ष्यं दैवं रत्नाश्रितं तज्ज्ञैः ॥१॥
शुभ रत्न धारण करने से राजाओं का शुभ और अशुभ रत्न धारण करने से राजाओं
का अशुभ होता है। इसलिये रत्नज्ञों के द्वारा रत्नगत दैव (शुभाशुभ फल) की परीक्षा
करनी चाहिये॥१॥
नृपाणां राज्ञां रत्नेन मणिना शुभेन शुभलक्षणेन संयुक्तेन शुभं दैवं भवति; अशुभेनानिष्टम-
शुभं दैवं भवति। दैवशब्देन प्राक्तनकर्मणां विपाक उच्यते। यस्मादेवमतोऽस्मात्तज्ज्ञै रत्न-
लक्षणज्ञै रत्नाश्रितं रत्नसंस्थितं दैवं परीक्ष्यं विचार्यम्॥१॥
रत्नपरीक्षायामुपलरत्नानामधिकारः क्रियत इत्येतदाह—
द्विपहयवनितादीनां स्वगुणविशेषेण रत्नशब्दोऽस्ति।
इह तूपलरत्नानामधिकारो वज्रपूर्वाणाम् ॥२॥
हाथी, घोड़ा, स्त्री आदि में अपने-अपने गुण की विशेषता से 'रत्न' शब्द का प्रयोग
होता है; जैसे गजरत्न, अश्वरत्न, स्त्रीरत्न आदि। किन्तु यहाँ पर वज्र आदि पाषाणरत्नों का
अधिकार है॥२॥
द्विपो हस्ती। हयोऽश्वः। वनिता स्त्री। अधिकरणाज्जातौ जातौ यदुत्कृष्टं रत्नं तदभिधीयते।
एवमादीनां स्वगुणविशेषेणात्मीयगुणप्रभावेण रत्नशब्दोऽस्ति विद्यते। तथा च—
जातौ जातौ यदुत्कृष्टं तद्रत्नमभिधीयते। इति।
इह त्वस्यां रत्नपरीक्षायामुपलरत्नानां पाषाणमणीनां वज्रपूर्वाणां वज्रप्रथमानाधिकारः
क्रियते॥२॥
तत्र रत्नानामुत्पत्तिप्रदर्शनार्थं मतभेदमाचार्याणामाह—
रत्नानि बलाद्दैत्याद्दधीचितोऽन्ये वदन्ति जातानि।
केचिद् भुवः स्वभावाद् वैचित्र्यं प्राहुरुपलानाम् ॥३॥
किसी का मत है कि बलसंज्ञक दैत्य से रत्न की उत्पत्ति हुई है। कोई दधीचि मुनि
की अस्थि से रत्नोत्पत्ति मानते हैं। कोई पृथ्वी के स्वभाव से उपलों में विचित्रता आकर
रत्न हो जाता है—ऐसा मानते हैं॥३॥
बल इति दैत्याख्यस्तस्माद्बलाद्रत्नानि जातानि सम्भूतानि। स किलेन्द्रेण निहतस्त-
स्यास्थिभ्यो रत्नान्युत्पन्नानि। तथा च—
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA