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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 760 में से

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पृष्ठ 377

शय्यालक्षणाध्यायः ३४९
एक वृक्ष के काठ से बनी हुई शय्या धन्य, दो वृक्षों के काठ से बनी हुई धन्यतर,
तीन वृक्षों के काठ से बनी हुई शय्या पुत्रों को बढ़ाने वाली और चार वृक्षों के काठ से
बनी हुई शय्या उत्तम धन और यश प्रदान करने वाली होती है। पाँच वृक्षों के काठ से
बनी हुई शय्या पर जो व्यक्ति शयन करता है, उसकी मृत्यु होती है तथा छः, सात या
आठ वृक्षों के काठ से बनी हुई शय्या कुल का नाश करती है।।३८-३९।।
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां शय्यासनलक्षणाध्याय एकोनाशीतितमः ॥७९॥
यच्छय्यासनमेकद्रुमेणैकवृक्षेण निर्मितं तद्धन्यम्। वृक्षद्वयनिर्मितं धन्यतरम्। त्रिभिर्वृक्षैः
प्रागुक्तैर्यैर्विनिर्मितं तदात्मजानां पुत्राणां वृद्धिकरम्। चतुर्भिर्यन्निर्मितं तदर्थं धनम्। अग्र्यं
प्रधानं यशः कीर्तिं च करोति।
पञ्चवनस्पतिरचित इति। पञ्चभिर्वनस्पतिभिर्वृक्षै रचिते निर्मिते शयनासने शयने
यः शेते स्वपिति स पञ्चत्वं याति। म्रियत इत्यर्थः। षण्णां सप्तानामष्टानां च तरूणां
वृक्षाणां काष्ठैर्घटिते निर्मिते कुलविनाशो वंशक्षयो भवति।।३८-३९।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ शय्यासनलक्षणं
नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥७९॥
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