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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 760 में से

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पृष्ठ 368

३४० बृहत्संहिता
जल से भरा हुआ घड़ा, रत्न और अन्य मंगलद्रव्यों का देखना शुभ होता है।।७।।
सितकुसुमानि श्वेतपुष्पाणि। मत्तवारणो मत्तहस्ती। दधि क्षीरविकारः। अक्षता यवाः।
पूर्णकुम्भो जलपूर्णो घटः। रत्नानि मणयः। मङ्गल्यानि। अन्यानि शङ्खशब्दवेदध्वनिगो-
चक्रवाककोकिलादीनां शब्दाः। आरम्भे आरम्भकाले दृष्ट्वाऽवलोक्य शुभं ज्ञेयं ज्ञात-
व्यमिति।।७।।
अथ नृपस्य शय्यायाः प्रमाणमाह—
कर्माङ्गुलं यवाष्टकमुदरासक्तं तुषैः परित्यक्तम्।
अङ्गुलशतं नृपाणां महती शय्या जयाय कृता ॥८॥
तुषरहित आठ जौ को परस्पर पेटा-पेटी करके मिलाने से एक कर्माङ्गुल होता है
तथा सौ कर्माङ्गुलतुल्य लम्बी शय्या राजाओं के जय के लिये होती है।।८।।
अष्टौ यवा यवाष्टकम्। तुषैः परित्यक्तं तुषरहितम्। परस्परमन्योन्यमुदरासक्तं कर्माङ्गुलसंज्ञं
भवति। तेनाङ्गुलप्रमाणेन नृपाणां राज्ञामङ्गुलशतं महती दीर्घा शय्या कृता रचिता जयाय
भवति।।८।।
अथ नृपपुत्रमन्त्रिबलपतिपुरोधसां शय्याप्रमाणमाह—
नवतिः सैव षडूना द्वादशहीना त्रिषट्कहीना च।
नृपपुत्रमन्त्रिबलपतिपुरोधसां स्युर्यथासङ्ख्यम् ॥९॥
राजपुत्र, मन्त्री, सेनापति और पुरोहित की शय्या क्रम से नब्बे, चौरासी, अठहत्तर
और बहत्तर अंगुल लम्बी होनी चाहिये।।९।।
अङ्गुलानां नवतिर्नृपपुत्रस्य राज्ञः सुतस्य दीर्घा शय्या कार्या। सैव नवतिः षडूना चतुर-
शीत्यङ्गुलानि सचिवस्य मन्त्रिणो दीर्घा कार्या। सैव नवतिर्द्वादशहीनाष्टसप्तत्यङ्गुलानि बलपतेः
सेनापतेः। सैव नवतिस्त्रिषट्कहीना अष्टादशभिरङ्गुलैर्न्यूना पुरोधस आचार्यस्य शय्या दीर्घा
कार्या। दैवज्ञस्याप्येवं समानत्वादिति।।९।।
अथ विष्कम्भलक्षणं पादोच्छ्रायप्रमाणं चाह—
अर्धमतोऽष्टांशोनं विष्कम्भो विश्वकर्मणा प्रोक्तः।
आयामत्र्यंशसमः पादोच्छ्रायः सकुक्ष्यशिराः ॥१०॥
शय्या की लम्बाई के आधे भाग में से उसके ( आधे के ) अष्टमांश घटा देने पर
जो शेष बचे, तत्तुल्य शय्या की चौड़ाई होती है तथा चौड़ाई के तृतीयांशतुल्य कुक्षि और
शिर के साथ पाये की ऊँचाई होती है; यह विश्वकर्मा का मत है।।१०।।
अतोऽस्माद् दैर्घ्यादर्धं दलमष्टांशोनमष्टभागवर्जितं विष्कम्भो विस्तारो विश्वकर्मणा
प्रोक्तः कथितः। तद्यथा—अङ्गुलशतं नृपशय्या। अतोऽर्धं पञ्चाशदङ्गुलानि। एतदष्टांशोनं
त्रिचत्वारिंशदङ्गुलानि सषड्यवानि विष्कम्भो वैपुल्यम्। एवं स्वदैर्घ्यानुसारेणान्यासामपि
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