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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 760 में से

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पृष्ठ 369

शय्यालक्षणाध्यायः ३४१
कल्पनीयम्। आयामत्र्यंशसम इति। आयामस्य दैर्घ्यस्य यस्त्र्यंशस्तृतीयो भागस्तत्सम-
स्तत्तुल्यः पादयोच्छ्रायः कार्यः। स च सकुक्ष्यशिराः सह कुक्ष्येण शिरो वर्तत इति सकुक्ष्य-
शिराः पादोच्छ्राय इति। एवमन्यासामपि स्वदैर्ध्यानुसारेण कल्पनीयम्। तथा च विश्व-
कर्मणोक्तम्—
अन्योन्यमुदरासक्तं वितुषं तु यवाष्टकम्।
कर्माङ्गुलमिति प्रोक्तं तेन मानेन कारयेत्।।
नृपाणामङ्गुलशतं शय्या दीर्घा जयावहा।
नवतिर्नृपपुत्रस्य सा षडूना तु मन्त्रिणः।।
द्वादशोना बलेशस्य त्रिषट्कोना पुरोधसः।
दैवज्ञमानमेवैतत् तुल्यत्वात् कारयेत् ततः।।
दैर्घ्यमष्टमभागोनं विष्कम्भः परिकीर्तितः।
आयामत्र्यंशतुल्यश्च पादोच्छ्रायः प्रकीर्तितः।।
सकुक्ष्यशिरसो ज्ञेयः शय्यायाः शुभकारकः।
ऊनाधिका च या शय्या सा ज्ञेया स्वामिनोऽशुभा।। इति।।१०।।
अधुना दारूणां विशेषफलमाह—
यः सर्वः श्रीपर्ण्या पर्यङ्को निर्मितः स धनदाता।
असनकृतो रोगहरस्तिन्दुकसारेण वित्तकरः ।।११।।
यः केवलशिंशपया विनिर्मितो बहुविधं स वृद्धिकरः।
चन्दनमयो रिपुघ्नो धर्मयशोदीर्घजीवितकृत् ।।१२।।
यः पद्मकपर्यङ्कः स दीर्घमायुः श्रियं श्रुतं वित्तम्।
कुरुते शालेन कृतः कल्याणं शाकरचितश्च ।।१३।।
केवलचन्दनरचितं काञ्चनगुप्तं विचित्ररत्नयुतम्।
अध्यासन् पर्यङ्कं विबुधैरपि पूज्यते नृपतिः ।।१४।।
श्रीपर्णी वृक्ष से बनी हुई शय्या धन देने वाली, असन ( विजयसार ) वृक्ष से बनी
हुई शय्या रोग का हरण करने वाली, तिन्दुकसार से बनी हुई शय्या धन देने वाली,
केवल शिंशपा वृक्ष से बनी हुई शय्या बहुत तरह से वृद्धि करने वाली, चन्दन वृक्ष से
बनी हुई शय्या शत्रु का नाश, कीर्ति और दीर्घायु करने वाली, पद्मक वृक्ष से बनी हुई
शय्या दीर्घायु, लक्ष्मी, धर्म और धन देने वाली एवं शाल वृक्ष से बनी हुई शय्या
कल्याण करने वाली होती है। केवल चन्दन वृक्ष से बनी हुई, सुवर्ण से मढ़ी हुई और
अनेक तरह के रत्नों से व्याप्त शय्या पर शयन करने वाल राजा देवताओं द्वारा भी
पूजित होता है।।११-१४।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA