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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

२१० बृहत्संहिता
उन्नतकुक्षाः क्षितिपाः कुटिलाः स्युर्मानवा विषमकुक्षाः ।
सर्पोदरा दरिद्रा भवन्ति बह्वाशिनश्चैव ॥२०॥
अविकल (परिपूर्ण) पार्श्व (कटि के ऊपर का चार अंगुल भाग) वाला मनुष्य
धनी, निम्न और वक्र पार्श्व वाला अभोगी एवं समान कुक्षी (उदरमध्य भाग) वाला
भोगी और निम्न कुक्षी वाला अभोगी होता है। उन्नत कुक्षी वाला मनुष्य राजा, विषम
कुक्षी वाला कठोर और सर्प के उदर के समान लम्बे उदर वाला मनुष्य निर्धन एवं बहुत
भोजन करने वाला होता है॥१९-२०॥
कट्या उपरि चतुरङ्गुलो भागः पार्श्वशब्दवाच्यः। अविकले परिपूर्णे समांसले पार्श्वे
येषां ते धनिन ईश्वराः। निम्नैः पार्श्वैर्वक्रैश्च दीर्घैर्भोगसन्त्यक्ता भोगरहिताः। कुक्षाशब्देनोदर-
मध्यभाग उच्यते। समा तुल्या कुक्षा येषां ते भोगयुक्ता निम्नाभिः कुक्षाभिर्भोगपरीहीना
भोगरहिता भवन्ति।
उन्नता उच्चा कुक्षा येषां ते क्षितिपा राजानः। विषमा अतुल्या कुक्षा येषां ते मानवाः
पुरुषाः कुटिलाः कठिनाः स्युर्भवेयुः। सर्पसदृशमतिदीर्घमुदरं येषां ते दरिद्रा निर्धना बह्वाशिनः
प्रभूताहाराश्च भवन्ति। तथा च—
पार्श्वैः समांसोपचितैर्धनिनो मानवाः स्मृताः।
निम्नैर्वक्रैश्च विषमैर्नरा भोगविवर्जिताः॥
समकुक्षा भोगयुक्ता निम्नाभिर्भोगवर्जिताः।
नृपाश्चोन्नतकुक्षाः स्युर्विषमाभिर्दुराशयः॥
सर्पोदरा नरा निःस्वाः स्मृता बह्वाशिनस्तथा॥ इति॥१९-२०॥
अथ नाभिलक्षणमाह—
परिमण्डलोन्नताभिर्विस्तीर्णाभिश्च नाभिभिः सुखिनः।
अल्पा त्वदृश्यनिम्ना नाभिः क्लेशावहा भवति॥२१॥
वलिमध्यगता विषमा शूलाद् बाधां करोति नैःस्वं च।
शाठ्यं वामावर्ता करोति मेधां प्रदक्षिणतः ॥२२॥
पार्श्वयिता चिरायुषमुपरिष्टाच्चेश्वरं गवाढ्यमधः।
शतपत्रकर्णिकाभा नाभिर्मनुजेश्वरं कुरुते॥२३॥
गोल, ऊँची और विस्तीर्ण नाभि वाले मनुष्य सुखी होते हैं। छोटी, अदृश्य और
अनिम्न नाभि दुःखदायी होती है। पेट की वलि के मध्य में स्थित एवं विषम नाभि शूली
पर चढ़ाती और निर्धन बनाती है। वामावर्त नाभि शठ एवं दक्षिणावर्त नाभि तत्त्वज्ञानी
करती है। दोनों पार्श्व में आयत नाभि दीर्घायु, ऊपर की तरफ आयत नाभि ऐश्वर्य, नीचे की
तरफ आयत नाभि गायों से युक्त और कमलकोर की आकृति के समान आकृति वाली
नाभि मनुष्य को राजा बनाती है॥२१-२३॥
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