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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 760 में से

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पृष्ठ 237

पुरुषलक्षणाध्यायः २०९
मांसगन्धो महाभोगी याज्ञिको मदिरासमः।
गन्धो येषां क्षारसमस्ते निःस्वा मनुजाः स्मृताः।।
शीघ्रमाश्वेव यो मैथुनगमनशीलः स दीर्घायुश्चिरजीवी भवति। अतोऽन्यथा चिरमैथुनगामी
स्वल्पायुर्भवेद् नरः। चिरं मैथुनगामी यः स ह्रस्वायुर्भवेदिति।।१४-१६।।
अथ स्फिजोर्लक्षणमाह—
निःस्वोऽतिस्थूलस्फिक् समांसलस्फिक् सुखान्वितो भवति।
व्याघ्रान्तोऽध्यर्धस्फिग् मण्डूकस्फिग् नराधिपतिः ।।१७।।
अति स्थूल स्फिक ( कुल्हा = कमर का मांसपिण्ड ) वाला मनुष्य निर्धन, मांसयुक्त
कुल्हा वाला सुखी, ड्योढे कुल्हा वाला बाघ के द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने वाला और
मेढक के समान कुल्हा वाला मनुष्य राजा होता है।।१७।।
अतिस्थूलौ स्फिजौ यस्य स निःस्वो निर्धनो भवति। समांसलौ मांससंयुक्तौ स्फिजौ
यस्य स सुखान्वितः सुखयुक्तो भवति। योऽध्यर्धस्फिक् स व्याघ्रान्तः। व्याघ्रः प्राणी तं
मारयति। मण्डूको भेकस्तत्सदृशौ स्फिजौ यस्य स नराधिपती राजा भवति। तथा च—
अतिस्थूलौ स्फिजौ यस्य निर्धनः स भवेन्नरः।
समांसलस्फिक् सुखितो मण्डूकस्फिग् नराधिपः।।
अध्यर्धस्फिग् नरो यस्तु व्याघ्रान्तः स तु कीर्तितः।। इति।।१७।।
अथ कटिजठरलक्षणमाह—
सिंहकटिर्मनुजेन्द्रः कपिकरभकटिर्धनैः परित्यक्तः।
समजठरा भोगयुता घटपिठरनिभोदरा निःस्वाः ।।१८।।
सिंह के समान कटि वाला मनुष्य राजा, ऊँट के समान कटि वाला निर्धन,
समान ( न ऊँचा, न नीचा ) उदर वाला भोगी और घड़े या हाँड़ी के समान उदर वाला
मनुष्य निर्धन होता है।।१८।।
सिंहसदृशी कटिर्यस्य स मनुजेन्द्रो राजा भवति। कपिर्वानरः। करभ उष्ट्रः। कपिकर-
भसदृशी कटिर्यस्य स धनैर्वित्तैः परित्यक्तो वर्जितः। समजठरास्तुल्योदरा न निम्नं नोन्नतं
जठरं येषां ते भोगयुता भोगिनः। घटः कुम्भः, पिठरो भाण्डविशेषः, तन्निभमुदरं येषां
ते निःस्वा निर्धनाः। तथा च—
सिंहतुल्या कटिर्यस्य स नरेन्द्रो न संशयः।
श्वशृगालखरोष्ट्राणां तुल्या यस्य स निर्धनः।।
समोदरा भोगयुता विषमा निर्धनाः स्मृताः।। इति।।१८।।
अथ पार्श्वकुक्षोदरलक्षणमाह—
अविकलपार्श्वा धनिनो निम्नैर्वक्रैश्च भोगसन्त्यक्ताः।
समकुक्षा भोगाढ्या निम्नाभिर्भोगपरिहीनाः ।।१९।।
बृ० भ० द्वि०-१४
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