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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

१५२ बृहत्संहिता
नृपभयमव्यङ्गायां हीनाङ्गायामकल्यता कर्तुः ।
शातोदर्यां क्षुद्भयमर्थविनाशः कृशाङ्गायाम् ॥५०॥
मरणं तु सक्षतायां शस्त्रनिपातेन निर्दिशेत् कर्तुः ।
वामावनता पत्नीं दक्षिणविनता हिनस्त्यायुः ॥५१॥
अन्धत्वमूर्ध्वदृष्ट्या करोति चिन्तामधोमुखी दृष्टिः ।
सर्वप्रतिमास्वेयं शुभाशुभं भास्करोक्तसमम् ॥५२॥
एक हाथ ऊँची सूर्य की प्रतिमा शुभ, दो हाथ ऊँची धन देने वाली तथा तीन हाथ
ऊँची प्रतिमा क्षेम और सुभिक्ष के लिये होती है। अधिक अंग वाली प्रतिमा राजा से
भय, हीनांग प्रतिमा बनाने वाले को रोगी, कृश उदर वाली प्रतिमा क्षुधा का भय और
कृश अंग वाली प्रतिमा धन का नाश करती है। क्षत प्रतिमा बनाने वाले की शस्त्र से
मृत्यु, बायीं ओर झुकी हुई प्रतिमा बनाने वाले की पत्नी का नाश और दाहिनी तरफ
झुकी हुई प्रतिमा आयु का नाश करती है। प्रतिमा की दृष्टि ऊपर की तरफ हो तो बनाने
वाले को अन्धा और नीचे की तरफ हो तो बनाने वाले को चिन्तित करती है। सूर्य की
प्रतिमा के सम्बन्ध में उक्त शुभाशुभ फल ही अन्य प्रतिमाओं के सम्बन्ध में भी जानना
चाहिये।।४९-५२।।
सौम्या तु हस्तमात्रेति । हस्तमात्रा हस्तप्रमाणा दीर्घा प्रतिमा सौम्या शुभावहा भवति।
हस्तद्वयोच्छ्रिता वसुदा धनप्रदा भवति। या त्रिचतुर्हस्तप्रमाणा सा यथासङ्ख्यं क्षेमसुभिक्षाय
भवेत्। त्रिहस्ता क्षेमाय चतुर्हस्ता सुभिक्षाय भवेत् स्यात्।
नृपभयमिति । अत्यङ्गायामिति । स्थूलावयवायां नृपभयं राजभयं भवति। हीनाङ्गायां
प्रमाणहीनावयवायां कर्तुरकल्यता अनारोग्यम्। शातोदर्यां तनूदरायां क्षुद्भयं भवति। कृशा-
ङ्गायां दुर्बलावयवायामर्थविनाशो वित्तक्षयः।
सक्षतायां क्षतसंयुक्तायां प्रतिमायां कर्तुः शस्त्रनिपातेन मरणं निर्दिशेद्वदेत्। वामे
वामभागे अवनता प्रतिमा कर्तुः पत्नीं भार्यां हिनस्ति मारयति, दक्षिणे विनता आयुर्जीवितं
हिनस्ति मारयति। आयुषः क्षयं करोति। अन्धत्वमूर्ध्वदृष्ट्या प्रतिमा नेत्रनाशं करोति। अधो-
मुखी दृष्टिश्चिन्तां शोकं करोति। एवं भास्करोक्तसमं सूर्यकथिततुल्यं शुभाशुभं सर्वासु
प्रतिमास्वन्यासु ज्ञेयं ज्ञातव्यम्।।४९-५२।।
अधुना लिङ्गस्य लक्षणमाह—
लिङ्गस्य वृत्तपरिधिं दैर्घ्येणासूत्र्य तत्रिधा विभजेत् ।
मूले तच्चतुरस्रं मध्ये त्वष्टाश्रिं वृत्तमत्तः ॥५३॥
चतुरस्रमवनिखाते मध्यं कार्यं तु पिण्डिकाश्वभ्रे ।
दृश्योच्छ्रायेण समा समन्ततः पिण्डिका श्वभ्रात् ॥५४॥
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