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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 760 में से

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पृष्ठ 181

प्रतिमालक्षणाध्यायः १५३
लिङ्ग की परिधि को लम्बाई में सूत्र से नाप कर उसके तुल्य पत्थर, लकड़ी या
मणि का लिङ्ग बनाना चाहिये। उसको तीन भाग करके मूल का प्रथम भाग चतुरस्र,
मध्य भाग अष्टास्र और ऊपर का भाग गोल बनाना चाहिये। प्रतिमा के चतुरस्र भाग को
भूमि में गाड़ना चाहिये, अष्टास्र भाग को पिण्डिका ( जलहरी = जलधरी ) के गड्ढे में
रखना चाहिये और वर्तुल भाग को ऊपर रखना चाहिये। ऊपर के दृश्य वर्तुल भाग की
ऊँचाई के तुल्य ही गड्ढे के चारो और पीठिका बनानी चाहिये।।५३-५४।।
लिङ्गस्य वृत्तभागे यः परिणाहस्तं सूत्रेण परिच्छिद्य तत् सूत्रं दैर्घ्येण दीर्घत्वेन आसूत्र्य
मित्वा तत्प्रमाणं पाषाणं काष्ठं मणिं वा कृत्वा त्रिधा विभजेत्, भागत्रयं कुर्यात्। ततो
लिङ्गस्य मूले योऽसौ त्रिभागस्तं चतुरस्रं कार्यम्। मध्ये यस्तमष्टाश्रिं कुर्यात्। अतः परं
यस्तृतीयभागस्तं वृत्तं परिवर्तुलं कुर्यात्।
तत्र चतुरस्रं यद्भागं तदवनिखाते भूखाते कार्यं क्षेप्यम्। मध्यं यदष्टाश्रि तत्
पिण्डिकाश्वभ्रे पीठगर्ते क्षिपेत्। श्वभ्रात् पीठविवरात् समन्ततः सर्वासु दिक्षु पीठिका दृश्यो-
च्छ्रायेण समा कार्या। दृश्यभागस्य परिवर्तुलस्य लभ्यो य उच्च्रायस्तत्समः। एतदुक्तं
भवति—यावत्प्रमाणं वृत्तभागस्य दैर्घ्यं तावत्प्रमाणं समन्ततः पीठिकापृथुत्वं कार्य-
मिति।।५३-५४।।
अन्यद्विशेषलक्षणमाह—
कृशदीर्घं देशघ्नं पार्श्वविहीनं पुरस्य नाशाय।
यस्य क्षतं भवेद् मस्तके विनाशाय तल्लिङ्गम् ॥५५॥
यदि शिवलिङ्ग पतला या लम्बा हो तो देश का नाश, दोनों तरफ से खण्डित हो तो
नगर का नाश और क्षत मस्तक वाला हो तो स्वामी का नाश करता है।।५५।।
यल्लिङ्गं कृशं दुर्बलं दीर्घमभ्युच्छ्रितं तद्देशघ्नं देशं हन्ति। यत् पार्श्वभ्यां विहीनं
तत् पुरस्य नगरस्य नाशाय भवति। यस्य मस्तके मूर्धनि क्षतं छिद्रं भवेत् स्यात् तल्लिङ्गं
विनाशाय भर्तुरिव भवति।।५५।।
अथ मातृगण एवं तस्य लक्षणमाह—
मातृगणः कर्तव्यः स्वनामदेवानुरूपकृतचिह्नः।
रेवन्तोऽश्वारूढो मृगयाक्रीडादिपरिवारः ॥५६॥
मातृगणों की प्रतिमा अपने नाम में जो देवता हों, उनके सदृश बनानी चाहिये। जैसे
ब्रह्मा के तुल्य ब्राह्मी की, इन्द्र के तुल्य इन्द्राणी की, शिव के तुल्य शिवा की इत्यादि;
परन्तु इन प्रतिमाओं में स्तन-शोभा, मध्य में कृश और पृथु नितम्ब भी बना देना चाहिये,
जिससे कि स्त्री की शोभा प्रतिमा में अवतरित हो जाय। घोड़े पर सवार और मृगयारूप
क्रीडा में संलग्न परिवार वाली प्रतिमा रेवन्त (सूर्य के पुत्र) की बनानी चाहिये।।५६।।
मातृगणो मातृसमूहः स्वनामदेवानुरूपकृतचिह्नः कर्तव्यः। स्वनामा यो देवस्तदनुरूपं
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