बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० बृहत्संहिता
सोलह हाथ विस्तार वाला होता है। 'गुहराज' प्रासाद गुह की आकृति वाला और सोलह
हाथ विस्तार वाला होता है तथा इन दोनों ही प्रासादों का बलभी तीन चन्द्रशालाओं से
समन्वित होता है॥२५॥
कुञ्जरसंज्ञो गजपृष्ठो हस्तिपृष्ठाकारः। षोडशहस्तः समन्ततो मूलात्, मूलात् षोडश-
हस्तः समन्ततश्चतुर्दिक्कं षोडश हस्ता विष्कम्भः अन्येषां पाठः षोडशहस्तः सुविस्तरो
मूलात्। एवं द्वात्रिंशद्धस्तास्तस्यौच्च्यम्। उत्थितगजाकार एकभूमिकः। गुहराजो गुहाकारः।
षोडशकः षोडश हस्ता विस्तीर्णो द्वात्रिंशद्धस्तास्तस्यौच्च्यम्। एकभूमिकश्च। अनयोर्द्वयोरपि
वलभी कुहरैस्त्रिचन्द्रशाला भवेत् स्यात्। तिसृभिश्चन्द्रशालाभिर्युक्ता इत्यर्थः। तथा च
काश्यपः—
कुञ्जरो गजपृष्ठाभो हस्ताः षोडश विस्तृतः।
गुहराजो गुहाकारो विष्कम्भात् षोडश स्मृतः॥
त्रिचन्द्रशाला वलभी तयोः कार्या सुलक्षणा।
दशमैकादशावेतौ प्रासादौ द्वौ प्रकीर्तितौ॥ इति॥२५॥
अधुना वृषहंसघटानां लक्षणमाह—
वृष एकभूमिशृङ्गो द्वादशहस्तः समन्ततो वृत्तः।
हंसो हंसाकारो घटोऽष्टहस्तः कलशरूपः॥२६॥
'वृष' नामक प्रासाद एक भूमि वाला, एक शृङ्ग वाला, बारह हाथ विस्तार वाला
और चारो तरफ से वृत्ताकार होता है। 'हंस' प्रासाद हंस पक्षी की आकृति वाला, बारह
हाथ विस्तार वाला, एक भूमि और एक शृङ्ग वाला होता है। 'घट' नामक प्रासाद कलश
की आकृति वाला, आठ हाथ विस्तार वाला, एक शृङ्ग और एक भूमि वाला होता
है॥२६॥
वृषसंज्ञ एकभूमिशृङ्गः, एकया भूमिकयैकेन शृङ्गेण शिखरेण युक्तः। द्वादशहस्तो
द्वादश हस्तो विस्तीर्णः। विष्कम्भाच्चतुर्विंशतिर्हस्तास्तस्यौच्च्यम्। समन्ततः सर्वासु
दिक्षु वृत्तः परिवर्तुलः। हंसो हंसाकारो हंससदृशः। चञ्चुपक्षपुच्छयुक्तः। द्वादशहस्तविस्तीर्णः।
चतुर्विंशतिर्हस्तास्तस्यौच्च्यम्। एकभूमिकश्च। घटसंज्ञः कलशरूपः कलशाकारः। अष्टहस्तो
विस्तीर्णः। विष्कम्भात् षोडशहस्तास्तस्यौच्च्यम्। एकभूमिकश्च सर्व एकशृङ्गाः। तथा
च काश्यपः—
वृषो द्वादशहस्तस्तु समवृत्तैकभूमिकः।
शृङ्गेणैकेन संयुक्तः प्रासादः परिकीर्तितः॥
हंसो हंसाकृतिर्ज्ञेयो हस्तो द्वादश विस्तृतः।
एकभूमिकया युक्तः पक्षपुच्छाद्यलंकृतः॥
घटः कलशरूपस्तु विस्तीर्णोऽष्टकरः स्मृतः॥ इति॥२६॥
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