बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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परिवर्तनों के आधार पर अपनी भविष्यवाणियों में सुधार करते रहते हैं। आचार्य वराह-
मिहिर ने कहा है कि 'यदि दैवज्ञ प्रतिदिन आकाशलक्षण तथा वृष्टिलक्षण का अवलोकन
सावधान चित्त से करता रहे तो उसकी भविष्यवाणी मुनियों की वाणी की तरह सदैव
सत्य होगी।'¹
यद्यपि मौसम विज्ञान अत्यन्त दुरूह है; फिर भी संहिताओं से इसे अत्यन्त सरल
ढंग से सामान्य कृषक के भी समझने-योग्य बतलाया गया है; ताकि कृषक मौसम के
ज्ञान से अपनी कृषि को सुरक्षित रख सके। भारतीय मनीषियों ने कृषि को अत्यधिक
महत्त्वपूर्ण बतलाया है। कृषि के साथ वायु-वृष्टि का सम्बन्ध होने से दोनों पर गहन
विचार किया है। कृषि के लिये वृष्टि आवश्यक होती है; इसलिये दोनों का महत्त्व
बतलाते हुये कहा है कि—
'समस्त कृषि वृष्टि के आधीन है। प्राणी मात्र का जीवन भी वृष्टि ( जल ) पर ही
आश्रित है। अतः सर्वप्रथम वृष्टि का ज्ञान करना चाहिये।'²
इतना ही नहीं; कृषि की प्रशंसा में अन्न के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुये कहा
गया है कि—कानों में, गलें में तथा हाथों में भले ही रत्नजटित स्वर्ण आभूषण हों;
किन्तु यदि अन्न नहीं होगा तो उपवास ही करना पड़ेगा।'³ अर्थात् क्षुधा की शान्ति केवल
अन्न से ही होगी, स्वर्ण और रत्नों से नहीं। अन्न का साधन एकमात्र कृषि है। इसीलिये
शास्त्रकारों ने कृषि तथा गाय और बैलों के संरक्षण पर विशेष बल दिया है। कृषि की
गुणवत्ता, बीज का संरक्षण, फलों का उत्पादन, वृक्षों और फसलों के रोगों का निदान
और चिकित्सा आदि ऐसे अनेक विषय हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध प्राणीमात्र से है और
संहिताओं में उनका विशद् प्रतिपादन किया गया है।
इनके अतिरिक्त अन्तरिक्षसम्बन्धी अनेक आश्चर्यजनक घटनाओं का भी विवेचन
संहिताग्रन्थों में मिलता है। कभी-कभी कुछ घटनायें आज के वैज्ञानिकों को भी आश्चर्य-
चकित कर देती हैं। इस प्रकार की अनुत्तरित जिज्ञासाओं की भी चर्चा संहिताओं में
यत्र-तत्र मिल जाती है। उदाहरण के रूप में एक घटना का उल्लेख कर देना आवश्यक
समझता हूँ। जब अन्तरिक्षयात्री 'नील आर्मस्ट्रांग' चन्द्रतल पर अवतरण करने जा रहा
१. दैवविदविहितचित्तो द्युनिशं यो गर्भलक्षणे भवति।
तस्य मुनेरिव वाणी न भवति मिथ्याम्बुनिर्देशे।। ( बृ० सं०, गर्भल०-३ )
२. वृष्टिमूला कृषिः सर्वा वृष्टिमूलञ्च जीवनम्।
तस्मादादौ प्रयत्नेन वृष्टिज्ञानं समाचरेत्।। ( कृ० पा०-२.१ )
३. कण्ठे कर्णे च हस्ते च सुवर्णं विद्यते यदि।
उपवासस्तथापि स्यादन्नाभावेन देहिनाम्।। ( कृ० पा०-१.५ )
अन्नं हि धान्यसञ्जातं धान्यं कृष्या विना न च।
तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्।। ( कृ० पा०-१.७ )
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था तो उस समय चन्द्रमण्डल पर क्षणिक प्रकाश दिखलाई दिया, जिसको देखकर
आश्चर्यचकित नील आर्मस्ट्रांग ने पृथिवी पर स्थित अन्तरिक्ष अनुसन्धान केन्द्र को
इसकी सूचना दी। सभी के लिये यह क्षणिक प्रकाश एक रहस्य था। ऐसी ही एक
घटना का उल्लेख पैट्रिक मूरे ने भी अपनी पुस्तक Guide to the Moon में किया
है कि 'जब मैंने अपने दूरदर्शक से चन्द्रमा को देखा तो कुछ क्षण के लिए चन्द्रविम्ब
नीले प्रकाश से युक्त दिखाई दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे नीले बल्ब के
प्रकाश में चन्द्रमा को देख रहा हूँ; किन्तु यह दृश्य कुछ ही क्षणों के बाद समाप्त हो
गया तथा चन्द्रमा अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देने लगा।' १
इस तरह के क्षणिक परिवर्तन निश्चय ही आश्चर्योत्पादक हैं; किन्तु इन विचित्र
घटनाओं से संहिताकार भी अपरिचित नहीं हैं। उन्होंने बड़े ही सहज भाव में लिख
दिया है कि 'चन्द्रविम्ब पर कभी पीला, कभी नीला, कभी हरा क्षणिक प्रकाश होता
रहता है।' २ इन प्रकाश-परिवर्तनों के प्रभावों का भी उल्लेख किया है; परन्तु इस प्रकार
के प्रकाशों का कारण आज भी एक रहस्य ही बना हुआ है। संहिताग्रन्थों को देखने से
प्रतीत होता है कि आधुनिक युग में भी अनेक ऐसे विषय हैं जिन पर गहन शोध के
अपार अवसर उपलब्ध हैं। इनके उल्लेख की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है; यतः
संहिताग्रन्थ स्वयं में ही प्रमाण हैं।
वराहमिहिर
आचार्य वराहमिहिर ज्योतिष शास्त्र के प्रतिनिधि आचार्य हैं। इन्होंने ज्योतिष शास्त्र
के तीनों स्कन्धों पर अद्वितीय कार्य किया है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि जिस प्रकार
भगवान् वराह ने रसातल से पृथ्वी को उबार कर बाहर लाया, उसी प्रकार कालप्रवाह
में निमग्न ज्योतिष के सिद्धान्त स्कन्ध को इन्होंने उबारा। अपने मानक ग्रन्थ 'पञ्च-
सिद्धान्तिका' में इन्होंने सौर, पैतामह, वसिष्ठ, रोमक और पौलिश सिद्धान्तों का संग्रह
किया तथा उनकी गुणवत्ता को परख कर उन पर अपनी टिप्पणी भी दी; जो इस प्रकार
है—'पौलिश सिद्धान्त स्पष्ट है। उसी के आसन्न रोमक भी है; किन्तु सौर सिद्धान्त
इससे भी शुद्ध ( स्पष्टतर ) है। अन्य दो ( पैतामह और वसिष्ठ ) अत्यन्त ( प्राचीन
होने से ) भ्रष्ट हो गये हैं।
१. The Moon is shining down from a slightly misty sky with a lovely
shimmering blueness like an electric glimmes, utterly unlike any-
thing I have never seen before.
२. विलग्नमध्यो नीलाभो वज्रसंस्थानसंस्थितः।
मध्यच्छिद्रविलीनाभो भयं कारयते महत्।।
हरितो पीतये विद्यात् पशूनां चाप्युपद्रवम्।
पीतवर्णो गजान् हन्ति पीतो व्याधिकरस्तथा।। ( अद्भूतसागर )
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संहिता स्कन्ध में बृहत्संहिता या वाराही संहिता उल्लेखनीय है। अद्यावधि उपलब्ध
संहिताओं में बृहत्संहिता की अप्रतिम प्रतिष्ठा है। संक्षेप में अधिकाधिक विषयों का
समावेश इस ग्रन्थ में आचार्य ने किया है।
इसी प्रकार होरास्कन्ध में वराहविरचित 'बृहज्जातक' की प्रतिष्ठा है। आचार्य भट्टोत्पल
ने वराह की दोनों कृतियों—बृहत्संहिता और बृहज्जातक पर अपनी सुप्रसिद्ध टीका
लिखी है, जो 'भट्टोत्पल' के नाम से ही जानी जाती है।
आचार्य वराहमिहिर का जन्म अवन्ती ( उज्जैन ) के पास कापित्थक नामक स्थान
में हुआ था। इनके पिता कर नाम आदित्य दास था। ये सूर्य के उपासक थे। इसके
आधार पर ये मगद्विज कुल में उत्पन्न थे। ये सभी सूचनायें वराहमिहिर द्वारा लिखित
बृहज्जातक के एक पद्य¹ के आधार पर प्राप्त होती हैं। आज के पुरातात्त्विक साक्ष्य भी
अवन्ती के पास ही इनके जन्मस्थान की पुष्टि करते हैं। इन्होंने अपने कुल एवं जन्म-
स्थान का तो उल्लेख किया है; किन्तु जन्मकाल का उल्लेख नहीं किया है। अतः
पञ्चसिद्धान्तिका² में उल्लिखित शक ४२७ के आधार पर इनका जन्मसमय शक
४०७-४१२ ( सन् ४८५-४९० ) के बीच माना जाता है। ज्योतिर्विदाभरण में जिस
वराहमिहिर का उल्लेख है, वे कोई अन्य हो सकते हैं अथवा काल्पनिक भी हो सकते
हैं; क्योंकि विक्रमादित्य के नवरत्नों में जिन आचार्यों के नाम हैं, उनकी एक कालावधि
में उपस्थिति सम्भव नहीं है। स्वयं ज्योतिर्विदाभरण के लेखक ने अपनी ही लेखनी से
अपने-आपको सन्देह के घेरे में डाल दिया है। अतः निःसंशय ही पञ्चसिद्धान्तिका के
वराहमिहिर ज्योतिर्विदाभरण में उल्लिखित वराहमिहिर से सर्वथा भिन्न हैं।
इनके तिरोधान का काल सन्दिग्ध है। एक अज्ञात लेखक के आयुष्य विवरण के
आधार पर इनका देहावसान शक ५०९ में हुआ।³ निश्चित तिथि ज्ञात न होने पर भी
कृतियों के आधार पर यह निश्चित ही है कि पाँचवी शताब्दी के ये मूर्धन्य खगोलशास्त्री
थे। इनके ज्ञान तथा इनके द्वारा प्रयुक्त शब्दावलियों के आधार पर इनके विषय में श्रुति
है कि इन्होंने विदेशों में भ्रमण करके भी ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन किया था। कुछ
इतिहासकारों का मत है कि ये विदेशों में भ्रमण नहीं किये थे; अपितु इनके समय तक
देश और विदेशों में ज्ञान का आदान-प्रदान हो चुका था। इनके
पूर्ववर्ती साहित्य में भी विदेशी शब्दों के उल्लेख मिलते हैं।⁴ आचार्य वराहमिहिर
१. आदित्यदासतनयस्तदवाप्तबोधः कापित्थके सवितृलब्धवरप्रसादः।
आवन्तिको मुनिमतान्यवलोक्य सम्यग्घोरां वराहमिहिरो रुचिरां चकार।।
( बृ० जा० उप०, अ०-९)
२. सप्ताश्वि वेदसङ्ख्यम्।
३. नवाधिकपञ्चशतसङ्ख्यशाके वराहमिहिराचार्यो दिवङ्गतः।। ( भारतीय ज्योतिष )
४. द्रष्टव्य—भारतीय ज्योतिषं।
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विदेश गये थे या नहीं? यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्त्वपूर्ण यह है कि वे
खुले मस्तिष्क वाले, उदार दृष्टिकोण एवं विश्वबन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत मनीषी
थे। उनकी यह उदारता एक पद्य से ज्ञात होती है, जिसका भाव यह है कि 'जिसके पास
सम्यक् ( संशयरहित पुष्ट ) ज्ञान होता है, वह ऋषि के समान पूज्य होता है ( वहाँ
जाति का पन्थ बाधक नहीं होता ) और इस प्रकार का ज्ञान यदि किसी विप्र में हो तो
फिर कहना ही क्या है?'१ यहाँ 'म्लेच्छ' शब्द का प्रयोग हीनार्थ-बोधक नहीं है; अपितु
शास्त्रों में वैदिक ( आर्य ) संस्कृति के अतिरिक्त अन्य संस्कृति के अनुयायियों के लिए
इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि आचार्य वराहमिहिर किसी भी
देश, किसी भी जाति एवं किसी भी व्यक्ति से ज्ञानार्जन में परहेज के पक्षधर नहीं थे।
बृहत्संहिता
उपलब्ध संहिताओं में बृहत्संहिता सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं सुव्यस्थित है। इसमें
संगृहीत विषयों को देखने से प्रतीत होता है कि आचार्य वराहमिहिर ने यत्र-तत्र से
महत्त्वपूर्ण विषयों का सङ्कलन कर भावी पीढ़ी के लिये गहन अध्ययन एवं अनुसन्धान
की प्रभूत सामग्री प्रदान की है। आज आवश्यकता है—बृहत्संहिता के प्रत्येक अध्याय
पर पृथक्-पृथक् कार्य ( अनुसन्धान ) करने की; तभी इस ग्रन्थ की सार्थकता अद्यतन
के युग में सिद्ध होगी तथा ज्योतिष शास्त्र को एक नया आयाम प्राप्त हो सकेगा। आचार्य
अत्यन्त दूरदर्शी थे। उन्होंने अपने काल में ही अनुमान लगा लिया था कि भविष्यत्
काल में ज्योतिष शास्त्र अल्पज्ञों एवं पाखण्डियों के हाथों में जाकर अपनी प्रतिष्ठा पर
प्रश्नचिह्न लगा सकता है। इसीलिये उन्होंने इस शास्त्र के अध्येताओं की अर्हता का
प्रतिपादन किया है।
सांवत्सर सूत्राध्याय के १५ पद्यों में आचार्य ने केवल दैवज्ञों का लक्षण निरूपित
किया है। उन लक्षणों से युक्त व्यक्ति को ही ज्योतिष शास्त्र पढ़ना चाहिये अथवा जिसे
ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन की जिज्ञासा हो, उस व्यक्ति को सर्वप्रथम अपने अन्दर उन
गुणों को धारण करना चाहिये।
दैवज्ञ-लक्षण बताने के बाद २२-३९ पद्यों में दैवज्ञों की प्रशंसा तथा पाखण्डियों
की निन्दा की गई है। किसी भी शास्त्र को उपयुक्त, जिज्ञासु एवं प्रबुद्ध व्यक्ति के हाथ
में देने से उसका विस्तार होता है; अन्यथा शास्त्र की हानि होती है। आचार्य ने लिखा
है—'संहितापारगश्च दैवचिन्तको भवति।' विना संहिताओं के सम्यग् अध्ययन के
व्यक्ति दैवचिन्तक नहीं हो सकता। प्रकृति और भावी घटनाओं को जानने के लिये
अन्तरिक्ष में प्रतिक्षण हो रहे परिवर्तनों पर दृष्टि रखना आवश्यक है। अतः आचार्य ने
सर्वप्रथम पात्रता-निर्धारण के अनन्तर सूर्यादि ग्रहों, अगस्त्य तारा तथा सप्तर्षि मण्डल
१. म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यग् ज्ञानं प्रतिष्ठितम्।
ऋषिवत्तेऽपि पूज्यन्ते किं पुनर्देवविद् द्विजः।। ( बृ० सं०-२.३० )
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के चार ( सञ्चरण ) एवं उनके परिणामों को परिभाषित किया। तदनन्तर पृथ्वी का
( भूगोल का ) वर्णन 'कूर्मचक्र' के अन्तर्गत किया है, जिसके आधार पर भूमण्डल पर
किसी प्रकार के प्रकृतोत्पातों के क्षेत्रों का निर्धारण किया जाता है। तदनन्तर 'नक्षत्रव्यूह'
नामक अध्याय में नक्षत्रों के प्रभावक्षेत्र का उल्लेख किया, जो अपने-आपमें अद्वितीय
और महत्त्वपूर्ण है। जैसे कि यदि मृगशिरा नक्षत्र पर कोई दुष्प्रभाव ग्रहचार अथवा
अन्तरिक्षोत्पात द्वारा पड़ता है तो उसके प्रभावक्षेत्र में आने वाले सभी प्रभावित होंगे।
मृगशिरा का प्रभावक्षेत्र बृहत्संहिता के आधार पर इस प्रकार है—सुगन्धियुक्त द्रव्य,
वस्त्र, जलोत्पन्न पदार्थ, पुष्प, फल, रत्न, वनवासी, पक्षी, मृग, सोमरस पीने वाले,
गायक ( सङ्गीतज्ञ ) का भी तथा सन्देहवाहक।१
इसी प्रकार सभी नक्षत्रों के प्रभावक्षेत्रों का उल्लेख किया गया है। तदनन्तर
'ग्रहभक्ति' अध्याय में ग्रहों से सम्बन्धित भूभाग का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार
प्रारम्भिक अध्यायों में प्राकृत उत्पातों से प्रभावित होने वाले पदार्थों तथा क्षेत्रों का
उल्लेख करने के अनन्तर भूस्थ एवं आन्तरिक्ष उत्पातों तथा आकाशीय परिवर्तनों का
उल्लेख किया गया है। २१वें अध्याय से २८वें अध्याय तक वायु और वृष्टि का
विवेचन किया गया है, जो अपने-आपमें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं कृषि की दृष्टि से
अत्यन्त उपयोगी है। २९ से ३९ अध्यायों तक भूमि एवं आन्तरिक्षोत्पातों का उल्लेख
है। ३८वाँ अध्याय 'रजोवर्षाणाध्याय' नाम से निर्दिष्ट है। यद्यपि यह अध्याय सभी संस्करणों
में नहीं है; किन्तु है महत्त्वपूर्ण। 'रजोवर्षण' नाम ही इसके वास्तविक अर्थ को व्यक्त
कर रहा है। इसमें आकाश से धूलि की वृष्टि का वर्णन है। कुछ लोगों ने भ्रमवश इसमें
भूमि से उड़ने वाली धूलि का वर्णन ही मान लिया है, जो कि उपयुक्त नहीं है। आज
आधुनिक विज्ञान के समक्ष भी यह धूलि ( Cosmic dust ) रहस्य बनी हुई है। ४०
से ५२ अध्याय तक प्रकीर्ण विषय हैं, जिनमें ५१वाँ अध्याय अङ्गविद्या का है। इसमें
शरीर के अवयवों के लक्षणों का निरूपण किया गया है।
५३वें अध्याय से बृहत्संहिता का उत्तरार्ध माना जाता है। सम्भवतः पूर्वार्ध और
उत्तरार्ध का विभाजन आदरणीय गुरुवर्य स्व० पं० अवधविहारी त्रिपाठी जी द्वारा सम्पादित
एवं वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित बृहत्संहिता के गवेषणापूर्ण
संस्करण के आधार पर ही माना गया है। उत्तरार्ध वास्तुविद्या से प्रारम्भ होता है। ५३
से ६० अध्याय तक वास्तुविद्या का विवेचन है, जिसमें प्रासाद-निर्माण तथा उन पर
वज्रलेप ( प्लास्टर ) की भी महत्त्वपूर्ण चर्चा की गई है। साथ ही ५४वें अध्याय में
भूगर्भस्थ जल के स्रोत का भी उल्लेख किया गया है, जो 'दकार्गल' या 'उदकार्गल'
नाम से जाना जाता है। आवासीय क्षेत्र में जल के स्रोत तथा पर्यावरण की दृष्टि से वृक्ष
१. मृगशिरसि सुरभिवस्त्राब्जकुसुमफलरत्नवनचरविहङ्गाः।
मृगसोमपीथिगान्धर्वकामुकाः लेखहराश्च ।। ( बृ० सं०-१५.३ )
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की आवश्यकता होती है। इसीलिये वास्तुविद्या के साथ इनका भी उल्लेख है। विशेषता
यह है कि ‘वृक्षायुर्वेद’ नाम से वृक्षों में होने वाली व्याधियों एवं उनके उपचार की विधि
भी उक्त अध्याय में बताई गई है। ६२ से ६७ अध्याय तक पशु-पक्षियों के लक्षण,
६८ से ७० तक स्त्री-पुरुषों के लक्षण एवं ७१ से ७९ तक स्त्री-पुरुषों एवं राजचिह्नों
से सम्बन्धित विविध विषयों का निरूपण किया गया है।
८० से ८३ तक रत्नों के लक्षण, ८४ में दीपज्वाला-लक्षण, ८५वें में दन्तकाष्ठलक्षण
तथा ८६ से ९६ तक शकुन एवं पशु-पक्षियों की चेष्टाओं का विवेचन है। ९७ से
१०५ अध्यायों तक ग्रह-नक्षत्रों से सम्बन्धित परिणामों के उल्लेख के अनन्तर १०६
तथा १०७ अध्यायों में ग्रन्थ का उपसंहार किया गया है।
यदि हम इन विषयों का सूक्ष्मेक्षण करते हैं तो पाते हैं कि प्रत्येक अध्याय एक
स्वतन्त्र एवं अनुसन्धानयोग्य विषय को स्वयं में समाविष्ट किये हुये है। एक ग्रन्थ में
इतने विषयों का संकलन वस्तुतः गागर में सागर के समान ही है। आचार्य वराहमिहिर
ने इतने विषयों को संगृहीत कर आगे कार्य करने के लिये सामग्री उपलब्ध कराई है।
आज आवश्यकता है—बृहत्संहिता को भाषान्तर के साथ सर्वसुलभ कराने की; ताकि
आधुनिक वैज्ञानिकों के साथ संयुक्त रूप से इस दिशा में शोधकार्य को प्रोत्साहित किया
जा सके। बृहत्संहिता का वास्तविक उपयोग तभी संभव है, जब पारम्परिक और
आधुनिक विज्ञानवेत्ता समवेत प्रयास कर इसमें निहित विज्ञान को प्रयोग के आधार पर
परिवर्धित कर प्रकाशित करें और व्यवहार में लायें।
आचार्य भट्टोत्पलकृत विवृति से समन्वित बृहत्संहिता के हिन्दी रूपान्तरणसहित
पुनः प्रकाशन पर अतिशय प्रसन्नता का अनुभव करते हुये आशा करता हूँ कि आधुनिक
वैज्ञानिक भी बृहत्संहिता के मनन में अभिरुचि लेंगे तथा सम्बन्धित विषयों में शोध एवं
परीक्षणों द्वारा प्राचीन ज्ञान-परम्परा को आगे बढ़ाने में अपना सक्रिय योगदान करेंगे।
अन्त में पुनः श्री अच्युतानन्द झाकृत हिन्दी टीका से समन्वित बृहत्संहिता के
वर्तमान प्रकाश्यमान संस्करण के प्रकाशक—चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी के स्वत्वा-
धिकारी गुप्तबन्धुओं को मैं अपनी हार्दिक शुभकामनाओं से विभूषित करते हुये कामना
करता हूँ कि वे इसी प्रकार अनवरत रूप से माँ भारती की सेवा में सतत प्रयत्नशील
रहेंगे एवं जिज्ञासुओं को लाभान्वित कराते रहेंगे।
वैशाख शुक्ल-३ प्रो० रामचन्द्र पाण्डेय
संवत्-२०६२ सङ्कायप्रमुखचरः
संस्कृतविद्याधर्मविज्ञानसङ्कायः
काशी हिन्दू विश्वविद्यालयः
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भूमिका
तिष्ठन्तीं शववक्षसि स्मितमुखीं हस्ताम्बुजैर्बिभ्रतीं
मुण्डं खड्गवराभयानि विजितारातिव्रजां भीषणाम्।
मुण्डस्रक्प्रविकाशमानविपुलोत्तुङ्गस्तनोद्भासिनीं
नत्वेमां किल भूमिकां वितनुते नन्दोऽच्युतादिः कृती।।
परमेश्वर के सम्बन्ध में शास्त्रों में प्रतिपादित है कि 'अणोरणीयान्महतो महीयान्'
अर्थात् यह परमात्मा छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा है। इस अखण्ड ब्रह्माण्ड-नायक
परमात्मा के निःश्वासभूत, प्राणियों के आधिभौतिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक—इन
तीनों प्रकार के दुःखों का अपहरण करने वाला और चतुर्वर्ग-प्राप्ति का अतिशय सुन्दर
मार्गप्रदर्शक वेद है।
प्राचीन तथा आधुनिक इतिहासों के द्वारा यह सर्वथा सिद्ध हो चुका है कि उपलब्ध
पुस्तकों में सबसे प्राचीन वेद है। इसको अपौरुषेय कहते हैं अर्थात् किसी मनुष्य ने
इसको नहीं बनाया, किन्तु प्राणियों के हित के लिये सर्वशक्तिमान् परमात्मा ने त्रिकालज्ञ
महर्षियों के द्वारा सृष्टि के आरम्भ में इसे प्रकाशित किया।
यहाँ पर मनु—
वेदोऽखिलो कर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च।।
श्लोकवार्तिक में—
श्रेयःसाधनता ह्येषा नित्यं वेदात्प्रतीयते।
ताद्रूप्येण च धर्मत्वं तस्मान्नेन्द्रियगोचरः।।
और भी—
प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते।
एवं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता।।
ब्राह्मणों को इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये।
यहाँ पर मनु—
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः।।
इसके व्याकरण आदि छः अङ्ग हैं, जैसे—व्याकरण मुख, ज्योतिष नेत्र, निरुक्त
कान, कल्प हाथ, शिक्षा नासिका और छन्द पैर है।
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( १४ )
श्रीमान् भास्कराचार्य—
शब्दशास्त्रं मुखं ज्योतिषं चक्षुषी श्रोत्रमुक्तं निरुक्तं च कल्पं करौ।
या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नासिका पादपद्मद्वयं छन्द आद्यैर्बुधैः।।
वेदपुरुष का नेत्ररूप होने के कारण ज्योतिष शास्त्र सभी अङ्गों में उत्तम गिना जाता
है, क्योंकि अन्य सभी अङ्गों से समन्वित प्राणी भी नेत्ररहित होने पर कुछ नहीं कर
सकता।
यहाँ पर भास्कराचार्य—
वेदचक्षुः किलेदं स्मृतं ज्योतिषं मुख्यता चाङ्गमध्येऽस्य तेनोच्यते।
संयुतोऽपीतरैः कर्णनासादिभिश्चक्षुषाङ्गेन हीनो न किञ्चित्करः।।
काश्यप के मत से इस शास्त्र के सूर्य आदि अठारह महर्षि प्रणेता हैं—
सूर्यः पितामहो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिः पराशरः।
कश्यपो नारदो गर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः।।
लोमशः पौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः।
शौनकोऽष्टादशाश्चैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्तकाः।।
किन्तु पराशर के मत से ज्योतिःशास्त्रप्रवर्त्तक उन्नीस हैं—
विश्वसृड् नारदो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिः पराशरः।
लोमशो यवनः सूर्यश्च्यवनः कश्यपो भृगुः।।
पुलस्त्यो मनुराचार्यः पौलिशः शौनकोऽङ्गिराः।
गर्गो मरीचिरित्येते ज्ञेया ज्यौतिःप्रवर्तकाः।।
पराशर के मत से ज्योतिषशास्त्र में गुरु और शिष्य की सम्बन्ध-परम्परा इस प्रकार है—
नारदाय यथा
( १५ )
सञ्चार का ज्ञान-प्रकार हो, दो प्रकार का ( व्यक्त-अव्यक्त ) गणित हो, उत्तरसहित प्रश्न
हो; पृथ्वी, नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति का वर्णन हो और यन्त्रादि का वर्णन हो।
सिद्धान्तशिरोमणि द्वारा यही परिभाषा मान्य है—
त्रुट्यादिप्रलयान्तकालकलना मानप्रभेदस्तथा
चारश्च द्युसदां द्विधा च गणितं प्रश्नास्तथा सोत्तराः।
भूधिष्ण्यग्रहसंस्थितेश्च कथनं यन्त्रादि यत्रोच्यते
सिद्धान्तः स उदाहृतोऽत्र गणितस्कन्धप्रबन्धे बुधैः॥
‘गणितस्कन्ध’ उसको कहते हैं, जिसमें व्यक्त-अव्यक्त आदि अनेक प्रकार के
गणित वर्णित हों। यह स्कन्ध सिद्धान्तस्कन्ध के अन्तर्गत ही पाया जाता है।
‘फलितस्कन्ध’ के मुख्य पाँच भेद हैं—जातक, ताजिक, मुहूर्त, प्रश्न एवं संहिता।
जिसमें जन्मकाल के द्वारा प्राणियों के जीवनसम्बन्धी सब तरह के फल कहे गये
हैं, उसको ‘जातक’ कहते हैं। वस्तुतः जन्मकाल के ज्ञान के विना प्राणियों का जीवन
अन्धकार में रहता है—
यस्य नास्ति किल जन्मपत्रिका या शुभाशुभफलप्रदायिनी।
अन्धकं भवति तस्य जीवितं दीपहीनमिव मन्दिरं निशि॥
ताजिकविभाग से वर्षफल, मासफल आदि का ज्ञान होता है।
पूर्वापर सन्दर्भ देखने से यह निश्चित होता है कि यवनों ने ताजिक शास्त्र में विशेष
उन्नति की; अतः ज्यौतिष शास्त्र के प्रवर्त्तकों में यवनाचार्य का भी नाम आता है। ऐसा
जान पड़ता है कि पूर्व समय में अत्रत्य ज्योतिषी लोग वर्षफल आदि अन्य प्रकार से
बनाते थे। नीलकण्ठाचार्य ने यवनों से ताजिक शास्त्र का अध्ययन करके ‘ताजिकनीलकण्ठी’
नामक ग्रन्थ का निर्माण किया। इसमें योगों के नाम फारसी शब्दों में इक्कवाल, इन्दुवार
आदि हैं। इन शब्दों को बदल कर संस्कृत शब्दों के द्वारा योगों के नाम नहीं लिखे;
अतः यह भी सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में विद्वानों में गुणग्राहकता अत्यधिक थी।
मुहूर्तविभाग में जातकर्म, अन्नप्राशन आदि सकल मुहूर्तों का वर्णन है।
प्रश्नविभाग में मूकप्रश्न आदि का वर्णन है।
संहिताविभाग फलित ज्यौतिष का प्रधान अङ्ग है। इसमें ग्रहचार आदि फलों के
अतिरिक्त वायसविरुत, शिवारुत, मृगचेष्टित, श्वचेष्टित, गवेङ्गित, अश्वेङ्गित, हस्तिचेष्टित,
शाकुन आदि विषयों का फल भी लिखा है; अतः इसको फलित का एक प्रधान अङ्ग
मानना पड़ेगा।
इस विभाग के अन्तर्गत यह ‘बृहत्संहिता’ नामक ग्रन्थ अनुपम है, जिसको आदित्य-
दास के पुत्र, त्रिस्कन्ध ज्यौतिष शास्त्र में पारङ्गत श्री वराहमिहिराचार्य ने बनाया।
इस समय एतद्देशीय सम्पूर्ण संस्कृत विद्यालयों में यह बृहत्संहिता नामक ग्रन्थ
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परीक्षा में पाठ्यत्वेन निर्धारित है; परन्तु इसके मूल श्लोकों के अत्यन्त कठिन होने के
कारण अर्थज्ञान के लिये विशेष प्रतिभा की आवश्यकता है। इसकी संस्कृत में भट्टोत्पल्लीय
टीका बहुत अच्छी है; किन्तु इस टीका द्वारा सर्वसाधारण के लिए मूल श्लोकों का
अर्थ जानना कठिन था; अतः जनसाधारण के उपकारार्थ मैंने इस ग्रन्थ की सरल
परिशुद्ध हिन्दी टीका की है। आशा है कि पण्डितगण इस ‘विमला’ हिन्दी टीकायुत
अनुपम ग्रन्थ को देखकर मेरे परिश्रम को सफल करेंगे।
काशी के प्रसिद्ध प्रकाशन-संस्थान चौखम्बा संस्कृत सीरीज एवं ‘चौखम्बा विद्याभवन’
के अध्यक्ष श्रीमान् बाबू जयकृष्णदास जी ने तत्परतापूर्वक शीघ्र ही इस ग्रन्थ को
प्रकाशित कर दिया; अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं।
अवसान में सविनय करबद्ध प्रार्थना यही है कि अनवधानवश अथवा मुद्रणदोष
से कहीं त्रुटि रह गई हो तो पक्षपातरहित बुद्धि से पण्डितगण उसे सुधार कर मुझे भी
सूचित करें, जिससे कि पुनः अग्रिम संस्करण में उसको ठीक कर उन सज्जनों के
सामने उपस्थित कर सकूँ। कहा भी है—
गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः।।
दुर्जनगण अनेक प्रकार से प्रार्थना करने पर भी अपनी आदत नहीं छोड़ सकते हैं,
अतः उनसे प्रार्थना करना व्यर्थ है; क्योंकि—
खलो मृगयते दोषं गुणपूर्णेषु वस्तुषु।
वने पुष्पफलाकीर्णे पुरीषमिव सूकरः।।
संवत्-२०१५, विदुषां वशंवदः
वसन्तपञ्चमी श्री अच्युतानन्द झा
विषयानुक्रमणी
विषयाः पृष्ठङ्काः
१. शास्त्रोपनयनाध्यायः
मङ्गलाचरणम् १
ग्रन्थप्रयोजनम् ३
ब्रह्मादिकथितशास्त्रेण स्वशास्त्रस्य
साम्यकथनम् ३
मुनिकृतशास्त्राणां महत्त्वं स्वशास्त्रस्य
चाल्पत्वकथनम् ३
ग्रन्थप्रणयनकारणप्रतिपादनम् ४
जगदुत्पत्तिकारणम् ४
जगदुत्पत्तेः मतवैभिन्न्यप्रतिपादनम् ५
ज्योतिःशास्त्रस्वरूपकथनम् ८
स्कन्धत्रयविभागकथनम् ९
ग्रन्थे वर्ण्यमानविषयकथनम् ९
२. सांवत्सरसूत्राध्यायः
दैवज्ञस्वरूपकथनम् १६
दैवज्ञगुणाः १७
दैवज्ञलक्षणम् १८
दैवज्ञस्य विशेषलक्षणम् ५०
गर्गप्रतिपादितदैवज्ञलक्षणम् ५१
मूर्खाणामधमत्वकथनम् ५१
दैवज्ञवाक्प्रशंसा ५२
दैवज्ञवाक्प्रशंसायां विष्णुगुप्तवचनम् ५२
स्कन्धद्वये भेदप्रतिपादनम् ५३
यात्रायां भेदकथनम् ५४
संहिताप्रशंसा ५६
संहिताभेदाः ५६
दैवज्ञस्य पूज्यत्वकथनम् ६०
दैवज्ञप्रशंसा ६०
बृ० सं० भू०-२
विषयाः पृष्ठङ्काः
अप्रष्टव्यमनुष्याः ६२
नक्षत्रसूचकानां निन्दा ६३
अविदग्धसांवत्सरनिन्दा ६४
राजज्योतिषिलक्षणम् ६४
देशकालज्ञदैवज्ञप्रशंसा ६४
तिथिनक्षत्रश्रवणफलम् ६५
आप्तदैवज्ञप्रशंसा ६५
३. आदित्यचाराध्यायः
परमतेनायनयोर्लक्षणम् ६७
स्वमतेनायनयोर्लक्षणम् ६७
अयनपरीक्षणप्रकारः ६७
विकृतरविफलम् ६९
सीमातिक्रमणे शुभफलकथनम् ६९
त्वष्टाग्रहाच्छादितसूर्यफलम् ७०
अर्कमण्डलगततामसकीलकफलम् ७०
तामसकीलकादीनां शुभाशुभफलम् ७१
तामसकीलकादीनामुदयनिमित्तानि ७१
तामसकीलकादीनामुत्पातानां
निष्फलत्वम् ७२
तामसकीलकादीनां दर्शनफलम् ७२
तामसकीलकादीनामाकृति-
वशात्फलम् ७३
तामसकीलकादीनां विशेषफलम् ७५
सूर्यरश्मिवशेन शुभाशुभफलम् ७५
ऋतुवशेन सूर्यवर्णफलम् ७५
वर्णपरकसूर्यस्यान्यत्फलम् ७६
सूर्यस्य ऋतुष्वशुभवर्णास्तेषां
फलानि च ७७
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विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः
सन्ध्याद्वये परिवेषयुक्तरविफलम् ८० | चन्द्रपुत्रवेधितचन्द्रबिम्बफलम् ९५
सन्ध्यायामर्कस्य शुभाशुभलक्षणम् ८० | केतुवेधितचन्द्रबिम्बफलम् ९६
अर्काक्रान्तनक्षत्रस्य सन्ताप- | ग्रहणकाले उल्काहतचन्द्रफलम् ९६
शोधनत्वम् ८० | चन्द्रमसो वर्णलक्षणं फलञ्च ९७
प्रतिसूर्यफलम् ८१ | चन्द्रमसः अन्यच्छुभलक्षणम् ९७
सूर्यस्यान्यवर्णास्तेषां फलानि च ८१ | पक्षवृद्धौ हानौ साम्ये वा शुभा-
सूर्यस्य शुभलक्षणम् ८२ | शुभफलम् ९७
४. चन्द्रचाराध्यायः | ५. राहुचाराध्यायः
चन्द्रमसि शुक्लकृष्णनिर्णयः ८३ | राहोग्रहत्वप्रतिपादने मतान्तराणि ९९
चन्द्रमसः स्वप्रकाशाभावकथनम् ८३ | राहोराकाशेऽगोचरत्वे हेतुकथनम् ९९
चन्द्रमसः पश्चिमदिग्भागात्सितवृद्धेः | राहोरन्धकारमयत्वकथनम् १००
कारणम् ८४ | अन्यमते दोषोद्घाटनम् १००
प्रत्यहनि चन्द्रगोलके शुक्लवृद्धेः | राहुद्वयप्रतिपादने दोषोद्घाटनम् १०१
कारणम् ८४ | अन्यमतनिरसनपूर्वकस्वमत-
चन्द्रमसः नक्षत्रगमनेन शुभाशुभत्वम् ८५ | स्थापनम् १०२
चन्द्रमसः नक्षत्रयोगकथनम् ८६ | रात्रौ भूच्छायायां हेतुकथनम् १०२
चन्द्रमसः दशविधसंस्थाने | प्रतिपूर्णिमायां चन्द्रग्रहणस्या-
नौसंस्थानलक्षणं फलञ्च ८७ | सम्भवत्वम् १०३
लाङ्गलसंस्थानलक्षणं फलञ्च ८७ | ग्रहणे एकरूपतायां अनेकरूप-
दुष्टलाङ्गलसंस्थानलक्षणं फलञ्च ८८ | तायाञ्च कारणत्वप्रतिपादनम् १०३
समदण्डसंस्थानलक्षणं फलञ्च ८८ | अर्द्धग्रसितचन्द्रमसः कुण्ठविषाण-
कार्मुक-युगसंस्थानयोर्लक्षणं फलञ्च ८९ | तायां रवेस्तीक्ष्णविषाणतायाञ्च
पार्श्वशायिसंस्थानलक्षणं फलञ्च ८९ | कारणत्वम् १०४
आवर्जितसंस्थानलक्षणं फलञ्च ९० | रवि-चन्द्रग्रहणे राहोरकारणत्वम् १०४
कुण्डाख्यसंस्थानलक्षणं फलञ्च ९० | लोकश्रुतिस्मृतिसंहितानामैक्यप्रति-
चन्द्रमसः सामान्यलक्षणम् ९२ | पादनाय राहोरेव ग्राहकत्वम् १०५
चन्द्रमसः स्वरूपाणि फलानि च ९२ | ग्रहणे गर्गादिकथितहेतुकथनं
कुजादिग्रहवेधितचन्द्रशृङ्गफलम् ९३ | तत्खण्डनञ्च १०६
शुक्रवेधितचन्द्रबिम्बफलम् ९४ | ग्रहणे ग्रासप्रमाणं दिग्ज्ञानं
गुरुवेधितचन्द्रबिम्बफलम् ९४ | वेलाज्ञानञ्च १०८
भौमवेधितचन्द्रबिम्बफलम् ९५ | सप्तपर्वणां देवताकथनम् १०९
शनिवेधितचन्द्रबिम्बफलम् ९५ | सप्तपर्वणां फलानि ११०
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विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः
वेलाहीनेऽतिवेले च पर्वणि फलम् १११ | ग्रस्तभौमफलम् १२९
स्वमते प्रामाण्यत्वकथनम् ११२ | ग्रस्तबुधफलम् १२९
मासैके चन्द्र-सूर्यग्रहणयोर्फलम् ११३ | ग्रस्तगुरुफलम् १३०
ग्रस्तोदितग्रस्तास्तयोर्कचन्द्रयोः | ग्रस्तशुक्रफलम् १३०
फलम् ११४ | ग्रस्तशनिफलम् १३०
उदयात्प्रभृत्यस्तं यावद् ग्रस्तयोर्क- | कार्त्तिकमासे ग्रहणफलम् १३१
चन्द्रयोः सप्तप्रकाराणि फलानि ११५ | मार्गशीर्षमासे ग्रहणफलम् १३१
अयनवशाद्दिग्वशाच्च ग्रहणफलम् ११७ | पौषमासे ग्रहणफलम् १३१
मेषराशिगतग्रहणफलम् ११८ | माघमासे ग्रहणफलम् १३२
वृषराशिगतग्रहणफलम् ११८ | फाल्गुनमासे ग्रहणफलम् १३२
मिथुनराशिगतग्रहणफलम् ११९ | चैत्रमासे ग्रहणफलम् १३२
कर्कराशिगतग्रहणफलम् ११९ | वैशाखमासे ग्रहणफलम् १३३
सिंह-कन्याराशिगतग्रहणफलम् ११९ | ज्येष्ठमासे ग्रहणफलम् १३३
तुला-वृश्चिकराशिगतग्रहणफलम् १२० | आषाढमासे ग्रहणफलम् - १३४
धनु-मकरराशिगतग्रहणफलम् १२० | श्रावणमासे ग्रहणफलम् १३४
कुम्भ-मीनराशिगतग्रहणफलम् १२१ | भाद्रपदमासे ग्रहणफलम् १३५
सूर्यचन्द्रयोर्दश ग्रासाः १२२ | आश्विनमासे ग्रहणफलम् १३५
सव्यासव्यग्रासयोर्लक्षणं फलञ्च १२२ | ग्रस्तार्कचन्द्रयोर्दशविधमोक्षाः १३६
लेहग्रासलक्षणं फलञ्च १२३ | दक्षिणहनुमोक्षलक्षणं फलञ्च १३६
ग्रसनग्रासलक्षणं फलञ्च १२३ | वामहनुमोक्षलक्षणं फलञ्च १३६
निरोधग्रासलक्षणं फलञ्च १२३ | दक्षिणकुक्षिमोक्षलक्षणं फलञ्च १३७
अवमर्दनग्रासलक्षणं फलञ्च १२४ | वामकुक्षिमोक्षलक्षणं फलञ्च १३७
आरोहणग्रासलक्षणं फलञ्च १२४ | दक्षिण-वामपायुमोक्षलक्षणं फलञ्च १३७
आघ्रातग्रासलक्षणं फलञ्च १२४ | सञ्छर्दनमोक्षलक्षणं फलञ्च १३८
मध्यतमग्रासलक्षणं फलञ्च १२५ | जरणमोक्षलक्षणं फलञ्च १३८
तमोऽन्त्यग्रासलक्षणं फलञ्च १२५ | मध्यविदरणमोक्षलक्षणं फलञ्च १३९
वर्णपरत्वेन ग्रहणकालिकराहुफलम् १२६ | अन्त्यविदरणमोक्षलक्षणं फलञ्च १३९
ग्रहणकालिकार्कचन्द्रयोर्ग्रहदृष्टि- | दशविधमोक्षा सूर्यग्रहणेऽपि
फलानि १२८ | विचारणीया १३९
ग्रहणकालिकार्कचन्द्रयोरुपरि | ग्रहणपश्चात्सप्ताहान्ते दृष्टोत्पातानां
गुरुदृष्टिफलम् १२८ | फलानि १४०
ग्रहणे उत्पातदर्शनादन्यग्रहण- | चन्द्रग्रहणानन्तरमर्कग्रहणफलम् १४१
परिज्ञानम् १२८ | अर्कग्रहणानन्तरञ्चन्द्रग्रहणफलम् १४२
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विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः
६. भौमचाराध्यायः | माघवर्षफलम् १६४
उष्णामुखभौमलक्षणं फलञ्च १४३ | फाल्गुनवर्षफलम् १६५
अश्रुमुखभौमलक्षणं फलञ्च १४३ | चैत्रवर्षफलम् १६५
व्यालमुखभौमलक्षणं फलञ्च १४४ | वैशाखवर्षफलम् १६५
रुधिरमुखभौमलक्षणं फलञ्च १४५ | ज्येष्ठवर्षफलम् १६६
असिमुसलमुखभौमलक्षणं फलञ्च १४५ | आषाढवर्षफलम् १६६
योगवशाद्विशेषफलम् १४५ | श्रावणवर्षफलम् १६६
सञ्चारवशाद्विशेषफलम् १४६ | भाद्रपदवर्षफलम् १६७
भौमस्य वार्षिकाणि नक्षत्राणि १४७ | आश्वयुजवर्षफलम् १६७
वार्षिकनक्षत्रेषु स्थितस्योदितस्य | नक्षत्रसञ्चारवशाद्गुरोर्विशेषफलम् १६८
वा भौमस्य विशेषफलम् १४८ | वर्णपरत्वेन गुरुफलम् १६८
भौमवर्णलक्षणं फलञ्च १४८ | संवत्सरपुरुषाङ्गविभागद्वारा नक्षत्र-
७. बुधचाराध्यायः | स्थितिस्तत्फलञ्च १६९
बुधोदयफलम् १५० | षष्ट्यब्दानयनम् १७०
नक्षत्रावस्थितबुधफलम् १५० | द्वादशयुगाधिपतयः १७३
बुधस्य पराशरोक्ताः सप्त गतयः १५३ | युगान्तर्गतपञ्चवर्षाणां नामानि
नक्षत्रवशात्सप्तगतीनां स्थितयः १५३ | तेषां दैवतञ्च १७३
उदयास्तदिनात्सप्तगतीनां | पञ्चवर्षाणां फलानि १७३
लक्षणानि १५४ | द्वादशयुगानामुत्तमादिविभागाः १७४
सप्तगतिफलम् १५५ | प्रभवसंवत्सरस्य प्रवृत्तिकालः १७४
देवलमतेन बुधस्य गतिचतुष्टयम् १५६ | प्रभवसंवत्सरस्वरूपम् १७५
गतिचतुष्टयफलानि १५७ | विभवादिसंवत्सरनामानि
मासवशेन उदयास्तबुधफलम् १५८ | फलानि च १७५
उदयास्तबुधफलम् १५८ | द्वितीययुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सर-
बुधबिम्बलक्षणं फलञ्च १५९ | नामानि फलानि च १७६
८. बृहस्पतिचाराध्यायः | तृतीययुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि
द्वादशवर्षकथनम् १६० | फलानि च १७६
मासक्रमेणैव द्वादशवर्षकथनम् १६२ | तुर्ययुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि
कार्तिकवर्षफलम् १६३ | फलानि च १७७
मार्गशीर्षवर्षफलम् १६४ | पञ्चमयुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि
पौषवर्षफलम् १६४ | फलानि च १७८
| षष्ठयुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि
| फलानि च १७८
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विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः
सप्तमयुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि | दिवादृष्टशुक्रस्य विशेषफलम् १९४
फलानि च १७८ | कृत्तिकानक्षत्रभेदनाच्छुक्रफलम् १९४
अष्टमयुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि | रोहिणीशकटभेदनाच्छुक्रफलम् १९४
फलानि च १७९ | मृगशिर-आर्द्रयोर्भेदनाच्छुक्रफलम् १९५
नवमयुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि | पुनर्वसु-तिष्यभेदनाच्छुक्रफलम् १९५
फलानि च १८० | आश्लेषा-मघाभेदनाच्छुक्रफलम् १९६
दशमयुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि | पूर्वोत्तरफल्गुनीभेदनाच्छुक्रफलम् १९६
फलानि च १८० | हस्त-चित्राभेदनाच्छुक्रफलम् १९६
एकादशयुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सर- | स्वाती-विशाखाभेदनाच्छुक्रफलम् १९७
नामानि फलानि च १८१ | अनुराधा-ज्येष्ठा-मूलभेदनाच्छुक्र-
द्वादशयुगान्तर्गतपञ्चसंवत्सरनामानि | फलम् १९७
फलानि च १८२ | पूर्वाषाढोत्तराषाढश्रवणधनिष्ठा-
द्वादशयुगान्तर्गतपञ्चमवर्षस्य नाम | भेदनाच्छुक्रफलम् १९७
फलञ्च १८२ | शतभिषकपूर्वभद्रपदभेदनाच्छुक्र-
बृहस्पतिबिम्बलक्षणं फलञ्च १८३ | फलम् १९८
| उत्तरभद्रपदारेवत्यश्विनीभरणी-
९. शुक्रचाराध्यायः | भेदनात् शुक्रफलम् १९८
मतान्तरेण शुक्रस्य नववीथयस्तासां | शुक्रस्य तिथिष्वस्तमयोदयफलम् १९९
नक्षत्राणि च १८४ | गुरुशुक्रयोरन्योन्यं सप्तमस्थयो-
स्वमतेन वीथीनां नक्षत्राणि १८५ | फलम् २००
वीथीनां मार्गप्रविभागम् १८५ | शुक्रस्याग्रवर्तिभिः सर्वैर्ग्रहैःफलानि २०१
मतान्तरेण मार्गकल्पना १८७ | शुक्रस्याग्रवर्तिशनिफलम् २०२
मतान्तरकथनप्रयोजनम् १८८ | शुक्रस्याग्रवर्तिभौमफलम् २०२
उत्तरादिवीथिस्थितशुक्रफलम् १८८ | शुक्रस्याग्रवर्तिगुरुफलम् २०३
वीथीनां विशेषफलानि १८९ | शुक्रस्याग्रवर्तिबुधफलम् २०३
शुक्रस्य षण्मण्डले प्रथममण्डलस्य | शुक्रवर्णलक्षणं फलञ्च २०३
लक्षणं फलञ्च १८९ |
द्वितीयमण्डलस्य लक्षणं फलञ्च १९० | १०. शनैश्चरचाराध्यायः
तृतीयमण्डलस्य लक्षणं फलञ्च १९१ | नक्षत्रस्थितिवशाच्छनैश्चरस्य
तूर्यमण्डलस्य लक्षणं फलञ्च १९१ | संक्षिप्तफलम् २०६
पञ्चममण्डलस्य लक्षणं फलञ्च १९२ | अश्विनी-भरणीस्थितशनिफलम् २०६
षष्ठमण्डलस्य लक्षणं फलञ्च १९२ | कृत्तिका-रोहिणीस्थितशनिफलम् २०७
षण्मण्डलानां विशेषफलम् १९३ | मृगशिर-आर्द्रास्थितशनिफलम् २०७
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विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः
पुनर्वसु-तिष्यस्थितशनिफलम् २०७ | द्वाविंशतिभूुपुत्रकेतुलक्षणं फलञ्च २२०
आश्लेषा-मघास्थितशनिफलम् २०८ | त्रिसंख्यकचन्द्रपुत्रकेतुलक्षणं
पूर्वफल्गुन्योत्तरफल्गुनीस्थित- | फलञ्च २२१
शनिफलम् २०८ | ब्रह्मदण्डाख्यकेतुलक्षणं फलञ्च २२१
हस्तस्थितशनिफलम् २०९ | एकोननवशतकेतुकथनम् २२१
चित्रा-स्वातीस्थितशनिफलम् २०९ | चतुरशीतिसंख्यकशुकपुत्र-
विशाखास्थितशनिफलम् २०९ | केतुलक्षणं फलञ्च २२२
अनुराधास्थितशनिफलम् २१० | षष्टिसंख्यकशनिपुत्रकेतुलक्षणं
ज्येष्ठा-मूलस्थितशनिफलम् २१० | फलञ्च २२२
पूर्वाषाढास्थितशनिफलम् २१० | पञ्चषष्टिसंख्यकगुरुपुत्रकेतुलक्षणं
उत्तराषाढास्थितशनिफलम् २११ | फलञ्च २२२
श्रवण-धनिष्ठास्थितशनिफलम् २११ | एकपञ्चाशद्बुधपुत्रकेतुलक्षणं
शतभिषकपूर्वभद्रपदोत्तरभद्रपदा- | फलञ्च २२३
स्थितशनिफलम् २११ | षष्टिसंख्यकभौमपुत्रकेतुलक्षणं
रेवतीस्थितशनिफलम् २१२ | फलञ्च २२३
विशाखास्थगुरोःकृत्तिकास्थशने- | त्रयस्त्रिंशद्राहुपुत्रकेतुलक्षणं फलञ्च २२४
स्तथाऽनयोरेकर्षगतयोः फलम् २१३ | विंशत्यधिकशतमग्निपुत्रकेतुलक्षणं
शनिवर्णस्वरूपं फलञ्च २१३ | फलञ्च २२४
११. केतुचाराध्यायः | सप्तसप्ततिवायुपुत्रकेतुलक्षणं
केतोरुदयास्तलक्षणम् २१५ | फलञ्च २२५
दिव्यवर्जितकेतुलक्षणम् २१५ | प्रजापति-ब्रह्मापुत्रकेतुलक्षणं फलञ्च २२५
दिव्यान्तरिक्षभौमकेतुलक्षणम् २१६ | द्वात्रिंशदरुणपुत्रकेतुलक्षणं फलञ्च २२६
मतान्तरेण केतुसंख्या २१६ | षण्णवतिकालपुत्रकेतुलक्षणं
स्वसिद्धान्तकथनम् २१६ | फलञ्च २२६
केतुदर्शनात्फलनिश्चयः २१७ | नवसंख्यकविदिकपुत्रकेतुलक्षणं
शुभकेतुलक्षणम् २१८ | फलञ्च २२६
अशुभकेतुलक्षणम् २१८ | दृष्टकेतोर्लक्षणं फलञ्च २२७
पञ्चविंशतिसूर्यपुत्रकेतुलक्षणं | अस्थिकेतोः शस्त्रकेतोश्च लक्षणं
फलञ्च २१९ | फलञ्च २२७
पञ्चविंशत्यग्निपुत्रकेतुलक्षणं | कपालकेतोर्लक्षणं फलञ्च २२८
फलञ्च २१९ | रौद्रकेतोर्लक्षणं फलञ्च २२८
पञ्चविंशतियमपुत्रकेतुलक्षणं | चलकेतोर्लक्षणं फलञ्च २२९
फलञ्च २२० | श्वेतकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३०
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( २३ )
विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः
श्वेतलक्षणं फलञ्च २३१ | सप्तर्षीणां चारनक्षत्रानयनम् २५२
रश्मिकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३१ | सप्तर्षीणां नक्षत्रभोगप्रमाणकालं
ध्रुवकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३२ | नक्षत्रावस्थितिश्च २५३
कुमुदकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३३ | सप्तर्षीणां संस्थानलक्षणम् २५४
मणिकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३३ | सप्तर्षीणां शुभाशुभफलम् २५४
जलकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३४ | सप्तर्षीणां स्ववर्गकथनम् २५४
भवकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३४ | १४. नक्षत्रकूर्मविभागाध्यायः
पद्मकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३५ | नक्षत्राणां विभागकथनम् २५७
आवर्तकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३५ | मध्यदेशविभागकथनम् २५७
संवर्तकेतोर्लक्षणं फलञ्च २३५ | पूर्वदिक्स्थितदेशान् जनपदांश्च २५८
नक्षत्रस्पर्शधूपनत्वादशुभकेतूनाम- | आग्नेयदिक्स्थितदेशान् जनपदांश्च २५९
शुभफलम् २३६ | दक्षिणदिक्स्थितदेशान् जनपदांश्च २६०
केतोर्विशेषफलम् २३९ | नैर्ऋत्यदिक्स्थितदेशान् जनपदांश्च २६१
१२. अगस्त्यचाराध्यायः | पश्चिमदिक्स्थितदेशान् जनपदांश्च २६२
अगस्त्यमुनिवर्णनम् २४१ | वायव्यदिक्स्थितदेशान् जनपदांश्च २६२
समुद्रशोभावर्णनम् २४१ | उत्तरदिक्स्थितदेशान् जनपदांश्च २६३
प्रकारान्तरेण समुद्रवर्णनम् २४२ | ईशानदिक्स्थितदेशान् जनपदांश्च २६४
अगस्त्यप्रभाववर्णनम् २४३ | कृत्तिकादिनववर्गफलम् २६६
विन्ध्यवर्णनम् २४३ | १५. नक्षत्रव्यूहाध्यायः
अगस्त्योदयप्रभाववर्णनम् २४५ | कृत्तिकानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६७
शरदृतुवर्णनम् २४५ | रोहिणीनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६७
भूमिशोभावर्णनम् २४७ | मृगशिरनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६७
अगस्त्यस्य प्राधान्यवर्णनम् २४७ | आर्द्रानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६८
अगस्त्योदयलक्षणम् २४८ | पुनर्वसुनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६८
अगस्त्यकृतेऽर्घदानलक्षणम् २४८ | पुष्यनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६८
अर्घार्थं वस्तुवर्णनम् २४९ | आश्लेषानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६९
अर्घस्य फलम् २४९ | मघानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६९
अगस्त्यस्य वर्णानुसारिफलम् २५० | पूर्वफल्गुनीनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २६९
अगस्त्यस्योदयास्तमयलक्षणं | उत्तरफल्गुनीनक्षत्रगतपदार्थ-
शुभाशुभञ्च २५० | निरूपणम् २७०
१३. सप्तर्षिचाराध्यायः | हस्तनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७०
सप्तर्षीणां दिक्संस्थानलक्षणम् २५२ | चित्रानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७०
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( २४ )
विषयाः पृष्ठाङ्काः
स्वातीनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७१
विशाखानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७१
अनुराधानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७१
ज्येष्ठानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७१
मूलनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७२
पूर्वाषाढानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७२
उत्तराषाढानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७२
श्रवणनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७३
धनिष्ठानक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७३
शतभिषङ्नक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७३
पूर्वभद्रपदनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७४
उत्तरभद्रपदनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७४
रेवतीनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७४
अश्विनीनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७५
भरणीनक्षत्रगतपदार्थनिरूपणम् २७५
जातिनक्षत्राणि २७५
क्रूरग्रहप्रयोजनम् २७६
१६. ग्रहभक्तियोगाध्यायः
सूर्यस्य देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २७८
चन्द्रस्य देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २७९
भौमस्य देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २८०
बुधस्य देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २८२
गुरोर्देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २८४
शुक्रस्य देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २८५
शनेर्देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २८७
राहोर्देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २८८
केतोर्देशाः जनाः ग्रहाधिपतयश्च २८९
उपर्युक्तानां प्रयोजनम् २९०
१७. ग्रहयुद्धाध्यायः
उपोद्घातः २९३
युद्धकारणम् २९३
चतुष्प्रकारकयुद्धस्य फलम् २९५
विषयाः पृष्ठाङ्काः
ग्रहाणां यायिनागराक्रन्दसंज्ञा २९७
अत्र विशेषफलम् २९८
पराजितग्रहलक्षणम् २९८
विजयिग्रहलक्षणम् २९९
विजयिग्रहलक्षणे विशेषः २९९
भौमस्य सर्वग्रहविजितस्य फलम् ३००
बुधस्य सर्वग्रहविजितस्य फलम् ३००
जीवस्य सर्वग्रहविजितस्य फलम् ३०१
शुक्रस्य सर्वग्रहविजितस्य फलम् ३०२
सौरस्य सर्वग्रहविजितस्य फलम् ३०३
विशेषकथनम् ३०३
१८. राशिग्रहसमागमाध्यायः
चन्द्रमसो गतिलक्षणं फलञ्च ३०५
अङ्गारकस्योत्तरगते चन्द्रे फलम् ३०६
बुधस्योत्तरगते चन्द्रे फलम् ३०६
गुरोरुत्तरगते चन्द्रे फलम् ३०६
शुक्रस्योत्तरगते चन्द्रे फलम् ३०६
सौरस्योत्तरगते चन्द्रे फलम् ३०७
ग्रहाणामुत्तरगते चन्द्रे विशेषः ३०७
१९. ग्रहवर्षफलाध्यायः
सूर्यस्य वर्षफलम् ३०९
चन्द्रमसः वर्षफलम् ३१०
भौमस्य वर्षफलम् ३१२
बुधस्य वर्षफलम् ३१३
गुरोर्वर्षफलम् ३१५
शुक्रस्य वर्षफलम् ३१६
सौरस्य वर्षफलम् ३१८
वर्षफले विशेषः ३१९
२०. ग्रहशृङ्गाटकाध्यायः
ताराग्रहाणामुदयास्तवशादिक्फलम् ३२१
ताराग्रहाणां संस्थानप्रदर्शनम् ३२१
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विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः
अन्तरिक्षप्रविभागेनाशुभं फलम् ३२२ | गर्भसम्भवे विशेषः ३३९
नक्षत्रस्थितग्रहाणां फलम् ३२२ | दृष्टान्तद्वारा विशेषकथनम् ३४०
योगषट्कस्य नामानि ३२२ | गर्भपुष्टिलक्षणम् ३४०
योगषट्कस्य लक्षणं फलञ्च ३२३ | २२. गर्भधारणाध्यायः
संवर्त-समागपयोगे मध्यमफलम् ३२४ | गर्भधारणलक्षणम् ३४१
२१. गर्भलक्षणाध्यायः | गर्भधारणे विशेषः ३४१
गर्भलक्षणकथनप्रयोजनम् ३२६ | २३. प्रवर्षणाध्यायः
गर्भलक्षणम् ३२६ | प्रवर्षणलक्षणम् ३४४
गर्भलक्षणज्ञदैववित्प्रशंसा ३२६ | जलप्रमाणम् ३४४
शास्त्रप्रशंसा ३२७ | वर्षणप्रमाणम् ३४५
गर्भलक्षणविषये परमत- | वर्षणप्रमाणे मतान्तरम् ३४५
स्वमतकथनम् ३२७ | नक्षत्रेषु वृष्टिप्रमाणम् ३४६
गर्भलक्षणविषये गर्गमतोप- | नक्षत्रवृष्टिप्रमाणे विशेषः ३४७
स्थापनम् ३२७ | २४. रोहिणीयोगाध्यायः
धृतगर्भस्य प्रसवकालज्ञानम् ३२८ | आगमप्रदर्शनम् ३४८
गर्भाणां विशेषलक्षणं | रोहिणीयोगविचारसमयः ३४८
कालनिर्देशञ्च ३२९ | रोहिणीयोगे विधानम् ३४९
मेघानां वायोश्च लक्षणम् ३३० | कलश-होमव्यवस्था ३४९
गर्भसम्भवलक्षणानि ३३१ | पताकया वायुपरीक्षा ३४९
ऋतुवशेन गर्भलक्षणम् ३३२ | वायुना शुभाशुभफलम् ३५१
गर्भसमये मेघानां लक्षणम् ३३४ | बीजाङ्कुरेण शुभाशुभफलम् ३५३
गर्भविनाशलक्षणम् ३३४ | रोहिणीयोगसमये शुभशकुनानि ३५४
गर्भलक्षणे विशेषः ३३५ | रोहिणीयोगे मेघवर्णनम् ३५६
गर्भकालिकनक्षत्रवशादधिक- | रोहिणीयोगे मेघस्थितिफलम् ३५६
वृष्टियोगः ३३६ | अशुभमेघलक्षणम् ३५७
गर्भकालिकनक्षत्रवशादधिक- | शुभमेघलक्षणम् ३५८
दिनवृष्टियोगः ३३६ | दिग्भागेन मेघफलानि ३५८
अधिकदिनवृष्टियोगे दिनसंख्या ३३७ | दिग्भागेन मेघोत्पातलक्षणानि
निमित्तवशाद्वृष्टियोग्यप्रदेशाः ३३८ | फलानि च ३५८
निमित्तयुतगर्भवशाज्जलपरिमाणम् ३३८ | चतुर्षु दिक्षु कुम्भस्थापनफलम् ३५९
गर्भकालिकनक्षत्रे विशेषवृष्टियोगः ३३९ | रोहिणीसह दक्षिणगतचन्द्र-
गर्भसम्भवस्य विशेषलक्षणम् ३३९ | समागमफलम् ३६०
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