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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

७१६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
काल्यंशवद्यर्धहोरांशभोगकालः प्रकीर्त्तितः ।
प्रमाणराशयश्चैते भागहारा कलात्मकाः ।।७२।।
तत्तद्देशकला इच्छाराशयो गुणराशयः ।
कटुको मधुरतिक्तः कषायो लवणाम्लकौ ।।७३।।
कलांश में उत्पन्न हुये का कटुक, मीठा, तीता, कषैला, नमक, अम्ल।।७२-
७३।।
कालांशेक्रमतो गण्याः षष्ठ्यंशेव्युत्क्रमात्स्मृताः ।
त्रिंशांशेतु कषायादिःकालहोरांशके पुनः ।।७४।।
क्रम से गणना करने से जो रस आवे वह उस वर्ष में उसे प्रिय होता है।
षष्ठ्यंश में उसे अम्ल से कटु पर्यन्त इस क्रम से, त्रिंशांश में कषाय से तिक्त
पर्यन्त।।७४।।
तिक्तादि द्वादशांशेषु मधुरादि नवांशके ।
अम्लादिमुनिर्भागे तु द्रेष्काणे मधुरादितः ।।७५।।
द्वादशांश में मधुरादि क्रम, नवांश में अम्लादि क्रम, सप्तांश, अर्ध होरा और
द्रेष्काण में मधुरादि क्रम से गिनना चाहिये।।७५।।
षष्ठ्यंशोत्पत्तौफलम् -
अर्धहोरांशके तद्वज्जातस्यैवं प्रजायते ।
वेदाष्टदशभैरमैः प्रषष्ठ्यंशे च भास्करे ।।७६।।
यदि कन्या के जन्म समय में सूर्य ४।८।१०।२७।३ संख्यक षष्ठ्यंश में
हो तो वह कन्या बंध्या होती हैं।।७६।।
त्रिषट्न्वत्रिर्वाकार्ध्विजिनदंतसुराः क्रमात् ।
नवदिग्भैर्जिनाकैश्र्च सूर्यैस्तांस्त्रिपंचभिः ।।७७।।
तथा ३।६।९।३।०।१२।४।२४।३२।३३ इन अंकों को क्रम से
९।१०।२७।२४।१२।१२।४९।३।५।५० से गुण ने जो प्राप्त हो उतने संख्या
के षष्ठ्यंश में सूर्य हो तो कन्या पूज्या (पूजनीया) होती हैं।।७७।।
मृतपुत्र-कन्यायोग-
पंचाशद्भिःक्रमाद्गुण्या वंध्यावंध्या प्रकीर्त्तिताः ।
त्रिवेदाद्यंकविश्वेंद्र नखच्छदोजिनायमाः ।।७८।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१७
पंचाशच्च शतं पूर्वयुताः मृतसुता स्मृता ।
पुत्राणां तु कलांशे तु शेषे जाता मृता द्विज ॥७९॥
३।४।७।९।१३।१४।२०।२६।२४।२।५०।१०० इनमें पूर्व अंकों को
जोड़ने से जो संख्या हो तत्तुल्य अंश में सूर्य हों मृतसुता उत्पन्न होती है। उक्तांश
से शेष अंशों में सूर्य हों तो उत्पन्न पुत्रों में मृत पुत्र भी होंगे॥७८-७९॥
अथ संन्यासयोगः-
द्वादशे च चतुर्विंशे चतुस्त्रिंशे सुरांशके ।
द्विसप्तांशे नवांशे षष्ठयुत्तरशतांशके ॥८०॥
यदि १२।२४।३३।७२।९।१६० ॥८०॥
षट्शते च सहस्रे च खखाहीन्द्वंशके पुनः ।
खांशातिथ्यंशके जातो भवेत्प्रव्रजितो नरः ॥८१॥
६००।१०००।१८०।१५।१० संख्यक अंश में जन्म हो तो सन्यासी होता
है॥८१॥
परमहंसादियोगाः-
गुरुशुक्रोदये राशौ तयोः परमहंसकः ।
शत्रुराशिगतौ तौ चेदप्रकाशयुतौ तु वा ॥८२॥
गुरु शुक्र के उदय की राशि में जन्म हो तो परमहंस होता है। यदि वे शत्रुराशि
में हों अथवा धूमादि अप्रकाश ग्रह से युक्त हों तो॥८२॥
भ्रष्टः स्यात्तु तथा ज्ञेतु त्रिदंडी वा वहूदकः।
रवौ जटाधरः शैवः कुजे नग्नोऽटनः स्मृतः॥८३॥
भ्रष्ट परमहंस होता है। ऐसे ही बुध हो तो त्रिदंडी सन्यासी होता है वा वहूदक-
होता है। सूर्य हो तो शिवभक्त, भौम हो तो नग्न घूमने वाला॥८३॥
मंदे बौद्धोऽथ वाग्मी स्याद्राहौ केतौ तथैव च ।
धूमे कापालिकाश्चापे काले तु परिवेषके ॥८४॥
गूढ़पापो यथा लिंगी कुलमार्गतस्तथा ।
शनि हो तो बौद्ध धर्मावलम्बी, राहु वा केतु जन्मराशि में हों तो बौद्ध सन्यासी,
धूमग्रह हो तो कापालिक, चाप, काल, परिवेष हो तो गुप्तपापी, पाखंडी,
कुलमार्गानुकूल चलने वाला होता है॥८४॥

७१८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
प्रव्रज्यायांनिष्टायोगः-
षष्ठ्यंशे ऋक्षसन्ध्यंशे सार्पे पौष्णेन्द्रभांशके ।।८५।।
षष्ठ्यंश में, नक्षत्र संध्यंश में, आश्लेषा, रेवती, ज्येष्ठा के अंश में।।८५।।
त्रिंशांशे कालहोरांशे तत्तदंशांशेऽपि च ।
नवमूर्च्छासुरांशे तु यथा षष्ठितमे युतः ।।८६।।
त्रिंशांश में, कालहोरांश में, नवांश में, मूर्ना ४९ अंश में ३३वें अंश, ६०वें
अंश ।।८६।।
शतांशेखाब्धितिथ्यंशे द्वादशांशे नवांशके ।
राश्यंतांशे तु सप्तांशे ऋक्षसंधिमृगांतिके ।।८७।।
१०० वें अंश में, १५४० वें अंश में, द्वादशांश में, राशि के अतिमांश
में, सप्तांश में नक्षत्र संधि में।।८७।।
मृगकर्कालिसिंहादिर्मीनतौल्यंशकादिमे ।
अंत्यांशेऽपि च जातस्य षष्ठ्यर्थाक्षिजिनैरदे ।।८८।।
मकर, कर्क, वृश्चिक, सिंह, मेष, मीन, तुला के आदि या अंतिम अंश में
उत्पन्न होने वाले, ६, ५, २, २४, ३२ अंशों में।।८८।।
द्रेष्काणेचार्द्धहोरायां त्रिसप्ते च नखेषु तु ।
जातः प्रव्रजितश्चैषु सर्वत्रैकयुतेष्वपि ।।८९।।
द्रेष्काण में अर्द्धहोरा में ७३, २० वें अंश में वा पूर्वोक्त अंकों में एक जोड़ने
से जो अंक हो उन अंशों में उन अंकों में उत्पन्न होनेवाले सन्यास धर्म में श्रद्धा
रखनेवाले होते हैं।।८९।।
अथ अंशविशेषजातायांस्त्रीलक्षणम् -
पापाप्रकाशसंयोगे कलत्रेत्वशुभं भवेत् ।
रवौवंध्या तु शीतांशौ क्षीणे तु व्यभिचारिणी ।।९०।।
सातवें भाव में पापग्रह हो अथवा अप्रकाशग्रह हो तों स्त्रीदुष्टा हो, सूर्य हो
तो बंध्या, क्षीणचन्द्र हो तो व्यभिचारिणी।।९०।।
कुजे तु प्रियते मन्दे दुर्भगा राहुसंयुते ।
परदाररतिः स्वीयनिषेकाभावतोऽसुताः ।।९१।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१९
भौम हो तो स्त्री का नाश, शनि हो तो दुर्भागिनी और राहु हो तो परस्त्रीगामी
होता है।।९१।।
धूमे विवाहहीनः सन्म्रियते कार्मुकेसति ।
परिवेशेतु दुःशीला केतौवंध्याऽसतीभवेत् ।।९२।।
धूम हो तो बिना विवाह के ही मर जावे, कार्मुक हो तो भी वही फल हो,
परिवेश हो तो स्त्री दुःशीला हो, केतु हो तो वंध्या और कुलटा हो।।९२।।
कालेऽभावस्य पापे तु गर्भश्रावेण संयुता ।
सुशीला स्त्रीप्रसूता च पूर्यमाणे तु शीतगौ ।।९३।।
काल हो तो स्त्री का अभाव, पापग्रह हो तो गर्भस्राव हो, पूर्ण चन्द्रमा हो
तो सुशीला, कन्या प्रजावती हो।।९३।।
बुधे त्वपुत्रा जीवेतु गुणयुक्ता सुपुत्रिणी ।
शुक्रे सौभाग्य संयुक्ता श्रीमतीपुत्रिणीभवेत् ।।९४।।
बुध हो तो पुत्र हीन हो, गुरु हो तो गुणी और पुत्रवती हो। शुक्र हो तो
सौभाग्यवती, लक्ष्मी से युक्त और पुत्रवती हो।।९४।।
अथ दशमभावानुसारफलम् -
एष्वेवं दशमे पापपुण्यकर्मरतो भवेत् ।
पंचाशद्भिः सुरैस्तत्त्वैनृपैश्च मुनिभिग्रहैः ।।९५।।
जिस प्रकार से सप्तम भाव से स्त्री के फल का विचार किया है उसी प्रकार
से दशम भाव से व्यापार आदि शुभाशुभ कर्मफल का विचार करना चाहिये। दशम
भाव शुभयुक्त वा दृष्ट हो तो शुभ कर्मफल जानना, पापग्रह से दृष्ट युक्त हो अशुभ
कर्मफल जानना चाहिये। मिश्रित ग्रह हों तो मिश्रफल इसमें भी शुभ पाप की संख्या
के समान ही शुभ पापफलों को न्यूनाधिक कहना।।९५।।
अष्टभिः षड्भिरेवाथ सप्तादिभिरनुक्रमात् ।
पंचादिभिश्च होराः स्युरेकोपचयैरथ ।।९६।।
इसमें भी ५० । ३३ । २५ । १६ । ७ । ९ । ८ । ६ । ७ तथा पाँच से एक पर्यन्त तथा
पूर्वोक्त अंकों में एक जोड़ने से।।९६।।
पापपुण्यक्रियाकर्त्ता क्रमाल्लब्ध्वांतरांशजः ।
आवृत्तितरुतरा प्रोक्ता पापपुण्यक्रियारतिः ।।९७।।

७२० • बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
जो हो उन अंशों में जन्म होने से पाप शुभ ।।९७।।
मिश्रे तु मिश्रं त्वाधिकवशादेव निर्णयः ।
मिश्रक्रिया ग्रहानुसार होती हैं।
वर्णाश्रमाचारविहीबुद्धिः स्त्रियांचपापी परदारसक्तः ।
क्षेत्रापहारी च परस्वसर्वं निहत्य योगं सकलं करोति ।।९८।।
वर्ण और आश्रम के आचार में हीन बुद्धिवाला, स्त्रियों के प्रति पाप बुद्धि
वाला, परस्त्रीगामी, दूसरे की भूमि को अपहरण करने वाला, दूसरे के सर्वस्व को
अपहरण करने वाला।।९८।।
परस्यचोत्कर्षविघातकारी विषाग्निदः घातककर्मकृच्च ।
ग्रामस्य देशस्य च विप्रवर्यः धनापहारी व्यसनेकृतार्थः ।।९९।।
दूसरे के उत्कर्ष को नाश करने वाला, विष और अग्नि को देने वाला, ग्राम
को जलाने वाला, ब्राह्मण और देवता के धन को हरण करने वाला पातक कर्म
करने वाला होता है ।।९९।।
मृतिप्रदं कर्मकरोति सूर्यात्प्राप्यप्रकाशः सितशीतगोश्च ।
दयारतो दानरतः सुतेजाः स्वाचारपाला विजितेन्द्रियश्च ।।१००।।
सूर्य हो तो मारण कर्म करने वाला, चंद्रमा और शुक्र हो तो प्रसिद्ध होता
है। भौम से दयारत, दानरत, सुन्दर तेजवान्, आचारयुक्त, इन्द्रियों को जीतने
वाला।।१००।।
इष्टं च पूर्तं च करोति जीवे शुक्रेवदान्यः कृतदारशीलः ।।१०१।।
गुरु हो तो इष्टापूर्त कर्म करने वाला, शुक्र हो तो दाता, शनि हो तो स्त्रीशील
हो।।१०१।।
अथ मेषादि राशीनां फलानि।
मेषे त्वगम्यागमनप्रियश्च त्वभक्ष्यक्ष्योवृषभेसुशीलः ।
देवेशदेवालयधर्मकारी युग्मेविरक्तोऽत्यधनैर्विहीनः ।।१०२।।
मेष राशि में जन्म हो तो अगम्यागमन, अभक्ष्य को भक्षण करने वाला वृष
राशि में अच्छा स्वभाव, शिव, विष्णु का उपासक, मिथुन राशि में वैराग्य
युक्त।।१०२।।
चान्द्रे च तीव्रं च करोतिपापं परस्वहर्तापि च पूर्वकारी ।
सिंहे तु देवस्य विघातकारी पाथोनके धर्मरतिः सुकृत्यः ।।१०३।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२१
कर्क राशि में अत्यन्त पाप करने वाला, दूसरे के धन को हरण करने वाला,
पूर्त कार्य (कूंआं आदि) करने वाला, सिंह राशि में देवस्थान का नाश करने वाला,
कन्याराशि में धर्म में प्रेम और सत्कर्म करने वाला।।१०३।।
जूके परेषां धनदश्च पूर्तं करोति चापेऽपि च वृश्चिकेतु ।
परस्वहर्ता परदारसक्तो मृगेऽपि चैवं घटभे कृतज्ञः ।।१०४।।
तुला में दूसरों को धन से पूर्ण करने वाला, धन में भी पूर्वोक्त फल, वृश्चिक
राशि में दूसरे के द्रव्य को हरण करने वाला दूसरे की स्त्री में आसक्त, मकर में
भी पूर्वोक्त फल, कुम्भ राशि में कृतज्ञ।।१०४।।
यज्ञस्य कर्त्ता झषभे तथैव पूर्तादिकारी वहुयोजकःस्यात्।
और यज्ञकर्त्ता और मीन राशि में पूर्त आदि काम को करने वाला और अनेक
योजना करने वाला होता है।
अथ सूर्यादीनां कालांश फलम् -
नर्तको गायको वंदी शिल्पी याञ्चापरस्ततः ।।१०५।।
सूर्यादि के कालांश में उत्पन्न होने से क्रम से नाच को जानने वाला गाने
वाला, राजा की स्तुति करने वाला, कारीगरी को जानने वाला, याचक।।१०५।।
गायको नर्तको भारवाही प्राणतियोजकः ।
प्रेष्यश्च भारकोवंदी याचको धातुवादकः ।।१०६।।
गायक, नर्तक, बोझा ढोने वाला, नम्र रहने वाला दास वृत्ति करने वाला,
वंदी, याचक, धातु के कामको करने वाला।।१०६।।
वेदाध्यायी स्मृतिज्ञस्तु शैवाश्रमकृतश्रमः ।
शिल्पलेखनकर्त्ता च मीमांशान्यायतर्कवित् ।।१०७।।
वेद पढ़ने वाला, स्मृति शास्त्र को जानने वाला, शिवदीक्षा में प्रवीण, शिल्प
को लिखने वाला, मीमांशा न्याय तर्क का जानकार।।१०७।।
पंचरात्रार्थशास्त्रज्ञः इतिहासपुराणवित् ।
आयुधश्रमहेतुश्च आयुर्वेदकृतश्रमः ।।१०८।।
अर्कात्क्लांशतश्चैव क्रमादेवं प्रकीर्त्तितः ।
आगम (तंत्र) को जानने वाला, अर्थ शास्त्र को जानने वाला, आयुध (शस्त्र)
को बनाने वाला, आयुर्वेद (दवा) का ज्ञाता होता है।।१०८।।

७२२, बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ षष्ट्यंश फलम् -
अध्यापकस्तु वेदानां सेवकः शास्त्रपाठकः ।।१९०९।।
यदि विषम लग्न हो तो क्रम से वेद का अध्यापक १, सेवक २, शास्त्र पढ़ाने
वाला ३।।१९०९।।
अश्वसादीभसादी च लिपिलेखनतत्परः ।
मदुरावंधको नट्यौ देशिको याज्ञिको गुरुः ।।१९१०।।
घोड़सवारी में कुशल ४, हाथी के कार्य में कुशल ५, पुस्तकादि लिखने
में कुशल ६, घोड़े के शाला का अधिकारी ७, वाचक ८, पाठशाला में पढ़ाने
वाला ९, यज्ञ करने वाला १०, गुरु ११।।१९१०।।
दानशीलस्तु तृणको ग्रामणीर्व्यसनाधिपः ।
आरामकरणोद्युक्तः पुष्पविक्रयतत्परः ।।१९११।।
दानशील तृण बेचने वाला १३, ग्राम प्रधान १४, व्यसन का अधिकारी १५,
बाग लगाने में कुशल १६, फूल माला बेचने वाला।।१९११।।
राजकार्यरतः सेनालतापुष्पफलक्रयी ।
नृत्यगीते च कुशलस्ताम्बूलफलविक्रयी ।।१९१२।।
राजकर्मचारी १८, फल-फूल खरीदने वाला १९, नाचगाने में प्रवीण २०,
पान बेचने वाला २१।।१९१२।।
निषिद्धविक्रयकरो ग्रामाणामधिकारकृत् ।
वंदी च देशिकः प्राज्ञो धूपकश्चौषधिक्रियः ।।१९१३।।
निंदित पदार्थ बेचने वाला, २२ ग्राम का अधिकारी २३, राज कर्मचारी २४,
देशिक २५, बुद्धिमान् २६, धूप बेचने वाला २७, दवा बेचने वाला
२८।।१९१३।।
कायस्य करणोद्यक्तो भारको भांडविक्रयी ।
कृषिकृच्च वणिग्धातुचर्मकारी च कर्षकः ।।१९१४।।
बहुरूप धारण करने वाला २९, भार ढोने वाला ३०, बर्तन बेचने वाला
३१, खेती करने वाला ३२, वैश्य वृत्ति करने वाला ३३, धातुचर्म का व्यापारी
३४, कृषक ३५।।१९१४।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२३
शास्त्राधिकारी विज्ञानी पुस्तकोरंजकोवणिक् ।
वेदवेदांगवेत्ता च शास्त्रज्ञोवंदिपाठकः ।।११५।।
शास्त्राधिकारी ३६, विज्ञान को जानने वाला ३७, पुस्तक का संग्राही ३८,
रंगने वाला ३९, वैश्य वृत्ति करने वाला ४०, वेदवेदांग को जानने वाला ४१,
शास्त्र को जानने वाला ४२।।११५।।
ग्रामणीरधिकारी च गणको दंडकारकः ।
भारकश्चेंधनाहारी फलमूलादिविक्रयी ।।११६।।
ग्राम प्रधान ४३, अधिकारी ४५, गणक ४६, दंड देने वाला ४७, भारक
४८ ईंधन का व्यापारी ४९, फल फूल बेचने वाला ५०।।११६।।
शांतकृत्स्वर्णकारी च कृषिकृत्पलविक्रयी ।
याजकोऽध्यापकोऽध्यक्षःप्रतिग्रहपरः फली ।।११७।।
शांतिस्थापन करने वाला ५१, सुनार का काम करने वाला ५२, खेती करने
वाला ५३, मांस बेचने वाला ५४, यज्ञ करने वाला ५५, अध्यापक ५६, अध्यक्ष
५७, दान लेने वाला ५८, फल बेचने वाला ५९।।११७।।
क्रमाद्व्युत्क्रमतश्चैव षष्ठिः स्यादंशकेषु च ।
कुछ भी काम न करने वाला ६० होता है, और समराशि में जन्म हो तो
विलोम से फल जानना चाहिये।
षष्ठ्यंश के विशेषः-
रवीशहरिविष्णीशदुर्गागणपतिष्वथ ।।११८।।
षष्ठ्यंश के दो दो अंशों को एक साथ करने से ३० होते हैं इस क्रम से
जिस अंश में जन्म नक्षत्र हो उसका फल क्रम से रवि १, ईश २, हरि ३, विष्णु
४, हिरण्यगर्भ ५, दुर्गा ६, गजपति ७।।११८।।
चंडिकायां च चंडेश चंद्रविष्णावीशपावके ।
त्रिपुराचेंदिराविष्णुहरिशंकरशंभुषु ।।११९।।
चंडिका ८, चंड ९, महादेव १०, चंद्र ११, विष्णु १२, ईश १३, अग्नि १४,
त्रिपुरा १५, इंदिरा १६, विष्णु १७, हरि १८, शंकर १९, शम्भु २०।।११९।।
क्षेत्रेशे गुरुडेस्कंदे शास्तरिब्रह्माणीश्वरे ।
विषापहरणोद्युक्ते जिने बुद्धे क्रमात्तथा ।।१२०।।

७२४. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
क्षेत्रेश २१, गरुड़ २२, स्कंद २३, शान्ता २४, ब्रह्मा २५, ईश्वर २६,
गरुड़ २७, जिन २८, बौद्ध २९, सभी में समान भक्ति होती है।।१२०।।
अथ मरण निमित्तानि-
ज्वरश्लेष्मातिसारासृग्जठरव्याधिमूलरुक् ।
मेहग्रहणिपिटिका पावकावनिशस्त्रतः ॥१२१॥
सूर्यादि १४ ग्रहों में से जन्म राशि में जो हो वा जिसका अंश हो उसके निमित्त
से मृत्यु कहना चाहिये। जैसे ज्वर १, कफ २, अतिसार ३, रक्तविकार ४, जठर
(पेट) व्याधि ५, मूलव्याधि ६, प्रमेह ७, संग्रहणी ८, पिटकरोग ९, अग्नि १०,
भू ११, शस्त्र १२॥१२१॥
दाहज्वरविषाभ्यां तु सूर्यात्कालांतिमेमृतिः ।
राशौ ग्रहांशके पित्तवातश्लेष्मनरोगतः ।।१२२।।
पित्तवातकफश्लेष्मपित्तवातैः क्रमात्स्मृतः ।
दाह १३, ज्वर विष निमित्त से मृत्यु कहना। प्रकारांतर से सूर्य से पित्त, चन्द्र
से वायु, भौम से कफ, बुध से पित्त, गुरु से वायु, शुक्र से कफ, शनि से कफ,
राहु से पित्त, केतु से वायु से मृत्यु होती है।।१२२।।
नवांश द्वारा मरण निमित्तानि-
ज्वरसन्निपातजठरामयांत्ररुग्रामप्रमेहजलाज्जलाग्नितः ।
ज्वरसन्निपाततोत्रभवेन्मृतिः क्रिय पूर्व कस्तुनिधनांशकेष्वितु ।।१२३।।
मेषादि राशियों में मरण कालीन नवांशों के निमित्त क्रम से ज्वर १ सन्निपातज्वर
२, जठर (पेट) के रोग ३, अंत्ररोग ४, प्रमेह ५, जल से ६, अग्नि से ७, ज्वर
से ९ मृत्यु कहना। यह जन्म लग्न के नवांश से देखना चाहिये।।१२३।।
राशिनिमित्ततो मृत्युविचारः-
गुल्मोदरज्वरविषाग्निजलादिपातगुदकलभगंदरोत्था ।
रक्तातिसारजठरज्वरमेहगुल्मकुष्ठातिसारपिटकादि-
भिरश्मरीयैः ।।१२४।।
मेषादि राशियों में क्रम से गुल्म १, उदरज्वर २, विष, अग्नि से ३, शस्त्रादि
से ४, भगंदर से ५, रक्तातिसार, जठर रोग से प्रमेह-गुल्म से ७, कुष्ठ अतिसार
से ८, पिटक रोग से ९।।१२४।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२५
शूलाशनिक्षतजपित्तसमावृतानि
शीतज्वरप्रभृतिराशिवशात्क्रमेण ।।१२५।।
शूल वज्रपातादि से १०, पित्तरोग से ११, शीतज्वरादि से १२ मृत्यु होती
हैं।।१२५।।
अथ कालादि सूर्य्यान्त चतुर्दशग्रहाणामंशेन मृत्युज्ञानम् –
कालादिरव्यंतखगोक्तजाता चेद्दुर्गपातपतनज्वरसन्निपातात्।
गोपातसत्वजनिता च मृतिः क्रमेण वामेन चापि पुनरेवमथांशकेषु।।
काल आदि १४ ग्रहों के क्रम से दुर्गपात से १, पतन से २,.ज्वर ३, सन्निपात
से ४, बैल से ५, पतन से ६, प्राणि निमित्त से ७।८, पतन से १३, दुर्गपात
से १४ मृत्यु होती है।।१२६।।
अथ रश्मिद्वारा वर्षानयने हरांशज्ञानम् –
आचतुर्थात्खभूतानि त्रयोद्वादश हारकौ ।
अथस्यादष्टमात्षष्ठिः पंचाष्टौ दशमात्ततः ।।१२७।।
पञ्चपञ्चाशदकाःस्युस्त्रयोरत्नानि हारकाः ।
एकादशेऽष्टषष्ठिःस्यात्सप्तकाष्ठाश्च हारकाः ।।१२८।।
त्रयोदशे च तानाः स्युर्द्विसप्ततिरथो मनौ ।
रश्मयः पंचदश चेत्पंचसप्ततिरेव च ।।१२९।।
वेदपंचरसा हारो दशरुद्राश्च रश्मयः ।
आत्रिंशतः क्रमादंका अशीतिरथ सप्ततिः ।।१३०।।
खेषवः खाब्धयः खाद्रिवेदसप्ततिः ।
षष्ठीरुद्रादिरिष्टेषु पंचसप्ततिरिद्रियुक् ।।१३१।।
रश्मि द्वारा वर्ष लाने के लिये हारक्यांक कहते हैं शेष चक्र से स्पष्ट है।।१२७-
१३१।।
एकाशीतिश्चतुर्युक्ता चत्वारिंशत्स्मृताःसमाः ।
सप्तांकरसतर्केषु नवाद्रिरसषट्कराः ।।१३२।।

७२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
रश्मिवर्षहारज्ञानायचक्रम् –

र.१२३४५६७८९१०१११२१३१४१५१६१७१८१९२०
व.०००५०५०५०५०६००५५६८०४९७५७५८०७०५०४०७
हा.०००३३३३५०३७०७३५४१०७९६६५
हा.०००१२१२१२१२८०९१०००६११०००००
रं.२१२२२३२४२५२६२७२८२९३०
व.७४७४६०७८५८७५७७८१८५४०
हा.९७६६२१११०९६१२
अथ अंशायुहारः-
रुद्रा दिङ्नवतर्काकी अंकहाराः क्रमादमी ।
रुद्रार्कमनुविश्वेऽष्टिः सप्तांकेष्वर्कदिक्छराः ।।१३३।।
११।२३।१४।१३।१६।७।५९।१२।१०।५।५४।९०। ये ये अंशायुर्दाय
के हार हैं।।१३३।।
राशीनामशायुर्दाये हारः-
वेदेषुवेदकांशाःस्युरंशहारा प्रकीर्तिताः ।
पंचानां च चतुर्णां च तत्तत्षण्णवतिःशतम् ।।१३४।।
५।४।६।९०।१०० ।।१३४।।
दशरुद्रानखामूर्छा हाराःस्युःक्रमशःस्मृताः ।
शते रसार्कुरुद्राश्च दशविंशोत्तरं शतम् ।।१३५।।
१०।११।२०।२१ ये क्रम से नवांशायुर्दाय के हार हैं शतायुर्दाय के क्रम
से ६।१२।११।१०।१२० हार होते हैं।।१३५।।
एते हाराःक्रमात्प्रोक्ताःकेषांचित्परमायुषः ।
केषांचिदनयोर्योगदलमाब्दाः षिशेषतः ।।१३६।।
किसी के मत से हार शतायु के योग का करना वही वर्ष होता है।।१३६।।
अथ पूर्वोक्तानां फल विचारः-
दशमं यावदायातःस्वकुटुम्बं विभर्त्ति च ।
कृच्छ्रेण दशमे पुत्रबाहुल्यानेकसंयुतः ।।१३७।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२७
यदि दश पर्यन्त रश्मि योग हो तो कष्ट से कुटुम्ब का भरण पोषण करे,
यदि दश रश्मि योग हो तो अधिक पुत्र हों।।१३७।।
एकादशे तु विद्वांसी निर्धनो जगती सदा ।
अरंति द्वादशे नित्यं निर्धनाःकुलपांशवाः ।।१३८।।
ग्यारह रश्मि हो तो पुत्र विद्वान् निर्धनता के कारण पृथ्वी पर घूमता रहे,
१२ रश्मि हो तो निर्धन, कुलाधम और नीच हो।।१३८।।
स्वदेहार्थधना दासा अतो यावत्तु विंशतिः ।
अतः परं मृतिं याता वाल्ये एव यथागताः ।।१३९।।
तेरह रश्मि हो तो शरीर के रक्षार्थ धन पैदा करने वाला, नौकरी करने वाला
और कितनों की वाल्यकाल में ही मृत्यु हो जाती है।।१३९।।
अथ योगज्ञानम् -
एवं प्राग्वत्सराः प्रोक्ताः प्रथमेचोत्तरेस्मृताः ।।१४०।।
केन्द्रत्रिकोणेष््वशुभाः ग्रहास्तु त्रिलाभषष्ठा

: ७२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
ग्रह हों तो मध्य अवस्था में और तीन ग्रह हों तो अंतिम अवस्था में दरिद्र होता
है।।१४४।।
योगान्तरम् -
नवयोगा इमे प्रोक्तास्त्रिषुस्थानेषु रेकदाः ।
कर्कटाद्वृश्चिकान्मीनाच्चतुर्ष्वेव क्रमात्स्थिताः ।।१४५।।
ये नवयोग तीन २ स्थानों के कहे गये हैं जो कि कर्क, वृश्चिक मीन राशि
से आरंभ होते हैं।।१४५।।
शत्रुगेहे स्थिताः पापा मध्येऽन्त्ये प्रथमे क्रमात् ।
सुखान्मृत्योर्व्ययात्पुत्राद्धर्माल्लग्नात्तथैव च ।।१४६।।
कर्क राशि से ४ राशि के अन्दर पापग्रह हों और शत्रु राशि में हों तो मध्य
अवस्था में योगफल होता है, वृश्चिकादि चार राशियों में हों तो अंत्य अवस्था में
और मीनादि चार राशियों में हों तो प्रथम अवस्था में योग का फल होता है। इसी
प्रकार ४।८।१२।५।९।१ भावों से भी योगों का विचार करना चाहिये।।१४६।।
एवमक्षा यदि न्यूनाश्चाष्टवर्गसमुद्भवाः ।
केन्द्रेषु च त्रिकोणेषु शुभा उपचये परे ।।१४७।।
केन्द्र (१।४।७।१०) त्रिकोण (९।५) स्थानों में शुभ ग्रह हों और ३।६।११
स्थानों में पापग्रह हों।।१४७।।
धनदेषु शुभांश्चान्ये परेषु च यदि स्थिताः ।
इष्टरश्मिफलाधिक्यैकश्च द्वौ च त्रयोपि वा ।।१४८।।
धन स्थान में शुभग्रह हों इष्टरश्मि फल अधिक हो और उच्च मूल त्रिकोण
राशि के एक, दो, तीन ग्रह हों।।१४८।।
उच्चादि पंचकस्थाने नवांशेष्वेव वा यदि ।
लक्ष्मीयोगा इमे प्रोक्तास्सुहृद्दृष्टास्तथापरे ।।१४९।।
अथवा उच्चादि के नवांश हों तो लक्ष्मी योग होता है।।१४९।।
योगान्तरम् -
रेके प्रोक्ताधिकालांशाः शुभारिःफाष्टषड्विना ।
उच्चौ द्वौ वा त्रयःकोणे चत्वारोऽतिसुहृत्स्थिताः ।।१५०।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२९
रेखा आदि दरिद्रयोग में जो अधिक कालांश कहे हैं वे और १२।८।६ इन
स्थानों को छोड़कर शेष स्थानों में उच्च त्रिकोण में हो के एक दो तीन वा चार
ग्रह हों अथवा अनिमित्र स्थान के होकर पांच, छः यां सात ग्रह हों तो श्रीलक्ष्मीयोग
होता है।।१५०।।
योगांतरम् -
मित्रेण पंच षट् सप्तखेटाश्चेच्छ्रीप्रदाःस्मृताः ।
द्विर्द्वादशे शुभो चन्द्रात्सप्तमे वा तयोस्तथा ।।१५१।।
चन्द्रमा से २।१२ स्थान में शुभग्रह हो अथवा लग्न से ७ स्थान में शुभ
ग्रह हों और लग्न में गुरु हों।।१५१।।
गुरौ लग्ने द्वितीये ज्ञे व्यये शुक्रेऽथवा भवेत् ।
भावदृग्बलकष्टेष्टफलभावस्वभावतः ।।१५२।।
दूसरे स्थान में बुध हो अथवा १२ वें स्थान में शुक्र हों तो लक्ष्मीयोग होता
हैं किन्तु भाव बल दग्वाल इष्टकष्ट फल के तारतम्य से फल होता है।।१५२।।
योगान्तरम् -
दायानां च फलैरेव भाववर्गेशसंयुतैः ।
रश्म्यंशसंभवादेव वर्षचर्यां च दैववित् ।।१५३।।
आयुर्दाय के फल के साथ भावेश और वर्गेश के फलों का समन्वय करके
रंश्म्यंश के तारतम्य से वर्षचर्या का फल कहना चाहिये।।१५३।।
एषामंशाश्च संभूताःकारकादिग्रहेरपि ।
मासचर्या दिनोत्थां नाप्यष्टवर्गसमुद्भवात् ।।१५४।।
तथा कारकादि ग्रहों के अनुसार मासचर्या और अष्टकवर्ग के अनुसार दिनचर्या
को कहना चाहिये।।१५४।।
अन्य विशेषः-
भावदृष्ट्योःप्रधानत्वात्कारको वोधको वले ।
इष्टकष्टफले त्वन्ये पाचको रश्मिसंभवे ।।१५५।।
इति वृहत्पाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽब्दचर्यावर्णनं नामश्रतुर्दशोऽध्यायः
भाव और दृष्टि के विचार में कारक ही प्रधान होता है उसी को लेना चाहिये।
वलावल के विचार में बोधक ग्रह की प्रधानता होती है अतः उसी को लेना चाहिये।
इष्टकष्ट और रश्मि के विचार में पाचक ग्रह की प्रधानता होने के कारण पाचक को
ही लेना चाहिये।।१५५।।

. ७३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अंतर्दाये तु भावानां प्रधानो वेधकःस्मृतः ।
अंतर्दाये दशानां तु कारको बोधकस्मृतः ।।१५६।।
अंतर्दाय के विचार में सभी भावों का वेधक प्रधान होता है, दशा के अंतर्दाय
विचार में बोधक और कारक प्रधान होते हैं।।१५६।।
भावस्वभावविषये पाचकस्त्वन्यथा भवेत् ।
पाचकस्त्वन्यथासूर्यश्चन्द्रमा बोधकःस्मृतः ।।१५७।।
और भाव स्वभाव के विचार में पाचक ग्रह प्रधान होता है। सूर्य स्वभावतः
पाचकग्रह है और चन्द्रमा बोधक ग्रह है।।१५७।।
इतिपाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽब्दचर्याध्यायश्चतुर्दशः ।
अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः।।९५।।
तत्रादौ रश्म्यंशफलम् -
षष्ठादिरश्मिष्वाद्येऽंशे जनको जन्मतोधृशम् ।
धनादिहीनो रिक्तश्च द्वितीयेऽंशे पितुर्मृतिः ।।१।।
छठें रश्मि के पहले अंश में जन्म हो तो उसका पिता निर्धन होता है दूसरे
अंश में जन्म हो तो पिता की मृत्यु होती है।।१।।
निःस्वस्तृतीये दासश्च चतुर्थे रंकसंयुतः ।
व्याधिभिः पीडितस्तद्वत्पंचमेभृशदुःखितः ।।२।।
तीसरे अंश में जन्म हो तो दरिद्र और सेवक होता है, चौथे अंश में दरिद्र
और व्याधिग्रस्त होता है, पाचवें अंश में अत्यन्त पीड़ित।।२।।
नवमे दशमे चैवं षष्ठेऽंशे सप्तमेऽपि च ।
व्याधियुक्तो दरिद्रश्च यदि जीवति जीवति ।।३।।
नवें, दशम, छठें और सातवें अंश में रोगी और दरिद्र तथा जीवने में भी
संदेह यदि जीवे तो जी सकता है।।३।।
एकादशेऽपि रश्मौ चेदाद्येऽशेपितृलालितः ।
पितुर्धनव्ययकरो द्वितीये वंधकीपतिः ।।४।।
ग्यारहवें रश्मि के प्रथमांश में पिता पालन पोषण करने वाला और पितृधन
हारक होता है। दूसरे अंश में हो तो स्त्री पुंश्चली होती है और स्वयं वेश्यासक्त होता
है।।४।।

अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३१
वेश्यासक्तस्तृतीये स्यान्निर्धनः कुलपांशनः ।
मृतपुत्रोऽथवाऽभाग्यश्चतुर्थे स्त्रीविमानितः ॥५॥
तीसरे अंश में निर्धन और कुलहीन होता है। अथवा मृत्यु मृतपुत्र वाला
भाग्यहीन होता है। चौथे अंश में स्त्री से पराजित हो॥५॥
पंचमेत्वल्पपुत्रः स्यात्षष्ठे चाप्यरुजा युतः ।
स्त्रीयोगे धनवान्कश्चित्सप्तमे दुःखितोऽधनः ॥६॥
पांचवें अंश में अल्पपुत्र छठें अंश में रोग रहित हो, स्त्री के योग से धनी
हो, सातवें अंश में दुःखी और निर्धन हो॥६॥
आद्येंऽशे द्वादशेरश्मौ नैव तस्य शुभाशुभौ ।
द्वितीये बलवान्मूर्खश्चौर्यद्रव्येण जीवति ॥७॥
बारहवें रश्मि के प्रथमांश में जन्म हो तो शुभ अशुभ समान हो, दूसरे अंश
में बलवान, मूर्ख चोर हो॥७॥
तृतीये च चतुर्थे च वेश्यापतिररिंदमः ।
नृपपुरुष मृत्युश्च भार्याहीनोऽसुतोऽधनी ॥८॥
तीसरे तथा चौथे अंश में वेश्यापति हो और शत्रु का नाश करने वाला राजपुरुष
के हाथ से मृत्यु हो और यदि जीवे तो स्त्रीहीन, पुत्रहीन और धनहीन हो॥८॥
विद्वांश्चतुर्दशे त्वाद्ये पितृभ्यांलालितः सुखी ।
द्वितीये क्लेशभाग्वापि शत्रुजिच्च रणाजिरे ॥९॥
पितृभ्यां हीन एवाथ लब्धकिंचिद्धनार्जकः ।
देशाद्देशागऽत्येव तृतीये धनतत्परः ॥९-१०॥
चौदहवीं रश्मि के प्रथम अंश में जन्म हो तो विद्वान हो, दूसरे अंश में माता
पिता से ललित और सुखी, तीसरे अंश में क्लेशयुक्त, शत्रु को जीतने वाला मातृ-
पितृ हीन हो और भ्रमणशील हो॥१०॥
सद्भिरेड्यः सुखी ख्यातः शांतबुद्धिररिंदमः ।
चतुर्थे धनवान् क्षेत्री विद्यार्जितपोषकः ॥११॥
चौथे अंश में धनी, सुखी, प्रसिद्ध, शांतबुद्धि, शत्रुनाशक, स्तुत्य, पांचवें
अंश में धनी, भूमि युक्त विद्या से जीविका करने वाला॥११॥
सती स्त्रीयोगसंयुक्तः पंचमेदुःखभाग्धनी ।
पुत्रादिसंपत्संयुक्तः एवं पंचदशे भवेत् ॥१२॥

: ७३२. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
उत्तम स्त्री से युक्त हो, छठें अंश दुःखी, धनपुत्र से सुखी, पंद्रहवे रश्मि का
फल ऊपर कहे हुये पांच अंश के सदृश ही समझना चाहिये।।१२।।
अस्मिन्षष्ठे धनी प्राज्ञो विद्यया सद्यशोभवेत् ।
एवं च षोडशे चांशे त्वतीव धनवान् भवेत् ।।१३।।
छठें अंश में बुद्धिमान् धनी सोलहवें और सत्रहवें रश्मि के प्रथम अंश में
अत्यंत धनी ।।१३।।
स्वबंधुभ्योऽधिकोऽन्येऽंशे विद्ययाऽथधनेनवा ।
पुत्रादिसंयुतः श्रीमांस्थ्यंशे स्यात्स्वजनेश्वरः ।।१४।।
दूसरे अंश मे बंधु से अधिक प्रतापी, तीसरे अंश में विद्या, धन पुत्रादि से
सुखी, चौथे अंश में अपने देश में अधिकार प्राप्त हो।।१४।।
इष्टापूर्तेन संयुक्तस्त्वष्टादशोनविंशके ।
पूर्ववद्विंशरश्मौ तु लब्धधामपरायणः ।।१५।।
पांचवें अंश में यज्ञ करने वाला, बावली, कूप, तालाब बगीचा लगाने वाला,
अठारह और उन्नीसवीं रश्मि का फल सत्रहवी रश्मि के अनुसार ही होता है। बीसवीं
रश्मि में भूमि प्राप्त करने वाला।।१५।।
वदान्यः पूर्वधर्माणं मनुवद्बहुपुत्रकः ।
एकविंशे धनैर्युक्तमाद्येऽनंतरभागके ।।१६।।
दानशील मनु के समान बहुपुत्रवान् हो, इक्कीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में
तथा दूसरे अंश में धनी हो।।१६।।
तृतीये तु भुवि ख्यातो दानेन च धनेन च ।
द्विनामत्वं तु वा यज्वा यानवाहनसंयुतः ।।१७।।
तीसरे अंश में दान धर्म से प्रसिद्धि युक्त वाहन युक्त, यज्ञ कर्त्ता, श्रीमान् बहुधन
से युक्त।।१७।।
श्रीमान्वहुधनानां च साधकश्च चतुर्थके ।
अग्निमांन्द्येन रोगार्तश्चतुर्थे धनवान्सुखी ।।१८।।
चौथे अंश में अग्नि मांद्य रोग से पीड़ित, श्रीमान्, अनेक धनों का साधन
धनी सुखी होता है।।१८।।
पंचमे देशयोविद्वान्वदान्यो दंतुरोऽथवा ।
सप्तमे धनहानिःस्याद्राजयोगैश्चमृत्युयुक् ।।१९।।

अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३३
पाचवें अंश में धनी सुखी, छठें अंश में वक्ष्य, दंतुर सातवें अंश में निर्धन
हो और राजनिमित्त से मृत्यु पाने वाला।।१९।।
अष्टमे निर्धनस्थानां जनानां पोषणे रतः ।
द्वाविंशे प्रथमेऽंशे तु पितुःपुत्रो धनस्य तु ॥१२०॥
आठवें में निर्धन दरिद्रों का पोषक, बाइसवें के प्रथम अंश में पितृधन का
रक्षक होता है।।१२०।।
द्वितीये धनहीनश्च किंचित्कृषिकरःसुखी ।
तृतीये राजकार्यार्थी तत्क्रमार्जितवित्तकः ॥१२१॥
बाइसवीं रश्मि के दूसरे अंश में निर्धन, थोड़ी खेती करने वाला और सुखी
होता है। तीसरे अंश में राजकार्य से धन प्राप्त करनेवाला।।१२१।।
चतुर्थे तु प्रभुश्चान्यनामभाग्दृढ़वंधनात् ।
पंचमे तद्वदेव स्यात्षष्ठे कार्यस्यहानिकः ॥१२२॥
चौथे अंश में समर्थ दो नाम से प्रसिद्ध, पांचवें अंश में चौथे के समान फल,
छठें अंश में कार्य की हानि करने वाला।।१२२।।
सर्वव्ययश्च रिक्तश्च सप्तमे रोगयुग्धनी ।
त्रयोविंशे तु जनकलालितश्च सुखी भवेत् ॥१२३॥
सातवें अंश में रोगी और धनी हो। तेइसवीं रश्मि के प्रथम अंश में पिता
से सुखी दूसरे अंश में सुखी।।१२३।।
तृतीये मूर्खकृत्येन पराभव समन्वितः ।
चतुर्थे चौरकृत्येन पंचमे व्याधिसंभवः ॥१२४॥
तीसरे अंश में मूर्खतावश हारखाने वाला चौथे अंश में चोर, पांचवें अंश
में रोगी।।१२४।।
षष्ठे दरिद्रःपुरुषो व्याधिना पीडितो भवेत् ।
श्रीमान् पुत्रश्चतुर्विंशे प्रथमेलालितोभृशम् ॥१२५॥
छठें अंश में दरिद्र, रोगी। चौबीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में धनी।।१२५।।
स्वजात्यनुगुणो विद्वान्प्रथमे च द्वितीयके ।
तेन ख्यातस्तृतीयेस्यात्स्वतंत्रः सर्वसम्मतः ॥१२६॥

७३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
पिता से सुखी, विद्वान्, स्वजातिगुण से युक्त, दूसरे अंश में पूर्व का ही फल,
तीसरे अंश में स्वतंत्र।।२६।।
क्षेत्रदारसुहृत्पुत्रकलत्रैर्बहुभिर्वृतः ।
पंचमेव्याधितः षष्ठे बहुव्ययपरायणः ।।२७।।
छठें अंश में अधिक व्यय करने वाला होता है।।२७।।
पंचविंशे तु षष्ठांशे फलहीनस्तु जीवति ।
षड्विंशे प्रथमांशे तु दरिद्रः स्यात्सुतोऽपिसन् ।।२८।।
पच्चीसवीं रश्मि के छठें अंश में निष्फल जीवन वाला, छब्बीसवीं रश्मि के
प्रथम अंश में दरिद्र।।२८।।
पितुःकार्ये तु वृद्धिःस्याद्द्वितीये पितृवेश्मतः ।
अन्यत्रगत्वा तत्रैव स्वयोगेन च कर्मणा ।।२९।।
दूसरे अंश में अपने गृह से अन्यत्र दूसरे स्थान में शरीर पोषण करने
वाला।।२९।।
स्वदेहपोषकोऽन्येंऽशेधनी च कृत्यवित्स्थितः ।
चतुर्थे पंचमे चैव पट्टबंधादिसंयुतः ।।३०।।
तीसरे अंश में धनी कार्य को जानने वाला, चौथे पांचवें अंश में पट्टबंधादि
से युक्त।।३०।।
अतीवधनवान्सस्यात्षष्ठेत्वंशे स्वदेहभाक् ।
क्षेत्रदारादिवृध्या तु व्यथा व्याधिसमन्वितः ।।३१।।
छठें अंश में धनी, सातवें अंश में देह पोषण करने वाला, आठवें अंश
में खेत और स्त्रियों की वृद्धि से जीवन चलाने वाला।।३१।।
नवमे धनहानिःस्यात्पुत्रदारविवर्जितः ।
यावद्दश नवांशाश्च षड्विंशवदथ द्वये ।।३२।।
नवें अंश में मानसिक रोग से युक्त, दशम अंश में धनहीन, स्त्रीपुत्रहीन
हो, सत्ताइस और अट्ठाइस रश्मि के फल पूर्वोक्तवत्।।३२।।
राजप्रियस्तत्रंशंडः शुद्धः स्यादंशकेततः ।
एकोनत्रिंशे रश्मौ तु सुखी स्याच्च द्वितीयेके ।।३३।।
उनतीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में जन्म हो तो सुखी होवें, दूसरे अंश में
राजसेवी तीसरे अंश में सत्कर्म करने वाला।।३३।।

अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३५
राजसेवी तृतीयेऽशे कृत्याकृत्यविदीश्वरः ।
बहुबंधुयुतः श्रीमान्मानवाहनसंयुतः ॥३४॥
चौथे अन्श में अधिपति पांचवें अन्श में बंधुओं के समागम में रहनेवाला,
छठें अन्श में श्रीमान्, सातवें अन्श में संतानयुक्त, आठवें अन्श में देशाधिपति
और नवम अन्श में ग्राम का अधिकारी हो।।३४।।
देशाग्रामाधिकारी च त्रिंशे त्वेतैःसमन्वितः ।
सेनानीनीतिमाञ्छूरः पंचमांशे भवेदिदम् ॥३५॥
तीसवीं रश्मि में भी पूर्वोक्त फल ही होता है इकतीसवीं रश्मि के पांचवें अन्श
में सेनाधिपति नीतिमान् शूर हो।।३५।।
षष्ठे तु विजयो युद्धे सप्तमेऽपिरुजा युतः ।
न्यूनायतिस्तु वस्वंशे नवांशे त्वधिकायतिः ॥३६॥
छठें अन्श में युद्ध में विजयी सातवें अन्श में रोगी, आठवें अन्श में थोड़े
लाभ वाला, नवम में अधिक लाभ वाला होता है।।३६।।
त्रयस्त्रिंशेतु राजानःषष्ठांशे वा तृतीयेके ।
अभिषिक्तो भवेद्यद्वा पट्टबंधस्तुयोगतः ॥३७॥
बत्तीसवीं रश्मि का फल पूर्व के अनुसार ही होता है। तैंतीसवीं रश्मि के छठें
और तीसरे अन्श में राजा होता है शेष पूर्ववत् फल होता है।।३७।।
रश्मौ तथा चतुस्त्रिंशे चतुर्थांशे पराजयः ।
तृतीये पंचमे षष्ठे युद्धे यु विजयी भवेत् ॥३८॥
चौतीसवीं रश्मि के चौथे अन्श में पराजयं, तीसरे, पांचवें, छठें अन्श में
विजेता।।३८।।
अष्टमे नवमेंऽशेतू वृद्धिःस्यात्शमेन हि ।
षडंशविषये यस्माच्चत्वारिशत्ततःपरे ॥३९॥
आठवें नवें अन्श में वृद्धियुक्त हो, चौतीस चालीस रश्मि तक के।।३९।।
द्वितीये च तृतीये च चतुर्थे चाद्यके तथा ।
राजा स्यात्पंचमेषष्ठेसप्ताष्टनवमेततः ॥४०॥
प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ अन्शों में राजा, सातवें अन्श में युद्ध आठवें में
व्याधि नवम में व्याधि।।४०।।