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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 731, कुल 800 में से

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पृष्ठ 731

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१९
भौम हो तो स्त्री का नाश, शनि हो तो दुर्भागिनी और राहु हो तो परस्त्रीगामी
होता है।।९१।।
धूमे विवाहहीनः सन्म्रियते कार्मुकेसति ।
परिवेशेतु दुःशीला केतौवंध्याऽसतीभवेत् ।।९२।।
धूम हो तो बिना विवाह के ही मर जावे, कार्मुक हो तो भी वही फल हो,
परिवेश हो तो स्त्री दुःशीला हो, केतु हो तो वंध्या और कुलटा हो।।९२।।
कालेऽभावस्य पापे तु गर्भश्रावेण संयुता ।
सुशीला स्त्रीप्रसूता च पूर्यमाणे तु शीतगौ ।।९३।।
काल हो तो स्त्री का अभाव, पापग्रह हो तो गर्भस्राव हो, पूर्ण चन्द्रमा हो
तो सुशीला, कन्या प्रजावती हो।।९३।।
बुधे त्वपुत्रा जीवेतु गुणयुक्ता सुपुत्रिणी ।
शुक्रे सौभाग्य संयुक्ता श्रीमतीपुत्रिणीभवेत् ।।९४।।
बुध हो तो पुत्र हीन हो, गुरु हो तो गुणी और पुत्रवती हो। शुक्र हो तो
सौभाग्यवती, लक्ष्मी से युक्त और पुत्रवती हो।।९४।।
अथ दशमभावानुसारफलम् -
एष्वेवं दशमे पापपुण्यकर्मरतो भवेत् ।
पंचाशद्भिः सुरैस्तत्त्वैनृपैश्च मुनिभिग्रहैः ।।९५।।
जिस प्रकार से सप्तम भाव से स्त्री के फल का विचार किया है उसी प्रकार
से दशम भाव से व्यापार आदि शुभाशुभ कर्मफल का विचार करना चाहिये। दशम
भाव शुभयुक्त वा दृष्ट हो तो शुभ कर्मफल जानना, पापग्रह से दृष्ट युक्त हो अशुभ
कर्मफल जानना चाहिये। मिश्रित ग्रह हों तो मिश्रफल इसमें भी शुभ पाप की संख्या
के समान ही शुभ पापफलों को न्यूनाधिक कहना।।९५।।
अष्टभिः षड्भिरेवाथ सप्तादिभिरनुक्रमात् ।
पंचादिभिश्च होराः स्युरेकोपचयैरथ ।।९६।।
इसमें भी ५० । ३३ । २५ । १६ । ७ । ९ । ८ । ६ । ७ तथा पाँच से एक पर्यन्त तथा
पूर्वोक्त अंकों में एक जोड़ने से।।९६।।
पापपुण्यक्रियाकर्त्ता क्रमाल्लब्ध्वांतरांशजः ।
आवृत्तितरुतरा प्रोक्ता पापपुण्यक्रियारतिः ।।९७।।